12 जुलाई 2023 का ज्ञानप्रसाद
आज बुधवार है और हम अपने साथियों/ सहपाठियों/ सहकर्मियों के साथ परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में बैठकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने को उत्सुक हैं।
आज का लेख 2010 में प्रकाशित हुई पुस्तक “ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान- प्रयोजन और प्रयोग” पर आधारित है। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित 65 पन्नों की पुस्तक पढ़ते समय पंडित लीलापत शर्मा जी की बात स्मरण हो आयी जिसमें वोह कर रहे हैं “हमने गुरुदेव को सबसे पहले लेखक के रूप में जाना, ऐसा लेखक हमने कभी देखा ही नहीं था।” हमारा भी कुछ ऐसा ही हाल था। हमारा अनुभव तो यही कहता है कि चाहे जो भी पुस्तक उठा लो, कोई भी पृष्ठ पढ़ लो, एक एक शब्द गुरुचरणों में नमन करने को प्रेरित करता है।
गायत्री मन्त्र के भावार्थ से हम सभी परिजन परिचित हैं। इस दिव्य मंत्र के 24 अक्षरों से माँ गायत्री की 24 शक्तिधाराओं से क्या सम्बन्ध है; यही सम्बन्ध इस महामंत्र को इतना शक्तिशाली बनाता है कि इसे ब्रह्मास्त्र की उपाधि से सम्मानित किया गया है। कल वाले लेख में 24 शक्तिधाराओं के नाम ही बताए थे, आज उनकी शक्तियों का संक्षिप्त वर्णन है।
यही है आज के ज्ञानप्रसाद लेख का विषय। आइए विश्वशांति की कामना करें और गुरुकुल पाठशाला की और प्रस्थान करें।
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने।हे भगवन हमें ऐसा वर दो।
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गायत्री मंत्र का भावार्थ लगभग सभी को मालूम है।
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ” का भावार्थ है – “उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।”
प्रस्तुत लेख में इस भावार्थ को ऐसे तरीके से समझने का प्रयास किया गया है कि साधक को इस महामंत्र की शक्ति पर कोई भी संदेह/ शंका करने की कोई भी गुंजायश नहीं रहेगी।
माँ गायत्री का मुख्य रूप “आद्यशक्ति” है,इस मुख्य रूप की 23 अन्य शक्तिधाराएँ (रूप) हैं जिनकी प्रतिमाएं हरिद्वार स्थित ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के ग्राउंड फ्लोर में स्थापित की गयी हैं। लेख में प्रत्येक शक्तिधारा की शक्ति का वर्णन किया गया है और अंत में इस शक्ति को गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों से जोड़कर समग्र गायत्री मन्त्र की शक्ति बताई गयी है।
माँ गायत्री को “विवेक की अधिष्ठात्री” कहा गया है । अथर्ववेद में तो उन्हें “वेदमाता” यानि वेदों की माता कहा गया है। ऐसा बताया जाता है कि प्रत्येक प्रतिमा में ज्ञान और विज्ञान की, योग और तप की विभिन्न शक्तियों का समावेश है। गायत्री साधक के अंतःकरण में उठ रही श्रद्धा को मार्गदर्शन देने के लिए इन प्रतिमाओं और उनकी शक्तियों का बड़ा योगदान है।
गायत्री के सभी रूपों में “आद्यशक्ति” मुख्य रूप है। वह वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री, देवमाता अर्थात् सद्भावों की प्रेरणापुंज, समस्त विश्व का माता अर्थात विश्वमाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की फिलॉसफी को हृदयंगम कराने वाली सार्वभौम शक्ति यही विश्वमाता ही है।
आद्यशक्ति के ही अन्य 23 रूप हैं। ब्राह्मी सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के प्रमुख बीजों को उगाने वाली महाशक्ति है तो वैष्णवी सृष्टि की सुव्यवस्थित करने वाली शक्ति है। सभी रूपों की अपनी-अपनी शक्तियां हैं और सभी 24 रूप गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों से सम्बंधित हैं। सभी शक्ति धाराएँ एक ही अनादि स्रोत की विभिन्न शाखाएँ हैं, जो भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के समूचे चेतन परिवार का परिष्कार कर उसका कायाकल्प कर दिखाती हैं।
