वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

“अपने सहकर्मियों की कलम से” का 22 सितम्बर 2023 का अंक। बेटी स्नेहा गुप्ता का योगदान 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से हर शनिवार को एक ऐसा विशेषांक प्रस्तुत किया जाता है जिसमें अपने ही साथियों के भांति-भांति के प्रेरणादायक विचार,अनुभूतियाँ,गतिविधियां प्रस्तुत की जाती हैं।  यही योगदान इस वीकेंड सेगमेंट को स्पेशल, विशेष, सर्व लोकप्रिय बना रहे हैं। 

आज की  अनुभूति पढ़ते समय हमारे साथी एवं सहकर्मी अवश्य ही सोच सकते हैं कि  यह विवरण तो पारिवारिक समस्याओं का ही वर्णन है, ऐसी समस्याएं जो किसी भी परिवार में प्रचलित हैं।अवश्य ही पाठक ऐसा सोच सकते हैं लेकिन “नकारात्मकता से सकारात्मकता, धन्यवाद् की शक्ति, Power of Gratitude, प्रेरणा जी की वीडियो की application” को समझने के लिए नकारात्मकता के root cause को समझना बहुत ही ज़रूरी है, और उस root cause के लिए पारिवारिक details देना आवश्यक हो जाता है, चाहे वोह कितनी भी व्यक्तिगत क्यों न हों, Family structure और setup तो लगभग हम सबका एक जैसा ही है।

सारा खेल तो दृष्टि का ही है , “दृष्टि बदली तो दृश्य स्वयं ही बदल गए”

अवश्य ही हम सबको मार्गदर्शन मिलेगा। 

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पिछले दिनों मैंने अपनी कुछ अनुभूतियों को अभिव्यक्त किया था जिस पर त्रिखा बाबूजी, संध्या मां सहित अनेक परिजनों की सुखद प्रतिक्रिया भी आई थी। बाबूजी पिछले सप्ताह  उसे प्रकाशित करने की योजना बना चुके थे लेकिन मां संध्या की प्रेरणा से मुझे उस अनुभूति को विस्तृत रूप में लिखने का मन हुआ, यही कारण था कि इस अनुभूति को पिछले सप्ताह के स्पेशल अंक  में प्रकाशित नहीं किया जा सका।

भावनाओं की घनघोर घटा का मन-मस्तिष्क में छा जाना तो आसान है लेकिन उन भावनाओं को  शब्दों के रूप में बरसाना कुछ  कठिन ही होता है। इस अनुभूति में ऐसा ही एक प्रयास किया गया है, मेरी  भावनाएं कहाँ तक आप सबके ह्रदय तक पंहुच पाती है, इसे जानने की जिज्ञासा रहेगी।

इस अनुभूति को पढ़ते समय ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के पाठक, हमारे समर्पित साथी एवं सहकर्मी अवश्य ही सोच सकते हैं कि  यह विवरण तो पारिवारिक समस्याओं का ही वर्णन है, ऐसी समस्याएं जो किसी भी परिवार में प्रचलित हैं।अवश्य ही पाठक ऐसा सोच सकते हैं लेकिन “नकारात्मकता से सकारात्मकता, धन्यवाद् की शक्ति, Power of Gratitude, प्रेरणा जी की वीडियो की application” को समझने के लिए नकारात्मकता के root cause को समझना बहुत ही ज़रूरी है, और उस root cause के लिए पारिवारिक details देना आवश्यक हो जाता है चाहे वोह कितनी भी व्यक्तिगत क्यों न हों, Family structure और setup तो लगभग हम सबका एक जैसा ही है।        

