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अखंड ज्योति आई हस्पताल- एक प्रेरणादायक कथा –Part 2

12  अप्रैल  2021 का ज्ञानप्रसाद 

आशा करते हैं कि हमारे समर्पित और सूझवान सहकर्मियों के ह्रदय में अखंड ज्योति आई हस्पताल के बारे में पृष्ठभूमि बन गयी होगी। हमारा सात मास का अथक प्रयास तभी सफल होगा जब हमारे  सहकर्मियों के ह्रदय में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा घड़ित  शिष्यों का समर्पण उभर कर प्रेरणा देगा और कहेगा “अरे क्या सोच रहा है ,कहीं सोच -सोच में ही यह अनमोल जीवन व्यतीत न हो जाये “ इस लेख को लिखने में हमने क्या -क्या प्रयास किये ,किस -किस से फ़ोन पर सम्पर्क किया, कैसे ऑनलाइन रिसर्च की इत्यादि का कल वर्णन करेंगें। 

तो आओ  चलें लेख के दूसरे और अंतिम भाग की ओर :

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तिवारी जी  का कहना है कि उन्हें  ग्रामीण परिवारों को इस बात के लिए राजी करने में बहुत परिश्रम करना पड़ा  कि लड़कियों की छोटी आयु में  शादी (early marriage ) की न  सोचें बल्कि उन्हें मस्तीचक भेजें जहां उनके लिए छह साल तक मुफ्त रहने और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। एक दशक में 150 लड़कियों को प्रशिक्षण देकर ऑप्टीमीट्रिस्ट बनाया गया है और सात लड़कियों ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है।  यह कार्यक्रम इतना सफल रहा है कि बिहार भर के गांवों से करीब 500 लड़कियां यहां दाखिले के लिए वेटिंग लिस्ट में हैं। बिहार में सीवान, पीरो, गोपालगंज और डुमरांव में चार प्राथमिक दृष्टि जांच केंद्र और एक उत्तर प्रदेश के बलिया में चल रहा है।  भोजपुर के कस्बे पीरो का जांच केंद्र तो पूरी तरह महिलाएं चला रही हैं।  इसका नेतृत्व 22 वर्षीया दिलकुश शर्मा करती हैं, जिन्होंने अखंड ज्योति के विज्ञापन को पढ़कर उनसे  संपर्क किया था।  

तिवारी जी  कहते हैं: 

”हमारी सोच है कि अगले चार साल में महिलाएं ही अस्पताल के कम से कम 50 प्रतिशत कार्यों का नेतृत्व करें ” 

तिवारी जी अपने दादा प्रसिद्ध समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु  श्री रमेश चंद्र शुक्ला जी  की शिक्षाओं का अनुसरण कर रहे हैं।  यह एक भली प्रकार स्थापित तथ्य है कि किसी भी चिकित्सा देखभाल कार्यक्रम की सफलता के लिए समर्पित कर्मियों का एक पूल  इस  कार्यक्रम की  एक  रीढ़ की हड्डी होता  है। यह भी सच है कि भर्ती करना, उन्हें प्रशिक्षित करना  और फिर retain  रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे मानव संसाधनो का उच्च कारोबार समस्या को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। चुनौतीपूर्ण भूगोल के तहत गरीब बुनियादी ढांचे  इसे और भी   अधिक जटिल बना देते  हैं । तो कहाँ से आयेंगें इस प्रतिभा वाले एक्सपर्ट।  यहाँ काम आयी out -of – the box तकनीक और एक नवीन  सोच। 

Out of the box : 

आउट-ऑफ-द-बॉक्स (Out of the box) सोचने से हमें अखंड  ज्योति नेत्र अस्पताल में भर्ती करने, प्रशिक्षित करने और स्थानीय प्रतिभा को सफलतापूर्वक बनाए रखने में मदद मिली है। Out -of -the box का  अर्थ  उन विचारों का पता लगाने के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं  जो रचनात्मक और असामान्य हैं और जो नियमों या परंपरा द्वारा सीमित या नियंत्रित नहीं हैं। संभवतः हम रुपया -पैसा खर्च करते हैं , इतने अधिक वर्ष खर्च करने के उपरांत हम फिर नौकरी के लिए आवेदन करते हैं ,फिर भी कोई पता नहीं कि नौकरी मिलेगी य नहीं। गुरुदेव की  दूरदर्शिता ने यहाँ काम किया। 

आओ देखें यह स्कीम कैसे काम में आयी। 

Football to Eyeball :

“फुटबॉल टू आईबॉल” कार्यक्रम 2010 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत, स्थानीय गांवों की लड़कियों को पेशेवर ऑप्टोमेट्रिस्ट के रूप में ट्रेनिंग  प्राप्त करने के लिए फुटबॉल खेलने और प्रशिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उन्हें अंधापन को ठीक करने और एक बहुत ही पितृसत्तात्मक समाज में व्यापक सामाजिक प्रभाव बनाने के लिए सशक्त बनाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज का अर्थ है कि जैसे एक पिता परिवार का मुखिया होता है ,माता क्यों नहीं।  यह अनूठा कार्यक्रम युवा लड़कियों के लिए एक आइसब्रेकर के रूप में फुटबॉल का उपयोग करता है। 12-16 वर्ष की आयु के बीच की लड़कियों का पालन-पोषण अस्पताल द्वारा पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी या ऑप्टोमेट्रिस्ट या दोनों बनने के लिए किया जाता है।

मृत्युंजय जी  का फुटबॉल के प्रति जुनून था परन्तु किसी दुर्घटना के कारणवश अब वह फुटबॉल खेल नहीं सकते। उन्होंने जब देखा  कि  एक घर की छत पर कुछ लड़कियों को नीचे  ग्राउंड में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखा तो उनके मन में आया कि  क्यों न लड़कियों को भी फुटबॉल खेलने में प्रेरित किया जाये।  यह आईडिया तो ठीक था लेकिन बिहार जैसे प्रदेश में जहाँ लड़कियों को घर से बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं थी ,उनको shorts पहन कर किसने खेलने देना था।  कार्य तो बहुत ही कठिन था।  परिवारों का विरोध अवश्य ही आड़े आना था और आया भी, लेकिन मृतुन्जय जी का तो एकमात्र उदेश्य था कि किसी प्रकार इन बच्चियों को घर के बाहर निकाला   जाये  और उन्हें भी खुली वायु में सांस लेने दिया जाये।  इस प्रकार  जागृति आने से कई समस्याओं का निवारण हो सकता था और हुआ भी। नारी शोषण और  बाल विवाह जैसे अभिशाप को समाप्त या  कम करने में  सहयोग मिलेगा   

तो हैं न मृतुन्जय जी के अन्तःकरण में परमपूज्य गुरुदेव की  शिक्षा।  

पूर्वी भारतीय राज्य बिहार के एक दूरदराज के गाँव मस्तीचक में   केवल  दस-बेड के अस्पताल से  आरम्भ होकर 4000 वार्षिक सर्जरी  करने वाला यह अस्पताल केवल 15  वर्षों में  100,000  सर्जरियां करने में समर्थ है और सबसे बड़ी बात है कि इस 100,000  में से  85000  निशुल्क हैं।  इस सारे समय में  इसे कभी भी नेत्र रोग विशेषज्ञों, विशेष रूप से ऑप्टोमेट्रिस्ट और नेत्र सहायक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट:

परमपूज्य गुरुदेव  के आदर्शों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर  2004  के शुरू में युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य चेरिटेबल ट्रस्ट का आरम्भ किया गया। यह ट्रस्ट  बिहार में गरीबों और दलितों के कल्याण के लिए काम करने के लिए  में बनाया गया था  क्योंकि राज्य  सरकार हमेशा से  मानव कल्याण के पहलू पर चुप्पी साधे थी । इस  ट्रस्ट का गठन श्री रमेश चंद्र शुक्ला (1917-) ने किया था जो  हमारे गुरुदेव कि शिष्य थे।  ट्रस्ट का एक उद्देश्य संचालित दृष्टिकोण है जो मूल्यों और विश्वासों के प्रति असम्बद्ध रवैया रखता है। उपासना, साधना और आराधना जैसे गुरुदेव के तीन स्तम्भ इस ट्रस्ट के pillar हैं।  स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला जागरण, पर्यावरण, सामाजिक बुराइयों को खत्म करना, उद्यमशीलता और आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना इस ट्रस्ट के मुख्य  उद्देश्य  हैं। लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि उनकी गतिविधियों से लोगों को सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक बाधाओं को दूर करने में मदद मिले और सकारात्मक बदलाव आए। 

इसीलिए हमने इस लेख के आरम्भ में पाठकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि स्वयं भी गूगल सर्च करके इस में अधिक जानकारी प्राप्त करें। 

” सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा  और नई उमंग लेकर आए।  

जय गुरुदेव 

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अध्याय 12-सत्संग  मनोनिग्रह में बड़ा सहायक है ; अध्याय 13-सत्व का शोधन कैसे हो

27  नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद-  अध्याय 12 –  सत्संग  मनोनिग्रह में बड़ा सहायक है ;  अध्याय 13 -.सत्व का शोधन कैसे हो

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  अध्याय12 और 13 हैं । मनोनिग्रह की यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं। लेखों के अंत में कामिनी और कंचन को समझने के लिए  श्री रामकृष्ण परमहंस देव जी के जीवन की एक घटना   प्रस्तुत की है जिसने हमारे अन्तःकरण को अतिप्रभावित किया है, आप सबको भी यह घटना प्रभावित किये बिना न रह पायेगी।      

अध्याय 12 –  सत्संग  मनोनिग्रह में बड़ा सहायक है  

हमने कुछ विस्तार से इस पर विचार किया है कि मन पर नियंत्रण पाने के लिए उसमें गुणों के अनुपात को कैसे बदला जाय। यह शास्त्रों में उपदिष्ट एक प्रामाणिक पद्धति है। यदि उसका समुचित रूप से अभ्यास किया जाय तो किसी को भी उसका फल प्रत्यक्ष हो सकता है। फिर भी ऐसे कई लोग होंगे जो अपनी प्रवृत्ति के कारण इतनी सूक्ष्मता के साथ अपनी भीतरी संभाल नहीं कर पाते, या फिर वे जिस वातावरण में रहते हैं, वह इस साधना के अभ्यास में अनुकूल नहीं पड़ता। तो क्या ऐसी कोई दूसरी साधना पद्धति है जिसका अभ्यास अपेक्षाकृत सरल हो और जो पहले ही के समान फल देनेवाली हो ? हाँ, वैसी एक पद्धति है जिसका अभ्यास सरलता से हो सकता है और पहली ही की अपेक्षा,अगर अधिक नहीं, तो बराबर फल देनेवाली अवश्य है। 

किन्तु इस अति सरल तरीके के सम्बन्ध में बताने में एक कठिनाई है। एक उदाहरण से हमारा अभिप्राय स्पष्ट हो जायेगा। ऐसे कुछ रोगी होते हैं, जो दीर्घकाल तक एक ज़िद्दी व्याधि से त्रस्त रहने के कारण उस चिकित्सक पर विश्वास नहीं कर पाते, जो एक सरल निदान प्रस्तुत करता है। वे सम्भवतः यह समझते हैं कि जटिल रोग ज्ञान का निदान भी अनुपात में जटिल ही होगा। ठीक यही बात इस सरल उपाय पर भी लागू होती है, जिसकी हम चर्चा करने जा रहे हैं ; कुछ लोग इसे अति सरल मान लेते हैं।

उपाय है सत्संग। यह है तो सरल, पर अन्य उपायों से अधिक फलदायी है। भगवान कृष्ण उपदेश देते हैं :

“जगत् में जितनी आसक्तियां हैं, उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वश में कर लेता है वैसा साधन न योग है, न सांख्य, न धर्मपालन, न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग, इष्टापूर्त और दक्षिणा से भी मैं वैसा प्रसन्न नहीं होता। कहाँ तक मैं कहूँ -व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम- नियम भी सत्संग के समान मुझे वश में करने में समर्थ नहीं हैं।”

हमारी अधिकांश आसक्तियां हमारे स्वभाव में रजोगुण के आधिक्य के कारण हें। जब हम किसी तत्वज्ञ साधु पुरुष के सानिध्य में होते हैं तो उनकी पवित्रता के शक्तिमान स्पन्दन हमारे भीतर घुस जाते हैं और हमारे मन के त्रिगुणात्मक उपादान में शीघ्र परिवर्तन ला देते हैं, जिससे उस समय सत्व की प्रधानता हो जाती है। सत्व की इस प्रधानता का लम्बे समय तक टिकना इस पर निर्भर करता है कि हम सत्संग कितनी मात्रा में करते हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं :

“संसारी मनुष्यों के लिए तो सदा ही साधु-स़ंग की आवश्यकता है। यह सबके लिए है, सन्यासियों के लिए भी; परन्तु संसारियों के लिए तो विशेषकर यह आवश्यक है। उन्हें तो रोग लगा ही हुआ है — कामिनी-कांचन में सदा ही रहना पड़ता है।”