गायत्री सार्वभौम यानि universal है। वह किसी देश, धर्म जाति या लिंग की जागीर नहीं है क्योंकि बुद्धि,ज्ञान, विवेक आदि की तो सभी को ज़रुरत है। “गायत्री की फिलॉसफी” संसार का सबसे छोटा धर्मशास्त्र है। इसकी साधना विधान में ऋद्धि-सिद्धियों के भण्डार छिपे पड़े हैं। गायत्री साधना को अमृत,पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु, ब्रह्मास्त्र जैसे विभिन्न रूपों में समझाया गया है। तात्पर्य यही है कि इस महाप्रज्ञा का आश्रय लेने वाला मनुष्य भवबंधनों के त्रास के छूट जाता है एवं दिव्य शक्तियां प्राप्त करने योग्य पात्रता अर्जित कर लेता है।
गायत्री का वाहन हंस है। हंस को विवेक एवं तर्कशीलता को धारण कराने वाला उपकरण कहा गया है। हंसवृत्ति को समझाने के लिए अनेकों बार क्षीर-नीर का उदाहरण दिया गया है जिसका अर्थ है कि ऐसी बुद्धि और विवेकशीलता जो दूध में से पानी को अलग कर दे। माँ गायत्री के एक हाथ में पुस्तक और दूसरे हाथ में कमण्डल दर्शाये गए हैं ।पुस्तक स्वाध्याय और ज्ञान का प्रतीक है और कमण्डल को पात्रता धारण करने का प्रतीक माना गया है। नारी शक्ति की वरिष्ठता एवं मानवी गरिमा के प्रति श्रद्धान्वित रहने की दृष्टि से गायत्री को नारी रूप प्रदान किया गया है ।
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के ग्राउंड फ्लोर पर गायत्री के चौबीस अक्षरों की प्रतीक, शक्ति धाराओं को दर्शाते स्वरूप का चित्रांकन हर प्रतिमा के साथ किया गया है। उन्हें देख-समझ कर हर कोई यह जान सकता है कि “मंत्र ऊर्जा” की असीमित सम्पदा से भरी गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेकर, इन बीज मंत्रों से कोई भी साधक अपने अन्दर सोई क्षमताओं को जगाकर विभूतिवान् बन सकता है। ब्रह्मवर्चस के स्वयंसेवक इस विज्ञान सम्मत गायत्री विद्या की फिलॉसफी को व्यावहारिक रूप में समझाते हैं ताकि यहाँ आने वाला, मात्र चर्मचक्षुओं से ही नहीं बल्कि अन्तर्चक्षुओं से भी यह अनुभव कर सके कि विश्व भर के सभी गायत्री शक्तिपीठों के “सर्वोच्च केन्द्र ब्रह्मवर्चस” में आने पर वह कितना कृतार्थ हो कर गया । अध्यात्म ज्ञान को logically समझकर वह कम से कम नित्य गायत्री उपासना का संकल्प लेकर तो जाता ही है। परम पूज्य गुरुदेव ने इस दिशा में और अधिक जानने और समझने के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य रच कर रख दिया है।
चौबीस शक्तियों का संक्षिप्त परिचय
(1 ) आद्यशक्ति अर्थात् सृष्टि की मूल चेतना की भव्य प्रतिमा को ब्रह्मवर्चस के मुख्य मंदिर में स्थापित किया गया है जिसे ज्ञानमंदिर भी कहा जाता है। आदिदेव ॐ कार के रूप में इसे ही प्रथम और सर्वोपरि पूज्य माना गया है। पुरुषवाचक संबोधन में इसे परब्रह्म भी कहते है ।
(2 ) ब्राह्मी : महाविद्या, सद्ज्ञान, सद्विचार सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के सोये बीजों को जगाने वाली महाशक्ति को ब्राह्मी कहा जाता है।
(3 ) वैष्णवी:संसार की सुव्यवस्था प्रदान करने वाली, परिपोषण करने वाली शक्ति को वैष्णवी कहा जाता है।
(4 ) शाम्भवी: अवांछनीयता (किसी चीज़ की चाह न होना) का निवारण करने वाली परिवर्तनकारी शक्ति, सृष्टि संतुलन के लिए ज़रूरी शक्ति, जो अपने प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करती है उसका नाम शाम्भवी है ।
(5 ) वेदमाता: ज्ञान-विज्ञान की समस्त ज्ञात/अविज्ञात धाराओं की गंगोत्री, ज्ञान की जननी वेदमाता ही है ।
(6 ) देवमाता: इस स्वरुप को देवत्व को जन्म देने वाली, देवोपम स्तर की मनः स्थिति बनाने वाली देवी कहा जाता है।
(7 ) विश्वमाता: सम्पूर्ण विश्व की संस्कृति की रक्षा और वसुधैव कुटुम्बकम् की फिलॉसफी को सार्थक करने वाली शक्ति को विश्वमाता केहते हैं।
(8 ) ऋतम्भरा: यह स्वरुप सत्य-असत्य, logical-illogical की स्थिति का निवारण कराने में सहायता करता है।
(9) मंदाकिनी: गंगा के समान पवित्र और भीतर/बाहर से शुद्ध करने वाली देवी मन्दाकिनी है।
(10 ) अजपा: निश्चल स्थिति,अविचल निष्ठा की सिद्धि वाला स्वरूप अजपा है
