29 अगस्त 2024 का ज्ञानप्रसाद– स्रोत:अखंड ज्योति अप्रैल 1940
आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करने से पहले अपने सभी सहपाठिओं से करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं कि अपने जन्म दिवस पर प्राप्त हुए आशीर्वाद का एक-एक करके रिप्लाई न कर पाए, धन्यवाद् न कर पाए। हमने अपने ही निर्धारित किये मानवीय मूल्य का पालन न करके त्रुटि की है जिसके लिए एक बार फिर से क्षमाप्रार्थी हैं।
एक बार फिर परम पूज्य गुरुदेव ने निर्देश दिया कि अगर मस्तिष्क रुपी कल्पवृक्ष की बात हुई है तो ह्रदय की, अंतःकरण की,अंतर्मन की बात क्यों न हो। 1940 के अप्रैल माह की अखंड ज्योति हाथ में थमा दी। हमारी सर्वआदरणीय बहिन सुमनलता जी द्वारा “शेयरधारक” शब्द प्रयोग करने वाले मार्गदर्शन ने हमें आज का लेख एक बिज़नेस Point of view से लिखने को प्रेरित किया। बहुत बहुत धन्यवाद् बहिन जी।
कल अगस्त माह का अंतिम शुक्रवार है और अंतिम शुक्रवार युवा साथिओं के लिए रिज़र्व होता है। इस शुक्रवार को हमारी बेटी डॉ सुमति “गृहस्थ एक तपोवन” की बात कर रही हैं।
आदरणीय सुमनलता बहिन जी के ही सुझाव पर शनिवार (माह का अंतिम शनिवार) को हमारी कठिन परीक्षा की घड़ी आन पड़ी है, कितना सफल हो पाएंगें, उस answer sheet का मूल्यांकन तो आप ही करेंगें।
सोमवार का ज्ञानप्रसाद गुरुनिर्देश पर ही निर्भर है, अब चलें उनके चरणों में गुरुकक्षा की ओर।
मेरा बिजनेसमैन पड़ोसी हर वर्ष अपने बिजनेस का हिसाब बनाता है। बड़ी ही तीक्ष्ण दृष्टि से हर आंकड़े को देखता है कि किसमें कितना लाभ हुआ और कितनी हानि। जिस क्रिया में लाभ हुआ है उसे और बारीकी के साथ देखता है,चिंतन करता है कि यही प्रक्रिया आगामी वर्ष में भी प्रयोग करेगा और इस वर्ष में भी किस प्रकार लाभ उठा सकेगा। जिस क्रिया के करने में हानि हुई है उसे बन्द करने या हानि के कारण को ढूँढ़ कर बन्द कर देने का हिसाब बनाता है।
बिजनेसमैन जो ठहरा; पूँजी को तो बड़े ही उत्साह, लालसा और एकाग्रता पूर्वक देखता है। बैंक में रखे पैसे पर कितना ब्याज मिल रहा है, गोदाम में कितना माल पड़ा है, तिजोरी में कितना पैसा है, इत्यादि सब का हिसाब लगाता है। यदि गत वर्ष की अपेक्षा कुछ बढ़ गया है तो वह प्रसन्न होता है, यदि घट गया है तो चिन्तातुर होता है। रात-रात जाग कर लाभ-हानि पर विचार करता है। इसे भी ऊपर उसे इस बात की चिंता रहती है कि पूँजी को कैसे सुरक्षित रखा जाए, उसे भय रहता है कि कहीं पैसा डूब न जाय।
इन सभी क्रियाओं को करते हुए वोह बहुत सतर्क रहता है, उसका व्यापार खूब चलता है और वह खूब प्रसन्न रहता है।
इन पंक्तियों के पाठक भी कुछ न कुछ बिज़नेस करते होंगे। वे भी मेरे पड़ोसी व्यापारी की भाँति अपने हिसाब का चिट्ठा बनाते होंगे और लाभ-हानि पर गंभीरता पूर्वक विचार करते होंगें । समय-समय पर अपने घर को Upgrade एवं Renovation के प्रयत्न करते होगें। शरीर के साज श्रृंगार की तो चौबीसों घंटे चिंता रहती ही है।
आइए आज असली व्यापार-घर चलें और लाभ-हानि का मूल्यांकन करें :
इस High level business-empire में जाने के लिए आपका सिक्योरिटी चैक होना बहुत आवश्यक है क्योंकि इस घर में केवल पुनीत आत्माएं ही प्रवेश कर सकती हैं। सारा बोझा उतार बाहर ही रख दीजिये, चिंताएं ,तृष्णाए,ममताएँ लादकर आपको वहां कोई नहीं जाने देगा। हमारी बात मानिए और कुछ क्षण के लिए इस बोझे को उतार कर एक तरफ रख दीजिए। विश्वास कीजिए ईश्वर के इस नंदनवन के भ्रमण के बाद आकर, अपना सारा बोझा उठा लेना, इसे कोई चुराने नहीं आयेगा। यह आपका बोझा है,आपको ही पसंद हैं, आपका बोझा कोई क्यों उठाएगा? यह आपको ही वाहन बनाना चाहेंगी,आपकी प्रतीक्षा में यहीं बैठी रहेगी।
