28 नवंबर 2023 का ज्ञानप्रसाद Source : समस्त समस्याओं का समाधान-अध्यात्म
परम पूज्य गुरुदेव के दिव्य चरणों में समर्पित होकर मानसिक समस्या के विषय को आगे बढ़ाने के लिए हम मंगल की ब्रह्मवेला में सभी के मंगल की कामना करते हुए गुरुकुल कक्षा में उपस्थित हो चुके हैं।
चार दिन के अंतराल के कारण हमारे लिए यह ढूंढ पाना और पिछले लेख के साथ कनेक्ट कर पाना कठिन सा हो रहा था लेकिन जैसे तैसे करके हमने उन दो विद्यार्थिओं के दृष्टिकोण वाली स्थिति को ढूंढ ही लिया, एक ने आत्महत्या कर ली और दूसरा आगे बढ़ गया। आज इसी स्थिति को कुछ और उदाहरणों के साथ गुरुकक्षा में चर्चा होगी और समाधान भी सुझाए जायेंगें। वैसे तो सबसे बड़ा समाधान “अध्यात्म” ही है, लेकिन उसके लिए अभी प्रतीक्षा करनी होगी।
आज के सत्संग में वर्णन किये गए उदाहरण किसी न किसी रूप में अपने जैसे ही लगते हैं , ऐसे लगता है यह हमारे लिए ही लिखा गया है।
सत्संग में चर्चा करना अपनेआप में एक बहुत ही उच्चकोटि का होमवर्क/ असाइनमेंट है। जब हमें मालूम होता है कि हमारे ज्ञानप्रसाद लेख का मूल्यांकन होना है तो हम ध्यान से लिखेंगें। ठीक उसी तरह जब पता हो कि कमैंट्स से पता चल जाना है कि किसने पढ़ा है और कैसे पढ़ा है तो सभी ध्यान से पढेंगें। यही अंतर् है गुरुदेव के साहित्य को सत्संग की भांति परिवार में पढ़ने का और पुस्तक का रिफरेन्स देकर स्वयं अपने समय में पढ़ने का। इसीलिए तो इस कक्षा का नाम “गुरुकुल कक्षा/गुरुकक्षा” रखा गया है, ऐसी कक्षा जहाँ हमारे गुरु का साक्षात् अनुभव होता है। आज के युग में कितने ही लोग ऑनलाइन स्टडी करके स्वयं को शिक्षित कर रहे हैं लेकिन विद्यालय का वातावरण ,गुरुकुल का वातावरण एक अलग ही योगदान देता है।
तो शांतिपाठ के साथ आज की शिक्षा का शुभारम्भ होता है।
ॐ असतो मा सद्गमय ।तमसो मा ज्योतिर्गमय ।मृत्योर्मा अमृतं गमय ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थात
हे प्रभु, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो ।मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।
मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥
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सारा चक्र दृष्टिकोण का ही तो है :
पिछले लेख में हमने दो विद्यार्थिओं के फेल होने की स्थिति का वर्णन किया था। अगर आत्महत्या करने वाला विद्यार्थी अपने मन को समझा लेता है और फेल होने की खिन्नता को अपने मन से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है तो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बच जाता। दोनों ही छात्र एक ही समय, एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे। एक ने आत्महत्या कर ली, दूसरे ने उस बात को मामूली मानकर अपना साधारण क्रम जारी रखा। दोनों विद्यार्थिओं में अंतर् केवल सोच का ही था, विचारों का ही था। यही है परम पूज्य गुरुदेव का “विचार क्रांति अभियान, Thought Revolution Campaign,परिस्थिति तो दोनों के लिए समान ही थी। यदि परिस्थिति का अंतर् होता, तो दोनों को समान दुःख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि “परिस्थितियों के मूल्यांकन” में गड़बड़ी होने से “मानसिक संतुलन” बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।
गुरुदेव बता रहे हैं कि हमें अपनी कठिनाइयों को आस पास के लोगों को बढ़ा चढ़ा कर बताने से,दया बटोरने से बेहतर है कि दूसरे अधिक आपत्तिग्रस्त लोगों के साथ तुलना करें। ऐसा करने से हम स्वयं को अपेक्षाकृत कम दुःखी अनुभव करें। दुःखी कौन नहीं है ? दुःख-सुख तो सभी के साथ लगे हैं, यह रात दिन की तरह, घूप छाँव की तरह हैं। आज के मानव का सबसे बड़ा दुःख तो आर्थिक competition की अंधी दौड़ है। आपको आर्थिक कठिनाई रहती है, अमीर लोगों जैसा रहन सहन प्राप्त करने में आर्थिक स्थिति दुर्बल मालूम पड़ती है, आर्थिक अभाव अनुभव होता है और चिंता रहती है तो इस स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के कई उपाय हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण उपाय तो यह है कि कुछ अधिक उपार्जन करने का प्रयत्न किया जाए। बिज़नेस में आजकल जितना समय और श्रम लगाया जा रहा है, उससे अधिक लगाया जाए, कोई और साइड बिज़नेस ढूँढ़ा जाए, वर्तमान बिज़नेस में ही आय बढ़ाने के उपाय संभव हों, उन्हें दौड़-धूप करके, किसी और की सहायता से जुटाया जाए । विवेक का प्रयोग किया जाए, माँ गायत्री की उपासना, विवेक की देवी की उपासना पर इसी कारण बल दिया जाता है।
अगर यह सब कुछ नहीं हो सकता तो अपने खर्चे कम किये जाएँ। संसार में अमीर-गरीब सभी तरह के लोग रहते हैं। सभी अपनी-अपनी आमदनी के अनुसार जीवनयापन करने की योजना बनाते हैं। यदि आपकी आमदनी कम है तो क्यों न कम खर्च का बजट बनाकर काम चलाने की आदत बनाई जाए। खर्चा घटा लेने से कुछ सुविधाएँ कम तो हो जाएंगीं लेकिन उस कमी का दुःख उतना न होगा, जितना बढ़े हुए खर्च की पूर्ति न होने पर दिन-रात चिंतित रहने के कारण होता है।
यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती, तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकालकर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का Tried and Tested सूत्र, “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है” बहुत ही प्रभावशाली सूत्र है। इसे प्रयोग करके तो देखिये, कैसे सुख शांति भागती हुई आएगी।
गुरुदेव बताते हैं कि अपने से अधिक दुःखी लोगों के साथ स्वयं की तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि थोड़ा बहुत कष्ट होते हुए भी भगवान ने हम पर बड़ी कृपा की है। भगवान् ने हमें उतना दुःखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुःखी हैं। अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, अंग-भंग, साधन-विहीन, संकट-जंजालों में फँसे हुए,पारिवारिक उलझनों में बुरी तरह उलझे हुए अनेकों व्यक्ति ऐसे मिल जाएंगें जो बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवनयापन कर रहे हैं। स्वयं की ऐसे लोगों से तुलना की जाय, तो प्रतीत होगा कि उनकी अपेक्षा हमारी स्थिति तो हजार गुनी अच्छी है। यदि पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों से अपनी तुलना की जाय, तब तो निश्चय ही यह प्रतीत होगा कि ईश्वर ने मनुष्य को सुख, सुविधाओं, एवं अनंत सम्पदाओं से इतना मालामाल किया हुआ है ( ईश्वर का वरद पुत्र, राजकुमार जो ठहरा) कि छोटी-छोटी कठिनाइयों को नगण्य ही माना जा सकता है।
एक और सिनेरियो :
अक्सर हमारे आसपास के, सगे सम्बन्धी, मित्र आदि हमारी दुविधा का, दुःख और चिंता का कारण बने रहते हैं। आखिर हमें जीवन तो इन्हीं के साथ ही व्यतीत करना है, छोड़ा तो जा नहीं सकता, तो क्या किया जाए ? जो जैसा करता है,सुनाता है, चुपचाप सुनते रहा जाए ,इग्नोर किया जाए, move on की पालिसी का पालन किया जाए यां फिर छोड़छाड़ कर ऐसे संसार से किनारा कर लिया जाए, स्वयं को misfit समझकर साधु/ सन्यासी बन लिया जाए ,न काहू से दोस्ती, न काहू से वैर ? क्या ऐसी पारिवारिक समस्याओं का,जिससे मानसिक स्थिति द्रवित होती है, अध्यात्म के क्षेत्र में कोई टेबलेट/इंजेक्शन है ?
