वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

DSVV के परिसर में स्थित प्रज्ञेश्वर मंदिर के शिवलिंग की कथा।

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20 जून 2024 का ज्ञानप्रसाद

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी साथियों का गुरुवार की ब्रह्मवेला में हार्दिक अभिनंदन एवम सुप्रभात।

आज का ज्ञानप्रसाद लेख नॉर्मल लेखों से कुछ हटकर है। जैसा कि कल वाले लेख के समापन पर लिखा था कि हमारी आदरणीय एवम सक्रिय बहिन पुष्पा सिंह जी को DSVV परिसर में स्थित प्रज्ञेश्वर मंदिर के शिवलिंग में गुरुदेव दिखाई देते हैं, उसी अनुभूति पर आज का लेख आधारित है।

बहिन जी ने इस अनुभूति के बाद हमें मैसेज करके बताया और और हमसे कुछ प्रश्न किए लेकिन हमने अपने सहकर्मियों की प्रतिभा को देखते हुए एवं उनसे समाधान की आशा करते हुए उचित समझा कि बहिन जी अपने प्रश्नों को ऑनलाइन ज्ञानरथ  गायत्री परिवार के मंच पर ही रखें तो उचित रहेगा। 

हमने ऑनलाइन रिसर्च करके प्रज्ञेश्वर महाकाल मंदिर में स्थापित दिव्य शिवलिंग की स्थापना से सम्बंधित एक लेख ढूंढ लिया जो अखंड ज्योति 2003 के मार्च अंक में प्रकाशित हुआ था। 

बहिन जी के प्रश्नों के बाद इस लेख का विवरण भी दिया गया है। हमारे साथी इस शिवलिंग की दिव्यता से परिचित हो सकते हैं। 

तो इन्हीं  शब्दों के साथ आज का ज्ञानप्रसाद बहिन जी के प्रश्नों से ही विश्वशांति की कामना का साथ आरम्भ करते हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत। हे ईश्वर ! सब सुखी रहें । सब निरोगी रहें।

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हमने बहिन जी को ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर शेयर करने का निवेदन किया और उन्होंने निम्लिखित लिखा:

भाई साहब प्रणाम,मैं अपनी यह  अनुभूति भेज रही हूं क्योंकि आपने कहा था कि यूट्यूब पर भेजिए शायद कुछ समाधान हो सके। आपको अगर ठीक लगे तो जब प्रस्तुत करना चाहें कीजिएगा कोई जल्दी नहीं है।

पुष्पा सिंह: जय गुरुदेव माता जी कोटि-कोटि प्रणाम

ज्ञानरथ गायत्री परिवार के सभी गुरु भाई बहनों को सादर प्रणाम आज मैं अपने साथियों से हाल में हुई अपनी एक अनुभूति  साझा कर रही हूँ, हो सकता है आप लोगों को भी यह  अनुभूति होती होगी या फिर किसी और तरह  की होती हो ।

मेरी अनुभूति निम्नलिखित है:

मैं टीवी पर शांतिकुंज हरिद्वार लाइव हमेशा सुबह और शाम  देखती हूँ । एक महीने पहले मुझे प्रज्ञेश्वर महादेव शिवलिंग में गुरुदेव का  हल्का सा चेहरा दिखाई देता था, कुछ दिनों बाद रोज़ ही एकदम साफ-साफ दिखाई देने लगा। फिर एक दिन गुरुदेव जी का हिमालयवास  जैसा पूरा दाढ़ी बढ़ा हुआ वाला चेहरा दिखाई दिया और दिखता ही रहा।  मैं सोचती थी कि यह  सिर्फ मुझे ही दिखता है कि  सबको दिखता होगा। फिर मन में यह  लगा कि  नहीं सबको दिखता होगा,अकेली  मैं ही भाग्यशाली थोड़े हूँ। फिर 2-3  जून को गुरुदेव जी के शरीर छोड़ने पर नाक में रूई लगा हुआ चेहरा दिखाई दिया, फिर तुरंत  ही अखंड ज्योति दिखाई दी, फिर हिमालय वाला चेहरा दिखाई दिया। मैं लगातारआंखें फाड़-फाड़कर देखती रही। 

सुबह के समय जब शांतिकुंज में  प्रज्ञागीत चलता रहता है और उधर सब दर्शन कराया जाता है, उसी समय लगभग 6:30 बजे  का समय होता है।

मैं उसी टाइम बाहर से टहलकर और दूध लेकर आती हूँ और टीवी ऑन कर पहले शांतिकुंज हरिद्वार लाइव लगाकर फिर अपना काम करती रहती हूँ । एक दिन मैंने  भाई बहनों से इस अनुभूति की चर्चा कर दी और वो हिमालय वाले चेहरे का फोटो भी खींच लिया था, वो फोटो भी उन्हें भेज दी, प्रमाण के रूप में दिखा दी । बस फिर क्या था  दो दिनों तक मुझे प्रज्ञेश्वर महादेव दिखाई ही नहीं दिये।अब तो मुझे बहुत अफसोस होने लगा मन काफी दुःखी  हो गया और मैं गुरुदेव जी से मन ही मन  प्रार्थना करने लगी कि अब किसी से नहीं बताउंगी, गुरुदेव मुझे दर्शन दीजिए तो तीसरे दिन से फिर दर्शन शुरू हुआ।

मैं आप लोगों से जानना चाहती हूँ  कि आप लोगों को भी ये सब दिखता है न । मैं अपनी एक महिला मित्र से पूछी तो वोह बोली कि  नहीं मुझे तो नहीं दिखते हैं और उसको भी फोटो शेयर की थी और डॉ त्रिखा भाई साहिब को भी। उसके बाद दो दिन तक मुझे दर्शन नहीं हुआ।

आप कृपया बताएं कि अनुभूति बताना चाहिए कि नहीं ? कृपया जरूर बताइएगा आपलोग जय गुरुदेव जी। 

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मंत्रमहार्णव ग्रंथ में बताया गया है कि कलियुग के प्रधान देवता तंत्राधिपति महाकाल शिव हैं। इसी ग्रंथ में उद्धृत है : ब्रह्मकृत युगे देवः त्रेतायाँ भगवान रविः । द्वापरे भगवान विष्णुः कलौ देवो महेश्वरः अर्थात सतयुग में ब्रह्मा प्रधान देव थे। त्रेता में सूर्य भगवान उपासना के प्रमुख देव हुए। द्वापर में मुख्य रूप से विष्णु भगवान की पूजा की प्रधानता थी। इसी प्रकार कलियुग के प्रधान देव भगवान महादेव-महाकाल हैं।

ऐसे महाकाल की रथयात्रा पुण्यभूमि भारतवर्ष की कुँभनगरी नासिक (महाराष्ट्र), ज्योतिर्लिंगों में एक प्रमुख त्र्यंबकेश्वर, भगवान श्रीराम की पंचवटी एवं पावनतीर्थ शिरडी से होती हुई, मध्य भारत की सतपुड़ा, विंध्याचल श्रृंखलाओं को पार कर, गोदावरी, ताप्ती, नर्मदा, पार्वती, चंबल, यमुना का सान्निध्य पाकर शाँतिकुँज हरिद्वार पहुँच रही है। महाशिवरात्रि की पूर्ववेला   में, वसंत के तुरँत बाद। 1, 10, 11, 12 जनवरी की तारीखों में पंचवटी क्षेत्र में गोदावरी तट पर कैलाशमठ, भक्तिधाम में इस ज्योतिर्लिंग का पूजन संपन्न हुआ। नर्मदा तट पर पाए गए, 7.5 क्विंटल के “महाकाल स्वयंभू” शिवलिंग के रूप में शाँतिकुँज, गायत्रीतीर्थ में स्थापित होने आ रहे हैं। सुपर्ब मिनरल्स के प्रमुख एवं गारगोटी  म्यूजियम के मुख्य निदेशक एक पुण्यात्मा श्री कृष्णचंद्र पाँडेय जी ने इसे प्राप्त होते ही शाँतिकुँज के लिए संकल्पित कर लिया था। श्री पाँडेय जी व कैलाश मठ के महामंडलेश्वर श्री संविदानंद जी के हाथों पूजन संपन्न कर एक विराट रथयात्रा 14 जनवरी मकरसंक्राँति की पावन वेला में रवाना हुई है। इस शिवलिंग का शाँतिकुँज पहुँचने का निर्धारित दिन 13 फरवरी गुरुवार है। इस बीच यह 27  स्थानों से होती हुई आ रही है।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह महाराष्ट्र की यात्रा पूर्ण कर मध्य भारत के गुना क्षेत्र तक आ चुकी थी। अब वसंत पर्व पर मथुरा स्थित  गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान रहकर यह फरीदाबाद, नोएडा होकर 13 फरवरी की शाम तक शाँतिकुँज आ जाएगी। अखंड ज्योति पत्रिका सबके पास पहुँचने तक यह यात्रा पूरी हो चुकी होगी। भारत इतना बड़ा देश है। इसका एक छोटा-सा क्षेत्र ही महाकाल की इस भव्य यात्रा का साक्षी बन पाया। मन तो यह था कि सभी महाकाल के दर्शन करते और फिर स्थापित होते लेकिन  यह संभव नहीं था। यही कारण है कि इस पत्रिका से,वीडियो पत्रिका युगप्रवाह द्वारा यह ज्ञात होगा कि जन-जन में इस यात्रा  ने कैसी उमंगे पैदा की हैं एवं  जन उत्साह किस तरह हिलोरें ले रहा है।