परम पूज्य गुरुदेव तो गुण निधान हैं। वो एक सिद्ध संत,तपस्वी की भांति अपना समस्त जीवन  विश्व के कल्याण के लिए होम कर सकते हैं।वो एक श्रेष्ठ पति,पिता एवम  पुत्र के रूप में जीवन जीकर सामान्य गृहस्थ के सामने आदर्श स्थापित कर सकते हैं। वो संसार के प्रत्येक विषय पर कलम चला कर लेखकों ,कवियों में भी पूज्य हो सकते हैं लेकिन हमे अपनी एक छोटी सी अनुभूति को अपने परिजनों के सामने प्रकट करने के लिए भी बार- बार सोचना, समझना पड़ता है। तब कहीं जाकर हम अपने हृदयग्त्त भावों को व्यक्त कर पाते हैं 

यह हमारे दिव्य परिवार की,सभी परिजनों की ही कर्मठता है,विशेषता है जिसके लिए मेरा हृदय बार-बार, करोड़ों बार सभी को धन्यवाद कर रहा है, प्रणाम कर रहा है। मेरे जीवन के श्रेष्ठ ,स्नेह, आशीष, करूणा से परिपूर्ण परिजनों, आप सभी को करोड़ों-करोड़ धन्यवाद, प्रणाम ।

आज मेरे हृदय से हर बात के लिए परमात्मा को धन्यवाद ही  निकलता है। इस प्रकार मेरे हृदय में एक बहुत ही सुन्दर, सकारात्मक ऊर्जा भर जाती है जिसकी सुगंध में जीवन खिलखिला उठता है और मेरे आस-पास की सारी नकारात्मकता परास्त हो जाती है। इस दिव्य,सुंदर, सुखद अनुभूति के लिए,जीवन को सकारात्मकता से परिपूर्ण करने के लिए मेरे रोम-रोम में बसे परम पिता परमात्मा को धन्यवाद, धन्यवाद ओर धन्यवाद कर रहा है।

मेरे प्यारे, मेरे आत्मीय परिजन जानते हैं कि कुछ माह पहले तक मैं इस मंच पर कह देती थी कि “जीवन नर्क है।” मैं जितना कहती थी उससे कई गुना अधिक  बुरी स्थिति मेरे जीवन में थी। अभी भी कोई स्थूल परिवर्तन नहीं हुआ है,। वही एक रसोई,एक टायलेट, एक बाथरूम,एक घर आंगन है जहां संयुक्त परिवार में रहने से कलह होती थी, सारी भौतिक स्थितियां वैसी ही हैं लेकिन “दृष्टि बदली तो दृश्य भी बदल गए हैं” दृष्टि का बदलना भी परमात्मा की,परम पूज्य गुरुदेव की,अपने इष्टदेव की कृपा से हुआ है। मेरी दृष्टि बदलने के लिए मैं अपने परम पिता परमात्मा, परम पूज्य गुरुदेव, परम वंदनीय माता जी,आदि शक्ति वेदमाता गायत्री मां का करोड़ों अरबों बार धन्यवाद करती हूं। 

आप सभी जानते हैं,याद भी हो सकता है कि मई महीने तक मेरा जीवन सदा की भांति संघर्षमय ही था । इतनी साधना, इतना तप करने के बाद भी मारे कलह के,मानसिक प्रताड़ना के मेरा जीवन नर्क था। मेरा हृदय चीत्कार कर उठता था कि इस प्रताड़ना का अंत कब होगा ? मेरी समस्त ऊर्जा अपने हृदय के घावों को,अपने भाई, अपनी देवरानी को दिखाने में खर्च हो जाती थी। 

जब से शादी हुई थी तभी से  ससुराल के एक जन से हमारे जन्मों के कर्मबंधन थे जिनके कारण मुझे  प्रताड़ना मिलती रहती थी। उनकी  प्रतिक्रिया में मेरी तरफ से भी बहुत कुछ नकारात्मक बातें निकलती थीं। जागृत अवस्था में प्रताड़ित मन, स्वप्न में भी उन्ही से प्रताड़ित होता रहता था। 