(11 ) ऋद्धि: यह स्वरुप व्यक्ति को आत्मिक विभूतियाँ ( सफलता,भाग्य, श्रेष्ठता, अच्छी किस्मत, धन आदि ) प्रदान कर असाधारण बनाता है।
(12 ) सिद्धि: सिद्धि को वैभव की अधिष्ठात्री, मनुष्य को समृद्ध- सम्पन्न बनाने वाली देवी कहा गया है।
(13 ) सावित्री: पंचमुखी सावित्री शक्ति का यह स्वरुप अचेतन की रहस्यमयी परतों का अनावरण करने वाला है। |
(14) सरस्वती : बुद्धि को प्रखर और परिष्कृत करने वाली देवी माँ सरस्वती है ।
(15) लक्ष्मी: सम्पन्नताप्रदायक शक्ति जो साधक में “ श्री” तत्त्व बढ़ाने वाले गुणों का विकास करती है, वही माँ लक्ष्मी है।
(16) महाकाली: असुरता का संहार करने वाली, मृत्यु की प्रतीक, रौद्र शक्ति वाली माँ महाकाली है ।
(17 ) कुण्डलिनी: जीवन की सामान्य ऊर्जा को असामान्य में परिष्कृत कर चमत्कारी सफलताएँ प्रदान करने वाली, तंत्रविद्या की अधिष्ठात्री देवी कुण्डलिनी कहलाती है।
(18 ) प्राणाग्रि: साधक को प्राणवान् बनाने वाली, जीवनी-शक्ति बढ़ाकर,सामर्थ्य बढ़ाने वाली शक्ति को प्राणाग्नि कहते हैं।
(19 ) भुवनेश्वरी: नियम और मर्यादाओं के परिपालन की कसौटी पर विश्व-वैभव का अधिष्ठाता बना देने वाली शक्ति माँ भुवनेश्वरी है ।
(20 ) भवानी: माँ भवानी संगठन कौशल का धनी बनाने वाली और व्यक्ति को युग-नेतृत्व सौंपने वाली दैवी विभूति है ।
(21 )अन्नपूर्णा: माँ अन्नपूर्णा वह, चेतना शक्ति है जिसकी कृपा से साधक को अभाव नहीं भोगने पड़ते ।यह अर्थ-सन्तुलन के लिए सद्बुद्धि देने वाली है।
(22 ) महामाया: भ्रान्तिओं का निवारण करनेवाली, भव-बंधनों से मुक्ति दिलाने वाली माँ महामाया है।
(23 ) पयस्विनी: माँ पयस्विनी भूलोक की कामधेनु है जिसकी कृपा से साधक में ब्रह्मतेज बढ़ता है और किसी भी चीज़ का अभाव नहीं रहता ।
(24 ) त्रिपुरा: बहादुरी,तेज और शक्ति बढ़ाने वाली, पापों से उबार कर महान् बनाने वाली सामर्थ्य वाली देवी त्रिपुरा है।
गायत्री महाशक्ति के चौबीस रूपों के अपने वाहन, वस्त्राभूषण, साज-सज्जा की अपनी- अपनी विशेषता है। ब्रह्मवर्चस के स्वयंसेवक इनकी व्याख्या दर्शनार्थियों को समझाते हैं।
गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर हैं। प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट देवी का, शक्तिधारा का, देवता का, ऋषि का, शक्ति बीज का, यंत्र चक्र एवं विभूति का प्रतीक है। प्रत्येक के अपने-अपने रहस्य, प्रयोग और प्रतिफल हैं।
ॐ भूः भुवः स्वः” गायत्री मंत्र का शीर्ष भाग है, अलग होते हुए भी मंत्र के आरम्भ में इसका प्रयोग होता है।
गायत्री के 24 अक्षरों का 24 शक्तिधाराओं से निम्नलिखित सम्बन्ध है :
24 अक्षरों का सम्बन्ध
1.”तत्” अक्षर की देवी आद्यशक्ति
2.”स” अक्षर की देवी ब्राह्मी
3.”वि” अक्षर की देवी वैष्णवी
4.”तुः” अक्षर की देवी शाम्भवी
5.”व” अक्षर की देवी वेदमाता
6.”रे” अक्षर की देवी देवमाता
7.”णि” अक्षर की देवी विश्वमाता
8.”यं” अक्षर की देवी ऋतम्भरा
9.”भ” अक्षर की देवी मंदाकिनी
10.”गो” अक्षर की देवी अजपा
11.”दे” अक्षर की देवी ऋद्धि
12.”व” अक्षर की देवी सिद्धि
13.”स्य” अक्षर की देवी सावित्री
14.”धी” अक्षर की देवी सरस्वती
15.”म” अक्षर की देवी महालक्ष्मी
16.”हि” अक्षर की देवी महाकाली
17.”धि” अक्षर की देवी “कुण्डलिनी
18.”यो” अक्षर की देवी प्राणाग्नि
19.“यो”अक्षर की देवी भुवनेश्वरी
20.”नः” अक्षर की देवी भवानी
21.”प्र” अक्षर की देवी अन्नपूर्णा
22.”चो” अक्षर की देवी महामाया
23.”द” अक्षर की देवी पयस्विनी
24.“यात्” अक्षर की देवी त्रिपुरा
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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 7 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज अरुण जी गोल्ड मैडल विजेता हैं।
(1)संध्या कुमार-38,(2) सुजाता उपाध्याय-26 ,(3) रेणु श्रीवास्तव- 30,(4) चंद्रेश बहादुर-27,(5 )अरुण वर्मा-35,(6 ) सरविन्द पाल-40 ,(7 ) स्नेहा गुप्ता -24
सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई