2 अगस्त 2023 का ज्ञानप्रसाद
आज बुधवार है, सप्ताह का तीसरा दिन। आज हमारा सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य यही है कि अपनी समर्पित सहयोगी आदरणीय निशा भारद्वाज जी के भतीजे के लिए, जिसे सर्पदंश के कारण ICU में भर्ती कराया गया है, गुरुदेव से प्रार्थना करें कि बेटे को इस कष्ट से मुक्ति प्रदान करें, बड़ी कृपा होगी।
आज का ज्ञानप्रसाद शांतिकुंज प्रांगण में,1986 की गुरुपूर्णिमा को गुरुदेव द्वारा दिए गए उद्बोधन का तीसरा एवं अंतिम पार्ट है। आप सबने इस लेख के कंटेंट को ऑडियो/वीडियो /लेख/शार्ट वीडियो द्वारा अमृतपान के बावजूद, बड़े ही श्रद्धा से पढ़ा और कमेंट किये जिसके लिए हम ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। हमारे सभी प्रयास केवल एक ही उद्देश्य की दिशा में केंद्रित हैं कि अधिक से अधिक परिजन गुरुदेव के साहित्य को पढ़कर अपने जीवन की दिशा बदल सकें; परिवर्तन प्रतक्ष्य दिख रहे हैं ।
हमारे साथी जानते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से सप्ताह में एक दिन शुक्रवार,हम एक वीडियो प्रकाशित करते हैं लेकिन इस सप्ताह दो वीडियो प्रकाशित करने की योजना है। इस Deviation का कारण वर्तमान उद्बोधन लेख श्रृंखला है। गुरुवर की धरोहर पार्ट 2 में प्रकाशित इसी लेख की 37 मिंट लम्बी वीडियो हमने प्रयास करके ढूढ़ निकाली है। हमारा सौभाग्य है कि हम इस वीडियो को गुरुवार वाले दिन देख सकेंगें। हमें पूर्ण विश्वास है कि लेख पढ़े होने के बावजूद वीडियो के सम्मान में ज़रा सी भी कमी नहीं दिखेगी, यही है अपने गुरु के प्रति सच्ची एवं अटूट श्रद्धा।
आज के समापन लेख में गुरुदेव हमें चार बातें बता रहे हैं, कौनसी चार बातें बता रहे हैं, इन्हें हमने सरल करके pointwise अपने सहयोगियों के समक्ष रखने का प्रयास किया है।
“गुरु की छाया में शरण जो पा गया,उसके जीवन में सुमंगल आ गया” जी हाँ, यही है आज की गुरु वंदना और इसी से आरम्भ होती है आज की गुरुकुल पाठशाला, गुरुचरणों के स्पर्श के साथ।
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चार सन्देश :
1. आज गुरुपूर्णिमा के दिन से आप लोग एक काम यह करना कि हमेशा यह अनुभव करना कि आप देवता हैं और रीछ- वानर का लिबास पहने बैठे हैं। कोई कुर्ता पहने बैठा है, कोई धोती पहने बैठा है, कोई चश्मा लगाए बैठा है, तो कोई कुछ किए बैठा है, लेकिन आप वास्तव में देवता हैं जो किसी खास काम के लिए, किसी खास उद्देश्य के लिए, किसी खास निमंत्रण पर यहाँ ( इस संसार में) आए हैं ।
2. दूसरी बात जो आपको मुश्किल जान पड़ती है वोह है कि संसार में से बुराइयाँ कैसे दूर होंगी और अच्छाइयों की वृद्धि कैसे होगी। इस संबंध में नोस्ट्राडोमस की राजनीतिक भविष्यवाणी तो हमने बता दी है और अब अपनी स्वयं की भविष्यवाणी बताते हैं कि हमने आपके बैरियों को, दुश्मनों को मार दिया है। वे मरे हुए रखे हैं और आपके लिए श्रेय जीवित है, सौभाग्य जीवित है। आपके लिए मुकुट जीवित है, बड़प्पन जीवित है, आप उस बड़प्पन को उठा लेना ।
