वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ध्यान क्यों करें, कैसे करें ? पार्ट 7      

“ध्यान क्यों करें, कैसे करें” विषय पर जून,1977 में गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज में परम पूज्य गुरुदेव ने अपने बच्चों की सुविधा एवं ट्रेनिंग के लिए एक विस्तृत उद्बोधन दिया। यह उद्बोधन अखंड ज्योति नवंबर, दिसंबर 2002 के दो अंक और जनवरी, फरवरी 2003 के दो अंकों में प्रकाशित हुआ ।इन चार अंकों के विशाल कंटेंट (लगभग 17000 शब्द)  को आधार बनाकर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की गुरुकक्षा में गुरुज्ञान को समझने का प्रयास किया जा रहा है। आज गुरुकक्षा में सातवां  पार्ट प्रस्तुत है, हमने इसे भी  यथासंभव, यथाशक्ति प्रैक्टिकल रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि इस ज्ञान का अमृतपान सार्थक हो सके। 

आज के लेख को इस प्रैक्टिकल दृष्टि से लिखा गया है कि हमारे साथी पढ़ते समय ऐसा अनुभव करेंगें कि यह तो हमारी रोज़मर्रा की ही बातें हो रही हैं। व्यापारी रोज़ ही कॉन्ट्रैक्ट Sign  करते हैं, शर्तें निर्धारित करते हैं, किस्तों की Frequency एवं Amount निर्धारित करते हैं,अदायगी न होने की सूरत में Defaulater की स्थिति भी आती है, यही सब कुछ  भगवान् के कॉन्ट्रैक्ट में भी हो सकता है। आज के लेख में भगवान के साथ रिश्तेदारी निकालने का भी सुझाव है,संबंध  बनाकर भगवान् से हम काम तो निकलवा ही सकते हैं लेकिन उनके प्रति कर्त्तव्यों का भी ज्ञान दिया गया है। लेख का समापन लोकमान्य तिलक जी के पाँव की सर्जरी  एवं ज्ञानप्रसाद लेखों के अमृतपान के उदाहरण देकर एकाग्रता एवं भगवान् के साथ एकाकार होने की शिक्षा दी गयी है। 

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गुरुदेव बता रहे हैं कि मनुष्य ने भगवान् के साथ एक “जीवनरुपी बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट” Sign किया हुआ है। यह एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है जिसमें केवल दो ही पार्टनर (शेयर होल्डर) हैं। दोनों की अपनी- अपनी Liabilities हैं जिन्हें मनुष्य ने तो अपने ह्रदय पटल पर लिखा हुआ है लेकिन भगवान का अकाउंटेंट धर्मराज सब लेख जोखा लेकर बैठा हुआ है। बिज़नेस में लाभ-हानि का सारा हिसाब-किताब उसी के पास है। बिज़नेस डील  की सभी Clauses को एक तरफ रख दें तो सबसे महत्वपूर्ण Clause ऐसी है जिसे मनुष्य कभी भी नकार नहीं सकता, नकारना  तो दूर, उसकी अदायगी में  एक दिन भी देरी होने से कॉन्ट्रैक्ट खतरे में पड़ सकता है, Bankruptcy की स्थिति का सामना  करना पड़ सकता है।     

दैनिक पूजा पाठ, यज्ञ हवन, आदि सारे क्रिया-कलाप के पीछे छिपा हुआ शिक्षण किसी बड़ी प्राप्ति की आशा न होकर बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के आधीन क़िस्त देने के इलावा और कुछ नहीं है। छोटे से छोटा कृत्य भी इसी दिशा में संकेत करता है। उदाहरण के लिए पुष्प, फल, अक्षत आदि    इस भावना से अर्पित किये जाते हैं कि हम इस बिज़नेस से हो रही कमाई का एक अंश रेगुलर ब्याज की क़िस्त मान कर अदा कर रहे हैं। मनुष्य को चाहिए कि मकान की क़िस्त, गाड़ी की क़िस्त, फर्नीचर, फ़ोन, टीवी आदि की क़िस्तों की भांति भगवान के साथ Sign किये गए कॉन्ट्रैक्ट को भी गंभीरता से लेना चाहिए नहीं तो Credit Defaulter होने की स्थिति आ सकती है जिसके परिणाम बहुत ही भयानक होंगें। 

यहाँ पर इस तथ्य पर बल देने की आवश्यकता है कि हर समय भगवान् के साथ ध्यानपूर्वक बैठकर “ध्यान” से बात की जाए, बिज़नेस के Pros and cons पर चर्चा की जाए और आगे की पृष्ठभूमि तैयार की जाए। भगवान् के साथ यह बिज़नेस डील 50-100 वर्षों की न होकर जन्म जन्मांतरों की  हो जाए। 

