वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान  के शोधार्थी क्या रिसर्च कर रहे हैं ?


10 जुलाई 2023 का ज्ञानप्रसाद
पिछला सम्पूर्ण एक सप्ताह हमने गुरुपूर्णिमा को मनाते हुए अपनेआप को  गुरुचरणों में समर्पित किया।  प्रत्येक वर्ष की  गुरुपूर्णिमा और गायत्री जयंती पर परम पूज्य गुरुदेव से एक नवीन मार्गदर्शन प्राप्त होता है और उसी मार्गदर्शन को इस छोटे से परिवार में चरितार्थ किया जाता है, गुरुदेव के निर्देश को पूर्ण करके जिस संतुष्टि एवं शांति का आभास होता है उसे शब्दों में बांध पाना हमारे बस की बात नहीं है। नमन है उस महान गुरुसत्ता को जिसके हम शिष्य हैं। 
युगतीर्थ शांतिकुंज से केवल आधा किलोमीटर  दूर ही  स्थित है ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान (Brahmavarchas Research Centre ), आज सोमवार से हम इसी शोध संस्थान को जानने के  प्रयास का शुभारंभ कर रहे हैं। आने वाले लेखों को समझने में उन साथियों को समस्या हो सकती है जिनका विज्ञान से कोई भी रिश्ता नहीं है, लेकिन हर बार की भांति हमारा प्रयास यही रहेगा कि हर तरह की विधि अपनाकर  इन लेखों को रोचक और सरल बनाएं। कई बार विज्ञान के टेक्निकल शब्दों  को समझने के लिए हिंदी के बजाए इंग्लिश भाषा अधिक सरल लगती है, ऐसे ही कुछ प्रयोग इन लेखों में भी किए जाएंगें। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान पर लेख श्रृंखला लिखने का उद्देश्य केवल इस संस्थान को जानना ही नहीं है बल्कि यह भी जानना है कि  यहाँ पर क्या रिसर्च हो रही है, यज्ञ से, मन्त्रों से, अध्यात्म से  मानव शरीर पर क्या प्रभाव पड़ रहा है । शोध संस्थान की स्थापना में युगदृष्टा  की क्या दृष्टि रही होगी, इसकी स्थापना एक ऐसे युगदृष्टा द्वारा की गयी जिनकी शिक्षा का स्तर केवल पांचवीं कक्षा तक ही था।
इस संस्थान में हो रही रिसर्च विश्व्यापी  Scientific Journals में प्रकाशित होने के इलावा अखंड ज्योति के प्रत्येक अंक में “ब्रह्मवर्चस-देव संस्कृति शोध सार” के टाइटल अंतर्गत भी प्रकाशित होती  है।  हम से जो भी बन पायेगा हम सब इक्क्ठे होकर गुरुकुल पाठशाला में गुरु चरणों में बैठ कर  इन टेक्निकल लेखों को समझने का प्रयास करेंगें। 
आज आरंभ हो रही  लेख शृंखला भी ब्रह्मवर्चस द्वारा लिखित 474 पन्नों के दिव्य ग्रन्थ “पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य-दर्शन एवं दृष्टि”, पर आधारित है । यह ग्रन्थ सच में एक masterpiece है।
तो आइए विश्वशांति की कामना के साथ आज के ज्ञानप्रसाद का आरम्भ करें। 
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने।हे भगवन हमें ऐसा वर दो।  


 ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के रिसर्च उद्देश्य: 
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना के समय परम पूज्य गुरुदेव  ने संस्थान में की जाने वाली रिसर्च के चार उद्देश्य निश्चित किए थे : 

  1. वैज्ञानिक अध्यात्म के रूप में जीवन दर्शन की खोज । Scientific spirituality and Life philosophy.
