वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

डॉ ओ पी शर्मा जी  द्वारा लिखित पुस्तक पर आधारित लेख श्रृंखला का पहला लेख  

24 जून 2024 का ज्ञानप्रसाद

आज सोमवार है, सप्ताह का प्रथम दिन, रविवार के अवकाश के उपरान्त,उत्साह, जिज्ञासा, एवं ऊर्जा से संचित होकर गुरुचरणों में समर्पित होने का दिन। हम विश्वास कर सकते हैं कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी सहकर्मी, गुरुकक्षा के समर्पित विद्यार्थी जानने को आतुर होंगें कि गुरुदेव के अमृत कलश की  कौन सी अमृत बूँदें हमारा कायाकल्प करने वाली हैं। 

साथिओं को स्मरण होगा कि शनिवार वाले सप्ताहिक विशेषांक में आदरणीय डॉ ओ पी शर्मा जी द्वारा लिखित पुस्तक “अज्ञात की अनुभूति” पर आधारित लेख शृंखला के संकल्प के प्रति कुछ भूमिका बनाई थी,उसी संकल्प का आज से शुभारम्भ हो रहा है। 

हमारे साथ, हमारे सहकर्मी भी पूरी तरह से उत्साहित होंगें कि 202 पन्नों की इस दिव्य पुस्तक में क्या कुछ प्राप्त  होने वाला है। कुछ समय पूर्व डॉक्टर साहिब ने हमें वीडियो कॉल करके इस पुस्तक के बारे में सूचित किया था। यह पुस्तक शांतिकुंज की वेबसाइट पर उपलब्ध न होने के कारण, डॉक्टर साहिब ने हमें अभिषेक मिश्रा जी के द्वारा भेजने की कृपा की। इस पुनीत  कार्य के लिए हम अभिषेक जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। 

गुरुदेव की प्रत्येक पुस्तक की तरह इस पुस्तक का भी एक-एक पन्ना अद्भुत ज्ञान से भरा हुआ है। हमारे लिए इस पुस्तक में से कुछ अमूल्य रत्न ढूंढ कर लाना बहुत ही चुनौतीभरा  कार्य होने वाला है क्योंकि सारी पुस्तक का अमृतपान करना कोई सरल कार्य नहीं है। हम पूर्ण श्रद्धा और समर्पण से, अपने विवेक के अनुसार उत्तम से उत्तम ज्ञानप्रसाद लाने का प्रयास करेंगें। हमारा विश्वास है कि आने वाले लेखों में साथिओं को उनके अनेकों प्रश्नों के सरल समाधान  मिलने वाले हैं, कई प्रश्न तो ऐसे हैं जिन्हें हमारे साथी अक्सर हमसे लगातार पूछते आ रहे हैं, हमारे पास इन प्रश्नों के उत्तर न होने के कारण हम परिवार के मंच पर ले आते हैं यां शांतिकुंज को फॉरवर्ड कर देते हैं। अनेकों को अपनी योग्यता पर आधारित सफलता/असफलता भी मिलती रही है 

शांतिकुंज में “जीवनदान” करने का एक बहुचर्चित प्रश्न हमसे बार-बार पूछा  गया है, हमने अपने विवेक के अनुसार उत्तर  भी दिए हैं लेकिन इस पुस्तक के बाद हम स्वयं ही मूल्यांकन कर सकते हैं कि 

क्या हम जीवनदान  करने के योग्य हैं ?

क्या हमारी पात्रता है कि हम गुरुदेव हमें स्वीकार कर लेंगें ? 

यह कोई ऐसा वैसा कार्य नहीं है कि बैग में दो कपड़े डाले, आँखों में आंसू लिए शांतिकुंज में आकर Sympathy बटोर कर जीवनदानी बनने को तैयार हो गए। गुरुदेव ने अपने गुरु को सारा जीवन समर्पण कर दिया, इस पुस्तक के प्रस्तुतकर्ता डॉक्टर ओ पी शर्मा जी एवं उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर गायत्री शर्मा जी ने बाल्यकाल से ही दिव्य बैकग्राउंड होने के साथ-साथ सारा जीवन समर्पण कर दिया क्योंकि यहाँ देने की बात है, न कि लेने की। इसी सन्दर्भ में वंदनीय माता जी की एक छोटी सी शार्ट वीडियो बिलकुल ही फिट बैठती है 

जिसमें माता जी बता रही हैं कि उन्हें कैसे परिजनों की आवश्यकता है। हमारे परिजन जानते होंगें कि वंदनीय माता जी कितनी क्लियर बात करती  हैं, कैसे डांट डपट भी कर देती हैं, माँ जो ठहरीं।  

कुछ ऐसी ही बात कल शाम सम्पन्न हुए प्रोग्राम में आदरणीय डॉक्टर प्रमोद भटनागर जी बता रहे थे।

गायत्री जयंती/गंगा दशहरा का यह प्रोग्राम तो 6 घंटे तक चला लेकिन भटनागर जी द्वारा गुरुदेव का अपने गुरु के प्रति समर्पण का विवरण इतना अद्वितीय था कि शब्दों में वर्णन करना असंभव है, यह बातें तो वहां बैठ कर, सुनकर अंतर्मन में उतारने वाली हैं। ओंकार भाई साहिब के प्रज्ञा गीतों की तो क्या बात है, इतनी एटॉमिक शक्ति वाली आवाज़ कि क्या कहा जाए।

हमारे साथी हमारी कार्यप्रणाली से भलीभांति परिचित हैं कि हम थोड़ी-थोड़ी Dose देकर उसका प्रभाव देखने में विश्वास रखते हैं। 37 पन्नों की पुस्तक को एक माह तक पढ़ने का परिणाम ही है कि आज तक कमैंट्स में इसके प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो रहे हैं। 

जब भी किसी नई  लेख श्रृंखला का शुभारम्भ होता है तो पुस्तक के बारे में, लेखक के बारे में संक्षिप्त वर्णन देना अपना कर्तव्य समझते हैं। अधिकतर पाठकों में यह प्रथा बनी है कि पुस्तक के आरम्भ में दिए गए कुछ पन्नें पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, सीधा चैप्टर 1  से ही आरम्भ  कर दिया जाए तो ठीक है लेकिन ऐसा करना अनुचित ही होता है। 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में आदरणीय डॉ शर्मा जी ने अपने ह्रदय के द्वार हम सबके समक्ष खोल कर रख  दिए हैं।  जब गुरुदेव ने डॉ साहिब का इंटरव्यू लिया तो प्रथम प्रश्न  जिसने डॉ साहिब को भयभीत कर दिया था वोह था : मैं नंगा करके देखता हूँ। 

तो जब डॉ साहिब ने यह पुस्तक हम सबके मार्गदर्शन के लिए इतने परिश्रम से लिखी है तो ह्रदय के द्वार तो पूरी तरह से खोलने ही पड़ेंगें। 

तो आइए गुरुचरणों में समर्पित होकर, इस समर्पित जीवनदानी शिष्य के ह्रदय का अवलोकन करें। 

********************                                

कृष्ण जन्माष्टमी, दिनांक 30 अगस्त 2013 ब्रह्ममुहूर्त्त में उपासना के समय अन्त:प्रेरणा हुई। बाल्यकाल से लेकर अभी तक जीवन के हर क्षेत्र में सन्तोषजनक सफलता मिलती रही है, जिसका कारण: 

आज जब हम अपने प्रारम्भिक जीवन पर दृष्टिपात करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि जब से होश संभाला, मन में ॐकार’ का जप व पूज्य माता-पिता की प्रेरणा से गायत्री मन्त्र का 24 बार जप होता रहा है। सन् 1952 में पूज्य ब्रह्मचारी स्वामी अखिलानन्द जी द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार के समय नित्य सूर्य की उगती किरणों का ध्यान करते हुए 108 बार गायत्री मन्त्र जप करने का संकल्प करवाया गया। पिता डॉ यज्ञदेव शर्मा जी के निर्देशन व प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्रातः आँख खुलते  ही जप कर लेते थे और सायंकाल कुएँ के चबूतरे पर बैठकर पश्चिम की ओर मुख करके जप करते थे क्योंकि हमारी माता श्रीमती इन्दिरा देवी जी का कहना था कि जब तक जप नहीं करोगे, तब तक भोजन नहीं मिलेगा।

प्रतिदिन हर क्षण अन्दर से श्रेष्ठ भावनाओं का उठना, उत्साह-उल्लास का अनुभव होते रहना, प्रतिकूल परिस्थितियों में अन्दर से श्रेष्ठ मार्गदर्शन मिलना, जब तक सत्य न मिल जाये अन्दर से शान्ति का अभाव बना रहना, कुछ गलत कार्य सोचने या करने पर अन्दर से पश्चात्ताप का होना, उससे स्वतः दूर हो जाना, भविष्य का आभास व उसकी प्राप्ति के लिए बिना प्रयास किये सहयोग का प्राप्त हो जाना, यह सब स्वाभाविक व सरल रूप से चलते रहना, यह कैसे हुआ ? 

जन्म से घर में यज्ञ व गायत्री का वातावरण, माता-पिता की सेवा की भावना, दान की वृत्ति मन को प्रभावित करती रहती थी। प्रस्तुतकर्त्ता ने अपने जीवन में अपना निर्धारित दैनिक कार्य करते रहने के साथ-साथ प्रातः व सायं गायत्री मन्त्र जप में नियमितता और निरन्तरता को अन्त: प्रेरणा से बनाये रखा। जिसके फलस्वरूप युगद्रष्टा वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी एवं परम वन्दनीय माताजी, अलौकिक ऋषियुग्म का दर्शन, 13 दिसम्बर 1980 गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज  में आज से 40 वर्ष पूर्व हुआ। आज उनके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन ने देव संस्कृति द्वारा निर्धारित तीन कक्षाओं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ व वानप्रस्थ आश्रम को पार कराकर धर्मपत्नी डॉ. गायत्री जी का परम सहयोग से अन्तिम चतुर्थ कक्षा में परम पुरुषार्थ करते हुए स्वयं व समाज के कल्याण करने के लिए पहुँचा दिया। 

माध्यम था, गायत्री महामन्त्र, यज्ञीय जीवन एवं प्रत्यक्ष व परोक्ष मार्गदर्शन तथा प्रेरणाएँ ।

10 मार्च 2013 को हमने व डॉ. गायत्री जी ने गायत्री महामन्त्र के अनुष्ठान की पूर्णाहुति शान्तिकुंज  की यज्ञशाला में सम्पन्न की। 11 मार्च 2013 (मौनी अमावस्या ) को सजल श्रद्धा – प्रखर प्रज्ञा के दर्शनोपरान्त अन्दर से आवाज आयी, 

“बेटा यह अपना अनुभव जो मैंने तुमको दिया है, सबके भले के लिए प्रस्तुत कर दो। आज तुम श्रद्धेय डॉ. प्रणव जी से और श्रद्धेया शैल बहिन जी से आशीर्वाद लो। बेटा, लेखनी हमने “डॉ. प्रणव जी को दी है।” 

हम दोनों ने समय पर ऊपर दर्शन कर अपनी आध्यात्मिक डॉयरी प्रस्तुत कर दी। श्रद्धेय द्वय ने आशीर्वाद दिया । शान्तिकुंज  के अनुशासन में, कार्यक्रमों को सम्पन्न करने के साथ-साथ आध्यात्मिक डॉयरी (जो सन् 1970 से सुरक्षित रखी हुई है) के मुख्य अंश धर्मपत्नी गायत्री जी के सहयोग से संकलित एवं व्यवस्थित कर डॉक्टर साहब व श्रद्धेया शैल जीजी के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन, सहयोग, आशीर्वाद तथा कृपा से “सब लाभान्वित हों” की भावना से दिव्य सत्ता का दिया हुआ, उन्हीं के चरणों में आषाढ़ पूर्णिमा, 16 जुलाई 2019) गुरु पूर्णिमा पर्व पर  समर्पित कर दिया।

” त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बन्धुस्त्वं च देवता । संसार प्रति बोधार्थं, तस्मै श्री गुरवे नमः ।। उन गुरु को नमन करते हुए जो अपने शिष्य के लिए पिता हैं, माता हैं, बन्धु हैं, इष्ट देवता हैं और संसार के सत्य का बोध कराने वाले हैं। (गुरुगीता) इस ज्ञान और बोध पर्व पर- न त्वहं कामये राज्यं…. की भावना से ” हे गायत्री महाविद्या के महासिद्ध गुरुवर’”… त्वदीयंवस्तु गोविन्द ! तुभ्यमेव समर्पये! आप का दिया हुआ आप को समर्पित है, आप स्वीकार करें ।

प्रस्तुतकर्त्ता को गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज  में निवास करते हुए 32 वर्ष, इस शरीर के 76 वर्ष तथा आध्यात्मिक जीवन के 36 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। इसमें अपना कुछ भी नहीं है। हाँ, त्रुटियाँ ही अपनी हो सकती हैं। उसे क्षमा करने की कृपा करें ।

प्रभु चरणों में समर्पित (प्रस्तुतकर्त्ता )

डॉ. ओमप्रकाश शर्मा

शान्तिकुंज, हरिद्वार।

****************

614 कमैंट्स और 11 युगसैनिकों से आज की 24 आहुति संकल्प सूची सुशोभित हो रही  है।आज गोल्ड मैडल का सम्मान आदरणीय चंद्रेश जी को जाता है, उनको बधाई एवं सभी साथिओं का योगदान के लिए धन्यवाद्। 

(1)रेणु श्रीवास्तव-28,(2)नीरा त्रिखा-33,(3)सुमनलता-37,(4)अरुण वर्मा-24,(5)चंद्रेश बहादुर-56,(6)सरविन्द पाल-27,(7)संध्या कुमार-40,(8)सुजाता उपाध्याय-39,(9)पूजा सिंह-24,(10)मंजू मिश्रा-27,(11)पुष्पा सिंह-25

सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


Leave a comment