भगवान को रिश्तेदार बनाने वाली बात इतनी भी अस्वाभाविक नहीं है। दो बिज़नेस पार्टनर जब श्रद्धा से, ईमानदार से कार्य करते हैं तो कई बार रिश्तेदार भी  बन ही जाते हैं। गुरुदेव ने तो अपने उद्बोधनों में ऐसा भी कहा है कि हम आपका विवाह भगवान  से कराना चाहते हैं। यहाँ गुरुदेव कह रहे हैं कि भगवान् को अपना बच्चा बना लीजिए। गुरुदेव ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि  जीवनसाथी के बाद अगर मनुष्य किसी से अटूट प्यार करता है तो वोह  है उसकी संतान। संतान के लिए तो मनुष्य कुछ भी (कुछ भी !!!!)  करने को तत्पर हो जाता है। गुरुदेव बड़ी ही चतुरता से हम से “कुछ भी करने” का संकल्प लेने को कह  रहे हैं। इस संकल्प को  लेना तो आसान है लेकिन निभाना जितना  कठिन है उससे हमारे सभी संकल्पित साथी परिचित हैं क्योंकि ऐसे ही संकल्प ने उन्हें भी ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में बांधा हुआ है। इस संकल्प का  साक्षात उदाहऱण आदरणीय निशा भारद्वाज बहिन  जी का कल वाला कमेंट था जिसमें उन्होंने OGGP  से दो माह की दूरी को सज़ा कहा  था        

गुरुदेव कह रहे  हैं कि अगर आपके चार बच्चे  हैं, तो पाँचवाँ बच्चा भगवान को मान सकते हैं। आप भगवान्  को माता,पिता, बंधू, संगी/साथी सब कुछ तो मानते हो, रोज़ आरती में गाते भी हो, अब बच्चा मानकर देखो। बच्चे की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। गुरुदेव कहते हैं कि चार बच्चों का पालन पोषण तो कर ही रहा था अब पांचवें बच्चे की ज़िम्मेदारी भी निभा। अगर वोह बच्ची है तो ज़िम्मेदारी और भी बड़ी है। जिस प्रकार आपने चार बच्चों के खर्चे  का अलग-अलग बजट बनाया है  उसी तरह इस पांचवें बच्चे के लिए भी अलग से उतना ही  बजट सुरक्षित करना पड़ेगा। हम इस बच्चे के साथ पक्षपात नहीं कर सकते कि यह तो Adopt किया गया बच्चा है, इसका क्या है।  

इस सारी चर्चा को समझने एवं किर्यान्वित करने के लिए हमें रियलिटी के स्तर पर आना पड़ेगा। हमें रियलिटी चेक करना पड़ेगा कि सच में  भगवान हमारे  प्रिय सम्बन्धी हैं । भगवान ने हमारे जीवन में जितनी ज्यादा सुविधाएँ और संपदाएँ दी हैं, उसके लिए हमको भी कुछ करना चाहिए। हमारा श्रम, हमारी कमाई, हमारा उपार्जन, जिसमें हमारा पैदा होना भी शामिल है, बुद्धि भी शामिल है, भाव भी शामिल है, प्रतिभा भी शामिल है, इसका एक भाग लोकहित के लिए है, उसे समाज के कल्याण के लिए, देश के लिए, धर्म और संस्कृति के लिए खर्च करना चाहिए। 

ध्यान करते समय, यह भाव भी करते जाएँ कि भगवान् हमारे सम्बन्धी हैं एवं उनके प्रति हमारा  एक सुनिश्चित, नियमित कर्तव्य है, ऋण है। व्यावहारिक जीवन की भांति  “इस हाथ ले, उस हाथ दे” वाली प्रवृति का पालन करने से सम्बन्ध ख़राब भी नहीं होते और Clarity भी रहती है। 

भगवान् को सम्बन्धी समझने में मनुष्य भांति-भांति की आनकानी करने की कोशिश करता है, बहानेबाज़ी करता है। इस महगाईं के समय में चार बच्चों का बोझ उठाते-उठाते पहले ही कमर टूट चुकी है, अब एक और आ गया। जब कोई बहानेबाज़ी नहीं चलती तो मनुष्य मन के भटकने का बहाना बनाता है। मन का भटकना तो बहुत ही नार्मल सी स्थिति है। मन का भटकना, मन की चंचल (Flickering) प्रवृति के कारण है। जिन साधकों को मन की इस प्रवृति का ज्ञान नहीं है उन्हें ध्यान लगाने में समस्या आती ही है। बहुत बार कहा गया है कि 

मन की चंचलता एक ऐसा ज्ञान है, जिसे मनोविज्ञान/ न्यूरोलॉजी जैसे जटिल विषय ही समझा सकते हैं। 

हमारा उद्देश्य तो बहुत ही सरल है: ध्यान के  समय मन को पकड़ कर  रखना अर्थात ध्यानपूर्वक “ध्यान” लगाना।   

