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गुरुदेव और स्वामी दयानन्द के बीच हुए अतिरोचक और ज्ञानवर्धक संवाद 2 

26 मई 2022 का ज्ञानप्रसाद -गुरुदेव और स्वामी दयानन्द के बीच हुए अतिरोचक और ज्ञानवर्धक संवाद 2 

आज का ज्ञानप्रसाद भी बहुत ही रोचक और ज्ञान से भरपूर है।  अन्य लेखों की तरह इस लेख को लिखते समय भी इतनी अधिक जानकारी इक्क्ठी हो गयी थी कि compile और concise करने की समस्या आती दिख रही थी।  लेखों का सरलीकरण करना हमारा मूलमंत्र है, अगर ऐसा न हो तो इन्हे  कौन पढ़ेगा।  बहुत ही प्रसन्नता होती है जब हमारे पाठक पूरे लेख को summarise करके कमेंट  लिखते हैं। हम आभार व्यक्त करते हैं। आज के लेख में ज्योतिर्मठ के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलने का सम्भावना है, हमें तो ऐसा अनुभव हुआ की शंकराचार्य की पदवी को लेकर बहुत सी controversy चलती रही।  निवेदन करते हैं की जो पंक्तियाँ  inverted commas में लिखी हैं उन्हें आत्मसात किया जाये।  गंगा की लहरों में  तत्त्वदृष्टि से गुरुदेव को  जीवन का नया मिला  मंत्र  “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत।” इस लेख का सन्देश है। 

कल के ज्ञानप्रसाद में एक बहुत ही छोटी सी वीडियो प्रकाशित की जाएगी, आशा करते हैं यह वीडियो सभी के लिए बहुत ही लाभदायक सिद्ध होगी।

तो  आज के ज्ञानप्रसाद को वहीँ से continue करते हैं जहाँ कल छोड़ा था।  

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स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती 1941  में जोशीमठ के शंकराचार्य बने।  बारह वर्ष  में जोशीमठ की काया पलट हो गई। वहाँ एक भव्य आश्रम बन गया। उसके अन्तर्गत वाराणसी, प्रयाग और जबलपुर आदि स्थानों पर भी आश्रम बने। कहते हैं कि स्वामीजी ने संकल्प लिया और साधन-सम्पदा अपनेआप इकट्ठी होती चली गई। स्वामी ब्रह्मानन्द जी का देहांत गायत्री तपोभूमि की प्राणप्रतिष्ठा से करीब एक माह पूर्व 1953 में  हो गयी थी 

बद्रीनाथ सर्वश्रष्ठ क्यों है ?

आदि शंकराचार्य ने जिन चार मठों की स्थापना की उनमें बद्रीनाथ का महत्त्व सर्वश्रेष्ठ  है। अन्य तीन मठ- दक्षिण में “श्रृंगेरी मठ”, रामेश्वरम में ; पश्चिम में “गोवर्धन मठ” पुरी ओडिशा में  और पूर्व में “शारदा मठ” द्वारका गुजरात में वह  पहले ही स्थापित कर चुके थे। बद्रीनाथ मठ के लिए उनहें संघर्ष करना पड़ा था। लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व  बद्रीनाथ मन्दिर की मूर्ति तोड़ कर दुष्टों ने कुण्ड में फेंक दी थी। बद्रीनाथ मन्दिर तब से सूना था। शंकराचार्य जब यहां आये और मठ की स्थिति देखी तो अपनी दिव्य दृष्टि से उस मूर्ति को तलाशा। आभास हुआ कि वह मूर्ति कुण्ड में अब भी सुरक्षित है। उन्होंने डुबकी लगाई। कुंडों में  पानी बहुत ही  गहरा था। वे मूर्ति लेकर बाहर निकले। यह  देखकर  कि मूर्ति खंडित है उन्होंने उस मूर्ति को गंगा में प्रवाहित कर दिया। उन्होंने कुण्ड में दोबारा डुबकी लगाई,एक और मूर्ति निकालकर लाए। वह मूर्ति भी खण्डित थी। उसे भी गंगा में प्रवाहित कर दिया। तीसरी बार फिर कूदे, तब भी वही दशा थी।

आदि शंकराचार्य ने किनारे बैठ कर ध्यान लगाया। ध्यानावस्था में भगवान बद्री  जैसे आदेश दे रहे थे कि इसी रूप की स्थापना करो। मैं युग बदलने तक इसी रूप में पूजा जाउंगा। आदि शंकराचार्य ने उसी रूप की प्राण प्रतिष्ठा की और सीमा पार से होने वाले धर्म विरोधी  आक्रमणों को रोकने के लिए संन्यासी संगठन भी बनाया। यहीं पर  चौथे और आखिरी मठ “ज्योतिर्मठ” की स्थापना की। जैसा हमने कल वाले लेख में भी लिखा था  दक्षिण में एक और मठ है कांची। यहां का प्रतिष्ठान और मठों की तुलना में  अधिक समृद्धि संपन्न है।