Okay, ठीक है, बोझा उतर गया,अब आप थोड़ा हल्का हो गये, अच्छा किया। चलिये,ज़रा जल्दी-जल्दी चलिये। यह रहा आपका असली व्यापार-गृह जहाँ मन का, ह्रदय का, आत्मा का एवं दिलों का व्यापार होता है। ईश्वर से, परम पिता से व्यापार होता है। जो सामान आपने बाहिर छोड़ा था, उससे करोड़ों गुना ठाठ-बाठ यहाँ मौजूद है। आनन्द के अपार भण्डार यहाँ भरे हुए है। पवित्रता का उद्यान लगा हुआ है। अमृत के सरोवर भरे हुए है । इस व्यापार-गृह में पूरी तरह का स्वर्गीय वैभव मौजूद है, लाखों कर्मचारी स्वयं (बिना कहे ही) अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। यही देव-दुर्लभ आपका व्यापार-गृह है।आप बड़े सौभाग्यशाली हैं।
लेकिन यह क्या ? इतना वैभव प्रदान होने के बावजूद आपने कभी इसका ख्याल ही नहीं किया। आप तो भौतिकता की अंधी मृगतृष्णा में ही लिप्त रहे जिसके कारण इसमें इतनी अव्यवस्था दिख रही है। वर्षों बाद अपने व्यापार-गृह में आये हो, देख रहे हो जगह-जगह गन्दगी के ढ़ेर लगे हुए है? महल में चमगादड़ कैसे बस गए हैं, परम पिता के अमृत सरोवर मे किसी ने गंदा नाला मिला दिया, प्रकाश स्तम्भ तोड़-फोड़ दिए, इस नंदनवन में तो गधे घूम रहे हैं। नौकरशाही ने गन्दगी के ढेर लगाकर इस सारे स्वर्ग सरोवर को नरक बना दिया है। शायद तुमने कभी इधर ध्यान ही नहीं दिया। भौतिकता के गट्ठों के बोझ ने कदाचित आपको इस ओर ध्यान नहीं देने दिया, नहीं तो आपने इस घर की भी उसी तरह देखभाल की होती जैसे शरीर रुपी घर की करते हो ।
मेरा पड़ोसी बिजनेसमैन जिस प्रकार वर्ष भर के आंकड़े चैक करता है, हर रोज रोकड़ खाते लिखता है, तुमने तो मुद्दतों से कुछ भी वैसा नहीं किया। बहियाँ तो मुद्दतों से नहीं लिखी गई, वर्षों से सत्कर्मों का एक भी पैसा जमा नहीं हुआ। सदिओं पुरानी जमा पूँजी थी, उसी में से खर्च हो रहा था, वोह जमा पूँजी थोड़े ही दिनों में खत्म होने वाली है, उसके चुकने के बाद क्या होगा? शायद तुमने कभी यह भी विचार नहीं किया होगा कि जिस प्रकार जमा पूँजी घटती जा रही है, एक दिन दिवालिया हो जायेगा। अगर ऐसा हो गया तो तुम्हारा क्या होगा ? कभी इस बिज़नेस की बैलेंस शीट लिखी है ?
पड़ोसी बिजनेसमैन से तुम इतना भी सीख न पाए कि “जीवन के व्यापार” में धर्म की कितनी पूँजी इकट्ठी करनी है? सिर पर पाप का इतना कर्ज़ा चढ़ा लिया कि जन्म-जन्मांतरों तक इस कर्ज़े को उतारते फिरोगे।
ठीक है, जिन्होंने अपना सारा कारोबार नौकरों के सुपुर्द कर दिया है और खुद उसकी सारी सुधबुध भूल गया हो एवं झूठी ममता के गट्ठों को छाती से चिपका कर इधर-उधर भटक रहा हो, उसको इसी प्रकार हानि उठानी चाहिए।
ईश्वर ने अपने वरद पुत्र, अपने राजकुमार को संसार का त्राण करने की शक्ति से परिपूर्ण करके, पवित्रता का भण्डार प्रदान करके अपना समस्त राजपाट इसकी रक्षा के विश्वास से सौंपा था, लेकिन मनुष्य इस राजपाट के संरक्षण को भूल गया है। अमृतमयी मानसरोवर को नारकीय दुर्गन्ध भरा नाला बना दिया। अपने अंतःकरण की अखण्ड ज्योति को बुझाकर अन्धकारमय बना दिया।
हाय रे मनुष्य, तू सब कुछ भूल गया कि तुझे यह अतिदुर्लभ मनुष्य जन्म (जिसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैं) किस लिए दिया था?
