वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

पुस्तक “मैं क्या हूँ ?” पर विदुषी जी, प्रेरणा कुमारी और संध्या  जी की फीडबैक 

(नीरा जी के सहयोग से आज का  ज्ञानार्जन इस वीडियो से करें)

https://youtu.be/nF6PqsTP0ZQ?si=iWdwJ… (हमारा साहित्य पढ़ाएं)

19  जून 2024 का ज्ञानप्रसाद

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं ने परम पूज्य गुरुदेव की प्रथम दिव्य पुस्तक “मैं क्या हूँ ?” का 23 लेखों के माध्यम से अमृतपान किया। हमारे पाठक समझ सकते हैं कि मात्र 37 पन्नों की छोटी सी पुस्तिका में ऐसा क्या था जिसने हमें 23 दिनों तक अध्ययन करने को प्रेरित किया। बार-बार एक कमेंट आते रहे कि “इस पुस्तक का पहले भी कईं  बार अध्ययन किया था लेकिन जिस विस्तार और सरलता से अब अध्ययन किया गया है, बहुत कुछ समझने में सहायता मिली है।” 

ज्ञान का तो कभी भी अंत नहीं हो सकता, 6 माह बाद अगर फिर से इसी पुस्तक को  पढेंगें तो न जाने कौन-कौन से प्रश्न मस्तिष्क पटल पर उभर आयेगें। इसलिए ऐसा भी निष्कर्ष निकल कर सामने आया है कि इस जटिल विषय को जितना भी समझ पाए हैं पर्याप्त  है। 

हमारी आदरणीय बहिन सुमनलता जी के कमेंट सदैव इतने उच्चकोटि  के होते हैं कि केवल  हम ही क्या, अनेकों साथी, बहिन जी के  कमैंट्स से मार्गदर्शन प्राप्त कर चुके हैं और करते रहेंगें। सभी साथिओं से हमारा करबद्ध निवेदन है कि बहिन जी के कमैंट्स एवं अन्य अनेकों साथिओं के कमेंट अवश्य पढ़ा करें, जिन्हें लेखन में तनिक भी समस्या आ रही हो, वोह समस्या एकदम उड़नछू  हो जाएगी।

आज के ज्ञानप्रसाद में तीन साथिओं, आदरणीय विदुषी जी,संध्या जी एवं हमारी सबकी प्रिय बेटी प्रेरणा का योगदान का शामिल किया गया है। ह्रदय से तीनों साथिओं का धन्यवाद् करते हैं। 

चार भागों में प्रकाशित हुए फीडबैक विशेषांक का आज इस अंक के साथ समापन हो रहा है। सभी साथिओं का धन्यवाद्  करते हैं जिनके सहयोग से यह वाला प्रयोग भी पूर्णतया सफल रहा, सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  

कल आदरणीय सुमनलता बहिन जी ने अपने कमेंट में  A+ ग्रेड की बात की थी, इसके सन्दर्भ में हम अपने कार्यकाल के एक संस्मरण की संक्षिप्त सी चर्चा करना चाहेंगें। यह संस्मरण M.Phil.विद्यार्थिओं के Environmental chemistry के अवार्ड्स से सम्बंधित है। हम किसी एक विद्यार्थी के  ज्ञान इतना अधिक प्रभावित थे कि हमने उसे O अर्थात outstanding  ग्रेड दे दिया लेकिन हमारे वाईस चांसलर साहिब को यह बात गवारा न हुई। उन्होंने  हमें बुलाकर विद्यार्थी को  A ग्रेड देने के लिए बाधित किया। इस आग्रह के पीछे उनकी धारणा थी कि हमारी यूनिवर्सिटी में कोई  भी Outstanding विद्यार्थी नहीं है। लेकिन जब हमने बताया कि इस विद्यार्थी का ज्ञान हमसे भी अधिक है तो वाईस चांसलर साहिब को हमारी बात माननी पड़ी। 