नासिक से शिरपुर तक की यात्रा में चाँदवड़, धुले होकर इस यात्रा ने अपना सफर चार दिन में पूरा किया। सेंधवा के माध्यम से इनका  प्रवेश मध्यप्रदेश में हुआ। पावन निमाड-मालवा अंचल के धामनोद, इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर राजगढ़, कुँभराज होकर यह यात्रा गुना पहुँची है। शिवपुरी, झाँसी, डबरा, ग्वालियर, मुरैना, धौलपुर, आगरा, आँवलखेड़ा होकर यह मथुरा पंहुची,जहाँ इसका विश्राम दो दिन रखा गया । फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, मुजफ्फरनगर होकर ब्रह्मकुँड, हर की पौड़ी के समझ से निकल यह गायत्री तीर्थ में प्रवेश कर 27 फरवरी तक यहीं विराजमान रहेगी। 1 मार्च महाशिवरात्रि की ब्रह्मवेला में गायत्रीकुँज-देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के केंद्र में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा है। इसमें सभी उन परिजनों को आमंत्रित किया गया है, जिन्हें आने वाले दिनों में विशिष्ट दायित्व सँभालने हैं।

इस यात्रा के साथ पाँच वाहन चल रहे हैं। हर जगह उत्साह देखते बनता है। त्रिपुरारि – महाकाल की यह सवारी परिवर्तन का संकेत लेकर आई है। लाखों लोगों ने शिवत्व धारण करने का, व्यसनों से मुक्त होकर सद्बुद्धि के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया है। युगसाहित्य, विभिन्न धर्म -मतावलंबियों ने पढ़ा व देवसंस्कृति का दिग्दर्शन प्रदर्शनी के माध्यम से किया है। महाकाल से साझेदारी करने हेतु हर किसी का मन मचल रहा है। माना जा रहा है कि युग परिवर्तन की वेला आ पहुँची है । इस ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा हिमवान् विराट हिमालय के द्वार पर विशिष्ट महत्त्व रखती है। आइए, हम सभी इससे जुड़ें व स्वयं को सौभाग्यशाली बना।

जय गुरुदेव 

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498 कमैंट्स और 9 युगसैनिकों से आज की 24 आहुति संकल्प सूची सुशोभित हो रही  है।आज का गोल्ड मैडल आदरणीय राधा त्रिखा  जी  को जाता है, उन्हें  बधाई एवं सभी साथिओं का योगदान के लिए धन्यवाद्। 

(1)रेणु श्रीवास्तव-29,(2)नीरा त्रिखा-28,(3)सुमनलता-25,(4)राधा त्रिखा-43,(5)चंद्रेश बहादुर-28,(6)मंजू मिश्रा-27,(7)सरविन्द पाल-31,(8)संध्या कुमार-32,(9)अरुण वर्मा-29                   

सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


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