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गुरुदेव से हमारे सम्बन्ध कैसे हों ? चतुर्थ एवं समापन भाग। अनिश्चित नहीं, सुनिश्चित परिजनों की आवश्यकता है।
23 जनवरी 2025 गुरुवार का ज्ञानप्रसाद-सोर्स- अखंड ज्योति जुलाई 1966 पृष्ठ 26 चार भागों में पूर्ण हुई वर्तमान लेख श्रृंखला का आज चतुर्थ एवं समापन भाग प्रस्तुत किया गया है। परम पूज्य गुरुदेव की इच्छा है कि कुछ ऐसे परिजन शिक्षित कर दिए जाएँ जिन्हें हम अपने उत्तराधिकारी कह सकें। उनकी योग्यता ऐसी हो कि…
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गुरुदेव से हमारे सम्बन्ध कैसे हों ? भाग 3 -हमारे गुरुदेव एक पारिवारिक शिक्षक
22 जनवरी 2025 का ज्ञानप्रसाद -सोर्स अखंड ज्योति जुलाई 1966 पृष्ठ 26 परम पूज्य गुरुदेव स्वयं को परिजनों के ऋण से मुक्त करना चाहते हैं। आज के लेख में गुरुवर कह रहे हैं कि यदि हमारा “भावना शरीर” यानि हमारा साहित्य, हर प्रेमी परिजन के समीप एक मूर्तिमान कलेवर की तरह विद्यमान रह सके तो हमारे…
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ऋतंबरा-प्रज्ञा की सरलतम चर्चा
12 अक्टूबर का ज्ञानप्रसाद – हो सकता है आज के लेख का हर कोई वाक्य आपको बार-बार पढ़ना पढ़े , बहुत गूढ़ है। शब्दसीमा के कारण भूमिका ले लिए कोई स्थान नहीं बचा। _________________ ज्ञान अनंत है -इसका कोई अंत नहीं कभी भी किसी ज्ञान को अंत नहीं कहना चाहिए क्योंकि अगर भगवान ही अनंत…
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