  2. अध्यात्म उपचारों द्वारा व्यक्ति के अंदर छिपी  शक्तियों का जागरण एवं इसकी वैज्ञानिकता ।
  3. एकौषधि अनुसन्धान यानि एक ही औषधि से इलाज, न कि अनेकों औषधियों के मिश्रण से।  
  4. यज्ञ चिकित्सा द्वारा समग्र स्वास्थ्य, Yagya therapy  
             शोध की प्रक्रिया:
    समग्र जीवन दर्शन की खोज 
    Research into  the Philosophy of Life 
    परम पूज्य गुरुदेव  के अनुसार जीवन की फिलॉसोफी केवल बुद्धि का खेल न होकर दृष्टि (vision) का खेल  है। इसी दृष्टि का,नज़र का ही तो सब खेल है।  तभी तो कहा गया है : नज़रें बदली तो नज़ारा ही बदल गया। 

नज़र बदली तो नज़ारे ही बदल गए:
कश्ती वही थी, पर किनारे बदल गए
जिनकी ओट में, मैं चैन ढूंढता था
मन्ज़िल की चाह और इशारे बदल गए
आज मन डूबा, इक गहरे विश्राम में 
अनुमानों से परे, बहुत आराम में 
थम सा गया है, विचारों का ज्वर भीतर
परम् सुख व आनंद इसी विराम में है

यह दृष्टि जितनी पैनी, गहरी, व्यापक और समग्र ( Holistic, overall ,broad) होगी, जीवन को उतनी ही समग्रता से देखा- समझा और पहचाना जा सकेगा। समस्याओं का सही स्वरूप समझ में आने से समाधान भी सही मिल सकेंगे। जीवन कोई नितान्त शरीर के भीतर सिमटा हुआ तत्व नहीं है। मन की कल्पनाएँ, चेतना का उत्कर्ष एक ओर उसे ईश्वर से जोड़ता है तो दूसरी ओर जीवन की आवश्यकताएँ, उसका सौन्दर्य बोध प्रकृति से मिलाती हैं। अपनी समग्रता में मनुष्य प्रकृति और परमेश्वर दोनों से अविछिन्न रूप से जुड़ा है। जीवन दर्शन की समग्रता में इन तीनों ( मनुष्य, परमेश्वर और प्रकृति ) के अंतर संबंधों की व्याख्या भी समग्र होनी चाहिए।
मनुष्य ने स्वयं  को तो अपनाया लेकिन प्रकृति और परमेश्वर को भुला ही बैठा। यदि प्रकृति को कभी कभार  याद भी किया तो अपने स्वार्थ के लिए ही  किया। ऐसे दार्शनिक मतों ने मानवी चेतना के उत्कर्ष के सारे रास्ते बन्द कर दिए। इन्सान की नियति सामाजिक प्राणी बनना न होकर देवमानव बनाने की दिशा में चलने लगा है। प्रकृति को सब कुछ मान बैठने वाले वैज्ञानिकों ने मनुष्य और प्रकृति के पारस्परिक सम्बन्धों की गहराई को भूल कर प्रकृति का इस कदर दोहन और शोषण किया कि प्रदूषण, पर्यावरण जैसी  अनेकों विपदाएँ खड़ी हो गयीं और ऐसा लगने लगा कि मनुष्य विनाश  के कगार पर जा पहुंचा है। जिन्होंने ईश्वर को सब कुछ माना, उन्होंने सम्बन्धों के आधार  पर जीवन को ही नकारना शुरू कर दिया । प्रकृति और मनुष्य को सर्वथा हेय समझने वाले इस चिन्तन ने “जीवन का अर्थ” ही खो दिया ।
1990 से पूर्व परम पूज्य गुरुदेव के  निर्देशन में और उसके बाद  श्रद्धेय डॉक्टर साहिब  के मार्गदर्शन में काम करने वाले ब्रह्मवर्चस्व के अनुसंधान कर्मियों की टीम देश और विश्व के विभिन्न भागों में जाकर वहां की प्रथाओं, परम्पराओं, प्रचलनों, मान्यताओं, मूल्यों एवं  नीतियों का नए सिरे से अध्ययन कर रही है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान  के शोधार्थी अपने देशव्यापी, विश्वव्यापी सर्वेक्षण में इस बात को गहराई से जानने की कोशिश में लगे हैं कि वर्तमान के और भविष्य के मनुष्य के जीवन के समाधान क्या हैं? उनकी जीवन दृष्टि क्या होनी चाहिए? ऋषियों का गौरवपूर्ण अध्यात्म विज्ञान इस उद्देश्य को पूरा कर सके, इसके लिए उसमें किस फेर बदल  की आवश्यकता है।  मनुष्य के व्यक्तित्व और समाज पर इसका क्या प्रभाव है।  इस समाज और व्यक्ति पर किए गए मनोवैज्ञानिक प्रयोगों, शोध निष्कर्ष के आधार पर ऐसा सरंजाम जुटाया जा रहा है, जो मानव शक्तियों का विनाश  रोके, प्रकृति के साथ सम्बन्ध को मधुर बनाकर उसे विकास की ओर ले जाये।
व्यक्ति की unending  शक्तियों    के जागरण की प्रयोग प्रक्रिया:
इस प्रक्रिया के अन्तर्गत शान्तिकुंज के तपः पूत वातावरण में एक मासीय और नौ दिवसीय साधना सत्र आयोजित किए जाते हैं। इन साधना सत्रों का क्रम पूरे वर्ष अबाध गति से चलता रहता है। एक मासीय सत्र प्रत्येक महीने की 1 तारीख से शुरू होते हैं और  30- 31 को समाप्त होते हैं। नौ दिवसीय शिविर भी नियत तिथियों पर महीने में तीन बार निरंतर चलते आ रहे हैं  इन दोनों सत्रों के साधनाक्रम अलग-अलग हैं, जिनका निर्देशन परम पूज्य गुरुदेव  एवं  वंदनीय माता जी  के बाद उनकी परम तपस्विनी बेटी  शैलबाला पण्ड्या करती हैं। शिविर में आने वाले साधक उन्हीं से साधना सम्बन्धी परामर्श एवं मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। साधकों-साधिकाओं को गुरुदेव  द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक अध्यात्म के साधनात्मक प्रयोगों को निर्देशित क्रमानुसार सम्पन्न करना होता है। साधनाक्रम के अलावा साधक  शांतिकुंज में संचालित होने वाले लोकहित के कार्यक्रमों में भाग लेकर जीवन और साधना में एकात्मता सिद्ध करते हैं। 
शिविरार्थिओं का प्रथम परीक्षण साधनात्मक प्रयोग से “पहले”  तथा साधनात्मक प्रयोग के “बाद” होता है। इन परीक्षणों के द्वारा आध्यात्मिक साधनाओं के प्रभावों का मापन (measurement) होता है। शिविर समाप्त होने पर भागीदार व्यक्तियों को एक निश्चित साधनाक्रम को जारी रखने का निर्देश दिया जाता है तथा शोध तकनीक  के अनुरूप  एक निश्चित समय के अन्तराल में पुनः बुलाया जाता है। बुलाए जाने का यह क्रम “एक्सपेरीमेण्टल डिजाइन” के अनुसार होता है  जिसका उद्देश्य यह जानना होता है कि व्यक्ति के अंदर छिपी  शक्तियां किस क्रम में विकसित हो रही हैं। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान  के वैज्ञानिकों के अनुसार ये प्रभाव मनोरोगों की समाप्ति, प्रतिभा जागरण, पारिवारिक सामंजस्य, सामाजिक उत्कर्ष, अन्तर्दृष्टि के विकास के रूप में देखे गए हैं।                                        
एकौषधि अनुसन्धान:
एकौषधि चिकित्सा  का अर्थ होता है अनेकों औषधियों के मिश्रण के बजाय केवल एक ही औषधि का प्रयोग करना।  आयुर्वेद के विकास का इतिहास देखने पर ज्ञात होता है कि वैदिक काल में वनौषधियों का उपयोग उनके “प्राकृतिक” रूप में ही होता था। वस्तुतः आर्यकाल को ही आयुर्वेद का स्वर्ण युग माना जाता है। आचार्य धन्वन्तरि से प्रारम्भ होकर यह चरक ऋषि पर समाप्त  होता है। अथर्ववेद में 100 प्वाइंट तो  मात्र आयुर्विज्ञान पर हैं जिनमें रोग निर्णय, चिकित्सा, लक्षण, शरीर तथा औषधियों का वर्णन है। वैसे तो चारों वेदों में आयुर्विज्ञान सम्बन्धी थोड़ा-थोड़ा वर्णन है लेकिन  मूलतः अथर्ववेद ही आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इसी कारण आज की प्रचलित आयुर्वेदिक औषधियों को ही प्रधान न मानकर उनके मूल स्रोत को देखा जाना जरूरी है।
आज के युग में  यह भुला दिया गया है कि Combination therapy यानि अनेकों औषधियों के मिश्रण से एकौषधि यानि एक ही औषधि बहुत ज़्यादा  श्रेष्ठ है। डॉ. सैमुअल हैनीमैन ने सम्मिश्रण फार्मूले (Mixed medicines)  का विरोध करते हुए  लिखा है कि Chronic diseases की उत्पत्ति का प्रधान कारण अनावश्यक औषधियों का प्रयोग ही है। 
“Drug Incompatibility” नामक ग्रन्थ में  एक समय में एक से  अधिक औषधियाँ मिलाने के फलस्वरूप  उठने वाली अनगनित  समस्याओं का विस्तृत वर्णन है। डॉ. इरविक मार्टिन ने अपनी 200  पन्नों की  बहुचर्चित पुस्तक Hazards of Medicine  में इस विषय की चर्चा की है।
परमपूज्य गुरुदेव ने अनेकों दवाओं से होने वाले नुकसानों का  हल “एकौषधि विज्ञान” के रूप में निकाला है। गुरुदेव की  संकल्पना के अनुसार ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान  के चिकित्साविदों ने 20  औषधियों (मुलहठी, आंवला, हरड, विल्व, अडूसा, भरंगी, अर्जुन, पुनर्नवा, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, निर्गुण्डी, सुण्ठी, नीम, सारिवा, चिरायता, गित्तेय, अशोक, गोक्षुर, शतावर, अश्वगंधा)  पर सफल प्रयोग/ परीक्षण करके सिद्ध किया है कि अपने गुण-धर्म (Properties) के अनुसार किसी एक औषधि का पिसा हुआ चूर्ण उसके अनुरूप रोग का निवारण करने में समर्थ है। उदाहरण के लिए अकेले आंवला का चूर्ण ऊपरी पाचक संस्थान के रोगों के लिए पर्याप्त है ।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के वरिष्ठ सहपाठी इन पंक्तियों को पढ़ते समय अवश्य ही पुराने दिनों के घरेलू नुस्खों को स्मरण कर रहे होंगें जब उनकी (so called अनपढ़) दादी/नानी के इलाज बहुत ही लाभदायक तो क्या, जादू की छड़ी हुआ करते थे। एक वोह समय था और एक आजकल का । डॉ शर्मा अपनी वीडियो में यही बात तो बता रहे थे “हमने उलटे चल रहे लोगों को सीधा करना है” 
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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 12 युगसैनिकों ने संकल्प पूर्ण किया है। आज अरुण  जी गोल्ड मैडल विजेता हैं  (1)संध्या कुमार- 54,(2) सुजाता उपाध्याय-38,(3) रेणु श्रीवास्तव- 39,(4) सुमन लता-24,(5) चंद्रेश बहादुर-40,(6)अरुण वर्मा- 64,(7) सरविन्द पाल-33,(8) मंजू मिश्रा-33, (9 )वंदना कुमार- 25,(10) निशा भारद्वाज-25 ,(11) स्नेहा गुप्ता -29,(12) नीरा त्रिखा-25  
सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई


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