ज्योतिर्मठ  के उत्तराधिकारी की परम्परा ज्यादा दिन नहीं चल पायी। पांच सौ वर्षों के भीतर ही यह व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई और “मंदिर के महन्तों” की देखरेख में यह  मठ चलने लगा। कोई पांच सौ वर्ष पूर्व  इस परम्परा को पुनः जीवित करने की कोशिश की गई  लेकिन वह कामयाब नहीं हुई। स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के समय  में वह व्यवस्था फिर जीवित हुई। इतने समर्थ और महिमावान संन्यासी के लिए यह प्रसिद्ध हो कि वह सिद्ध पुरुष है तो कोई अत्युक्ति नहीं है। 

स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती की विलक्षणता का एक प्रमाण और है। उनकी शिष्य परम्परा में ऐसे सन्त महात्मा उभर कर आये जिन्होंने धार्मिक जगत का इतिहास बदल दिया। स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती भागवत के प्रबल  विद्वान वक्ता और संगठनकर्ता, स्वामी करपात्री जी महाराज विलक्षण विद्वान और संगठनकर्ता। करपात्री जी का  वास्तविक नाम स्वामी हरिनारायणानन्द था। इन्होंने अंजुलि में जितना आ जाए उतना ही भोजन करने का व्रत लिया था। किसी और पात्र (बर्तन) का इस्तेमाल नहीं करते थे। इसीलिए करपात्री के नाम से विख्यात हुए। राजनीति को प्राचीन परम्परा के अनुसार दिशा देने के लिए इनकी स्थापित ‘रामराज्य परिषद’ ने अपने समय में काफी काम किया है। वह  अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुए लेकिन 1980  के दशक तक समय को प्रमाणित करने वाली हवाओं में एक नाम उनका भी था। उनकी बनाई ‘धर्मसंघ’ नामक संस्था ने कई जगह संस्कृत महाविद्यालय और गुरुकुल खोले। इनके अलावा शान्तानन्द सरस्वती, स्वामी कृष्णबोधाश्रम, स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती, महर्षि महेश योगी, पथिकजी महाराज जैसे कई नाम हैं जिन्होंने अपनी तरह से समाज को संस्कारित किया। स्वामी ब्रह्मानंद और उनके शिष्य साधुओं की विचारधारा से मतभेद हो सकते हैं लेकिन उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता।   

स्वामी दयानंद ने पूरा वृत्तांत बताने के बाद कहा कि आप सन्यासी  होकर धर्म प्रतिष्ठानों का दायित्व नहीं संभालेंगे तो स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने जो काम शुरू किया था वह बीच में ही रह जाएगा। 

गुरुदेव ने कहा “क्षमा ही करें”

गुरुदेव  कुछ देर चुप रहे। स्वामी दयानंद के प्रस्ताव को जैसे वह  मन ही मन परख रहे थे। कुछ पल की चुप्पी के बाद वह  बोले,

“महाराज हम जो भी काम शुरू करने जा रहे हैं, वह भारत के समस्त साधु संतों और ऋषि मुनियों की देन को अखंड रखने के उद्देश्य से है। किसी संस्था या संगठन से जुड़ने का अर्थ हमारी समझ में यही  आता है कि अपने आपको वहीं तक सीमित कर लेना। संस्था का कोई दायित्व संभालने के लिए क्षमा ही करें तो अच्छा रहेगा।”

इतना कह कर गुरुदेव  ने अपनी बात पूरी की। यह उनका अंतिम निर्णय था। स्वामी दयानंद ने इसके बाद और आग्रह नहीं किया। सिर्फ इतना ही बोले, 

“आपके उत्तर को मैं अस्वीकार के रूप में नहीं देख रहा हूँ। यह और भी व्यापक और महत्तर दायित्व की तैयारी है। हम लोगों को आपसे बड़ी आशाएं हैं। ईश्वर आपको सनातन धर्म की सेवा के लिए चिरायु रखे।”

बातचीत में यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि स्वामी दयानंद गुरुदेव  को ज्योतिर्मठ  का दायित्व सौंपना चाह रहे थे या ‘भारत धर्म महामंडल’ का।  चर्चा विस्तार में जाये बिना ही समाप्त हो गई। 