सत्संग मनोनिग्रह को सरल बना देता है। अतएव हमें उसके लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। परन्तु जब हमें सत्संग उपलब्ध न हो सके तो क्या करना चाहिए ? तब तो हमें अपने ही साधनों पर निर्भर रहकर प्रणाली बद्ध रूप से आगे बढ़ चलना चाहिए। उपर्युक्त निर्देशों में से जो हमारे अनुकूल हो, उसका अनुसरण करते हुए हमें अपने मन में सत्वगुण की प्रधानता लानी चाहिए और अन्त में सत्वगुण का शोधन कर उसे भी लांघ जाने का उपाय सीखना चाहिए।

अध्याय 13 -.सत्व का शोधन कैसे हो  

वेदान्त के अनुसार, नित्य और अनित्य में सतत् विवेक, अनित्य का त्याग और आत्मा के यथार्थ स्वरूप पर गम्भीर ध्यान के द्वारा सत्व का शोधन होता है। यहाँ पर मन:संयम के लिए श्री शंकराचार्य का यह अप्रत्यक्ष निर्देश हमारे लिए सहायक होगा:

“आत्मसाक्षात्कार की इच्छा अनात्म-वस्तुओं की असंख्य कामनाओं से ढक जाती है। जब सतत् आत्मनिष्ठा के द्वारा वे कामनाएँ नष्ट होती हैं, तब आत्मा स्वयमेव अपने को स्पष्ट रूप से प्रकट कर देता है। ज्यों ज्यों मन प्रत्यगात्मा में अवस्थित होता है, त्यों त्यों वह बाह्य विषयों की वासना को त्यागता जाता है और जब इस वासना का सर्वथा त्याग हो जाता है, तब आत्मा की निर्बाध अनुभूति होती है। 

योगी का मन अपनी ही आत्मा में सदैव स्थित होने के कारण, नाश को प्राप्त होता है। उससे वासना का क्षय होता है। अतएव अपने अध्यास (Superimposition) को दूर करो।” 

मन के नाश का मतलब उसका खात्मा नहीं है, बल्कि उसका तात्पर्य है पूर्ण ज्ञान पावित्रय। इस अवस्था में मन आत्मा से एक हो जाता है। जब मनुष्य अपनी आत्मस्वरूपता को जान लेता है तो फिर नियंत्रण करने को कोई मन नहीं रह जाता है। 

मनोनिग्रह करते समय हमें इस उच्चतम अवस्था को प्राप्त करने का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए। जबतक मन में एक से अधिक वासनाएं बनी हुई हैं, या यों कहें कि आत्म-साक्षात्कार की वासना के अतिरिक्त अन्य वासनाएं विद्यमान हैं, तबतक मनोनिग्रह कठिन होगा क्योंकि तबतक मन एक बिखरी हुई अवस्था में होगा। सभी चीजें जहां जाकर एक हो जाती हैं उस उच्चतम से यदि हम कुछ नीचे के लिए कोशिश करें , तो मन मानो विभक्त हो जाता है l विभक्त मन को वश में लाना कठिन होता है l दूसरे शब्दों में, जो लोग पूर्ण ज्ञान की अवस्था या आत्म-साक्षात्कार की अपेक्षा कुछ कम को पाने की कोशिश करते हैं, वे कभी भी अपने मन को वश में नहीं कर सकते। उनके मन में आत्म-ज्ञान के अलावा और कोई वासना बनी रहती है और इसलिए वे वस्तुतः अविद्या को ही बनाये रखने का उपक्रम करते हैं। इस प्रकार मनोनिग्रह के लिए जो बातें आवश्यक होतीं हैं, उनकी पूर्ति में वे अपने को असमर्थ पाते हैं। वेदान्त में अशुद्ध मन को अविद्या से एकरूप बताया गया है। अतएव अविद्या को दूर करने के लिए जिन साधनाओं की आवश्यकता होती है, वे ही मनोनिग्रह पर लागू होती हैं। इनमें से विशेषकर एक साधना मन:संयम में बड़ी सहायक होती है। इस साधना को वेदान्त की भाषा में “स्वाध्यास- अपनय” कहते हैं। जो अज्ञान हमने स्वयं अपने ऊपर लाद लिया है उसे दूर करना और इस प्रकार अनात्म- वस्तुओं से अपने तादात्म्य को समाप्त कर देना। 

आत्मा पर अध्यास  कैसे हुआ और उसे दूर करने के उपाय क्या हैं , इस पर चर्चा करते हुए श्री शंकराचार्य कहते हैं:

“शरीर, इन्द्रियाँ आदि अनात्म- वस्तुओं के प्रति ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव ही अध्यास है। बुद्धिमान को चाहिए कि वह आत्मा से एकत्व की अनुभूति करता हुआ इस अध्यास को निरस्त कर दे।

अपनी बुद्धि और उसकी वृत्तियों के साक्षी अपने इस प्रत्यगात्मा को जानकर तथा ‘ सोहम् ‘ इस सद्वृत्ति को सतत् भीतर उठाते हुए अनात्मा के साथ अपने एकत्व को जीत ले”

मनुष्य की सारी अशान्ति, तनाव और मानसिक समस्याओं का बस एक ही कारण है और वह है उसके यथार्थ आत्मा का अनात्मा से मिथ्या एकत्व। इसी से शरीर और इन्द्रियों आदि के प्रति ‘ मैं’ और ‘मेरे’ की भावना उपजती है। इन समस्त विकारों का निदान ‘सोहम’ मन्त्र की प्रयत्नपूर्वक साधना करना है। सोचो कि ‘मैं आत्मस्वरूप हूँ’। सत्य पर केन्द्रित मन को नियंत्रित किया जा सकता है। वेदान्त के अन्तर्गत, ज्ञान की प्राप्ति के लिए साधन -चतुष्टय का जो अभ्यास किया जाता है , उस अभ्यास की प्रक्रिया में ही मनोनिग्रह की समस्या का समाधान स्वत: हो जाता हैl

मन को वश में करने के लिए उपर्युक्त साथन-चतुष्टय के साथ योग के अभ्यास को जोड़ देना अधिक सहायक होता हैl अब हम इस योगाभ्यास पर विचार करेंगे

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कामिनी और कंचन का  अभिप्राय 

 जिस समय श्री रामकृष्ण परमहंस देव को दिव्य-ज्ञान हुआ उसी समय उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि सब वस्तुओं का सार ईश्वर ही है और उसी को पाने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके पश्चात उन्होंने इस भावना को दढ करने का अभ्यास करना आरंभ किया। उन्होंने एक हाथ में रुपया और दूसरे में मिट्टी का ढेला लिया और मन को संबोधन करके कहने लगे :

“हे मन, तू इसको रुपया कहता है, और इसको मिट्टी। रुपया चाँदी का गोल टुकड़ा है जिस पर एक ओर रानी (विक्टोरिया) की तस्वीर छपी है। यह जड़ पदार्थ है। रुपया से चावल, कपड़ा, घर, हाथी, घोड़ा आदि पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं, दस-बीस मनुष्यों को भोजन कराया जा सकता है, तीर्थ-यात्रा, देवता और संतों की सेवा की जा सकती है। पर इसके द्वारा सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती। क्योंकि इसके रहते हुए अहंकार सर्वथा नष्ट नहीं हो सकता और न मन आसक्तिहीन हो सकता है। देवता और साधु की सेवा आदि धर्म-कार्य किए जा सकने पर भी यह मन में रजोगुण और तमोगुण ही उत्पन्न करता है और इस दशा में सच्चिदानंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।”

मिट्टी को देखकर वे कहते:

“यह भी जड़ पदार्थ है, पर इससे अन्न उत्पन्न होता है जिससे मनुष्य के शरीर की रक्षा होती है। मिट्टी के द्वारा ही घर बनाया जाता है, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी बनाई जा सकती हैं। द्रव्य के द्वारा जो कार्य होते हैं वे मिट्टी द्वारा भी हो सकते हैं। दोनों एक ही श्रेणी के जड़ पदार्थ हैं और दोनों का परिणाम एक ही तरह का होता है। अरे मन! तू इन दोनों पदार्थों को लेकर तृप्त होगा अथवा सच्चिदानंद को प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा।” 

इस प्रकार कहकर उन्होंने नेत्र बंद कर लिए और ‘रुपया-मिट्टी’ ‘रुपया-मिट्टी’ इस प्रकार की ध्वनि करने लगे। अंत में उन्होंने रुपया और मिट्टी दोनों को गंगाजी में फेंक दिया। इस प्रकार बारबार अभ्यास करके उन्होंने अपने मन को धातु (रुपया) के प्रति इतना विरक्त बना लिया कि किसी धातु के छूने से बड़ा कष्ट जान पड़ता था। इसी प्रकार उन्होंने स्त्री के संबंध में विचार किया कि उसकी वासना किसी भी प्रकार से क्यों न रखी जाए, उससे मस्तिष्क और मन दुर्बल ही होते हैं और परमात्म-चिंतन में बाधा पड़ती है। माना कि उसे लोग सुख के लिए ग्रहण करते हैं, पर वह सुख क्षणिक ही रहेगा ,कभी स्थाई नहीं होगा और परिणाम हानिकारक ही होगा। 

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24 आहुति-संकल्प  के आज के विजेता  (1) सरविन्द कुमार पाल – 42, (2) अरुण कुमार वर्मा जी – 31, (3) डा.अरुन त्रिखा जी – 29, (4) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 29, (5) प्रेरणा कुमारी बेटी – 27, (6) पिंकी पाल बेटी – 27, (7) संध्या बहन जी – 26, (8) सुमन लता बहन जी – 26, (9) रजत कुमार जी – 25  

आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से सभी को  साधुवाद व अनंत हार्दिक शुभकामनाएँ व हार्दिक बधाई। 

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अध्याय 11 -मन की बनावट को बदलना -भाग 2  

26 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद–मन की बनावट को बदलना -भाग 2  https://drive.google.com/file/d/19tM1g6g57zF3qqdTWZYN0sQiVZuxakrq/view?usp=sharing

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  अध्याय 11 का द्वितीय  भाग है। मनोनिग्रह की यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन मायावती,अल्मोड़ा के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी का आभारी है जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों का  सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं।

स्वामी बुद्धानन्द जी का संक्षिप्त विवरण :

स्वामी बुद्धानन्द जी जैसी महान आत्माओं   के बारे में कुछ भी लिखना हमारी समर्था तो बिल्कुल  नहीं है लेकिन फिर भी कुछ साहस  बटोर कर आगे कुछ पंक्तियों में इनके बारे में लिख रहे हैं।  सहकर्मियों से निवेदन है कि स्वामी बुद्धानन्द महाराज के विवरण के साथ आप 36 सेकंड की वीडियो भी देख लें ताकि आपको आभास हो सके कि जिस पुस्तक का हम स्वाध्याय कर रहे हैं ,यह एक साधारण पुस्तक नहीं बल्कि एक रिसर्च प्रोजेक्ट यानि एक थीसिस है। इस तथ्य को बल देने के लिए हमने वीडियो में  पुस्तक का एक पन्ना शामिल किया है जिसमें आप रेफरन्स वाले arrow को  देख रहे हैं। इसका अर्थ होता है कि जो भी  इस पुस्तक में लिखा जा रहा है ,उस original source  का स्वाध्याय है। कहने का अर्थ यह हुआ कि अगर पुस्तक में 128 पन्ने हैं और हर पन्ने के नीचे दो रेफरन्स हों तो 256 किताबें पढ़ी गयी है। इस पुस्तक में इतना ज्ञान छिपा है। अंग्रेजी की जिस पुस्तक की सहायता हम ले रहे हैं उसका  टाइटल पेज भी इस वीडियो में शामिल किया है। तो हमारे सहकर्मी जान गए होंगें कि यह एक सामूहिक प्रयास है।   

श्रीमत स्वामी विराजानंदजी महाराज के एक दीक्षित शिष्य, स्वामी बुधानंद (भवानी महाराज) 1944 में मद्रास मठ में शामिल हुए और 1954 में स्वामी शंकरानंदजी महाराज से संन्यास लिया। वे वेदांत केसरी के संपादक थे, जिसके बाद, 1959 में, उन्हें USA भेजा गया, जहाँ उन्होंने स्वामी निचिलानंदजी के सहायक के रूप में रामकृष्ण विवेकानंद केंद्र न्यूयॉर्क  में काम किया। 1966 तक सैन फ्रांसिस्को और हॉलीवुड केंद्रों में सहायक  के रूप में भी काम किया। 1967 में वह  भारत लौट आए और चंडीगढ़ आश्रम के सचिव बने। 1968 में  वह “प्रबुद्ध भारत” के संयुक्त संपादक और बाद में अद्वैत आश्रम, मायावती (उत्तराखंड)  के अध्यक्ष बने। 1976 में उन्हें सचिव के रूप में दिल्ली में तैनात किया गया था। वह  पूज्य स्वामी वीरेश्वरानंदजी को देखने देने बेलूर मठ गए हुए  थे, जब 11 नवंबर 1983 को सेवा प्रतिष्ठान हस्पताल  में  अचानक हृदय गति रुकने से उनका  निधन  हो गया।

बुद्धानंद  जी  एक बहुत ही अच्छे वक्ता और सशक्त लेखक थे। उन्होंने अंग्रेजी और बंगाली में कई लेख और  किताबें लिखीं। उनकी  महत्वपूर्ण पुस्तकें  हैं: “इच्छा-शक्ति और इसका विकास”, “मन और उसका निग्रह ”, “क्या कोई वैज्ञानिक भी आध्यात्मिक हो सकता है”, “धर्म की चुनौती” इत्यादि हैं। 

“मन और उसका निग्रह”  ऑडियो बुक एवं ebook दोनों ही अद्वैताश्रम की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। इसके लिए आपको इस लिंक पर जाना होगा http://www.advaitaashrama.org/ अगर आप यह पुस्तक खरीदना नहीं चाहते हैं तो 20 मिनट का फ्री preview भी उपलब्ध है जिसमें आप 128 पन्नों की पुस्तक की summary रामकृष्ण संघ के वरिष्ठ सन्यासी जी की वाणी में सुन सकते हैं। यह जानकारी आदरणीय विवेक खजांची जी ने दी जिसके लिए हम उनके  आभारी हैं।   

तो प्रस्तुत है अध्याय 11 -मन की बनावट को बदलना – का द्वितीय  भाग

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श्रीमद्भागवत में  हम  पढ़ते  हैं: 

“सत्व , रज और तम, ये तीनों बुद्धि ( प्रकृति) के गुण हैं , आत्मा के नहीं . सत्व के द्वारा रज और तम इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए।  तदनंतर सत्व गुण की शान्तिवृत्ति के द्वारा उसकी दया आदि वृत्तियों को भी शान्त कर देना चाहिए। जब सत्व गुण की वृद्धि होती है, तभी जीव को मेरे भक्ति रुप स्वधर्म की प्राप्ति होती है। और तब मेरे भक्ति रूप स्वधर्म में प्रवृत्ति होने लगती है। जिस धर्म के पालन से सत्वगुण की वृद्धि हो, वही सबसे श्रेष्ठ है। वह धर्म रजोगुण और तमोगुण को नष्ट कर देता है। जब वे दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब उन्ही के कारण होने वाला अधर्म भी शीघ्र ही मिट जाता है।” 

हमारे उद्देश्य की पूर्ति में यह एक महत्वपूर्ण सबक है कि सत्व गुण की वृद्धि से साधक आध्यात्मिकता की प्राप्ति करता है; और आध्यात्मिकता की प्राप्ति तथा मन का निग्रह ये दोनों एक दृष्टि में समानार्थी हैं। अतएव मनोनिग्रह के इच्छुक व्यक्तियों के लिए सत्वगुण की वृद्धि के उपाय जान लेना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

ये सात्विक बातें और क्रियाएँ कौन सी हैं जिनके द्वारा सत्व की प्रधानता लायी जा सकती है ? भगवान कृष्ण भागवत् में ही आगे कहते हैं : “शास्त्र, जल, प्रजाजनो, देश, समय, कर्म, जन्म,ध्यान,मन्त्र और संस्कार – ये दस, गुणों की वृद्धि के कारण हैं।”

उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि ऊपर बतायी गयी दस चीजों में से प्रत्येक के सात्विक, राजसिक और तामसिक पहलू हुआ करते हैं ;

पहला पहलू पवित्रता, ज्ञानालोक और आनन्द की अभिवृद्धि करता है; दूसरा पहलू दु:खदायी प्रतिक्रिया को जन्म देने वाला क्षणिक सुख प्रदान करता है और तीसरा पहलू अज्ञान तथा अधिकाधिक बन्धन को जन्म देता है। भागवत् का उपदेश आगे कहता है: इनमें से शास्त्रज्ञ महात्मा तामसिक की निंदा करते हैं और जो वस्तुएं राजसिक हैं उनकी उपेक्षा करते हैं । जबतक अपनी आत्मा का साक्षात्कार, तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों गुणों की निवृत्ति न हो, तबतक मनुष्य को चाहिए कि सत्वगुण की वृद्धि के लिए सात्विक शास्त्र आदि का ही सेवन करे क्योंकि उससे धर्म की वृद्धि होती है और धर्म की वृद्धि से अन्त:करण शुद्ध होकर आत्मतत्व का ज्ञान होता है। 

अन्तिम श्लोक का मथितार्थ यह है:

केवल उन्हीं शास्त्रों का अनुसरण करना चाहिए जो निवृत्ति का यानि ब्रह्म के एकत्व में वापस जाने का पाठ पढाते हों। प्रवृत्ति या अनेकात्मक राजसिकता का अथवा हानिकारक तामसिकता का पाठ पढानेवालू ग्रन्थों का अनुसरण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार पवित्र जल का व्यवहार करना चाहिए , सुगन्धित जल या मद्य का नहीं, आदि आदि। साधक को रुचिसम्पन्न लोगों से ही मेलजोल रखना चाहिए , संसारी या दुष्ट लोगों से नहीं। एकान्त स्थान का चुनाव करना चाहिए, राजमार्ग या खेल की जगह का नहीं। विक्षेप या अवसाद को बढावा देनेवाले समय में ध्यानाभ्यास करने के बदले ब्राह्ममुहुर्त को ध्यान के अभ्यास के लिए चुनना चाहिए। केवल ऐसे कर्म करने चाहिए जो अनिवार्य हों और नि:स्वार्थ हों; स्वार्थयुक्त या हानिकारक कर्मों से दूर रहना चाहिए। धर्म की शुद्ध और हानिरहित रूपों को ग्रहण करना चाहिए तथा दिखावा–प्रदर्शन वाले एवं अशुद्ध और हानिकारक रूपों को त्याग देना चाहिए। ध्यान ईश्वर का करना चाहिए , विषय -भोगों का नहीं। प्रतिशोध लेने की भावना से शत्रु का ध्यान वर्जनीय है। ऊँ आदि मन मन्त्रों का ही ग्रहण करना चाहिए। सांसारिक उन्नति प्रदान करनेवाले या दूसरों की क्षति करनेवाले मन्त्रों का ग्रहण नहीं करना चाहिए। केवल शरीर या घर  को साफ -सुथरा रखना ही हमारा उद्देश्य नहीं है। मन की शुद्धि ही हमारा प्रयोजन है।

उपर्युक्त श्लोकों में प्रामाणिकता के साथ यह उपदेश निबद्ध है कि हम अपने मन के गुणमिश्रण में वांछित परिवर्तन कैसे साधित करें। यह भीतरी परिवर्तन ही मनोनिग्रह का रचनात्मक और विधेयात्मक पहलू है। जबतक यह साधित नहीं होता, तबतक मनोनिग्रह की दिशा में यथार्थत: कोई कदम नहीं रखा जा सकता।

जब इस प्रकार अभ्यास के द्वारा साधक अपने स्वभाव में सत्व की प्रधानता लाने में समर्थ होता है तो समझना चाहिए कि उसने मन: संयम की लड़ाई को आधे से अधिक जीत लिया किन्तु पूरा नहीं। इसका कारण यह है कि सत्व भी आखिरकार मनुष्य के लिए बन्धनकारक है। ‘ गीता कहती है:

हे महाबाहो ! प्रकृति से उत्पन्न हुए सत्व, रज और तम के तीनों गुण इस अविनाशी देही ( जीवात्मा ) को शरीर में जकड़कर बांध देते हैं। हे निष्पाप इन तीन गुणों में प्रकाश करनेवाला, निर्मल और विकार रहित सत्वगुण भी सुख और ज्ञान की आसक्ति से (ज्ञानाभिमान से) बांधता है।

श्रीरामकृष्ण अपने “बटोही(सिपाही) और तीन डाकू” के चुटकुले में इसी बात को निम्नलिखित ढंग से रखते हैं:

यह संसार ही जंगल है। इसमें सत्व, रज और तम तीन डाकू रहते हैं। ये तीनों जीवों का तत्वज्ञान छीन लेते हैं। तमोगुण मारना चाहता है, रजोगुण संसार में फंसाना चाहता है, पर सत्वगुण रज और तम से बचाता है। सत्वगुण का आश्रय मिलने पर काम, क्रोध, आदि तमोगुण से रक्षा होती है। फिर सत्वगुण जीवों का संसार बन्धन तोड़ देता है, पर सत्वगुण भी डाकू है, वह तत्वज्ञान नहीं दे सकता। हाँ वह जीव को उस परमधाम में जाने की राह तक पहुँचा देता है और कहता है, ” वह देखो , तुम्हारा मकान वह दीख रहा है !” जहाँ ब्रहम ज्ञान है वहाँ से सत्वगुण भी बहुत दूर है। ‘

गीता ने जो यह कहा कि “सत्वगुण भी सुख और ज्ञान की आसक्ति से बांधता है” तथा श्रीरामकृष्ण ने जो यह बताया कि “सत्वगुण भी डाकू है” , इनदोनों कथनों का मनोवैज्ञानिक अभिप्राय यह है कि स्वभाव में सत्वगुण की प्रधानता का मतलब पूर्ण निग्रह नहीं समझना चाहिए। पूर्ण मनोनिग्रह के लिए तो गुणों के भी परे जाना पड़ता है। भगवान कृष्ण गीता के चौदहवें अध्याय में गुणों के परे जाने का उपाय बतलाते हैं. वहाँ 26वें श्लोक में वे समूचे रहस्य को अत्यन्त सरल भाषा में, बिना किसी गूढ़ शब्दावली का प्रयोग किये समझाते हुए कहते हैं: “और जो अव्यभिचारी ( कभी न टलने वाले ) भक्तियोग से सम्पन्न हो मुझे भजता है, वह गुणों का अतिक्रमण कर ब्रह्म में एकीभाव प्राप्त करने के योग्य होता है।”

पर बात यह है कि शुद्ध हृदय व्यक्ति ही अव्यभिचारी भक्ति से भगवान को भज सकता है। यदि हमें ऐसा लगे कि हमारा हृदय तो उतना पवित्र नहीं है, अत: अटल भक्ति की साधना हमसे नहीं हो सकेगी, तो हमें हताश नहीं होना चाहिए। निष्ठा पूर्वक भक्ति और अभ्यास से हम क्रमशः अधिकाधिक स्थिर और पवित्र होते जायेंगे। 

यदि कतिपय कारणों से परे जाने से इस “सरलतम उपाय” ‘को अपने काम में न ला सके तो मनोनिग्रह के दूसरे तरीके हमारे लिए खुले हुए हैं।

तमस और रज को जीतने की कला जानने के साथ-साथ हमें सत्व को जीतने की कला भी जाननी चाहिए। श्री शंकराचार्य यह कला सिखाते हुए कहते हैं: “तमस का नाश रज और सत्व दोनों से होता है। रज का सत्व से और सत्व शुद्ध होने से नष्ट हो जाता है। अतएव सत्व का सहारा लेकर अपने अभ्यास ( अज्ञान) को दूर कर डालो।”

अगला लेख- सत्संग  मनोनिग्रह में बड़ा सहायक है।  

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24 आहुति संकल्प सूची :

25  नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने के उपरांत  24 आहुति  संकल्प के विजेता निम्नलिखित 7 समर्पित सहकर्मी हैं: 1.आद. सरविन्द पाल जी (32 ), 2.आद.अरुण त्रिखा जी (30 ),3.आद. अरुण वर्मा जी (41 ),4.आद. रजत कुमार जी (37 ),5.आद. संध्या कुमार बहिन जी (26 )6.,प्रेरणा बिटिया (30 ),7.पिंकी पाल बिटिया (33 ) उक्त सभी सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से  साधुवाद व हार्दिक बधाई हो। जगत् जननी माँ  गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा इन सभी पर सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व  कामना है।  धन्यवाद।  

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अध्याय 11-मन की बनावट को बदलना -भाग 1 

25 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मन की बनावट को बदलना -भाग 1 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  अध्याय 11 का प्रथम भाग है।  अध्याय बड़ा होने के कारण दूसरा भाग कल वाले ज्ञानप्रसाद में शामिल किया जायेगा। मनोनिग्रह की यह अद्भुत श्रृंखला आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी के स्वाध्याय पर आधारित  प्रस्तुति है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  रामकृष्ण मिशन के वरिष्ठ सन्यासी पूज्य स्वामी बुद्धानन्द जी महाराज और छत्तीसगढ़ रायपुर के विद्वान सन्यासी आत्मानंद जी महाराज जी के आभारी हैं जिन्होंने  यह अध्भुत  ज्ञान उपलब्ध कराया। इन लेखों के सम्पूर्ण श्रेय इन महान आत्माओं को जाता है -हम तो केवल माध्यम ही हैं। 

तो प्रस्तुत है अध्याय 11 -मन की बनावट को बदलना – का प्रथम भाग   

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मन को पौष्टिक आहार देकर तथा उसकी बनावट  को ऐसा बदलकर  कि  जिससे शेष  दो गुणों पर सत्वगुण  की प्रधानता हो जाय,  मन की  अशुद्धियों को धीरे – धीरे दूर किया जा सकता है। अंत में भले यह सत्य है कि सत्वगुण को भी लांघ  जाना पड़ता है  तथापि पहले तो उसकी प्रधानता लानी पड़ती है l

हम कह चुके हैं किउपनिषद् के अनुसार  मन अन्नमय है। इस उपदेश का विस्तार करते हुए उपनिषद कहता है:  

खाया  हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो अत्यंत स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है। जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है और जो  अत्यन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है। 

मथे जाते हुए दही का जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है , वह घृत होता है। उसी प्रकार  हे  सौम्य ! खाये हुए अन्न का  जो  सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् प्रकार से ऊपर आ जाता है, वह मन होता है। चूंकि मन अन्नमय है इसलिए स्वाभाविक ही  उपदेश आगे बढता है:

आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि : सत्वशुद्धौ ध्रुवौ स्मृति:आहार की शुद्धि होने पर अन्त: करण की शुद्धि होती है। अन्त:करण की शुद्धि होने पर निश्चल स्मृति होती है (ऐसी निश्चल ) स्मृति के प्राप्त होने पर सम्पूर्ण ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है।

शंकराचार्य के भाष्य के अनुसार यहाँ पर “आहार” शब्द  का  तात्पर्य वह सब है जिसे इन्द्रियाँ ग्रहण करतीं हैं। उदाहरणार्थ, शब्द, रूप, गन्ध, आदि तथा “अन्त:करण की शुद्धि”  का अर्थ है कि वह उन राग- द्वेष और मोह आदि से मुक्त हो जाता है जो मन में क्षोभ उत्पन्न कर उसे दुर्निग्रह  बना देते हैं। अत: मनोनिग्रह के मूलभूत उपायों में से एक यह है कि ऐसे “आहार” से दूर रहा जाय जो आसक्ति , द्वेष और मोह उत्पन्न करता हो। 

पर प्रश्न यह है कि कौन सा आहार आसक्ति द्वेष और मोह उत्पन्न करता है इसे कैसे जानें ? मोटे तौर पर गीता के अनुसार राजसिक  और  तामसिक आहार आसक्ति, द्वेष , और मोह  को जन्म देता है।  सात्विक आहार मनुष्य की आसक्ति, द्वेष और मोह को  कम को कम करने में सहायक होता है। पोषण के लिए साधारणतया जो कुछ मुंह से ग्रहण किया जाता है केवल उसका ही मन पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि अन्य पेयों का भी  मन पर विशेष असर पड़ता है। शराब और नशीली दवाइयाँ भी तो मुंह से ही ली जाती हैं और उनका मन पर प्रभाव प्रत्यक्ष है।  मिसरी का शरबत  और मदिरा पीने से मन पर कैसा अलग-अलग असर पड़ता है  यह तो सहज ही देखा जा सकता है।  मन पर नशीली दवाइयों का प्रभाव भी अच्छी तरह विदित ही है।  फिर यह भी देखा गया है कि हम आंखों से जो कुछ देखते हैं, कानों से जो कुछ सुनते हैं और  जो कुछ स्पर्श करते हैं , उस सबका मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। कोई सिनेमा या कोई भाषण हमारे मन में कई प्रकार की विचार-लहरियों को उठा दे सकता है, जिससे मन का निग्रह या तो सरल हो जाता है या फिर कठिन।    

अतएव, मनोनिग्रह के अनुकूल वातावरण तैयार करने में भोजन-पान का विचारपूर्वक ग्रहण कुछ दूर तक सहायक होता है। इसी, प्रकार अन्य इन्द्रियों के माध्यम से हम जो कुछ ग्रहण करते हैं यह भी समानरूप से महत्वपूर्ण है। जो लोग मन को वश में करना चाहते है , उनके लिए राजसिक और तामसिक आहार के बदले सात्विक आहार का चयन लाभदायक होगा।  जहाँ तक मुंह से ग्रहण किये जानेवाले आहार का प्रश्न है, गीता इस सम्बन्ध में सर्वोत्तम प्रकाश डालती है :

आयु , सत्व , बल  आरोग्य , सुख  और रुचि  को बढाने वाले, रसयुक्त,चिकने, पौष्टिक  और  स्वभाव से ही  मन  को  प्रिय  लगने वाले खाद्यपदार्थ सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।  

कड़वा, खट्टे  लवणयुक्त , अतिगरम  और  तीखे ,  रुखे और दाहकारक , तथा  दु: ख , चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाले भोज्यपदार्थ  राजसिक मनुष्य  को प्रिय होते हैं। 

जो भोजन रस रहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्चिष्ट और  अपवित्र है, वह तामसिक पुरुष को प्रिय होता है। सात्विक, राजसिक और तामसिक मनुष्यों  को  जो पदार्थ प्रिय होते हैं, वे ही क्रमशः  मन की सात्विक, राजसिक और तामसिक  वृत्तियों  के लिए भी  उत्तरदायी  होते हैं।     

मानवी स्वभाव सत्व, रजत और तम  इन तीनों गुणों के विभिन्न मात्राओं के  मेल से  बनता है।  अत:  इनमें से किसी  एक गुण  का शेष दो गुणों पर  वर्चस्व मनुष्य के स्वभाव का  निर्णय करता है। जिस मनुष्य के स्वभाव में रज या तम का आधिक्य है वह चाहते हुए भी उस व्यक्ति के समान वर्तन नहीं कर सकता जिसके स्वभाव में सत्व की प्रधानता है।  तभी तो मानो भगवान कृष्ण नैराश्य के स्वर में गीता में बोल उठते हैं: एक ज्ञानवान व्यक्ति भी अपने स्वभाव के अनुसार ही चेष्टा करता है ; सभी प्राणी अपने -अपने स्वभाव के वश  में  हो कर्म  करते हैं,  इसमें किसी  का निग्रह भला क्या  करेगा?

अगर  यही  सत्य हो कि निग्रह से कुछ नहीं  हो  सकता, अगर  मनुष्य का  स्वभाव पहले से ही  निश्चित  हो  और उसे यदि बदला न  जा  सके, तो फिर मनोनिग्रह पर विचार करने  का कोई अर्थ  नहीं। अतएव, श्री भगवान के कथन का तात्पर्य  ऐसा लगता है: मन को नियंत्रण में लाने के लिए  मनुष्य  को  अपना  शारीरिक और  मानसिक  स्वभाव बदलना ही पड़ेगा। जबतक हमारे मन  की बनावट  में  रज और तम  की  प्रधानता है, तबतक हम चाहे  जितनी कोशिश कर लें,  मन को वश  में नहीं ला  सकते। इसका  कारण समझ लेना चाहिए। वेदान्त  के  अनुसार:  

रजोगुण में विक्षेपशक्ति होती है जो क्रियात्मिका है. इसी से संसार की आदिम प्रवृत्ति निकली है. मन के जो राग आदि विकार हैं, वे तथा दु:ख आदि इसी से उत्पन्न होते रहते हैं। 

काम, क्रोध, लोभ , दम्भ, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या और मात्सर्य आदि ये सब रजोगुण के धर्म हैं , इन्हीं से मनुष्य की  सांसारिक प्रवृत्ति उत्पन्न हुई है। अतएव  रजोगुण बन्थन का कारण है।  

तमोगुण में  आवरणशक्ति होती है जिसके कारण  वस्तुएँ अपने स्वरूप से अन्यथा दिखायी देती हैं। यही  मनुष्य के  बारम्बार आवागमन का कारण है और विक्षेपशक्ति को यही  क्रियमाण करती है। 

जिस मनुष्य का आवरणशक्ति के साथ  तनिक सा भी सम्बन्ध है, सम्यक विचार का अभाव या उल्टा विचार सुनिश्चित विश्वास का अभाव और संशय उसका साथ कभी नहीं छोड़ते और तब विक्षेपशक्ति  अनवरत कष्ट देती है। 

रजोगुण की विक्षेपशक्ति  और तमोगुण की आवरणशक्ति  मन में ही  निहित है। उनकी प्रधानता होने से मनोनिग्रह कठिन हो जाता है। तथापि मन का एक घटक और है जिसके कारण हताशा पर रोक लगती है।  यह घटक है सत्वगुण, जो मिश्रित या शुद्ध अवस्था में मिलता है।  इस संदर्भ में वेदान्त की शिक्षा है:

शुद्ध सत्व  निर्मल जल के समान है परन्तु रज और तम से उनका संयोग होने पर वह संसार का कारण बनता है। आत्मतत्व सत्व में प्रतिबिम्बित होता है और सूर्य के समान  समग्र जड संसार को प्रकाशित कर देता है , मिश्रित सत्व के धर्म ये हैं— अभिमान का नितान्त अभाव आदि, तथा यम और नियम आदि, एवं श्रद्धा, भक्ति, मुमुक्षा, दैवी-सम्पत्ति और असत् से निवृत्ति।       

मन: प्रसाद, स्वात्मानुभूति, परमशान्ति, तृप्त, आनन्द और परमात्मनिष्ठा- ये विशुद्ध सत्व के धर्म हैं जिनके द्वारा साधक  सदानन्द -रस  का अधिकारी होता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे  अपने ही स्वभाव में मनोनिग्रह की जबरदस्त  बाधाएँ और सबल  सहायक शक्ति दोनों विद्यमान हैं। इस तथ्य को जान लेना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 

अतएव आवश्यकता है एक समग्र युद्धनीति की जिससे विपरीत शक्तियां पराजित हो जांय एवं  सहायक शक्तियों को कार्य करने की पूरी छूट मिले। यह आंखों को बंद  करके घूंसे उछालने से नहीं सधेगा बल्कि भीतरी शक्तियों के कुशलता पूर्वक नियमन से  सम्भव होगा।

मन:संयम के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम  गुणों के तोल  को अपने स्वभाव में इस प्रकार परिवर्तित कर सकते हैं जिससे सत्व की प्रधानता हो जाय ?  स्वाभाविक ही इस समस्या पर दिए गये उपदेश हमारे लिए बड़े सहायक होंगे।

24 आहुति संकल्प सूची : 

24  नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने के उपरांत  24 आहुति  संकल्प के विजेता निम्नलिखित 10 समर्पित सहकर्मी हैं :1.अरुण त्रिखा जी  (29), 2.अरुण कुमार वर्मा जी (30), 3.रजत कुमार सारंगी जी (27),4.राधा त्रिखा बहिन  जी (25),5.संध्या कुमार बहिन जी (35 ),6.बिटिया प्रेरणा कुमारी (35 ),7.सरविन्द कुमार जी (47 ),8.पिंकी पाल बिटिया (28),9.रेनू श्रीवास्त्व बहिन जी (25 ),10.साधना सिंह बहिन जी (26) उक्त सभी सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से  साधुवाद व हार्दिक बधाई हो। जगत् जननी माँ  गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा इन सभी पर सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व  कामना है।  धन्यवाद।  

स्कोर सूची का इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके  आदर-सम्मान हेतु  रिप्लाई अवश्य  करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी  विस्तृत होगा। ऐसा करने से और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी  जानते हैं कि हमें  किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार स्कोरसूची के रूप में आपके समक्ष होता  है। जय गुरुदेव   

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अध्याय 9-भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ, अध्याय -10 मन जितना शुद्ध होगा, उसका निग्रह उतना ही सरल होगा   

24 नवम्वर 2021 का ज्ञानप्रसाद – भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। आज की  प्रस्तुति में अध्याय 9 और 10 शामिल हैं जो केवल 750 शब्दों के हैं । लेख छोटा होने के कारण हमने निष्काम कर्म दर्शाती  नोबेल पुरस्कार विजेता फ्लेमिंग की कहानी शामिल  की है। हमारे बहुत ही समर्पित सहकर्मी  साधना सिंह जी ने ज़ूम मीटिंग का सुझाव दिया है, सहकर्मियों से निवेदन है कि इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने की कृपया करें। 

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अध्याय 9 – भीतरी अनुशासन की दो  श्रेणियाँ 

मन को वश में करने के लिए हमें अपने तईं भीतरी अनुशासन की दो श्रेणियाँ तैयार करनी पड़ती हैं :

( अ ) एक श्रेणी स्थायी मूलत: उपचार के लिए है l ( ब ) दूसरी श्रेणी उच्च शक्तिसंपन्न आपातकालीन ब्रेक प्रदान करने के लिए है l   

पहली श्रेणी मन को सामान्य रूप से एक स्वस्थ दिशा प्रदान करेगीl यदि पहली श्रेणी का अभ्यास न किया जाय , तो हम दूसरी श्रेणी का तनिक भी उपयोग करने में समर्थ नहीं होंगे l इसका सरल सा कारण यह है कि दूसरी श्रेणी को जो शक्ति मिलती है, वह प्रथम श्रेणी के अनुशासन

के सम्यक् अभ्यास से प्राप्त होती है l पहली श्रेणी के अन्तर्गत कई मूलभूत अनुशासन आते हैं:

1.जीवन को रचनात्मक विचार के समुचित ढांचे में डालना चाहिएl दैनिक जीवन में एक निश्चित क्रम होना चाहिए और कुछ मूलभूत सिद्धांतों का पालन होना चाहिए, जिससे हमारा आचरण दिशाहीन होने से बचे l जिनके जीवन में नैतिक सिद्धांतों के लिए स्थान नहीं है, जिनके जीवन में क्रम का अभाव है , वे मनोनिग्रह को लगभग असम्भव ही पाएंगे l मन को वश में करने के लिए हमें अपने जीवन में एक लय लानी चाहिए l    

2.मन: संयम के लिए हमें उसकी स्वाभाविक चंचलता पर रोक लगानी चाहिएl “राजयोग” में स्वामी विवेकानन्द मन की चंचलता का वर्णन करते हुए कहते है कि: मन को संयत करना कितना कठिन है ! इसकी एक सुसंगत उपमा पागल वानर से दी गयी हैl कहीं एक वानर था ,वह स्वभावतः चंचल था, जैसे कि वानर होते हैं l लेकिन उतने से संतुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफी शराब पिला दी; इससे वह और भी चंचल हो गया l इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डंक मार दिया l तुम जानते हो किसी को बिच्छू डंक मार दे तो वह दिन भर इधर- उधर कितना तड़पता रहता है। सो उस प्रदत्त अवस्था के ऊपर बिच्छू का डंक ! इससे वह बन्दर बहुत अस्थिर हो गया l तत्पश्चात मानो उसकी दुःख  की मात्रा को पूरी करने के लिए एक दानव उस पर सवार हो गया l यह सब मिलाकर, सोचो, बन्दर कितना चंचल हो गया होगा l यह भाषा द्वारा व्यक्त करना असम्भव है l बस, मनुष्य का मन उस वानर के सदृश है l ये मन तो स्वभावत: ही सतत् चंचल है, फिर वह वासना-रूप मदिरा से मत्त है, इससे उसकी अस्थिरता बढ़ गयी है l जब वासना आकर मन पर अधिकार कर लेती है, तब सुखी लोगों को देखने पर ईर्षयारूप बिच्छू उसे डंक मारता रहता है l उसके भी ऊपर जब अहंकार रूप दानव उसके भीतर प्रवेश करता है , तब तो वह अपने आगे किसी को नहीं गिनता l ऐसी तो है हमारे मन की अवस्था ! सोचो तो इसका संयम करना कितना कठिन है।

मन की चंचलता पर रोक लगाने के लिए हमें उसके कारणों को जान लेना चाहिए l ये कारण कौन से हैं ? मन की अपवित्रतांए ही इस चंचलता के कारण हैं l    

अध्याय -10 मन जितना शुद्ध होगा, उसका निग्रह उतना ही सरल होगा   

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं : मन जितना ही निर्मल होगा, उसे वश में करना उतना ही सरल होगा l यदि तुम उसे वश में रखना चाहो , तो मन की निर्मलता पर जोर देना होगा। मन को पूर्णतया वश में करने के लिए पूर्ण नैतिकता ही सब कुछ हैl जो पूर्ण नैतिक है, उसे कुछ करना शेष नहीं रहता, वह मुक्त है l मन का संयम उसकी पवित्रता पर निर्भर करता है, हम मन को इसलिए वश में नहीं कर पाते कि वह आज अशुद्ध है l यदि हम जीवन इस प्रकार बितायें जिससे मन और भी अशुद्ध हो जाये तथा साथ ही मनोनिग्रह के लिए भरपूर प्रयत्न भी करें, तो इससे कोई लाभ न होगा l फिर, यदि मन की शुद्धि की ओर ध्यान दिये बिना ही हम मन:संयम के लिए प्रयत्नशील हों, तो ऐसी दशा में भी हमें सफलता न मिल पायेगी l हो सकता है कि जहाँ पर प्रारम्भ से ही मन पर्याप्त शुद्ध हो, वहाँ बात दूसरी हो l हम मन को वश में लाने के लिए ऐसी साधना-प्रणाली चाहते हैं, जो उसकी अशुद्धि को भी दूर करती चले l  

मन की ये अशुद्धियाँ क्या हैं ? वे हैं :मन की वासनाएं और वृत्तियाँ जो घृणा, क्रोध, भय, ईर्ष्या, काम, लोभ , दम्भ और मोह आदि के रूप में प्रकट

होती हैं l ये रजोगुण और तमोगुण से जन्म लेती हैंl ये अशुद्धियाँ राग और द्वेष को उत्पन्न कर मन में थरथराहट पैदा करती हैं और इस प्रकार उसकी शान्ति को हर लेती हैं l इन अशुद्धियों को  दूर कैसे किया जाय ?

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नोबेल पुरस्कार विजेता एलेग्जेंडर फ्लेमिंग की प्रेरणापद कहानी 

एक दिन एक गरीब स्कॉटलैंड निवासी  किसान ने निकट के दलदल से किसी की  आवाज सुनी जो सहायता के लिए चिल्ला रहा था। उसने अपने औज़ार रखे और वह दलदल की  तरफ भागा। वहां एक लड़का दलदल मे डूब रहा  था, उसकी कमर दलदल मे घुस चुकी थी।  वह मदद के लिए चिल्ला रहा था,  किसान फ्लेमिंग  ने उसे दलदल मे डूबने से बचा लिया। अगले दिन एक सुंदर कार किसान के  घर के आगे आकर  रुकी।  सुंदर कपड़े पहने एक रईस उस गाड़ी से बाहर निकले और किसान फ्लेमिंग  को अपने से परिचित कराया कि वह उस बच्चे के पिता हैं  जिसे आपने कल दलदल मे डूबने से बचाया था।  रईस व्यक्ति किसान  से कहते हैं  कि आपने मेरे बच्चे की  जान बचाई है इसलिए मै आपको धन्यवाद कहता हूँ  और आपको कुछ देना चाहता हूँ । किसान फ्लेमिंग  ने अपने इस कार्य के लिए कुछ भी लेने से मना कर दिया  और रईस के  प्रस्ताव को ठुकरा दिया । उसी समय किसान फ्लेमिंग का बच्चा भी वहा आ जाता है। रईस व्यक्ति किसान से पूछते हैं  कि क्या ये तुम्हारा  बच्चा है।  किसान हां कहता है।  रईस व्यक्ति किसान के साथ एक डील  करते हैं  कि मै इस बच्चे को वही शिक्षा प्रदान करवाऊँगा जो मेरे बच्चे को मिलती है।  अगर इस बच्चे मे अपने पिता की  तरह कुछ भी होगा तो इसमे कोई शक नहीं कि यह एक ऐसा व्यक्ति बनेगा जिस पर हम दोनों को गर्व होगा। किसान ने यह  बात स्वीकार कर ली और उस रईस पुरुष ने ऐसा ही किया।  किसान के पुत्र ने अच्छे स्कूलों  से शिक्षा ग्रहण की  और लंदन के ST. MARY’S HOSPITAL MEDICAL SCHOOL से ग्रेजुएट हुआ। आगे चलकर इसी युवक ने  PENICILLIN का आविष्कार किया जो  पूरी दुनिया मे SIR ALEXANDER FLEMING के नाम से प्रसिद्ध हुए।  कुछ साल बाद उसी रईस व्यक्ति का बेटा,जिसकी किसान फ्लेमिंग  ने दलदल मे डूबने से जान बचाई थी, को निमोनिया  हो गया। इस बार उसकी जान Alexander Fleming द्वारा खोजे गए penicillin ने बचाई।

मित्रो, उस रईस व्यक्ति का नाम था LORD RANDOLPH CHURCHILL और उनके बेटे का नाम था प्रसिद्ध WINSTON CHURCHILL(विन्सटन चर्चिल) जो बाद मे जाकर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बने। 

इस कहानी से हमे यह सीख मिलती है कि जैसा  भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है: निष्काम कर्म  वह कार्य है  जिसके करने के उद्देश्य में फल की लालसा नहीं होती  लेकिन फल अवश्य ही  मिलता है। हमें हर कार्य का  फल मिलता ही है। इसलिए किसी भी काम को करते समय यह सोचना व्यर्थ है कि मुझे इससे क्या लाभ है। 

किसान फ्लेमिंग ने निस्वार्थ भाव से  बच्चे की जान बच्चाई और अपने इस कार्य के लिए उसने कुछ भी लेने से मना कर दिया।  हम जब किसी की सहायता करते हैं तो बदले मे हमारी इच्छाओं  के पूरा होने के रास्ते भी स्वयं ही बन जाते हैं।  किसान फ्लेमिंग के द्वारा किए कार्य ने उसके बच्चे की अच्छी शिक्षा के रास्ते खोल दिये जिससे वह penicillin का आविष्कार कर विश्व प्रसिद्ध हुआ।

आज की स्कोर सूची :

23  नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने के उपरांत  24 आहुति  संकल्प के विजेता निम्नलिखित  9 समर्पित सहकर्मी हैं : (1) सरविन्द कुमार पाल – 52, (2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 38, (3) पिंकी पाल बेटी – 30, (4) डा. अरुन त्रिखा जी – 29, (5) अरुण कुमार वर्मा जी – 28, (6) सुमन लता बहन जी – 27, (7) प्रेरणा कुमारी बेटी – 26, (8) संध्या बहन जी – 25, (9) रजत कुमार जी – 25 ;  उक्त सभी सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से  साधुवाद व हार्दिक बधाई हो। जगत् जननी माँ  गायत्री माता दी की असीम अनुकम्पा इन सभी पर सदैव बरसती रहे यही आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरु सत्ता से विनम्र प्रार्थना व  कामना है।  धन्यवाद।  आदरणीय सरविन्द जी ने आदर सम्मान देते हुए इन सहकर्मियों को नवरत्न की उपमा से सुशोभित किया है। 

स्कोर सूची का इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके  आदर-सम्मान हेतु  रिप्लाई अवश्य  करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी  विस्तृत होगा। ऐसा करने से और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी  जानते हैं कि हमें  किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार स्कोरसूची के रूप में आपके समक्ष होता  है।  आप सब बधाई के पात्र है और इस सहकारिता ,अपनत्व के लिए हमारा धन्यवाद्।  प्रतिदिन स्कोरसूची  को compile करने के लिए आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का धन्यवाद् तो है ही ,उसके साथ जो उपमा आप पढ़ते हैं बहुत ही सराहनीय है। सहकर्मीओं से निवेदन है कि स्कोरसूची  की  अगली पायदान पर ज्ञानप्रसाद के संदर्भ में कमेंट करने का प्रयास करें -बहुत ही धन्यवाद् होगा

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मनोनिग्रह  को  अनावश्यक रूप से  कठिन  बनाने  से  कैसे  बचें -अध्याय 6,7 और 8 

23 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – मनोनिग्रह  को  अनावश्यक रूप से  कठिन  बनाने  से  कैसे  बचें 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। आज की  प्रस्तुति में  अध्याय 6,7 और 8  को शामिल किया गया  है। ऐसा इसलिए किया गया है कि तीनो अध्याय इतने छोटे ( 1 -2 पन्नें  ) हैं कि  प्रत्येक पर एक पूरा लेख लिखने का कोई औचित्य नहीं बनता। पाठकों की सुविधा के लिए हमने पुस्तक के अनुसार  तीनों अध्याओं के  अलग-अलग शीर्षक भी दिए हैं   

लेख के अंत में 24 आहुति -संकल्प के विजेताओं की सूची देखना न भूलें। 

कल रिलीज़ हुई ढाई मिंट की  वीडियो को हमने आपके साथ इसलिए  शेयर  नहीं किया था कि लेख के साथ आपका workload बढ़ जायेगा ,लेकिन फिर भी कुछ सहकर्मियों ने इस वीडियो को देखा भी ,कमेंट भी किया ,बहुत बहुत धन्यवाद्।  ढाई मिनट में परमपूज्य गुरुदेव के बारे में जानने का एक अद्भुत प्रयास है। 

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प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद 

6-मनोनिग्रह  को  अनावश्यक रूप से  कठिन  बनाने  से  कैसे  बचें 

अब तक मन के स्वभाव पर हिन्दू धर्म के दृष्टिकोण से कुछ विचार किया l यह ज्ञान मनोनिग्रह में हमारा सहायक हो सकता है, पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह हमें सीधे मनोनिग्रह में पहुंचा देगा l भले ही मानव- मनोविज्ञान का बहुत सा ज्ञान किसी को हो जाय, पर यह सम्भव है कि उसका मन एकदम नियंत्रित न हो l मुख्य बात यह है “मनोनिग्रह की दृढ़ इच्छाशक्ति” l यदि वह हममें है, तो मनोविज्ञान की जानकारी निस्सन्देह हमारी सहायता करेगी, बशर्ते कि निर्दिष्ट साधनाओं का अभ्यास करें l      

कुछ क्रियाओं, अभिरुचियों और विचार की आदतों के द्वारा हम मनोनिग्रह को लगभग असम्भव बना लेते हैं l उनके सम्बन्ध में जान लेना हमारे लिए सहायक होगा, जिससे कि हम उनसे बच सकें l     

यदि हममें तीव्र रुचि और अरुचि, राग और द्वेष हों, तो हम अपने मन का निग्रह करने में समर्थ नहीं होंगे l यदि हम अनैतिक जीवन बितायें, तो हम मन को नियंत्रण में नहीं ला सकेंगे l

