वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के 2 सप्ताह बाद वंदनीय माताजी का “मातृवाणी” शीर्षक के अंतर्गत सन्देश का पांचवां एवं समापन पार्ट

20 अगस्त 2024 का ज्ञानप्रसाद-स्रोत अखंड ज्योति अगस्त-सितंबर 2002

परमपूज्य गुरुदेव ने स्वेच्छा से 2 जून 1990 को गायत्री जयंती एवं गंगा दशहरा अपनी स्थूल काया का त्याग किया। महाप्रयाण के बाद शपथ समारोह, श्रद्धांजलि समरोह जैसे विशाल भव्य आयोजन तो हुए ही लेकिन माँ की अंतरात्मा शांत कैसे बैठती जब तक गुरुदेव का सन्देश उनके बच्चों तक न पंहुच जाता। इसी को सार्थक करने के लिए वंदनीय माता जी ने 2 सप्ताह बाद ही, 16 जून 1990 को शांतिकुंज में अपने बच्चों को सम्बोधन किया। “मातृवाणी” यानि माँ की वाणी शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत की जा रही लेख श्रृंखला का आज पांचवां एवं समापन पार्ट प्रस्तुत है।
प्रकाशित हुए सभी चारों लेखों की भांति आज का लेख भी माँ की शिक्षा एवं मार्गदर्शन से भरपूर है।
ज्ञान से भरपूर इस लेख का अमृतपान करने से पहले बताना चाहेंगें कि हमारी आदरणीय बहिन साधना जी के अनुसार पांडे जी की सर्जरी रात 2:30 बजे संपन्न हो गयी थी और सूचना मिलने तक वोह ICU में ही थे, डॉक्टरों ने उन्हें 48 घंटे के लिए Under observation रखा है। हमारा पूरा परिवार साधना जी के साथ है, उन्हें किसी भी तरह की चिंता नहीं होनी चाहिए, ऐसा हम विश्वास से कह सकते हैं।
यह पांचों लेख अखंड ज्योति 2002 के अगस्त- सितम्बर अंकों में प्रकाशित हुए लेखों पर आधारित हैं, जो ऑडियो-बुक फॉर्म में भी उपलब्ध हैं। हम क्षमाप्रार्थी हैं कि अपने वचन के अनुसार इस ऑडियोबुक को प्रकाशित न कर पाए, आशा करते हैं कि इस शुक्रवार को प्रकाशित करेंगें।
आने वाले दिनों में गुरुदेव के पत्रों द्वारा मार्गदर्शन से पहले, हम कुछ दुर्लभ लेख लेकर आ रहे हैं जिन्हें हमारे टाईमटेबल में कहीं भी स्थान नहीं मिल रहा। यह ऐसे लेख हैं जिनके बारे में जानना हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक ही अंक में प्रस्तुत होने वाले, कल वाले लेख में अखंड ज्योति पत्रिका की 65 वर्षीय अनंत यात्रा के प्रारंभिक पड़ाव की जानकारी मिलने की आशा है।
278 मेन कमैंट्स और केवल 5 संकल्पधारी, भाई-बहिन के अटूट बंधन के साक्षी हैं।
साथिओं, अब ज्ञानकक्षा में गुरुज्ञान के अमृतपान का समय है, उचित रहेगा कि सम्पूर्ण श्रद्धा और विवेक से माँ की वाणी को सुने और अंतर्मन में उतारें।


बेटे, अगर सिद्धांतों को हमने अपने जीवन में उतार लिया है, तो फिर चाहे तुम छोटे ही क्यों ने हों, सिद्धांतों का प्रभाव अवश्य पड़ेगा। गाँधी जी दिखने में बहुत ही छोटे से थे लेकिन उनका प्रभाव कितना जबरदस्त था, सब जानते हैं। ऐसा प्रभाव पहले नहीं था, एक बार तो किसी मुवक्किल ने उनकी टाई पकड़ ली थी और कहा था “लाओ मेरे पैसे, तुमसे बहस नहीं होती” बाद में ऐसा क्या हुआ कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उनके आगे शीश झुकाता चला गया। उनकी एक आवाज़ पर लोगों ने घर छोड़ दिए, फाँसी के फंदे पर लटक गए और सारे देश को आज़ाद कराने के लिए वचनबद्ध हो गए।