मैं स्थान बदलती रहती,दर दर भटकती रहती, बच्चों को लेकर, समाज के, परिवार के, ताने सुनकर, कभी अपनी पढ़ाई के नाम पर, तो कभी निर्झर की पढ़ाई के बहाने, कुछ ही समय सही लेकिन इस नर्क से मुक्ति को भटकती रहती थी। वर्षो पहले मेरे हृदय में आत्महत्या का भी नन्हा सा विचार आया था,जो  मैं करने वाली तो नही थी, तब मेरी मां ने सहारा दिया था कि बदनामी मत देख ,और मायके में ही रह। इस दौरान मैं मानसिक तनाव के कारण कुछ-कुछ विक्षिप्त सी हो गई थी। तब भाईयो ने साथ में दौड़-दौड़ कर बनारस मेरा इलाज कराया था। आप सभी जानते हैं कि पति साल में मुश्किल से दो बार ही छुट्टी पर आते हैं। मेरे सास ससुर, मुझे और मैं उन्हें बहुत प्यार करती थी। मैं बहुत तड़पती थी,चाहती थी कि मेरे सास ससुर अपने निर्झर के साथ समय बताएं। हालाकि मेरे बहुत कठिन प्रयत्न के बाद काफी समय निर्झर अपने दादा दादी के साथ बिता पाया। लेकिन जेठानी के कारण जितना चाहिए था उतने लंबे समय तक ससुराल में रह ही नहीं पाती थी। तब मेरी एकमात्र यही कामना थी कि मैं सुख से, सम्मान से अपने ससुराल में रहूं । ससुराल में रहने पर भी माहौल कुछ ऐसा बना दिया गया था कि निर्झर को शाम को छः बजे भूख लगती थी तो मेरा बच्चा कहता था कि मम्मी दिन का भात ही फ्राइ कर दो मैं खा लूंगा और वही उसका डिनर होता था। मेरा हृदय रोता था कि क्या रोज-रोज मैं अपने बेटे को भुजा भात ही खिलाऊं,क्योंकि कुछ और बनाया तो कलह हो जायेगी। तो कभी-कभी पूरियां,कभी चने की सब्जी बना देती तो  फिर महाभारत होता।

क्यों, कैसे,जवाब  किसी के पास नहीं था।

कारण बस एक ही था: 

अलग-अलग प्रवृतियों के लोगों को जबरदस्ती एक धागे में बांधा गया है, यही तो है परिवार की परिभाषा। इसमें कोई चॉइस तो होती नहीं है, 

“कहीं की ईंट  कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुम्बा जोड़ा” 

इसीलिए तो गुरुदेव ने कहा है “गृहस्थ साधना ही सबसे बड़ी साधना है।”

यह तो बस एक-दो उदाहरण मात्र ही हैं। 

आज जब परिस्थियां बदली हैं, तब से नित्य बदल ही रही हैं।अब मैं बच्चों को लेकर बनारस से गहमर आ गई हूँ। आज मैं अपने ससुराल में पूरे हक से, पूरे सम्मान से और सुख से रहती हूँ । आज मेरी अम्मा भी नहीं हैं जिन्हे मैं अभी और प्रेम करना चाहती थी। मेरी मां भी नहीं है जो मेरी खुशी से खुश हो सके। 

यह परिवर्तन कैसे हुआ : 

मुझे नहीं मालूम कि यह परिवर्तन कब और कैसे हुआ है। केवल “आभार प्रार्थना” से ही यह परिवर्तन हुआ है  या शांतिकुंज जाने से। जब बहुत परेशान थी तो मई के अंत में शांतिकुंज  गई थी । सोचा था कि वहीं समाधि पर सिर रखकर ये कहूँगी  ,वो कहूँगी  लेकिन वहां तो मन शांत ही हो गया। हम गुरुदेव की दिव्य ऊर्जा में डूबते गए, बस डूबते ही गए । मेरे बाद अरुण भैया शांतिकुंज गए थे, उन्होंने अपनी यात्रा की अनुभूतियां भी साझा की थीं। मेरा मन कर रहा था कि मैं भी कुछ कहुँ  लेकिन हृदय से आवाज़ आती थी कि अभी रुको, किसी सुखद अनुभूति के साथ लिखना और आज वह सुखद पल तो आ चुका है लेकिन मैं उस यात्रा अनुभूति जो  बहुत ही छोटी सी है, बाद में लिखने के लिए रख लेती हूँ । अभी तो “धन्यवाद प्रार्थना”की अनुभूति ही पूरी करनी है। 

