7 नवंबर 2023 का ज्ञानप्रसाद
यह लेख मात्र एक Introductory लेख है, आज कई गुना विस्तार हो चुका है।
आज का ज्ञानप्रसाद लेख “परम पूज्य गुरुदेव के पांच स्थूल शरीर” का समापन पार्ट है। दोनों भाग अखंड ज्योति जुलाई 1997 पर आधारित हैं। शब्द सीमा के कारण आज और कुछ भी कहना संभव नहीं है।
पूज्यवर का दूसरा स्थूल शरीर -अखण्ड ज्योति संस्थान घीयामण्डी, मथुरा
1924 में प्रज्वलित अखण्ड दीप के साथ परम पूज्य गुरुदेव आगरा से मथुरा आए । दो-तीन मकान बदलने के बाद वे घीयामण्डी स्थित मकान में आए। इस मकान को भुतहा करार दिया गया था यानि इस बिल्डिंग में भूतों का वास बताया गया था। पूज्यवर को यहाँ से अपनी प्राणचेतना के विस्तार के लिए “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। 1938 में प्रारम्भ की गयी किन्तु व्यवस्थित रूप में वसंत पंचमी 1940 में फ्रीगंज आगरा से आरम्भ की गयी यह पत्रिका न केवल हाथ से बने कागज पर प्रकाशित हुई बल्कि प्रकाशन के लिए उस मशीन का प्रयोग किया गया जो पैर से चलती थी। इस मशीन को ट्रेडिल मशीन कहते हैं। इसी मशीन पर छोटी-छोटी किताबें भी लागत मूल्य पर छापी जाने लगीं । “अखंड ज्योति पत्रिका” व पूज्यवर की चिट्ठियों के माध्यम से गुरुदेव का प्रेम और स्नेह जन-जन में बिखरने लगा। यह व्यक्तिगत स्पर्श जो पूज्यवर एवं वंदनीय माताजी द्वारा स्नेहभरे आतिथ्य के रूप में दिया गया, गायत्री परिवार की स्थापना का मूलभूत आधार बना। प्रारम्भिक स्तर पर मिशन की नींव के पत्थर के रूप में ढेरों कार्यकर्त्ताओं ने यहीं इसी बिल्डिंग में माताजी का “आत्मीयता भरा प्रसाद” और गुरुदेव का जीवन-विद्या शिक्षण प्राप्त किया ।
शुरू में एक छोटे से भवन में आरम्भ, यह संस्थान, जिसने “गायत्री महाविज्ञान” जैसा गायत्री महाविद्या ‘एनसाइक्लोपीडिया’ स्तर का प्रकाशन किया, आज एक विराट रूप ले चुका है । वह कोठरी जहाँ परम पूज्य गुरुदेव ने अपना अखण्ड दीपक रखा,वंदनीय माताजी ने जिसकी रक्षा की एवं पूज्यवर ने कठोर तपसाधना की,अंदर से वैसी ही रखकर बाहर से सुरक्षित ढाँचे से ढक दी गयी है।आज भी करोड़ों साधक इस “ऊर्जा केन्द्र” के दर्शन के लिए नित्य आते हैं। किसी समय जहाँ “अखण्ड ज्योति” पत्रिका का कार्यालय हुआ करता था, अब वह एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख से अधिक संख्या में प्रकाशित हो रही “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र भी है। यह वही जगह है जहाँ कभी गायत्री तपोभूमि के निर्माण की, वहाँ चलने वाले सत्रों की एवं 1958 के विशाल 1008 कुण्डीय यज्ञ की रूपरेखा बनी थी।
पूज्यवर का तीसरा स्थूल शरीर- गायत्री तपोभूमि मथुरा
