वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव के पांच सूक्ष्म शरीर-पार्ट 1 

8 नवंबर 2023 का ज्ञानप्रसाद

पिछले कुछ दिनों से हम परम पूज्य गुरुदेव की शक्ति एवं कार्यशैली की चर्चा कर रहे हैं। हमने देखा कि गुरुदेव ने एक शरीर के रहते हुए पांच शरीरों जितना कार्य कैसे किया  और कौन-कौन सा कार्य किया। उसके बाद दो पार्ट में गुरुदेव के पांच स्थूल  शरीरों की जानकारी प्राप्त की। उसी श्रृंखला में आज हम गुरुदेव के पांच सूक्ष्म शरीरों को समझने ( हाँ, समझने का ) का प्रयास करेंगें। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि आज का विषय बहुत ही पेचीदा सा है। इस विषय को अंतर्मन में उतार  पाएं यां नहीं, समझने के प्रयास अवश्य करना चाहिए। लेख में सरलीकरण के बावजूद जिस  टेक्निकल शब्दावली का प्रयोग किया गया है, वोह अपनेआप में ही एक अलग विषय है। उदाहरण के तौर पर गुरुदेव पंचकोशों के जागरण की बात कर रहे हैं,अगर हमें पंचकोशों का ही ज्ञान नहीं है तो जागरण कैसे समझ आएगा। इसी प्रकार दादा गुरु ने गुरुदेव को सूक्ष्म में संपन्न हुई हिमालय यात्रा के दौरान परा वाणी में सभी निर्देश दिए, अगर हमें  परा वाणी का कांसेप्ट ही नहीं मालूम तो विषय की शक्ति  कैसे समझ आएगी। यही कारण है कि यह धारणा कि सभी परिजनों  को  गुरुदेव के साथ गायत्री मन्त्र उच्चारण करने से 1000 गुना लाभ मिलता है। यह लाभ  पात्रता, साधना के  स्तर, concentration के साथ साथ अन्य कईं factors पर आधारित है। इसी प्रकार आज के लेख में गुरुदेव के पांच वीरभद्रों की बात हो रही है। अधिकतर लोगों को तो  वीरभद्रों को समझ नहीं आ  पाती। कोई पूज्यवर के आस-पास कार्य करने वाले पाँच वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को गुरुदेव के  वीरभद्र समझने लगे तो कोई उनकी व्याख्या अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भिन्न-भिन्न ढंग से करने लगे, आज के लेख में इस गुत्थी को सुलझाने का  प्रयास भी किया है, हालाँकि इसका पूर्ण समाधान तो कल वाले लेख में शिवजी के वीरभद्रों की जानकारी के बाद ही होगा। 

आज के लेख के साथ संलग्न चित्र इसे समझने में सहायता कर सकते हैं। 

कल वाले लेख में हमारी सबकी प्रिय बेटी संजना ने कमेंट करके गुरुदेव द्वारा रचित पुस्तक   “समस्याओं का समाधान-अध्यात्म”  को  लेख शृंखला में शामिल करने का निवेदन  किया है, बहुत ख़ुशी की बात है। 

आज के इस introductory section का समापन हमारे सबके प्रिय बेटे, चिरंजीव बिकाश शर्मा जी के जन्म दिवस शुभकामना के साथ होता है। 

निम्लिखित पंक्तियों से गायत्री परिवार का बच्चा बच्चा परिचित है,आइए देखें,आखिर क्या छिपा  है इन पंक्तियों में :  

अप्रैल 1985 की अखण्ड ज्योति  में इस निर्देश का वर्णन आता है जिसे दादा गुरु ने हमारे गुरुदेव को दिया था। परम पूज्य गुरुदेव की चौथी हिमालय यात्रा सूक्ष्मशरीर से सम्पन्न हुई थी। दादा गुरु, जिन्हें  हम सब हिमालयवासी गुरुसत्ता के नाम से भी जानते हैं,ने  अपनी परावाणी से समझा दिया था कि क्या  करना है और कैसे करना है। 

आगे चलने से पूर्व परावाणी के बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण है 

इस ब्रह्मांड में चार प्रकार की वाणी व्याप्त  है। वैखरी , मध्यमा , पश्यंती ओर परावाणी ।

1.वैखरी वाणी  : जो कंठ से ध्वनि द्वारा, शब्द से बोली जाय और कान द्वारा सुनी जाय वो वैखरी वाणी है । मन मस्तिष्क के विचार आवेग को हम शब्दों में व्यक्त करें वह  वैखरी वाणी है । यह वही वाणी है जिसे हम, आप सभी बोल रहे हैं। 

2. मध्यमा वाणी : यह “ह्रदय” का भाव है। दिल से जो मनोभाव होता है और जो  हम व्यक्त करते हैं  वो मध्यमा वाणी है। नवजात शिशु जिस वाणी से अपनी  माँ को पुकारता है, साधक जिस वाणी से अपने इष्ट को पुकारता है, वह  मध्यमा वाणी है। यह वाणी व्यक्ति के अंतर्मन  के  भाव संस्कार से प्रेरित है, ह्रदय मध्यमा वाणी का केंद्र है ।

3. पश्यन्ति वाणी : न कोई शब्द ध्वनि और न ही कोई भाव। बस स्वयं ही किसी व्यक्ति का किसी दूसरे  व्यक्ति के प्रति या किसी स्थान के प्रति आकर्षित  होना । बिना सोचे और बिना  बात किये स्वयं  ही किसी विषय का ज्ञान  होना पश्यन्ति वाणी है। नाभिचक्र यानि मणिपुर चक्र पश्यन्ति वाणी का  केंद्र है और मनुष्य की नाभि “आत्मा/प्राण” का स्थान है । हम सब जानते हैं कि नौ माह तक जीवात्मा नाभि के जरिए ही माँ के शरीर से जुडी रहती है। इस संसार में आने  से पहले शिशु  Umbilical cord (गर्भनाल ) से ही शिशु जीवित रहता है। मणिपुर दो शब्दों के जोड़ से बना है। मणि और पुर, मणि का अर्थ होता है  गहना या मोती और पुर का अर्थ होता है स्थान। आत्म विश्वास,आत्म आश्वासन, खुशी, विचारों की स्पष्टता, ज्ञान तथा बुद्धि एवं  योग्य निर्णय लेने की क्षमता, यही रत्न व मोती हैं जो मणिपुर चक्र, नाभिचक्र  में निहित है, जो पीले रंग का होता है। 

4. परा वाणी : उच्चस्तरीय साधक, जिनकी आत्मशक्ति जाग्रत हो और जिनके  पास  ब्रह्मांड की दिव्य शक्तिओं से स्वयं  ही वार्तालाप करने की क्षमता हो, वोह परा वाणी से ब्रह्माण्ड के साथ संपर्क स्थापित कर सकते हैं। मंत्र, तंत्र , पूजा , होम , अनुष्ठान ये सब करते-करते जब साधक की ऊर्जा पूर्ण जाग्रत हो जाय तब साधक परावाणी द्वारा ब्रह्मांड की  शक्तिओं  से जुड़ जाता है । बैंगनी रंग के 1000 पंखुडिओं वाले सहस्र चक्र को ही ब्रह्मरंध चक्र भी  कहते हैं, इसे अंग्रेजी में Crown चक्र कहते हैं। ब्रह्मरंध में ब्रह्म का अर्थ ब्रह्माण्ड से जुड़ा हुआ है। योगियों के प्राण इसी चक्र से निकलते है और उन्हें ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।  परावाणी का केंद्र इस चक्र से भी ऊपर होता  है। हमारे अनेकों साथी  गुरुदेव की वाणी के साथ गायत्री मंत्र का जाप करते है और विश्वास करते हैं कि ऐसा करने से 1000 गुना लाभ मिलता है यानि 24 बार मंत्रोचारण करने से  24000 मन्त्रों का फल मिलता है, यह है परावाणी की शक्ति, ब्रह्मण्ड की शक्ति। 

संलग्न चित्र में नाभिचक्र, ब्रह्मरंध चक्र दिखाए गए हैं।   

चार प्रकार की वाणी की जानकारी  के बाद देखते हैं गुरुदेव ने पांच शरीरों से कौन से पांच कार्य करने थे।  

पाँचों शरीर को जो पाँच काम करने थे वे निम्नलिखित  थे : 