तो बात इस तरह हुई कि प्रेरणा जी की वीडियो के बाद मैं काफी समय से “आकर्षण के सिद्धांत” की  सकारात्मक सोच अपना रही थी। इस वीडियो से मुझे प्रेरणा मिली और मेरे पास जो है मैं उसके लिए परमात्मा का आभार व्यक्त करने लगी। लिख कर भी ,बोलकर भी, हर पल, हर क्षण,हर चीज के लिए । धीरे-धीरे मेरे  हृदय की रिक्तता भरने लगी और रिजल्ट  आपके सामने है।

धन्यवाद् ही धन्यवाद्- बहुत शक्ति है इस शब्द में :  

आप सभी ने इतनी आत्मीयता से, इतने प्रेम से मेरी अनुभूति को पढ़ा और मुझे विस्तार में लिखने को प्रेरित किया। इसके लिए आप सभी परिजनों को शत-शत प्रणाम   मेरे प्यारे पिता का, परम पिता का, करोड़ों अरबों धन्यवाद जिन्होंने मुझे ये मनुष्य का जीवन दिया है। धन्यवाद मेरे दयालु पिता आपने मुझे ऐसे परिश्रमी,माता पिता, भाई बहन,बहनोई दिए  है। मेरे परम कृपालु परम पिता आपने मुझे ऐसा भरा पूरा मायका,ससुराल दिया है, ऐसे देवता समान पति, सास ससुर दिए,ऐसे अच्छे जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी दिए। आपको लाखो-करोड़ों धन्यवाद । मेरे परम पिता परमात्मा आपने मुझे इस पवित्र भारत भूमि में,दिव्य सनातन संस्कृति में जन्म दिया है। आपका लाखों लाख धन्यवाद,जो मुझे ऐसी  गहरी संवेदना ,ऐसी बुद्धि दी, ऐसा  विवेक दिया । आपको कितना-कितना धन्यवाद करूं । मेरे परम पिता आपने मुझे मां गायत्री का, गुरु सत्ता का सानिध्य दिया। आपको लाखो करोड़ों धन्यवाद । आपने मुझे ऐसे स्नेह आशीष से परिपूर्ण परिजन दिया है। आपने मुझे फूलों जैसे  प्यारे बच्चे दिए । आपने तो मुझे हर वो चीज दी, जो मेरे जीवन को सुंदर और सुखद बनाती है। आपको करोड़ों-करोड़ धन्यवाद । आपने मुझे सब कुछ दिया। इतना कुछ जिसे मैं गिन भी नहीं सकूंगी। धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद मेरे परम पिता परमात्मा आपको कोटि कोटि धन्यवाद

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संकल्प सूची को गति देने के लिए सभी का धन्यवाद्। 

आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 14  युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज भी अरुण जी ही  गोल्ड मैडल विजेता हैं। कमेंट करके हर कोई पुण्य का भागीदार बन रहा है। 

(1)चंद्रेश बहादुर-64  ,(2 )नीरा त्रिखा-28 ,(3 )मंजू मिश्रा-28 ,(4) सुमनलता-34 ,(5) संध्या कुमार-45  ,(6 )रेणु श्रीवास्तव-47 ,(7)स्नेहा गुप्ता-24,(8)सरविन्द पाल-42 ,24,(9) अरुण वर्मा-83 ,(10 ) सुजाता उपाध्याय-64,(11)पूनम कुमारी-25,(12) वंदना कुमार-25,(13) प्रेरणा कुमारी-25, (14) राज कुमारी कौरव-25   

 सभी साथिओं को हमारा व्यक्तिगत एवं परिवार का सामूहिक आभार एवं बधाई।


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