वर्ष 1953 को दुर्वासा ऋषि की तपस्थली में गायत्री तपोभूमि मथुरा की पावन स्थापना परमपूज्य गुरुदेव के 24-24 लाख के 24 महापुरश्चरण की पूर्णाहुति पर की गयी थी। 2400 तोर्थों के जल व रज को संग्रहीत कर, 700 वर्ष पुरातन अखण्ड अग्नि को स्थापित कर, यहाँ गायत्री महाशक्ति का एक मन्दिर विनिर्मित किया गया । यहीं बैठकर पूज्यवर ने “गायत्री परिवार” नाम से एक विराट वटवृक्ष का बीजारोपण सतत जनसम्पर्क एवं लोकशिक्षण के माध्यम से किया । 1956 में इसी तपोभूमि में नरमेध यज्ञ हुआ । नरमेध शब्द को सार्थक करता, कार्यकर्त्ताओं के जीवनदान का क्रम इसी के बाद आरम्भ हुआ । 1958 में यहाँ से सहस्रकुण्डी विराट गायत्री महायज्ञ की योजना बनायी । लगभग 6 लाख से भी अधिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही एवं एक सुव्यवस्थित गायत्री परिवार की आधारशिला रखी गयी ।
हिमालय प्रवास से लौटकर परम पूज्य गुरुदेव ने “युगनिर्माण योजना” की घोषणा यहीं से 1962 में की। शतसूत्री कार्यक्रम के साथ एक सत्संकल्प की घोषणा भी की । छोटे ट्रैक्ट्स गायत्री-यज्ञ की प्रेरणाओं से लेकर क्रान्तिकारी चेतना का संवाहक साहित्य यहीं लिखा गया। मुद्रण हेतु यहाँ एक व्यापक प्रकाशन तंत्र बनाया गया, साथ ही एक स्वावलम्बन विद्यालय भी विनिर्मित हुआ, जिसमें बालकों को रोजगारपरक (Job-oriented) अनौपचारिक शिक्षा दी जाती है । आज भी यह विद्यालय सफलतापूर्वक कुशल मार्गदर्शन में चल रहा है ।
1953 से 1971 तक परम पूज्य गुरुदेव की कर्मभूमि यही स्थान रहा है ।
पूज्यवर की विद्या-विस्तार योजना को पूरे भारत भर में फैलाने हेतु यह संस्थान सक्रिय है । 17 से 20 जून 1971 को एक विराट सम्मेलन में परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वन्दनीय माताजी को एक ऐतिहासिक मर्मस्पर्शी आयोजन करके हिमालय तप साधना के लिए भावभीनी विदाई दी गयी ।
परम वंदनीय माताजी के लिए शांतिकुंज हरिद्वार निर्धारित हो चुका था। पूज्यवर दुर्गम हिमालय चले गए, जहाँ से वोह घोर साधना करके 1 वर्ष बाद लौटे। गुरुदेव ने 1971 में मथुरा से प्रस्थान करके, पुनः वहां लौटकर न जाने का संकल्प अपने जीवन के अंत 1990 तक निभाया। गायत्री तपोभूमि सँभालने का दायित्त्व जिन मज़बूत कन्धों पर गुरुदेव ने सौंपा था, आजकल उनके माध्यम से वहां एक भव्य निर्माण हो चुका है। एक विराट प्रज्ञानगर के साथ विद्यालय की बड़ी इमारत है,यहाँ पर साहित्य प्रकाशन हेतु कम्प्यूटर्स से लेकर आधुनिकतम तकनीक वाली मशीनें उपलब्ध हैं। तपोभूमि परिसर में ही गायत्री जयन्ती पर “प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा” के रूप में ऋषियुग्म के स्मारकों की स्थापना प्राणप्रतिष्ठा भी एक भव्य समारोह के माध्यम से हुई है।
पूज्यवर का चौथा स्थूल शरीर, युगतीर्थ शान्तिकुंज, हरिद्वार
अखंड दीप परम वन्दनीय माताजी के साथ ही युगतीर्थ शान्तिकुंज हरिद्वार आ गया। यह तीर्थस्थली सप्तसरोवर क्षेत्र में उस स्थान पर विनिर्मित की गयी जो कभी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को तपस्थली थी । 1961 में ही भूमि का चयन करके गुरुदेव ने इस युगतीर्थ का निर्माण आरम्भ करा दिया था। परम पूज्य गुरुदेव की हिमालय साधना की अवधि में ही परम वंदनीय माताजी के साथ 24 कुंवारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक के समक्ष 240 करोड़ गायत्री मंत्र जप का अनुष्ठान आरम्भ कर दिया गया । इसी के साथ “नारीजागरण अभियान” की आधारशिला रखी गयी। पूज्यवर के एक वर्ष बाद हिमालय से लौट कर आने पर