3. तीसरी बात यह है कि हमने नालंदा विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया था कि हम देश को, समाज को, विश्व को एक लाख समर्थ और सक्रीय कार्यकर्ता तैयार करके देंगें। इस कार्य में आप लोग हमारी मदद कीजिए और 15-15 दिन के लिए अपने यहाँ प्रज्ञा पाठशाला चलाने का प्रयास कीजिए। हम वहाँ पढ़ाने के लिए स्वयं तो नहीं आएंगे लेकिन अपनी शक्ति देंगे, अपनी बुद्धि देंगे, अपनी भावना देंगे, अपना प्राण देंगे, अपना सर्वस्व देंगें। इसलिए जो कोई भी इन प्रज्ञा पाठशालाओं से होकर आएगा, उसका कायाकल्प होना निश्चित है
4. चौथा कार्य है हमारे द्वारा आरम्भ किया गया दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध युद्ध और सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन का अभियान। यह कार्य बहुत बड़ा और कठिन है, इसमें कुछ मुसीबतें भी आएंगी लेकिन हम उन मुसीबतों को आप तक नहीं पहुँचने देंगे । उन मुसीबतों को अपने ऊपर लते रहेंगे ।
राणा सांगा जो था, उसे जहाँ कहीं भी दिखता कि उसके साथियों पर गाज गिरी, उनके ऊपर तलवार गिरी, वह भागकर वहीं आ जाता था और उनके बदले का भाला, तलवार अपने शरीर पर झेल जाता था । उसने ढेरों आदमी इस तरह बचा लिए थे। जब उसके शरीर पर 80 घाव हो गए तब वह बेहोश हो गया और उसने अपना काम बंद कर दिया । 80 घाव खाने तक तो कोई भी मुसीबत आपके ऊपर नहीं आवेगी । मुसीबत आएगी तो हमारे ऊपर आएंगी। पहले भी आई थी। श्रीकृष्ण भगवान के पास आई थी । रामचंद्र जी पर भी मुसीबत आई थी। सीताहरण हो गया था। किसी का क्या हो गया । लेकिन हमारे ऊपर “एक और तरह की मुसीबत” आएगी जिसकी जानकारी आपको देना चाहते हैं । वह मुसीबत इस तरह की है जैसी कि कालनेमि ने पैदा की थी।
कालनेमि रावण का कुटुंबी था। स्कंद पुराण में कथा आती है कि वह सबकी बुद्धि बिगाड़ देता था । रावण का बड़ा भाई कुंभकरण था । उसने योगाभ्यास किया, तप किया। वह चाहता था कि 6 महीने जागा करूँ और एक दिन सोया करूँ, लेकिन कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि बिगाड़ दी, भ्रष्ट कर दी कि कुंभकरण यह माँगने लगा किं 6 महीने सोया करूँ और एक दिन जगा करूँ । अगर वह 6 महीने जगा होता तो कुछ का कुछ हुआ होता । इसी तरह मारीच ने भी तप किया था। वह स्वर्ग चाहता था लेकिन कालनेमि ने उसकी ऐसी बुद्धि भ्रष्ट की और कहा कि तू यह मत माँग कि मैं स्वर्ग जाऊँ, वरन यह माँग कि सोने का हिरण बन जाऊँ। कारण था कि चमड़े वाले को तो एक ही आदमी मार सकता है लेकिन सोने वाले को मारने के लिए सौ-सौ आदमी चाहिए।
गुरुदेव कालनेमि की कथा सुना रहे हैं। पूतना के कोई बच्चा नहीं था। कालनेमि ने उससे कहा कि तेरे बच्चा नहीं होता है तो तू जादू का मंत्र लेकर जा और श्रीकृष्ण को दूध पिला दे । तेरा दूध पिएगा तो अपनी मम्मी को भूल जाएगा और तेरे पास रहने लगेगा । कालनेमि के बहकावे में आकर पूतना बेचारी गई कि मेरे बेटा नहीं होता तो बेटा ले आऊँ और बेटा तो मिला नहीं, उल्टे बदनामी हुई । शूर्पणखा से कालनेमि ने कहा- तू ब्याह करेगी ? उसने कहा- हाँ। वह बोला,राक्षस तो काले-कलूटे होते हैं, माँस खाते हैं, शराब पीते हैं, तुझे गाली भी देंगे और मारेंगे भी। हम तुझे ऐसा दूल्हा बताते हैं जिससे खूबसूरत तुझे दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा । बस तेरे जाने भर की देर है, तू गई और ब्याह हुआ। दूल्हे का नाम राम है । उनके पिता के तीन ब्याह हुए थे, राम के भी दो ब्याह करा देंगे । सीता जी भी बनी रहेंगी और तू भी बनी रहेगी और राजगद्दी पर बैठेगी । तू गोरी होगी और तेरे बच्चे भी गोरे होंगे । शूर्पणखा कालनेमि के बहकाने पर रामचंद्र जी के पास गई और अपनी बेइज़्ज़ती कराकर लौटी । कालनेमि ने उसकी बुद्धि जो बिगाड़ दी थी । कालनेमि ने ही मंथरा की भी बुद्धि बिगाड़ दी थी, ऐसी बुद्धि बिगाड़ी कि उसने कैकेई को पट्टी पढ़ाकर अपना काम बनाना चाहा।
कालनेमि की यह घटनाएं हमारे ऊपर भी लागू होती है । हमारे प्राणों से प्यारे बच्चे, हमारे हृदय के टुकड़ों को अलग करके, बहका करके इनको हमसे दूर करने की कोई कालनेमि कोशिश कर रहा है। तो गुरुजी आपका तो बहुत नुकसान हो जाएगा ? नहीं, बेटा, हमारा क्या नुकसान हो जाएगा। अभी ये लड़के गा रहे थे “कोई साथ न दे तो भी अकेला चल ।” अकेले चल देंगे हम। हम अकेले भी कम नहीं हैं परन्तु हमें अपने बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं। बच्चों को कोई छीन न ले जाए, चुरा न ले जाए, अगर बच्चों का अपहरण होता है तो माता पिता को दुःख होता है। हमें भी दुःख होता है जब कोई कालनेमि हमारे बच्चों को हमसे दूर कर देता है, बागी कर देता है। अपने ये जो 24000 बच्चे हैं ( 1986 में गायत्री परिवार में केवल 24000 परिजन ही थे) हमें चिंता है कि कोई कालनेमि हमारे बच्चों की बुद्धि भ्रष्ट न कर दे। यही चिंता हमें सताती रहती है। मिशन बढ़ रहा है ओर वह बढ़ेगा ही, काम तो बढ़ ही रहा है। गंगा में बाढ़ तो आएगी ही, उसे कोई रोक नहीं सकता। उसे कोई रोकने वाला नहीं है। हम मिशन के लिए कोई सहायता नहीं मांगते, वोह तो चल ही रहा है। अगर कुछ कहते हैं तो इसलिए कि आपका ही लाभ होगा। आप नेता बनेगें। जिस किसी को भी नेता बनना पसंद हो,वोह आगे आएं, हमारे साथ कदम से कदम, कंधे से कंधा मिलाकर चलें । हमारे साथ नहीं चलेंगे तो योग्य मनुष्य कैसे बनेंगे ?
हम कहते हैं कि हमारे बच्चे जिन्हें हमने पैदा किया है, पाला है, वोह हमारी छाती से अलग न होने पावें । आप हमारी छाती से अलग हो जाएंगे तो हमें बहुत दुःख होगा, कष्ट होगा । किसी और बात से हमें दुःख नहीं होगा लेकिन जब ये छोटे-छोटे बच्चे जिनसे हमने बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगाकर रखी हैं अगर वोह बागी होते दिखेंगें , विरोधी होते हुए दिखेंगें तो हमें बेहद कष्ट होगा।
कालनेमि का तो कहना ही क्या, वह तो भगवान का ही बनाया हुआ है।अगर वह न होता तो क्या लंका का सत्यानाश होता ? जहाँ कहीं भी कालनेमि गया उसने हाहाकार ही पैदा किया ।
बस चौथी बात यही कहनी है कि हमारा कोई भी बच्चा हमारी छाती से अलग न होने पाए । कोई चोर,कोई बाबाजी इन्हें अपनी झोली में डालकर ले जाएगा तो हमें दुःख होगा कि हमारा प्यारा बच्चा हमसे दूर हो गया । कितना कष्ट होगा आप नहीं समझते।
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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 8 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज के गोल्ड मैडल विजेता अरुण जी हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।
(1)संध्या कुमार-34,(2) सुजाता उपाध्याय-44,(3) रेणु श्रीवास्तव-45 ,(4) सुमन लता-31 ,(5) चंद्रेश बहादुर-47 ,(6)अरुण वर्मा -54 ,(7) मंजू मिश्रा-34 ,(8) सरविन्द पाल-30
सभी साथियों के सहयोग, समर्पण, समयदान एवं श्रमदान के लिए हमारा नमन ।