इतनी आत्मविस्मृति, इतना आत्मपीड़न :
अरे मुर्ख, ज़रा क्षण भर बैठकर अपने अंतर्मन को खोज तो सही। देख इसमें कितनी कुवासनाऐं, कुटिलताएं आ घुसी हैं। वोह तुम्हारे अन्तःकरण में इतनी सावधानी से अपना स्थान बनाकर बैठ गई है कि अपना असली रूप प्रकट ही नहीं होने देती। मोटे तौर पर जब तुम स्वयं को देखते है तो कितना निर्दोष, सौम्य, सदाचारी और धार्मिक समझते हो लेकिन गम्भीरता से परीक्षण करने पर पता चलता है कि तुम्हारा अंतःकरण कुवासनाओं से भरा पड़ा है, ज्ञान-अभाव के कारण तुम्हारा ह्रदय अंधकारमय है। जिन बाहरी वस्तुओं की ममता के आधार पर तुम अपने वर्चस्व की ढींगें मार रहे हो, वह सारी ममता नश्वर वस्तुओं में अटकी हुई है। जिस प्रकार बंदरिया मरते दम तक अपने बच्चे को छाती से लगाए फिरती है, उसी नाशवान मोहमाया को तुमने गले का हार बनाया हुआ है।
हे राजकुमार, स्वयं को पहचानो,अपने असली व्यापार (जीवन-व्यापार) को मत भूलो। तुम्हारा अस्तित्व ही पूर्ण और विकसित बनने के लिए है, पूर्णता प्राप्त करो, विकास की ओर बढ़ो, आत्मशक्ति को पहचानो। स्वयं से प्रश्न करो, “मैं क्या हूँ?” अब तक कितना खो चुके, कितना नष्ट कर चुके इसका हिसाब लगाओ। भली प्रकार सोचो कि क्या तुम वही हो जो आज बने हुए हो? भली प्रकार विचार करो कि क्या तुम्हारा यही कर्तव्य है जिसमें आज जुटे हुए हो? भौतिक वस्तुओं को जुटाने में जितना परिश्रम कर रहे हो, क्या वह सार्थक होगा? धूप-शीत की कठिन स्थिति को सहन करते हुए, बालू के जो पहाड़ इकट्ठे कर रहे हो क्या वह हवा के एक ही झोके में उड़ नहीं जायेंगे?
हे राजकुमार,अपने असली रूप और असली धर्म का चिन्तन करो,बनावटी चीज़ों को देखकर ललचाओ मत, असल को खोजो और अंतर्मन को टटोलो,अपने अन्तर में मुँह डालो, अंतर्मुखी हो जाओ, देखो कि अब तक कितना खो चुके हो, बहुत घाटा हुआ, प्राप्त कुछ भी नहीं हुआ। भौतिक पदार्थों के अम्भार लगा दिए, रिश्ते-नातों की दो धारी तलवार से अपनी काया को लाद सा लिया, इस भौतिकता की अंधी दौड़ में भागते-भागते सांस फूलने लगी , मृत्यु जैसी स्थिति हो गयी लेकिन तुझे अक्ल न आयी।
अंतर्मुखी मनुष्य और बहिर्मुखी मनुष्य में वही अंतर् है जो भौतिकवादी और अध्यात्मवादी में है। अंतर्मुखी अपने केंद्र से,अपने अंतकरण से, अपनी जड़ों से, अपने परम पिता से, ईश्वर से जुड़कर सुख-चैन अनुभव करता है लेकिन बहिर्मुखी बाहरी वस्तुओं में, भौतिकता में, मित्रों में, रिश्तों में, पार्टिओं आदि में आनंदित रहता है। अनेकों बार चर्चा हो चुकी है कि भौतिकवाद और अध्यात्मवाद एक दूसरे के विपरीत हैं। एक तो प्राप्त करने के लिए दूसरे का त्याग करना ही पड़ेगा। कोलकाता से काशी जाने के लिए, कोलकाता को पीछे छोड़ना ही होगा।
जीवन के इस बिज़नेस में जितनी भी हानि हुई है,अब इस घाटे को पूरा करने में लग जाओ। हिसाब लगाओ, चिंतन करो कि कितनी पूँजी शेष रह गई है एवं इसे किस प्रकार चोरों से बचाया जा सके।
नियमितता से प्रतिदिन अंतर में मुँह डालने का संकल्प लो, अच्छा साहित्य ग्रहण करो, ज्ञानप्रसाद लेखों को न केवल इस उद्देश्य से पढ़ो कि पढ़कर, कमेंट करके अपनी ड्यूटी पूरी करनी है। आप बहुत सामर्थ्यवान हैं, स्वयं को Under-estimate मत करो, परम पूज्य गुरुदेव के प्रत्येक वचन को समझो, ह्रदय में उतारो, औरों को प्रेरित करो और फिर देखो कि आपका वीरान पड़ा नंदनवन फिर से हरा भरा होता है कि नहीं। विचार करो कि मेरे स्वर्ग सोपान को नरक बनाने वाले पिशाच किस कोने में छिपे बैठे हैं , उन्हें पूज्यवर के ज्ञान की मशाल जलाकर ढूँढ़ो और Business-empire से बाहर निकाल फैंको।
समापन
464 टोटल कमैंट्स, 29 मेन कमैंट्स और 8 संकल्पधारी कमैंट्स से आज की संकल्प सूची सुशोभित हो रही है, सभी को बधाई एवं धन्यवाद्।