प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों को श्रृंखला चली । साधकों में प्राणऊर्जा का संचार कर गुरुदेव ने उन्हें भविष्य में महती भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। धीरे-धीरे युगतीर्थ शान्तिकुंज विराट रूप लेने लगा । वानप्रस्थ सत्र, लेखन सत्र, कल्प-साधना सत्र, जीवन-साधना सत्र, महिला जागरण सत्र आदि के आयोजन व पूज्यवर की लेखनी से निकलने वाली ऊर्जा ने ऋषि परम्परा के बीजारोपण हेतु स्थापित इस तीर्थ में साधकों,शिष्यों के आने का क्रम जारी रखा। परिवार के विस्तार को देखते हुए, अतिरिक्त स्थान की आवश्यकता पड़ने पर “गायत्री नगर” की स्थापना की गयी । 1978 में स्थापित यह विराट कैम्पस, प्रशिक्षण अकादमी का स्वरूप ले चुका है। यहाँ पूज्यवर ने देवपरिवार में बसने हेतु जाग्रतात्माओं का आह्वान किया। जीवनदानिओं के रूप में ऐसे अनेकों व्यक्ति आते चले गए । सप्तर्षियों की मूर्तियों की स्थापना के साथ यहाँ 16 संस्कार सम्पन्न होने लगे । एक नौकुण्डी यज्ञशाला बनाई गयी । इस प्रकार यह “एक समर्थ गायत्रीतीर्थ” के रूप में स्थापित हो गया
दुर्लभ वनौषधि उपवन से लेकर लगभग 5000 व्यक्तियों के रहने योग्य स्थान, देवात्मा हिमालय की प्रतिमा की स्थापना तथा एक साथ 2000 से 3000 व्यक्तिओं के एक साथ बैठकर भोजन के लिए माँ भगवती अन्नपूर्णा भोजनालय की स्थापना की गयी । निःशुल्क चिकित्सा परामर्श से लेकर संस्कारों की व्यवस्था,बिना किसी जाति या ऊँच-नीच के , छोटे-बड़े के भेद के, सभी के लिए भोजन व्यवस्था उपलब्ध है । युगतीर्थ शांतिकुंज में लगभग 1500 सुशिक्षित कार्यकर्त्ता रहते हैं। सरकारी संस्थानों, विभागों के व्यक्तित्व- परिष्कार, जीवन-साधना सत्र यहाँ चलते हैं । 9 दिवसीय ऊर्जा अनुदान सत्र सतत चलते हैं। एक माह के युगशिल्पी सत्रों में कार्यकर्ताओं को स्वावलम्बन से लेकर लोकशिक्षण की प्रक्रिया में प्रशिक्षित किया जाता है। कम्प्यूटरों से सज्जित विशाल पत्राचार केन्द्र, सारे भारत व विश्वभर के गायत्री परिजनों के संगठनात्मक सुनियोजन का तंत्र, आधुनिकतम ऑडियो-वीडियो एडोटिंग यूनिट से सज्जित “इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग” EMD एवं शान्तिकुंज फार्मेसी ऐसी विशेषताएँ हैं, जिन्हें देखने एवं लाभ उठाने हजारों व्यक्ति नित्य यहाँ आते हैं। मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन द्वारा “हिमालय स्मृति भवन” में आत्मदेवता की साधना से लेकर पर्यावरण जाग्रति एवं हिमालय की सूक्ष्म चेतन सत्ता के साक्षात्कार का लाइट एंड साउण्ड शो जैसी विलक्षणता अन्यत्र कहीं नहीं उपलब्ध है। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में अखंड दीप का दर्शन, “प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा” रूपी भव्य स्मारक जहाँ पूज्यवर एवं वंदनीया माताजी के स्थूल शरीर को अग्नि दी गयी थी यहीं स्थापित हैं। इस स्मारक के समीप बैठकर, ध्यान साधना करना, शान्तिकुंज की आध्यात्मिक ऊर्जा में स्नान करने, त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने के समान है।
गुरुवर का पांचवा स्थूल शरीर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान,हरिद्वार
विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वय को संकल्पित यह संस्थान परमपूज्य गुरुदेव द्वारा महर्षि कणाद की तपस्थली में स्थापित सप्त सरोवर में बह रही गंगा की सात धाराओं के सामने शान्तिकुंज से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इसका शुभारम्भ 1979 में हुआ था । परम पूज्य गुरुदेव इसे भविष्य के धर्म की स्थापना हेतु विनिर्मित “अपना मस्तिष्क” कहा करते थे। तीन मंजिलों का यह भवन अपनी स्थापत्यकला के कारण सभी को आकर्षित करता है । मध्य में एक यज्ञशाला बनी हुई है, जहाँ सतत वनौषधि यजन प्रक्रिया पर वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहा है। “यज्ञोपैथी” नाम से लोकप्रिय विधा यहीं से प्रचलित हुई है। प्रथम तल पर माँ गायत्री की चौबीस प्रतिमाएं हैं । प्रत्येक प्रतिमा के साथ बीजमंत्र, यंत्र व उनकी फलश्रुतियाँ लगाई गयी हैं । द्वितीय तल पर चौबीस कमरों में एक विशाल प्रयोगशाला बनी हुई है जहाँ रक्त विश्लेषण से लेकर शरीर के विभिन्न एन्जाइम, हारमोन्स, काया व मन की विद्युत पर मंत्रशक्ति, योग-साधना, आहार, प्रार्थना, यज्ञ, प्राणायाम आदि के पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण, अध्ययन करने का एक व्यापक तंत्र आधुनिकतम उपकरणों के माध्यम से बनाया गया है। साधक शान्तिकुंज में ठहरते हैं व माह में दो बार उनका परीक्षण होता है। ब्रह्मवर्चस में साधकों पर नित्य ही विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी सम्पन्न होते रहते हैं। तीसरी मंजिल पर 45000 से अधिक ग्रन्थों वाली एक विशाल लाइब्रेरी है जिसमें विश्वभर में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर हुए कार्य, शोधप्रबंध,प्रकाशित पत्रिकाओं का संकलन है, कई दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ हैं। यहीं पर वेद, उपनिषद, गीता विश्वकोश का विशद अध्ययन कर प्रकाशन किया जा रहा है । लगभग 50 से अधिक पोस्ट ग्रेजुएट लेवल के वैज्ञानिक-चिकित्सक यहीं रहकर अध्ययन कर रहे हैं, आने वालों का मार्गदर्शन करते हैं एवं शोधकार्य में लगे हुए हैं । यह संस्थान अपने आप में एक अनूठा संस्थान है एवं विश्वभर के वैज्ञानिकों को आकर्षित करता रहता है
इस परिचय मात्र से ही किसी को अनुमान हो सकता है कि परम पूज्य गुरुदेव, परम वंदनीय माताजी का व्यक्तित्व कर्तृत्त्व कितना विराट रहा होगा। वे जो भी कुछ स्थापनाएँ कर गए आज सारे भारतवासियों, विदेश के संस्कृति प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है ।
यदि इन पाँच स्थापनाओं, पाँच स्थूल शरीरों के साथ वे सभी स्थापनाएँ जोड़ ली जाएँ जो क्षेत्र में फैले विश्व्यापी शक्तिपीठों के तंत्र के रूप में विद्यमान है तो हिमालय के समान एक गगनचुम्बी व्यक्तित्व के रूप में ऋषियुग्म की सत्ता का बोध होता है।
लेखक की समापन पंक्तियाँ “ऐसी महान गुरुसत्ता के हम लीला-सहचर रहे हैं, यह सोच-सोचकर ही मन प्रमुदित होता रहता है” अपनेआप में ही दिव्यता की प्रतीक हैं।