बहिन जी के सुझाव में भी,यही लोजिक बिल्कुल फिट बैठ रहा है। A+ क्यों, हमारे साथिओं को तो O ग्रेड मिलना चाहिए, सभी हमसे अधिक ज्ञानवान ही हैं और फिर हम कौन होते हैं किसी को ग्रेड देने वाले, यह तो परिवार का सामूहिक निर्णय है जो सर्वमान्य है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में जो कुछ भी हो रहा है केवल परिवार की सर्वसम्मति और सम्मान से ही हो रहा है। 

कल प्रस्तुत किया जाने वाला ज्ञानप्रसाद हमारी अति आदरणीय बहिन  पुष्पा जी से सम्बंधित है। देव संस्कृति विश्विद्यालय गायत्रीकुंज स्थित प्रज्ञेश्वर महाकाल के शिवलिंग से सम्बंधित  उनकी अनुभूति एवं शिवलिंग की महत्ता को वर्णन करने के बाद, बहिन जी के मन में उठ रहे प्रश्नों का समाधान होने की संभावना है। 

इन्हीं शब्दों के साथ आज की गुरुकक्षा का शुभारंभ गुरुचरणों में समर्पित होकर होता है। 

जय गुरुदेव 

*******************       

1. आदरणीय विदुषी बहिन जी की फीडबैक:

ॐ श्री गुरु सताए नमः आ. त्रिखा भाई सा. को हमारा भाव भरा नमस्कार 

“मै क्या हूं”गुरुदेव की प्रथम पुस्तक जो कि आत्मा के विस्तार के ज्ञान का भंडार है, बहुत कुछ जानने को मिला ।

सार यही है कि यह संसार जीवन और शक्ति का समुद्र है। इस जगत में अनंत अणु/परमाणु जीवित हैं और अपनी अनंत उर्जा से ये गतिमान हैं। एक ही चेतना हम सब के भीतर विद्यमान है। मेरा अस्तित्व मेरे तक ही सीमित नहीं है ये समस्त संसार ही उस विशुद्ध आत्मा का विस्तार है और अपने विशुद्ध रूप में वह परमात्मा ही है। इस पुस्तक से हमें समझ लेना चाहिए कि भौतिकता के पीछे भागने से अच्छा है कि हम स्वयं को जाने और इस मिथ्या जगत में रहते हुए उस परमसत्ता से एकाकार होने का अनुभव प्राप्त करें। यह तभी संभव है जब मनुष्य में हर प्राणी के प्रति प्रेम, करुणा, वात्सल्य, अहिंसा का भाव जागृत हो। 

आज का ये समापन अंक बहुत ही ऊर्जावान और ज्ञानवर्धक है। इस अनमोल लेख को सरलता से हम सब के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए त्रिखा भाई को अनंत-अनंत शुभ कामनाएं व आभार व्यक्त करते हैं।

जय मां गायत्री, शुभ दिन शुभ प्रभात,सभी को प्रणाम 

2. हमारी प्रेरणा बिटिया की फीडबैक: ओम् श्री गुरूसत्ताए नमः

परम आदरणीय चाचाजी आपके श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन वंदन। आपने हम सबको परम पूज्य गुरुदेव की लिखित प्रथम पुस्तक “मैं क्या हूं” लेख श्रृंखला पर आधारित लेखों पर अपने विचार प्रस्तुत करने का जो अवसर प्रदान किया है सचमुच यह अद्भुत है।