उस दिन गुरुदेव की मथुरा के लिए वापसी नहीं हो सकी। दिन में गुरुदेव  ने काशी करवत, विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट पर कुछ समय व्यतीत किया। वहां के प्रमुख कार्यकर्ता त्रिपाठीजी भी साथ थे। इन तीनों स्थानों की अपनी ही महत्ता है परन्तु  यह मात्र संयोग ही नहीं था कि तीनों स्थानों का संबंध मृत्यु से है। काशी करवत यानी मृत्यु के स्वेच्छया वरण का प्रतीक, काशी विश्वनाथ संहार के, मृत्यु के अधिष्ठाता और मणिकर्णिका घाट जहाँ व्यक्ति के पार्थिव अवशेष समेटे जाते हैं। मणिकर्णिका से वापसी में गुरुदेव  हनुमान घाट मोहल्ले में विशुद्धानंद कुटीर में भी रुके। कुटीर में तब शांति थी। त्रिपाठीजी भी यहां कभी कभार आया करते थे। उन्होंने पूछा, ‘आप इस स्थान को जानते हैं क्या?’

गुरुदेव  ने कहा, 

“वर्षों पहले आया था तब भारत स्वतंत्र नहीं हुआ था। विशुद्धानंद जी से भेंट हुई थी। उन्होंने अपनी दिव्यशक्ति से भारत माता की प्रतिमा रच कर भेंट की थी। उन सब बातों का अब कोई अर्थ नहीं है।”

विषय बदल कर वे स्वगत ही बोले, 

“बाबा की सिद्धि देख कर यह निष्कर्ष तो पुख्ता होता है कि भगवान की इस सृष्टि में हर समय सभी तत्व हर जगह उपलब्ध है। इसका अर्थ है कि समूची सृष्टि एक ही तत्व से बनी हुई है। प्रकृति जिस तरह एक ही तत्व से विभिन्न पदार्थों की रचना कर लेती है, साधक भी अपने पुण्यबल का उपभोग कर नये पदार्थों की रचना कर सकता है।”

स्वामी विशुद्धानंद हिमालय के जिस गुह्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे, वहीं के एक सिद्धयोगी महावतार बाबा के संबंध में विख्यात था कि वे अपने आपको जहां चाहे प्रकट कर सकते हैं। अदृश्य  भी हो जाते हैं। त्रिपाठीजी ने उनकी चर्चा छेड़ी लेकिन गुरुदेव  का ध्यान कहीं और था। वह  विशुद्ध कुटीर से बाहर आए और वापस गंगा किनारे पहुँचे। वहाँ गमछा बिछाया। पालथी लगाकर बैठे और गंगा की लहरों को देखने लगे। तीसरे पहर का समय था। मौसम न गरम था न ही ठंडा। गंगा की धारा को छूकर आती हुई हवाएं अपने साथ शीतलता भी लाती थी। खुले में बैठे गंगा को निहारते हुए गुरुदेव  के चित्त में एक मंत्र उभरा। 

ब्रह्मा का एक अहोरात्र ( आधी रात) बीतने पर सृष्टि का भी अंत हो जाता है। उसकी जीवन लीला पूरी हो जाती है। फिर ब्रह्मा भी सो जाते हैं। मनुष्य भी उसी ब्रह्मा की संतान है। उसका भी एक अहोरात्र है-

“सूर्य उदय होता है तो दिन का आरंभ होता है, अस्त होता है तो अंत समापन।”

यह विचार सरणि ( Thought Timetable) आगे बढ़ती गई और निष्कर्ष उभरा कि  दिन को एक जीवन मानकर जिया जाए तो जीवन ज्यादा पवित्र हो सकता है। रात को विश्राम करते हैं। विश्राम को मृत्यु का प्रतीक मानें। शयन आरंभ हो तो मौत का प्रवेश। उससे पहले अपने आज के “वर्तमान जीवन के” जिये जा चुके दिन की समीक्षा करें । जो गलतियां हुई हैं उनके लिए पश्चाताप करें। हर दिन एक नये जन्म की तरह हो और रात मौत की तरह। गुरुदेव  गंगा किनारे लगभग बीस मिनट बैठे होंगे और उन्होंने लहरों से भी सुना,

“हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत।” 

इस तत्त्वदृष्टि से जीवन को जैसे नया मंत्र मिला।

समापन 

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हम अपनी लेखनी को यहीं विराम देने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव। 

25  मई 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1) संध्या कुमार-25 , (2 ) अरुण वर्मा -31   

इस सूची के अरुण वर्मा जी  गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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