(1) वायुमण्डल का संशोधन 

(2) वातावरण का परिष्कार

(3) नवयुग का नवनिर्माण

(4) महाविनाश का निरस्त्रीकरण, समापन 

(5) देवमानवों का उत्पादन एवं विस्तार 

1984 में प्रारम्भ हुई यह सावित्री साधना पूज्यवर के उस गोपनीय  स्वरूप को दर्शाती है, जिसमें वे विराट से विराटतम होते चले जा रहे थे। परम पूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण के इस गुप्त एवं गूढ़ विज्ञान को और स्पष्ट करते हुए अपनी उस अवधि में प्रकाशित अखण्ड ज्योति  में लिखा है कि 

वस्तुतः इस साधना के बाद ही “मिशन के विराट पंचकोशी शरीर” में वह मोड़ आया कि वह भी विराट रूप लेता चला गया। न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन मिला, ऐसी अनुभूतियों हुईं  कि जिसका सम्पूर्ण  विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है।

अगर हम कहें कि बेटे आयुष और बेटी कात्यानी को सहायता देकर मार्गदर्शन देना  इसी सूक्ष्मसत्ता का ही कार्य था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सूक्ष्म की शक्ति अनंत है।  

विश्व की कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा “पाँच वीरभद्रों” के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच एक कनेक्शन  स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी। 

रामनवमी 1984 से आरम्भ होकर 1987 में संपन्न हुई सावित्री साधना यानि सूक्ष्मीकरण साधना अत्यंत शक्तिशाली साबित हुई। यह शक्ति राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञ,राष्ट्रीय एकता सम्मेलन, विराट दीपयज्ञ, “इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य” के गगनभेदी उद्घोषों में साकार रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते रखना,  संस्कार सम्पन्न कराते चलना एवं गुरुदेव के ही द्वारा 1989 से आरम्भ करके बारह वर्षीय “युगसन्धि महापुरश्चरण” की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न कराना, पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।

मोटी बुद्धि सूक्ष्मीकरण को या पाँच सूक्ष्म शरीरों, वीरभद्रों को समझ नहीं पाती। कोई पूज्यवर के आस-पास कार्य करने वाले पाँच वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को गुरुदेव के  वीरभद्र समझने लगे तो कोई उनकी व्याख्या अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भिन्न-भिन्न ढंग से करने लगे। 

वस्तुतः ये “पांच शक्ति के पुँज” थे, जिनको मोटे रूप में पाँच दायित्व, पाँच कार्य जो लेख के प्रारम्भ में बताए गए हैं, उन्हें  एक साथ सम्पन्न करना था। उन्हीं पांच कार्यों को और सरल तरीके से निम्नलिखित वर्णित किया गया है :   

पहला- लोगों की उल्टी बुद्धि को उलट कर सीधा करना, विचार संशोधन करना।  

दूसरा- किसी भी कीमत पर नवनिर्माण के लिए प्रचुर साधन जुटाने के लिए स्वयं को समर्थ बनाना। 

तीसरा-दुष्ट आत्माओं  के लिए भय का वातावरण उत्पन्न कर उनका मनोबल पस्त करना।  

चौथा- भविष्य में आने वाले गायत्री परिजनों को प्रज्ञा परिवार में जोड़ना, उन्हें  अधिकाधिक सामर्थ्य व सुरक्षा प्रदान करने के लिए स्वयं  विकसित होना।  

पाँचवाँ- ऊपर वाले चारों कार्यों के लिए  उपयुक्त तप रूपी खुराक जुटाना। 

यह शक्ति के पुंज,वीरभद्रों को  हमेशा ही कठिन तपश्चर्या में निरत रहना आवश्यक था ।

कल वाले लेख में गुरुदेव के वीरभद्रों को भगवान शिव के वीरभद्रों से कनेक्ट करने का प्रयास करेंगें। 

संकल्प सूची को गतिशील बनाए रखने के लिए सभी साथिओं का धन्यवाद् एवं जारी रखने का निवेदन। आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 9  युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज रेणु  जी और चंद्रेश   जी गोल्ड मैडल विजेता हैं। (1)अरुण वर्मा-33   ,(2 )सुमनलता-39 ,(3 )रेणु श्रीवास्तव-42,(4) संध्या कुमार-37, (5) सुजाता उपाध्याय-38  ,(6 ) चंद्रेश बहादुर-42  ,(7) मंजू मिश्रा-33, (8)नीरा त्रिखा-27  ,(9) सरविन्द कुमार-24  

सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


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