ऐसा कब हुआ ? प्रभाव कब पड़ता है ?
प्रभाव तब पड़ता है, जब हम अपने जीवन को उसके लायक बना लेते हैं। मैं चाहती हूँ कि हमारा प्रत्येक कार्यकर्त्ता इसी तरीके से बनता हुआ, निखरता हुआ, सँभलता हुआ चला जाए। यह प्रवचन हाल तुम लोगों से खचाखच भर हुआ है। मेरे ख्याल में यहाँ लगभग 300-350 लोग तो बैठे ही होंगे, कम-ज्यादा भी हो सकते हैं। बेटे, हमारे पास बहुत बड़ी फौज है, हम बड़े सौभाग्यशाली हैं कि हमारे पास इतनी बड़ी सेना है,हमारे पास इतने सारे कार्यकर्त्ता हैं । औरों के पास तो दो-दो, पाँच-पाँच ही हैं, फिर भी वे इतने बड़े काम कर गुजरते हैं कि क्या कहें। देखते जाइए, हम न जाने कहाँ-कहाँ की छलाँग लगाएँगे।
अगले दिनों में हम सारे विश्व को हिलाकर रख देंगे। हमें यूं ही अपना साहस बनाए रखना चाहिए,तभी तो हम सारे विश्व को मथकर रख देंगे।
इस विश्वव्यापी कार्य की हिम्मत कौन देगा?
हिम्मत तो गुरुजी ही देंगें तो लेकिन कार्य आप करेंगें। बेटे, मैं भी धक्का लगाऊँगी लेकिन आगे-आगे तुम्हें ही चलना होगा। मेरा हाथ तुम्हारी पीठ पर होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। मैं इसी तरह तुम्हें छाती से लगाए रखूँगी। तुम्हें कोई भी अभाव नहीं व्यापेगा । मैं तुम्हें सँभालती भी आई हूँ।
बहुत दिनों से गुरूजी ने यह कार्य मेरे हाथ में ही दे रखा था, अब मैं पीछे कदम थोड़े ही हटाऊँगी। अब ये कदम आगे ही आगे चलेंगे, चाहे जो भी परिस्थितियाँ आएँ । वैसे परिस्थितियाँ इतनी भी खराब नहीं हैं
गुरुजी के बाद हमारा क्या होगा?
अगर आप कहें कि गुरुजी के बाद हमारा क्या होगा तो बेटे, गुरुजी का शरीर ही तो गया है,उनकी आत्मा तो यहीं पर विद्यमान है। मेरे पास भी है और सारे शांतिकुंज में भी विद्यमान है। आप जैसे पहले रहते थे, अब भी वैसे ही रहेंगे। माताजी जब आप नहीं रहेंगी, तो फिर हमारा क्या होगा? बेटे, आपसे हमारा वचन है कि आपको कोई घाटा नहीं होने वाला है, न तो पहनने का और न खाने का। घाटा होगा तो केवल आपकी संकीर्णता का,तंगदिली का। आप संकीर्ण रहेंगे, बुजदिल रहेंगे, कायर रहेंगे और जो आपका पहले संकल्प था, उस संकल्प को अगर आप तोड़ेंगे, तो कहीं के नहीं रहेंगे, दो कौड़ी के हो जाएँगे। जब हमें इसी मिट्टी में मिलना है, इसी में रहना है, इसी में मरना है, इसी में खपना है, तो अपना मनोबल बनाए रखना चाहिए। आप के लिए बेटे, हम इतना छोड़ जाएँगे और इतना गुरुजी भी छोड़ गए हैं कि आपका पेट पालन होता रहेगा।
भिखारी मत बनना, देवता बनना :
बेटे, हमारा एक भी कार्यकर्त्ता भिखारी नहीं है, फिर से सुन लो। हमारा कार्यकर्त्ता त्यागी और तपस्वी की लाइन में आता है। भिखारी की लाइन में नहीं आता। हमें उन लोगों से नफरत है, जो हमारे बच्चों को भिखारी के रूप में देखते हैं। धिक्कार है ऐसे लोगों को और धिक्कार है ऐसी मनोभूमि को जो हमारे बच्चों की मनोभूमि में,छोटे छोटे उपहार देकर उनका मनोबल गिरा दे । कुछ दिन पहले लंदन की एक महिला मेरे पास आई और बोली, माताजी, मैं चाहती हूँ कि यहाँ सबको अमुक चीज बाँट दूँ। मैंने कहा, देवी नमस्कार है तेरे लिए। तू हमारे बच्चों का मनोबल मत गिरा। जो देना होगा अपने बच्चों को हम देंगे। हमने उन्हें सादगी सिखाई है। हमारे बच्चे भिखारी नहीं हैं। हमारे पास होगा तो देंगे अन्यथा हम नमक-रोटी खिलाएँगे। हमें नहीं चाहिए तेरा साग और न ही चाहिए तेरी मेवा मिठाई । तू ले जा और वहाँ कहीं देकर आ जहाँ कोढ़ी बैठ होंगे। तू इसे कोढ़ियों को, भिखारियों को बाँट आना।