इस पुस्तक को मैंने बहुत पहले पढ़ा था परंतु ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया था क्योंकि गुरुदेव की लेखनी को समझने के लिए वैसी योग्यता भी होनी चाहिए। आपने जब इसे छोटे-छोटे लेखों के माध्यम से समझाया तो सचमुच यह जादू कर गया। एक-एक तथ्य को आपने बहुत ही सरलता से समझाया कि हमारा शरीर आत्मा का वस्त्र है। जब यह वस्त्र रूपी शरीर पुराना हो जाता है तो आत्मा उसे छोड़ देती है और फिर नया वस्त्र धारण करती है। इसीलिए हमें शरीर से ज्यादा मोह नहीं करना चाहिए और स्वयं को आत्मा ही समझना चाहिए।यह वही आत्मा है जिसमें परमात्मा निवास करते हैं। हम सब परमात्मा को बाहर ढूंढते फिरते हैं, जबकि वो हमारे सबसे नजदीक है, हमारे अंदर ही विराजमान हैं।

“मैं क्या हूं” पुस्तक में गुरुदेव यही समझा रहे हैं कि खुद को शरीर नहीं आत्मा समझो। बस इतना ही समझ लेने मात्र से जीवन की समस्त परेशानियां क्षण भर में दूर हो जाएगी परंतु यह इतना सरल भी नहीं है। हां यदि गुरुदेव के द्वारा बताए गए नियमों का पालन करेंगे तो अवश्य ही यह संभव हो पाएगा और आत्मा से साक्षात्कार कर पाएंगे।

सचमुच यह लेख श्रृंखला मेरे लिए “कोहिनूर के हीरे” से भी बढ़कर है। इसके लिए मैं परम आदरणीय चाचाजी का जितना भी धन्यवाद करू कम है।

किसी भी त्रुटि के लिए हृदय से क्षमा प्रार्थी हूं।

जय महाकाल।।

3. आदरणीय संध्या बहिन जी की फीडबैक:

परमपूज्य गुरुसत्ता को सादर नमन,वन्दन,पूजन। आदरणीय डॉक्टर त्रिखा भाई जी को गुरुवर की 1940 में प्रकाशित दिव्यपुस्तक”मैं क्या हूँ” पर ज्ञानवर्धक लेख श्रंखला प्रस्तुति हेतु हार्दिक आभार, साधुवाद, सादर नमन, आज आदरणीय त्रिखा भाई जी ने इस लेख श्रंखला पर विचार प्रकट करने का निमंत्रण दिया है, अतः मैं भी एक प्रयास कर रही हूँ l

परमपूज्य गुरूदेव की दूरदृष्टि को सादर शत शत नमन। सर्वप्रथम सर्वाधिक गूढ़ एवं महत्वपूर्ण विषय पर पुस्तक प्रकाशित कर दी l मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है, जिसे परमात्मा ने अनेक श्रेष्ठ उपलब्धियों से अलंकृत किया है, उसे बुद्धि एवम  विवेक के माध्यम अपने मन पर पूरा नियंत्रण रखना चाहिए कि मन को उसका स्वामी नहीं बल्कि सेवक बन कर रहना चाहिए। हर जीवधारी के शरीर के भीतर परमात्मा का दिव्य अंश आत्मा के रुप में विद्यमान है। मनुष्य, आत्मज्ञान,आत्मदृष्टि, आत्मस्वरूप एवं आत्मा से साक्षात्कार करता हुआ आत्मा का दर्शन कर सकता है । इस हेतु आदरणीय त्रिखा भाई जी ने  तीन सरल प्रेकटीकल बताये हैं,जिनके नित्य एवं निरन्तर प्रयास से आत्मा के दर्शन की प्रक्रिया संभव होती है। इस प्रकाशमनी के दर्शन के साथ ही मनुष्य के सारे दुर्गुणों का शमन एवं सद्गुणों का विकास होता है,जिसके फलस्वरूप मनुष्य स्वयं की आत्मा के साथ-साथ अन्य में भी आत्मा के दर्शन करता है एवं इसका आभास महसूस करता है। परिणास्वरूप स्वतः ही परस्पर ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा का नाश हो जाता है और  शेष रह जाता है  प्रेम, प्रेम और केवल प्रेम।

इस तरह मनुष्य आत्मा के माध्यम से परमात्मा का सानिध्य प्राप्त करता हुआ परमानन्द का अनुभव प्राप्त कर सकता है l 

इस गतिशील, परिवर्तनशील संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, हम सब को भी अनुभव है कि मनुष्य शिशु से बालक, बालक युवा, युवा से व्यस्क, व्यस्क से  प्रोढ़ और फिर प्रौढ़ से बुजुर्ग की दहलीज पार करता हुआ अंतिम पड़ाव पर पहुँच कर परलोकगामी हो जाता है। वह जीवन भर अनेक क़ीमती वस्तुओं का संग्रह करता रहता है किंतु चाहे लाख यत्न कर ले यहाँ से कुछ लेकर  नहीं जा सकता एवं स्वयं रुक भी नहीं सकता। अतः “ईश्वर के राजकुमार” को अपना जीवन उत्तम विचारों, संयमित दिनचर्या के साथ व्यतीत करते हुए अपनी आत्मा को साधना रूपी भोजन करवाना चाहिए जिससे आत्मा को बल मिलेगा। ऐसा करने से मनुष्य का जीवन परिष्कृत होते हुए, परमात्मा से सानिध्य स्थापित करते हुए परमानन्द का अनुभव प्राप्त कर सकता है, लेकिन मनुष्य शारीरिक सुख और लाभ में ही लिप्त रहता है एवं आत्मा को साधना रूपी भोजन से वंचित रखता है। अतृप्त आत्मा के कारण मनुष्य एक चलती-फिरती लाश की भाँति जीवन जीता है एवं कोई लक्ष्य नहीं प्राप्त कर पाता है I मनुष्य के लिए यह समझना नितांत आवश्यक है कि शरीर साधन है एवं आत्मा साध्य है। जो मनुष्य इस गूढ़ज्ञान को समझ जाता है वह आत्मा को साधना रूपी भोजन अवश्य करवाता है तथा वह स्वतः ही उपासना, आराधना की ओर अग्रसर होते हुए अध्यात्म के मार्ग पर चल निकलता है। उदाहरण स्वरूप अनेक दिव्य आत्माओं ने इसे कर दिखाया है, भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं किंतु समस्त विश्व सम्मान से उन्हें स्मरण करता है l परमपूज्य गुरूदेव इस तथ्य के ज्वलन्त उदाहरण हैं। वोह आज स्थूल रुप में हमारे बीच नहीं हैं किंतु सूक्ष्म रुप में प्रत्येक गायत्री परिजन को स्नेह एवम संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार को भी गुरुवर का पूर्ण स्नेह संरक्षण प्राप्त है, तभी तो यह परिवार प्रगति के पथ पर अग्रसर है। हमारे संचालक एवं मार्गदर्शक आदरणीय त्रिखा भाई जी को गुरुवर ने जांच परख कर ही परिवार के संचालन का पावन कार्य सौंपा है जिससे वह हम अनेक परिजनों के जीवन की दिशा एवं दशा को परिष्कृत कर रहे हैँ। गुरुवर ने अपनी आत्मा को कठिन तप एवं साधना द्वारा जागृत कर सदैव परिष्कृत किया,एवं परमात्मा से सानिध्य स्थापित कर उनसे एकाकार होकर अनेक असम्भव कार्यों को संभव कर दिखाया l 

यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है, कुछ त्रुटि हो क्षमा करें। 

**********************

414  कमैंट्स और 7  युगसैनिकों से आज की 24 आहुति संकल्प सूची सुशोभित हो रही  है।आज का गोल्ड मैडल आदरणीय सुजाता जी एवं संध्या जी  को जाता है, दोनों को बधाई एवं सभी साथिओं का योगदान के लिए धन्यवाद्। 

(1)रेणु श्रीवास्तव-31,(2)नीरा त्रिखा-25,(3)सुमनलता-29 ,(4)सुजाता उपाध्याय-42,    (5)चंद्रेश बहादुर-29 ,(6)संध्या कुमार-41,(7)साधना सिंह-24                   

सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


Leave a comment