यदि हममें जान बूझकर दूसरों को हानि पहुंचाने की आदत हो, तो हम अपने मन को वश में नहीं कर सकेंगे l    

यदि हम नशीली वस्तुओं का सेवन करते हों और असन्तुलित एवं अव्यवस्थित जीवन व्यतीत करते हों, अर्थात् खाना, पीना, बोलना, सोना और काम करना अति -अल्प य अति अधिक मात्रा में करते हों, तो हम मन का निग्रह करने में समर्थ नहीं होंगे l      

यदि हम निर्थक विवाद में पड़ने के आदी हों, दूसरों के सम्बन्ध में जानने के लिए अनावश्यक रूप से उत्सुक हों अथवा दूसरों के दोष खोजने में अत्यन्त तत्पर हों, तो हम अपने मन को वश में नहीं कर सकेंगे l

यदि हम अनावश्यक रूप से अपने शरीर को यातना दें, अर्थहीन खोजों में अपनी शक्ति खर्च करें, अपने ऊपर कठोर मौन का व्रत बलपूर्वक थोप लें, अथवा अत्यन्त आत्मकेंद्रित बन जायं, तो सहज ही मन को वश में करना हमारे लिए सम्भव न होगा l

यदि हम अपने सामर्थ्य को न देखकर अधिक महत्वाकांक्षी हों, दूसरों की सम्पत्ति देखकर ईर्ष्या करते हों, अथवा धर्माभिमानी हों, तो अपने मन को सहज ही वश में नहीं कर सकेंगे l

यदि हममें अपराध की भावना हो , तो मन का निग्रह सम्भव न होगा l अतएव हमें मन से अपराध की समस्त भावना मिटा देनी चाहिए l हो चुके पापों के लिए पश्चाताप करना तथा भगवान से इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की प्रार्थना करना ताकि फिर से वैसे पाप-कर्म न हों, बस यही अपराध भावना को दूर करने का उपाय है l  

मनोनिग्रह में सफलता पाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ मनुष्य में इस दिशा में आत्मविश्वास होना चाहिए l भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि स्वयं को अपनी दुर्बलता दूर करनी चाहिए तथा स्वयं को ही अपने आप को उठाना चाहिए l जो अपने मन को वश में लाना चाहता है, उसे इस उपदेश का पालन करना चाहिए l     

मन को मन के ही द्वारा नियंत्रण में लाना पड़ेगा l मनोनिग्रह में हम जिन कठिनाइयों का अनुभव करते हैं, वे सब हमारे अपने ही मन के द्वारा निर्मित होती हैंl मन को तनिक देर के लिए भी कृत्रिम उपायों द्वारा वश में नहीं किया जा सकता l उसके लिए तो धैर्य , अध्यवसाय, बुद्धिमत्ता और परिश्रमपूर्वक उपयुक्त और परीक्षित साधनाओं में लगना आवश्यक है।

7-  कार्य की स्पष्ट धारणा आवश्यक: 

यह स्पष्ट रूप से समझना और स्वीकार करना चाहिए कि ऐसा कोई जादू नहीं है जिससे मन वश में हो जाय। जो लोग जल्दबाज हैं और ऐसी किसी कौशल की खोज में रहते हैं, उन्हें सावधान कर देना चाहिए कि मन एक नाजुक यंत्र है और उससे बड़ी सावधानी के साथ व्यवहार करना चाहिए। मनोनिग्रह का समूचा कार्य हमें स्वयं ही करना होगा इसे कोई दूसरा हमारे लिए नहीं कर सकता l हम कुछ फीस देकर दूसरों से इसे अपने लिए नहीं करा सकते l यह हमारा व्यक्तिगत कार्य है। इसे तो हमको स्वयं ही करना चाहिए l इस कार्य में हमें बड़े धैर्य की आवश्यकता होगीl स्वामी विवेकानंद कहते हैं :

मन को क्रमशः और विधिपूर्वक वश में करना पड़ेगा l लगातार शनैः शनैः धैर्यपूर्वक संयम के द्वारा इच्छाशक्ति को बलवती बनाना पड़ेगा। यह बच्चों का खिलवाड़ नहीं और न कोई सनक है कि उसमें पड़कर एक दिन अभ्यास किया जाय और दूसरे दिन त्याग दिया जाय l यह जीवनभर का काम है और लक्ष्य की सिद्धि में जो भी मूल्य चुकाना पड़े , वह सर्वथा उचित है, और वह लक्ष्य ईश्वर से अपने पूर्ण एकत्व के बोध जैसा महान् हैl यदि इसे लक्ष्य बनाया जाय और यदि यह ज्ञान रहे कि सफलता निश्चित है, तो उसकी सिद्धि के लिए कोई भी मूल्य चुकाना अधिक नहीं हो सकता l

8- अनुकूल भीतरी  वातावरण  बनाने की आवश्यकता :     

मनोनिग्रह की साधनाओं का अभ्यास करने के लिए हमें जीवन की कतिपय अपरिहार्य बातों को विवेकपूर्वक स्वीकार कर एक अनुकूल भीतरी वातावरण तैयार करना पड़ता है l यद्यपि ये बातें अपरिहार्य और अनिवार्य हैं , तथापि हम बहुधा उनकी ओर से अपनी आंखें मूंद लेते हैं l फल यह होता है कि अनावश्यक रूप से मानसिक समस्याएं उठ खड़ी होती हैंl लेकिन जो लोग अपने मन को नियंत्रण में लाना चाहते हैं, उन्हें सावधानीपूर्वक मन को अनावश्यक समस्याओं के भार से बचाना चाहिए, क्योंकि अपरिहार्य और अनिवार्य समस्याओं का बोझ ही कुछ कम नहीं हैl इस संदर्भ में “अंगुत्तर निकाय” में बुद्ध द्वारा दिये गये निम्नलिखित उपदेशों का अभ्यास करेंगें :

 भिक्षुओ, ये पांच उपदेश पुरुषों और स्त्रियों के द्वारा , गृहस्थों और भिक्षुओं  के द्वारा समान रूप से माननीय हैंl 

1. किसी न किसी दिन वृद्धावस्था मुझपर आयेगी और मैं उससे बच न सकूँगा l  

2. किसी न किसी दिन मुझपर रोग का आक्रमण हो सकता है और मैं उससे बच न सकूँगा l 

3. किसी न किसी दिन मुझ पर मृत्यु का आक्रमण होगा और मैं उससे बच न सकूँगा l  

4. जिन वस्तुओं को मैं प्रिय मानता हूँ , वे परिवर्तनशील और नाशवान हैं तथा उनका मुझसे वियोग हो जाता है l मैं इसे अन्यथा नहीं  कर सकता l

5.मैं अपने ही कर्मों का प्रतिफल हूँ और मेरे कर्म भलै हों या बुरा, मैं उनका उत्तराधिकारी बनूँगा l  

भिक्षुओ, वृद्धावस्था का विचार करने से यौवन का मद दूर किया जा सकता है , या कम से कम न्यून किया जा सकता हैl मृत्यु का विचार करने से जीवन का घमंड दूर किया जा सकता हैl समस्त प्रिय वस्तुओं के परिवर्तन और वियोग पर विचार करने से अधिकार की लालसा दूर की जा सकती है तथा यह विचार करने से कि मैं अपने ही कर्मों का प्रतिफल हूँ , विचार , वाणी , और क्रिया की अशुभ प्रवृत्तियों को दूर किया जा सकता है, या कम किया जा सकता हैl  

जो इन पांचों बातों पर विचार करता है, वह अपने अहंकार और वासना को दूर कर सकता है, या कम से कम न्यून कर सकता है और इस प्रकार निर्वाण के मार्ग पर चलने में समर्थ हो सकता है l   

बुद्ध के इन उपदेशों का अभ्यास परोक्ष रूप से मन की शुद्धि में सहायक होगा। 

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22 नवम्बर के ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करने उपरांत  24 आहुति संकल्प के विजेता निम्नलिखित 8 ज्ञानवान सहकर्मी हैं  (1) प्रेरणा कुमारी बेटी – 30, (2) सरविन्द कुमार पाल – 29, (3) संध्या बहन जी – 29, (4) अरूण कुमार वर्मा जी – 28, (5) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 27, (6) डा. अरुन त्रिखा जी – 25, (7) रजत कुमार जी – 25, (8) कुसुम बहन जी – 25 

इन सभी सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद व हार्दिक शुभकामनाएँ।आनलाइन ज्ञान रथ परिवार इन सबकी श्रद्धा व समर्पण को नतमस्तक है। हमारी कामना है कि  माँ गायत्री  की असीम अनुकम्पा आप पर सदैव बरसती रहे। बहुत ही हर्ष के साथ अवगत कर रहे हैं कि सरविन्द जी के   नवीन व्यवसाय को प्रगति में चार चाँद लग रहे हैं।  12  मानवीय मूल्यों का,   जो  आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के  स्तम्भ हैं, पूर्णतया पालन किया जा रहा है। इन मानवीय मूल्यों का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में  पालन करना हमारा कर्तव्य है -जय गुरुदेव  

स्कोर सूची का इतिहास :

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसके  आदर-सम्मान हेतु  रिप्लाई अवश्य  करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना का सम्मान किया जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और भी  विस्तृत होगा। ऐसा करने से और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी  जानते हैं कि हमें  किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है कि  ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार स्कोरसूची के रूप में आपके समक्ष होता  है।  आप सब बधाई के पात्र है और इस सहकारिता ,अपनत्व के लिए हमारा धन्यवाद्।  प्रतिदिन स्कोरसूची  को compile करने के लिए आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का धन्यवाद् तो है ही ,उसके साथ जो उपमा आप पढ़ते हैं बहुत ही सराहनीय है। सहकर्मीओं से निवेदन है कि स्कोरसूची  की  अगली पायदान पर ज्ञानप्रसाद के संदर्भ में कमेंट करने का प्रयास करें -बहुत ही धन्यवाद् होगा

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अध्याय 5-मन का स्वभाव  : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 2 

22 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मन का स्वभाव  : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 2 

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। यह प्रस्तुति अध्याय 5  का द्वितीय  भाग है। लेख के अंत में 24 आहुति -संकल्प के विजेताओं की सूची देखना न भूलें। संकल्प सूची की आज  की उपमा भी  आदरणीय सरविन्द जी की थी  लेकिन शब्द सीमा के कारण हमने अपने अल्पज्ञान से मंथन करते हुए जो कुछ भी प्राप्त हो सका ज्ञानप्रसाद के उपरांत प्रस्तुत किया  है। हर बार की भांति आज भी आवश्यक एडिटिंग करके आकर्षण प्रदान किया गया  है। हमारे विचार में  सरविन्द जी ने हमें  एडिटिंग की स्थाई आज्ञा दी हुई है क्योंकि अगर बेस्ट कंटेंट प्रस्तुत करना है तो परस्पर सहयोग से  एडिटिंग  करना कोई त्रुटि नहीं है। ऑनलाइन ज्ञानरथ द्वारा प्रकाशित कंटेंट( लेख ,वीडियो )  कई वर्षों तक हमारी वेबसाइट पर स्थाई तौर से विराजमान रहेगा। इनकी क्वालिटी पर कोई  ऊँगली न उठा सके ,यह सुनिश्चित करना हमारा धर्म और कर्तव्य है। हमारा प्रयास है  कि जहाँ कहीं भी यह कंटेंट शेयर हो , पाठक चुंबक की भांति आकर्षित होते आएं, यह केवल अथक परिश्रम और प्रयास से ही संभव है।    

तो चलते हैं ज्ञानप्रसाद की ओर ।  

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सूक्ष्म जड़-परमाणुओं से बना यह पारदर्शी मन आत्मा के सबसे निकट है; वह इस बोध स्वरूप आत्मा का अन्त:करण यानी भीतरी यंत्र हैl वह प्रकाश का उत्साह नहीं है l मन में अपने आपमें कोई चेतना नहीं है l वह बोधस्वरूप आत्मा से, जिसका कि वह भीतरी यंत्र है,चेतना की आभा ग्रहण करता है और सबको उदभासित करता है l यहाँ तक कि भौतिक प्रकाश भी इसी प्रकार मन के माध्यम से प्रकाशमान होता है l अपना स्वयं का कोई प्रकाश न होते हुए भी मन प्रकाशमान प्रतीत होता है l भले ही लगता है कि मन में ज्ञान की क्रिया होती है, पर वह ज्ञानात्मक नहीं है, वह तो ज्ञान का साधन मात्र हैl चेतना से उधार लिये गये आलोक से प्रकाशमान होने के बावजूद मन ज्ञान का सक्षम साधन है l

हम अपने स्वयं के अनुभव से यह कई प्रकार से जान सकते हैं कि इन्द्रियों और शरीर से पृथक एक मन है l अपनी पांच कर्मेन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों की सहायता बिना लिए ही हम विचार , इच्छाशक्ति, कल्पना, स्मरण, हर्ष और विषाद की क्रियाएँ कर सकते हैं, इसी से वह प्रमाणित होता है कि इन्द्रियों से पृथक् एक भीतरी यंत्र है, जिसके कारण उपर्युक्त क्रियाएँ सम्भव होतीं हैं l