अपकार और उपकार :
जो व्यक्ति इस समय हमें बुरे और शत्रु प्रतीत होते हैं,जिन्होंने हमारा अहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जहाँ तक संभव हुआ उन्होंने हमारा अमंगल ही किया उनके सारे अवगुण एवं अपकारों (गलत कार्य) बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को, उनके द्वारा किए हुए सद्व्यवहार को स्मरण करें तो निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं मित्र दिखाई पड़ेंगे। पिता-माता ने हमें MA तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं; उनके प्रति अपना द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है लेकिन यदि हम अपना दृष्टिकोण बदल दें और जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए, उतने बड़े कुटुंब का पालन करते हुए, उन्होंने हमारा पालन-पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा की व्यवस्था की,ऐसी बातों का चिंतन करें तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जायेगा और वे देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।
दृष्टिकोण में थोड़ा अंतर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणत कर सकते हैं। ईश्वर ने हमें दुर्लभ मानव तन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य संपदा प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों-करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता । जिस तरह का शरीर एवं उससे सम्बंधित सभी अंग हमें ईश्वर ने प्रदान किये हैं, उनमें से प्रत्येक की विशेषता और सुविधा का चिंतन करें और साथ में यह भी सोचें कि यदि यह सब कुछ उपलब्ध न होता तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता। ऐसे चिंतन से प्रतीत होगा कि हम कितने भाग्यशाली हैं और हमारी वर्तमान परिस्थिति दुःख दारिद्र से भरी नहीं बल्कि सुख-सुविधाओं से संपन्न है।
अच्छे व्यक्तिओं का अभाव :
परिस्थितियों के अतिरिक्त हमारी “मानसिक अशांति” का एक कारण यह भी है कि हमें अच्छे व्यक्तियों का अभाव दिखाई देता है। यह भी चिंतन-दोष की ही फलश्रुति है। प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व अच्छाइयों और बुराइयों दोनों से मिलकर बना हुआ है। किसी में बुराइयाँ ही हों, ऐसा भी नहीं है और यह भी नहीं है कि किसी व्यक्ति में समस्त अच्छाइयाँ हों। हर व्यक्ति में अच्छाइयाँ भी हैं और बुराइयाँ भी हैं। अपनी दृष्टि जिस पक्ष पर जाती है, वही पक्ष हमें दिखाई देने लगता है और अपनी पसंद के अनुसार हम अच्छाइयाँ या बुराइयाँ खोज लेते हैं। यदि बुराइयाँ ही ढूँढ़ी जाएँ तो वे भगवान में भी मिल जायेंगी और अच्छाई देखनी हो तो सिंह सरीखे हिंसक पशु में भी उनका अभाव न दिखेगा। दूसरे व्यक्ति इसलिए दुष्ट और घृणित लगते हैं कि उनमें दोष ही दोष देखे गए हैं। अपने प्रिय स्वजन अच्छाइयाँ देखते रहने के कारण प्राणप्रिय लगने लगते हैं। यहाँ तक कि उनकी बुराइयाँ भी अच्छी दिखाई देने लगती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि दोष-दर्शन की आदत छोड़कर गुण-दर्शन की वृत्ति विकसित कर ली जाय तो कल तक जो व्यक्ति शत्रु जैसे लगते थे, वही मित्र जैसे लगने लग जायेंगे।
प्रतिगामी और पुरोगामी दृष्टिकोण:
ऐसे लोग जो स्वयं को बड़ी कठिनाइयों और शत्रुओं के बीच में घिरे हुए देखते हैं, वस्तुतः उनकी विचार और भावना की शक्ति प्रतिगामी होती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य स्वयं को विरोधियों, हानि पहुँचाने वालों, काम बिगाड़ने वालों से घिरा हुआ मानकर परेशान होता है। वह यह नहीं समझता कि यह परेशानी मेरे स्वयं के “आंतरिक जीवन की बाहरी छाया मात्र है।” जिनकी मानसिक शक्तियाँ पुरोगामी होती हैं, उन्हें चारों ओर अपने मित्र, सहायक दिखाई पड़ते हैं। वह कठिनाइयों से नहीं घबराते और उन्हें दूसरों में अच्छाइयाँ ही नजर आती हैं। ऐसे मनुष्य जीवन की भीषण विपरीत परिस्थितियों में भी वह सफलता प्राप्त कर लेते हैं और सब सहायक बन जाते हैं।
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संकल्प सूची को गतिशील बनाए रखने के लिए सभी साथिओं का धन्यवाद् एवं जारी रखने का निवेदन। आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 12 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज चंद्रेश जी आज भी गोल्ड मैडल विजेता हैं।
(1)वंदना कुमार-34 ,(2 ) सुमनलता-41,(3 )पिंकी पाल-24,(4) संध्या कुमार-40,(5) सुजाता उपाध्याय-37 ,(6) नीरा त्रिखा-27 ,(7)चंद्रेश बहादुर-57,(8)रेणु श्रीवास्तव-48 ,(9 ) अरुण वर्मा-25 ,(10)मंजू मिश्रा-26,(11) निशा भारद्वाज-25 ,(12) सरविन्द पाल -43 सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।