मन अधिक देर के लिए एक ही  बिंदु पर स्थिर हो ही नहीं सकता। साकार उपासना में , गायत्री माता की उपासना में हम देखते हैं कि गायत्री माता हंस पर विराजमान हैं, उनके एक हाथ में कमंडल, एक हाथ में पुस्तक आदि हैं। मन को सीमाबद्ध करने के लिए इसे इतने ही दायरे में घुमाना पड़ेगा। कभी कमल को देख कर , कभी हंस को देख कर , कभी मुकुट को देख कर  तो कभी उनके होठों को देख कर ध्यान लगाना पड़ेगा। मनुष्य का मन जब इतने ही सीमित दायरे में घूमेगा तो वही मन जो कुछ मिंटों के लिए भी केंद्रित नहीं हो पाता था अब घंटों भर भी ध्यान से ऊबता नहीं। तन्मयता और एकाग्रता प्राप्त करने का यही मार्ग है 

एकाग्रता का मतलब होता है- एक धारा, एक दिशा। शांतिकुंज में जब प्रातःकाल में गुरुदेव जब ध्यान कराते हैं तो  एक धारा देकर, एक दिशा देकर कराते है। मन को एकाग्र होने का दावा नहीं करते, बल्कि एक दिशा देते है। यह प्रक्रिया बिल्कुल एक वैज्ञानिक की प्रक्रिया से मिलती जुलती है। वह प्रयोग-परीक्षण करके सिद्ध कर देता है कि इसमें यह  कैमिकल मिल जाएगा, एक नया Product  बन सकता है। जब वोह यह प्रैक्टिकल कर रहा होता है तो उसे मालूम ही  नहीं कि उसके आसपास क्या हो रहा है क्योंकि वोह अपने काम के  साथ एकाकार हो गया है, एकाग्र हो गया है।

“ध्यान” लगाने के लिए ऐसे ही एकाकार होना पड़ता है।  

जो साथी इस समय एकाग्र होकर (ध्यान से, ध्यानपूर्वक) इस ज्ञानप्रसाद लेख को पढ़ रहे हैं वही  विस्तृत कमेंट लिखने में समर्थ होंगें। कमेंट लिखना ज्ञानप्रसाद लेखों को समझने की प्रथम सीढ़ी हैं। अंतिम उद्देश्य तो लोगों के साथ बातचीत करके गुरु-साहित्य को घर-घर में स्थापित करना है। जो सहपाठी एकाग्रचित होकर ज्ञानप्रसाद के किसी भी लेख  का अमृतपान करते हैं, वही जन-जन में ज्ञानप्रसार कर पायेंगें।    

लोकमान्य तिलक के पैर का ऑपरेशन होने वाला था। डॉक्टरों ने उनसे कहा कि आपको बेहोश करना पड़ेगा। उस जमाने में बेहोशी का तरीका बहुत घटिया था। एक बार क्लोरोफार्म सुँघा दिया, तो महीने भर तक उल्टियाँ आती रहती थी, सिर चकराता रहता था। बहुत शिकायतें रहती थीं। तिलक ने कहा कि फिर तो महीने भर में मेरा काम का बड़ा हर्ज होगा। आप ऐसा कीजिए कि बिना बेहोशी के ही ऑपरेशन कर दीजिए, मैं चिल्लाऊँगा नहीं। डॉक्टर ने कहा, आप चिल्लाएँगे। उन्होंने कहा, बिल्कुल नहीं, लाइए हम अपनी गीता की पुस्तक पढ़ना शुरू करते हैं। इसे पढ़ने में हम इतना तन्मय एवं एकाग्र हो जाएँगे कि उस  समय आप मुझे काटकर पटक देना मैं कुछ नहीं कहूंगा। डॉक्टरों ने कहा, अच्छी बात है। तिलक ने गीता की पुस्तक मँगाई। उन्होंने अपनी टाँग लंबी कर दी और पढ़ने में तन्मय हो गए। वे पुस्तक में पढ़ने लगे, “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥”इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं कि स्थितप्रग्य  मनुष्य कैसा होता है, जब वोह ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है तो कैसा अनुभव करता है ? इसे पढ़ने के बाद तिलक  समाधि में चले गए। डॉक्टर ने झट से पाँव का ऑपरेशन करके रुग्ण भाग को काटकर फेंक दिया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन हुआ कि नहीं हुआ। डॉक्टर ने कहा वोह तो कब का हो गया। 

वर्तमान लेख श्रृंखला का एकमात्र उद्देश्य है : 

ध्यानपूर्वक ध्यान देकर “ध्यान” करो, फिर कभी भी नहीं कहोगे कि “ध्यान” में मन नहीं टिकता

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कल वाले लेख  को 642  कमैंट्स मिले,17  युगसैनिकों (साधकों) ने,  24 से अधिक कमैंट्स, आहुतियां प्रदान करके ज्ञान की इस दिव्य यज्ञशाला का सम्मान बढ़ाया है जिसके लिए सभी को बधाई एवं सामूहिक सहकारिता/सहयोग  के लिए धन्यवाद्। जय गुरुदेव


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