 जो संशय करते हैं कि मन एक पृथक् भीतरी यंत्र है या नहीं, उन्हें मनवाने के लिए बृहदारण्यक उपनिषद निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करता है:

मेरा मन अन्यत्र था, इसलिए जो मनुष्य ऐसा कहता है मैंने नहीं सुना, इसी से निश्चय होता है कि वह मन से ही देखता है और मन से ही सुनता है l काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा , अश्रद्धा, धृति ( धारणा-शक्ति), अधृति, बुद्धि भय, ये सब मन ही हैं l पीछे से स्पर्श किये जाने पर भी मनुष्य मनन से जान लेता है अतएव मन है l

मन में अपने आपको देखने की क्षमता है l मन की सहायता से  हम मन का विश्लेषण कर सकते हैं और देख सकते हैं कि मन में क्या चल रहा है l हिन्दू विशलेषण के अनुसार मन के तीन उपादान हैं, तीन स्तर हैं, चार प्रकार की क्रियाएँ हैं और पांच अवस्थाएँ हैं l हम संक्षिप्त में इनकी चर्चा करेंगे।

हम मन को हरदम एक ही प्रकार की स्थिति में क्यों नहीं पाते ? कारण यह है कि मन तीन मूलभूत शक्तियों का सम्मिश्रण है, जिन्हें हम सत्व, रज, और तम गुण कहते हैं l ये गुण सम्पूर्ण भौतिक और मानसिक विश्व के भी आधारभूत उपादान हैं l सत्व सन्तुलन का, स्थैर्य का तत्व है, पवित्रता, ज्ञान और आनन्द को जन्म देता है l रज गति का तत्व है और उससे क्रियाशीलता, काम और चांचल्य की उत्पत्ति होती है l तम जड़ता का तत्व है और उससे निष्क्रियता, अवसाद और भ्रम उत्पन्न होते हैं l तमोगुण मन को बिखेर कर चंचल बना देता है और सत्वगुण उसे एक उच्चतरृ दिशा प्रदान करता है l

गुणों की व्याख्या करना सहज नहीं है l अतएव विद्यारण्य पंचदशी में उनके कार्यों को देखकर उनकी व्याख्या करते हैं:

सत्वगुण से वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि और रजोगुण से से काम, क्रोध, लोभ, यत्न आदि उत्पन्न होते हैं l आलस्य, भ्रम और तन्द्रा आदि विकार तमोगुण से होते हैं l मन में सत्वगुण के कार्य से पुण्य की और रजोगुण के कार्य से पाप की उत्पत्ति होती है l और जब तमोगुण का कार्य होता है तब न पुण्य होता है, न पाप, किन्तु व्यर्थ   ही आयु का नाश होता है l

हर व्यक्ति के मन की बनावट इन तीन गुणों की मात्राओं के सम्मिश्रण तथा हेरफेर से निश्चित की जा सकती है l इससे स्पष्ट  हो जाता है कि मानव-स्वभाव इतना वैचित्र्यपूर्ण है क्यों है तथा इससे मन की अस्थिरता की भी व्याख्या हो जाती है l

हम बहुधा कहते हैं कि: “हमने अपना मन बदल दिया है” यदि मन केवल एक ही मौलिक शक्ति तत्व से बना होता, तो मन को बदलना सम्भव न हो पाता l तब तो मनुष्य न तो गिर सकता, न उठ सकता l जो जैसा पैदा हुआ है, उसी प्रकार बना रहता l

हम चेतन और अवचेतन इन दोनों शब्दों से परिचित हैं l ये उन विभिन्न स्तरों को सूचित करते हैं जिनमें मन क्रियाशील होता है l चेतन  स्तर पर सभी क्रियाएँ सामान्यतः अहंभाव से युक्त होतीं हैं l अवचेतन स्तर पर अहंकार की भावना लुप्त हो रहतीं हैं l

एक इससे भी ऊंचा स्तर है, जिस पर मन कार्य कर सकता है l मन के अनुरूप  चेतन के भी ऊपर जा सकता है l जैसे अवचेतन का स्तर चेतन के नीचे है, उसी प्रकार इस सापेक्ष चेतन के ऊपर भी एक स्तर है l इसे अतिचेतन के नाम से पुकारते हैं l यहाँ भी अहंकार की भावना लुप्त रहती है, पर इसमें तथा अवचेतन स्तर में बहुत बड़ा अन्तर है l जब मन सापेक्ष चेतना से परे चला जाता है तो वह अतिचेतन- स्तर पर आकर समाधिस्थ हो जाता है l अतिचेतन- स्तर पर मन अपनी शुद्ध अवस्था में होता है l एक प्रकार से तब उसे आत्मा से तद्रूप कहा जा सकता है l तभी तो श्रीरामकृष्ण कहा करते थे: “जो शुद्ध मन है, वही शुद्ध बुद्धि है और शुद्ध बुद्धि ही आत्मा है l”

मनोनिग्रह का प्रश्न केवल चेतन-स्तर से सम्बन्ध रखता है, इस स्तर पर मन सामान्यतः अहं- भावना से युक्त होता है l जबतक हम योग में प्रतिष्ठित नहीं हो जाते, तबतक अवचेतन मन को सीधे नियंत्रण में नहीं ला सकते l अतिचेतन स्तर पर मन के निग्रह का प्रश्न उठता ही नहीं l किन्तु अतिचेतन -स्तर पर वे ही पहुँच सकते हैं, जिन्होंने चेतन और अवचेतन स्तरों पर अपने मन को नियंत्रित कर लिया है l

क्रियात्मक मन की चतुर्विध वृतियां होती हैं- मन , बुद्धि, अहंकार और चित्त l मन अन्त:करण की उस वृत्ति को कहते हैं जो किसी भी विषय के पक्ष और विपक्ष में संकल्प-विकल्प करती है l अन्त:करण की निश्चय करनेवाली वृत्ति को बुद्धि कहते हैं l अन्त:करण की स्मरण करनेवाली वृत्ति को चित्त  कहते हैं l अन्त:करण की जो वृत्ति अहंभावना से युक्त होती है, उसे अहंकार  कहते हैं l प्रत्येक बाह्य इन्द्रिय – संवेदना के साथ मन की ये चारों क्रियाएँ जुड़ी होती हैं l ये चारों क्रियाएँ एक दूसरे के बाद इतनी शीघ्रता से आतीं हैं कि  वे एक साथ ही होती प्रतीत होती हैं l

मन अपने को निम्नलिखित पांच अवस्थाओं में प्रकाशित करता है:  क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, और निरुद्ध l स्वामी विवेकानंद समझाते हैं:

क्षिप्त में मन चारों ओर बिखर जाता है और कर्मवासना प्रबल रहती है l इस अवस्था में मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दु:ख, इन दो भावों में ही प्रकाशित होने की होती है l मूढ़ अवस्था तमोगगुणात्मक है और इसमें मन की प्रवृत्ति केवल औरों का अनिष्ट करने में होती है l विक्षिप्त ( क्षिप्त से विशिष्ट) अवस्था वह है, जब मन अपने केन्द्र की ओर जाने का प्रयत्न करता है l यहाँ पर भाष्यकार कहते हैं कि विक्षिप्त अवस्था देवताओं के लिए स्वाभाविक है तथा क्षिप्त तथा मूढावस्था असुरों के लिए l एकाग्र अवस्था तभी होती है जब मन निरुद्ध होने के लिए प्रयत्न करता है और निरुद्ध अवस्था ही हमें समाधि में ले जाती है l

सामान्यतः मन मूढ़  और क्षिप्त  अवस्थाओं में रहता है l मूढ़  अवस्था में मनुष्य शिथिल और अवसन्न हो जाता है l क्षिप्त अवस्था में वह चांचल्य का अनुभव करता है l योगाभ्यास के द्वारा इसी मन को विक्षिप्त और एकाग्र बनाया जा सकता है l मन को एकाग्र बनाना ही मनोनिग्रह का समस्त प्रयोजन है l जब ऐसे मन को किसी भी क्षेत्र की क्रिया से युक्त किया जाता है तो वह वहीं चमक उठता है l एकाग्र मन से सम्पन्न एक व्यापारी अपने व्यापार में उन्नति करेगा, एकाग्र मन से युक्त एक संगीतज्ञ बहुत बड़ा संगीतज्ञ हो जायगा l एकाग्र मन वाला एक वैज्ञानिक बड़ा ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक बन जाएगा l एकाग्रता के अभ्यास और विकास द्वारा मन

अपनी उच्चतम अर्थात् पांचवी अवस्था में पहुँच जाता है  जिसे निरुद्ध  कहते हैं, इस अवस्था में मन अतिचेतन स्तर पर चला जाता है l

अगला लेख :मनोनिग्रह  को  अनावश्यक रूप से  कठिन  बनाने  से  कैसे  बचें  

 जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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20 नवम्बर 2021 के ज्ञानप्रसाद, मन का स्वभाव – हिंदू दृष्टिकोण भाग 1 का स्वाध्याय करने वाले 12 सहकर्मियों ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण कर अपने जीवन का कायाकल्प किया है। यह बहुत ही प्रशंसनीय कार्य है क्योंकि आहुतियों की उष्णता से विचारों में परिवर्तन देखा जा रहा है। अग्नि का गुण है कि इसमें सभी पदार्थ जल जाते हैं, बदल जाते हैं एवं गल जाते हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जिसमें अग्नि का संसर्ग होने पर परिवर्तन न होता हो। यह अग्नि ही हैं जिसमें तपने पर सोना कुंदन बना जाता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के सहकर्मी स्वाध्याय करते हुए अपनेआप को घिसा रहे हैं। घिसाने की रगड़ से गर्मी पैदा होती है और इस ऊष्मा से आत्मशक्ति पैदा होती है। यही आत्मशक्ति हमारे सहकर्मी अनुभव कर रहे हैं। समुद्र मंथन से रत्न मिलते हैं, दूध -मंथन से घी मिलता है ,भूमि मंथन से अन्न उपजता है,आत्म-मंथन से आध्यात्मिक विचार निकलते हैं। इसी मंथन और घिसाव की प्रक्रिया से पापमुक्त,तेजस्वी और विवेकवान मानवों की उत्पति होती है। हम निवेदन करते हैं कि 24 -आहुति संकल्प को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये, न कि केवल गिनती प्राप्त करने का लक्ष्य । ज्ञानप्रसाद का स्वाध्याय करते हुए परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करना इसका मुख्य उदेश्य है, इसी आदान-प्रदान से रत्न निकल आयेंगें -ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।

इन सभी  12 रत्नों को हमारा ह्रदय से आभार एवं नमन – (1) सरविन्द कुमार पाल – 55, (2) डा.अरुन त्रिखा जी – 47, (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 46, (4) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 33, (5) संध्या बहन जी – 33, (6) प्रेरणा कुमारी बेटी – 32, (7) विदुषी बहन जी – 30, (8) रजत कुमार जी – 27, (9) पिंकी पाल बेटी – 26, (10) कुसुम बहन जी – 26, (11) राजकुमारी बहन जी – 25, (12) धीरप सिंह तँवर – 25 

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अध्याय 5-मन का स्वभाव : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 1

20 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मन का स्वभाव : हिन्दू दृष्टिकोण भाग 1

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी की प्रस्तुति है। यह प्रस्तुति अध्याय 5 का प्रथम भाग है, रविवार अवकाश होने के कारण द्वितीय भाग सोमवार 22 नवंबर के ज्ञानप्रसाद में प्रस्तुत करेंगें । यूट्यूब में शब्द सीमा होने के कारण हम अध्याय पांच को दो भागों में बाँटने के लिए विवश हैं ।

लेख के अंत में 24 आहुति -संकल्प के विजेताओं की सूची देखना न भूलें। हालाँकि इस सूची की उपमा आदरणीय सरविन्द जी की है ,हमने punctuation और आवश्यक एडिटिंग करके आकर्षण प्रदान किया है। हमारे विचार में सरविन्द जी ने हमें एडिटिंग की स्थाई आज्ञा दी हुई है क्योंकि अगर बेस्ट कंटेंट प्रस्तुत करना है तो परस्पर सहयोग से एडिटिंग करना कोई त्रुटिपूर्ण नहीं है। आने वाले कुछ दिनों तक हम SCORELIST का इतिहास भी शेयर करते रहेंगें ताकि अधिक से अधिक सहकर्मी 24 आहुति- संकल्प के जानकर हो सकें।

तो चलते हैं ज्ञानप्रसाद की और।

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मन: संयम की इच्छा ही पर्याप्त नहीं है l हमें मन के स्वभाव के सम्बन्ध में भी कुछ ज्ञान रखना चाहिए l हम हिन्दू मनोविज्ञान के आलोक में इस पर संक्षेप में विचार करेंगे, क्योंकि उसमें प्राचीन काल से मनोनिग्रह के लिए पर्याप्त साधना-प्रणालियां वर्णित हैं l हिन्दू मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि उसने समुचित प्रयोगों और जांच- पडताल के द्वारा मन के पूर्ण निग्रह के लिए तरीके खोज निकाले हैं, जिनका अवसान अन्त में जाकर पूर्णता या ज्ञान प्राप्ति के रूप में होता है l स्वामी विवेकानंद ने ‘ विवेकानंद साहित्य’ में हिन्दू मनोविज्ञान की जैसी व्याख्या की है, वही हमारे प्रस्तुत विचार का आधार है l