वह कहने लगी:माता जी,अन्य आश्रमों में तो यही होता है कि वहाँ जो सेठ जी आते हैं, कुछ-न-कुछ बाँटते ही रहते हैं। उनके पीछे-पीछे लोग कुत्तों की तरह फिरते हैं। इसी तरह मिठाई देखकर लोग पीछे लगे रहते हैं, उनके जयकारे बोलते हैं।
माताजी ने कहा: नहीं बेटी, तू ऐसे आश्रमों में दे आना लेकिन यहाँ मेरे बच्चों को गिराने मत आया कर।
माता जी कहती हैं : मैं आप से भी निवेदन करती हूँ कि आप कभी स्वार्थपरता में, कभी लालच में मत फँसना। बेटे, कई बार हमारी मनोभूमि विचलित हो जाती है, लेकिन ऐसी मनोभूमि को सँभालना, उसे विचलित मत होने देना। कई बार कुछ चीजें देखकर मन में लालच आ जाता है। आप ऐसा मत होने देना, नहीं तो हम दूसरों की आँखों में गिर जाएँगे। जो भगवान ने हमें दिया है, उसी में हम अपना संतोष करेंगे। बेटे, आप इसी तरीके से रहना ।
सूक्ष्म सत्ता ही सतत मार्गदर्शन करेगी:
आगे आने वाले तीन महीनों में आपके पुरुषार्थ में, आपकी भावनाओं में ऐसी उमंग आनी चाहिए जैसी हमें आ रही है। गुरुजी कहाँ गए हैं? कहीं नहीं गए, हमारे अंदर ही हैं। जब स्थूल शरीर में थे,तो भी तुम्हें कब मिलते थे, बताना जरा ? आप में से कौन रोज़-रोज़ मिलता था ? कोई भी नहीं मिलता था । दूर से दर्शन हो जाते थे। तीन वर्ष से तो गुरूजी के दर्शन दूर से भी नहीं हुए। फिर क्या आप शरीर को ही महत्त्व देंगे ? शरीर को महत्त्व नहीं देंगे, उनकी दिव्य चेतना को महत्त्व देंगे,जो हम सबकी रग-रग में समायी हुई है । जो हमारा मार्गदर्शन करती है, जो हमें प्रेरणा देती है और आगे चलने के लिए हमारा पथ बनाती है, हमको साहस देती है, हमको बल देती है।
बेटे, आज मुझे आपसे यही बात कहनी थी और ये कहना था कि आप साक्षात् मुझे देख जाइए। गुरुजी के महाप्रयाण को आज 15 दिन हो रहे हैं, इस बीच में भी मैंने गायत्री जयंती से लेकर परसों बुधवार तक स्वयं को किस तरह सँभाला, मैं तनिक भी विचलित नहीं हुई। आँखों में आँसू जरूर आए, विह्वल भी हुई, लेकिन मैंने कोई भी कार्य छोड़ा नहीं। कोई यह कह दे कि माता जी ऐसी हो गई हैं कि बोल भी नहीं सकतीं । बेटे, ठीक एक घंटा बोलकर आई हूँ। वैसे 40-45 मिनट ही बोलती थी, लेकिन उस रोज मैं एक घंटा बोलकर आई और अभी भी मुझे पौन घंटा हो रहा है, जबकि दो- सवा दो घंटे वहाँ बैठकर लोगों से मिलकर आई हूँ। ज़रा इस बुढ़ापे में ख्याल तो रखो, ध्यान तो दो कि क्या हालत हो रही होगी इस शरीर की। यहाँ सारे दिन भीड़ होती रहती है, शरीर का कचूमर निकलेगा कि नहीं।निकलने दो, लेकिन मेरे अंदर हिम्मत है, इसमें कोई दो राय नहीं है। मैंने जो वचन लिया है, अब मैं उसे निभाकर दिखाऊँगी।
बेटे, आप लोगों ने भी गुरूजी से जो वचन लिया था, उसे आप भी निभाइए। आप भी अपने संकल्पबल को ठीक कीजिए और अपने चिंतन को, चरित्र को ठीक कीजिए। जो भी कुचिंतन आ रहा हो, उसको साफ कीजिए।
हमारे सब बच्चे हमको बहुत प्रिय हैं। हम किसी को हटाना नहीं चाहते, किसी को भगाना नहीं चाहते, लेकिन गड़बड़ी होगी तो बेटे,उस सड़े टमाटर को हम फेंक भी देंगे, इसमें दो राय नहीं है। चाहे वह हमारा कितना ही विरोधी क्यों न हो जाए। हमें इसकी चिंता नहीं है। हमें तो गुरूजी का बनाया हुआ यह वंश आगे फैलाना है, इसे मजबूत बनाना है और विश्वव्यापी बनाना है । इसका विश्वविस्तार करना है। इस विश्वविस्तार में आपकी क्या-क्या भूमिका होनी चाहिए, इसके लिए आप तैयार हो जाइए।
बस,आपसे मुझे यही बात कहनी थी । इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करती हूँ ।
ॐ शांति ।


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