हमारे इस स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है l उसी को हम मन कहते हैं l यह स्थूल शरीर मानो मन की बाहरी परत है l पर मन शरीर का सूक्ष्म अंश होने के कारण दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता है l यही कारण है कि शरीर का रोग बहुधा मन को प्रभावित करता देता है, और मानसिक अवस्था या तनाव शरीर को रुग्ण बना देता है l l

मन के पीछे आत्मा है l यही मनुष्य का यथार्थ स्वरूप है l शरीर और मन दोनों जड़ हैं ; आत्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है,मन आत्मा नहीं है, वह आत्मा से सम्पूर्णत: भिन्न है l

यदि विज्ञान की एक उपमा लें, तो कहेंगे कि जड़पदार्थ और मन में अन्तर केवल कम्पन की गति में है l मन जब धीमी गति से कम्पनशील होता है, तब उसे मन कहकर पुकारते हैं l

जड़पदार्थ और मन दोनों देश, काल और निमित्त के नियमों के द्वारा समान रूप से नियंत्रित होते हैं l जड़पदार्थ को मन में परिवर्तित किया जा सकता है, भले ही हमने इसका प्रत्यक्ष अनुभव न किया हो l उदाहरण के लिए, एक ऐसे व्यक्ति को लो जिसने एक पखवाड़े (15 दिनों) से कुछ खाया ही नहीं है l उस पर क्या प्रतिक्रिया होती है? उसका शरीर ही केवल दुर्बल नहीं पड़ता, प्रत्युत उसका मन भी रीता- सा हो जाता है l यदि वह कुछ दिन और अधिक दिन उपवास करे , तो वह सोच भी नहीं सकता l वह अपने नाम का स्मरण भी नहीं कर सकता l जब वह फिर से अन्न लेना शुरू करता है, तो धीरे- धीरे उसके शरीर में ताकत आती है, और उसकी स्मृति – शक्ति कार्य करने लगती है l अतएव यह स्पष्ट है कि वह अन्न ही, जो जड़पदार्थ है, मन बना करता है l हम ‘छान्दोग्य’ उपनिषद में उद्दालक को अपने पुत्र श्वेतकेतु को अपने प्रयोग के माध्यम से उपदेश देते हुए पाते हैं कि अन्न कैसे मन बनता है l वहाँ के दो अध्याय अन्य प्रासंगिक उपदेशों के साथ इस प्रकार हैं: ‘ हे सौम्य ! मथे जाते हुए दही का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है ; वह घृत होता है l उसी प्रकार हे सौम्य ! खाये हुए अन्न का जो सूक्ष्म अंश होता है, वह सम्यक प्रकार से ऊपर आ जाता है, यह मन होता है l हे सौम्य ! पीये हुए जल का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण हो जाता है। हे सौम्य! भक्षण किये हुए तेज का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है l इस प्रकार हे सौम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है I

इस पर पुत्र श्वेतकेतु ने कहा: ‘भगवन् ! मुझे फिर समझाइये l” ठीक है , सौम्य ! सुनो, पुरुष सोलह कलाओं वाला है l तू पन्द्रह दिन भोजन मत कर , केवल अपनी इच्छानुसार जल ग्रहण कर l प्राण जलमय है , इसलिए जल पीते रहने से उसका नाश नहीं होगा l ‘

श्वेतकेतु ने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया l तत्पश्चात् वह अपने पिता के पास आया और बोला : ‘ भगवन ! क्या बोलूँ ? ‘ पिता बोले , ‘ हे सौम्य ! ऋग: , यजु: और साम: का पाठ करो l ‘ वह बोला: , ‘ भगवन् ! मुझे उनका स्मरण नहीं आ रहा है l ‘( उसकी स्मृति क्षीण हो गयी थी l) तब पिता उससे बोले: , ‘ हे सौम्य ! जैसे ईंधन से धधकती अग्नि का यदि जुगनू के बराबर एक छोटा सा अंगारा रह जाय , तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता , उसी प्रकार हे सौम्य ! तेरी सोलह कलाओं में से केवल एक कला रह गयी है, इसलिए उस एक कला के द्वारा तू वेदों का स्मरण नहीं कर पा रहा है l अच्छा , अब जा और भोजन कर तब तू मेरी बात समझ जाएगा l

श्वेतकेतु ने भोजन किया और पिता के पास आया l फिर पिता ने जो कुछ पूछा , वह सब उसके मन के सामने उपस्थित हो गया l तब पिता उससे बोले: ‘ हे सौम्य ! जैसे ईंधन से धधकती अग्नि का यदि जुगनू के बराबर एक छोटा सा अंगारा रह जाय और उसे तृण से सम्पन्न कर प्रज्ज्वलित कर दिया जाय , तो वह पूर्व परिमाण की अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है l इसी प्रकार हे सौम्य ! तेरी सोलह कलाओं में से एक कला अवशिष्ट रह गयी थी l वह अन्न के द्वारा प्रज्वलित कर दी गयी l अब उसी से तू वेदों का स्मरण कर रहा है l अत: हे सौम्य ! मन अन्नमय है , प्राण जलमय है ,वाक् तेजोमयी है l वह पिता के कथन को समझ गया ; हाँ अच्छी तरह समझ गया l

जिन लोगों को इस उपदेश में संशय हो , वे पन्द्रह दिन तक निराहार रहें, केवल जल ग्रहण करें और देखें कि उनके मन को क्या होता है !

वस्तुतः मनुष्य मन नहीं बल्कि आत्मा है l आत्मा नित्यमुक्त , अनन्त और शाश्वत है l वह शुद्ध चैतन्य रूप है l मनुष्य में स्वतंत्र कर्ता मन नहीं , आत्मा है l मन तो मानो आत्मा के हाथों एक यंत्र है , जिसके द्वारा आत्मा बाह्य जगत् का अनुभव और ग्रहण करता है l

यह यंत्र जिसके द्वारा आत्मा बाह्य जगत् के सम्पर्क में आता है, अपनेआप में सतत् परिवर्तनशील और अस्थिर है। जब इस अस्थिर यंत्र को स्थिर और निश्चंचल बनाया जाता है, तो वह आत्मा को प्रतिबिम्बित कर सकता है l भले ही मन एक स्वतंत्र कर्ता नहीं है, तथापि उसकी शक्तियां अकल्पनीय हैं l यदि मनुष्य ने अदृश्य अणु को तोड़कर उसकी ऊर्जा को प्रकट किया है, यदि मनुष्य दुर्दर्श आत्मा का अनुभव कर ज्ञानालोक से उद्भाषित हो गया है, तो उसने मन की शक्तियों के सहारे ही यह सब किया है l उपलब्धि के इन दो ध्रुवों के बीच मानव ने विभिन्न क्षेत्रों में अन्य जो भी उपलब्धियां की हैं, वे सभी मन की शक्तियों के द्वारा ही सम्भव हुईं हैं l वास्तव में मन हर दूसरे मन के साथ सम्बन्धित है l अतएव प्रत्येक मन को, वह चाहें कहीं भी हो, सम्पूर्ण विश्व के साथ सम्बन्धित किया जा सकता है l

उपनिषद कहता है : उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है l उसके प्रकाश से ही यह सब कुछ भासता है l मन- सम्बन्धी हिन्दू दृष्टिकोण को समझने के लिए इस गम्भीर उपदेश का ध्यान रखना चाहिए l वह ब्रह्म, वह शुद्ध चैतन्यस्वरूप परमात्मा ही समस्त प्रकाश का उदगम है l जिसे हम आत्मा कहते हैं, जो प्राणियों में ज्ञात के रूप में अवस्थित है , वह शुद्ध चेतना स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न है l इस शुद्ध चेतना की आभा ही सर्वदा समस्त वस्तुओं को अभिव्यक्त करती है l क्रमशः जारी भाग 2 , जय गुरुदेव कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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आज की स्कोर लिस्ट : आज जिन नौ सहकर्मियों ने परम पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में 24 आहुति-संकल्प का समर्पण किया है उनके नाम रिलीज़ करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। यह नाम हैं : (1) अरूण कुमार वर्मा जी – 38, (2) प्रेरणा कुमारी बेटी – 33, (3) सरविन्द कुमार पाल – 33, (4) धीरप सिंह तँवर बेटा – 29, (5) संध्या बहन जी – 29, (6) रजत कुमार जी – 28, (7) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 27, (8) पिंकी पाल बेटी – 27, (9) पुष्पा पाठक बहन जी – 27 इन सभी सहकर्मियों को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामना एवं हार्दिक बधाई l स्कोर लिस्ट का इतिहास: जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसका आदर सम्मान रखने के लिए रिप्लाई करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना की कदर की जाये। कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना। जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और विस्तृत होगा उससे और अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी जो हमसे कुछ समय से जुड़े हैं जानते हैं कि किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क संभव हो पाया है। अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण compile कर सकते हैं। इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका है ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं। केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया। इसका विस्तार इस स्कोरबोर्ड के रूप में आपके समक्ष है। आज आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में वह अपार शक्ति है जिसमें निस्वार्थ भाव से विचारों की हवन सामग्री से कमेन्ट्स रूपी आहुति डाली जाती है यह परम पूज्य गुरुदेव की योजना है और अरुन भइया जी तो केवल माध्यम ही हैं l अगर विश्वास न हो तो निस्वार्थ भाव से परमार्थ के लिए आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में अपनत्व की भावना से ओतप्रोत होकर समयदान- श्रमदान करके देखिये, अवश्य ही आशातीत सफलता मिलेगी l आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की इस आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों की महायज्ञशाला में प्रतिदिन भाव रूपी हवन हो रहा है जिसका लाभ हम अमृत तुल्य महाप्रसाद के रूप में अनवरत ले रहे हैं l

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अध्याय 4-सुखभोग  की  स्पृहा को कैसे जीता जाय ?  भाग 2  

18 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद -सुखभोग  की  स्पृहा को कैसे जीता जाय ?  भाग 2  

आज के ज्ञानप्रसाद में प्रस्तुत है सुखभोग  की  “स्पृहा को कैसे जीता जाय ?” का भाग 2 ; यह  ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। यह प्रस्तुति इस पुस्तक के  अध्याय 4 का द्वितीय  भाग है, प्रथम  भाग की प्रस्तुति कल की गयी थी । आज का लेख भी पूर्णतया  मूलरूप में बिना किसी बदलाव के प्रस्तुत किया जा रहा है।

हमारे सहकर्मी पिछले कई दिनों से स्कोरबोर्ड की प्रस्तुति देखते आ रहे हैं  और अपनी प्राप्तियों को देखकर प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं।   हम  व्यक्तिगत रूप से एवं ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की ओर  से सबका धन्यवाद करते हैं।  आज से हम उस स्कोरबोर्ड को  दैनिक ज्ञानप्रसाद के अंत में  प्रस्तुत करेंगें। सहकर्मियों के समय और व्यस्तता को देखते हुए हमने ऐसा करने का विचार किया है।  सहकर्मियों के समय का सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। हमारे सहकर्मियों को तीन  जगहों पर कमेंट करना पड़ता था -शुभरात्रि ,स्कोरबोर्ड और ज्ञानप्रसाद। आशा करते हैं कि  आप उसी तरह कमेंट करके अपनी पात्रता -सहभागिता सुनिश्चित कराकर इस पुनीत कार्य के भागिदार बनने का सौभाग्य प्राप्त करेगें। 

तो प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद। 

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श्रीरामकृष्ण कहते हैं : विषयानन्द का आकर्षण कब खत्म होता है? जब मनुष्य ईश्वर में समस्त सुख और आनन्द की चरम सीमा देखता है , ईश्वर, अखण्ड, नित्य आनन्द के सागर हैं , जो उनके आनन्द का उपभोग करते हैं उन्हें संसार के इन व्यर्थ के सुखों में कोई आकर्षण नहीं मालूम पड़ता।

जिसने एकबार मिश्री की डली चख ली है, उसे मैली राब में भला कौनसा सुख मिल सकता है ? जो राजमहल में सो चुका है , उसे गन्दी झुग्गी में सोने में क्या आनन्द मिलेगा? जिसने एक बार दिव्यानन्द का रसास्वादन कर लिया है, उसे संसार के तुच्छ विषय – भोगों में कोई रस नहीं मिलता।

बहुत से लगनशील साधक उचित  मार्गदर्शन के अभाव में, अपनी सुख- भोग लालसा से गलत ढंग से संघर्ष करने लगते हैं।  अपनी तत्परता में वे अपनी हानि करने में भी नहीं हिचकते, परन्तु ऐसा प्रयास व्यर्थ है। क्योंकि भले ही वह अपने प्रयास में सच्चे हों किन्तु अन्त में उनकी हार हो जाती है। अतएव यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हम अपने आन्तरिक जीवन की इस सुख – लालसा की समस्या से जूझते समय उपर्युक्त अन्धकूप से बचें।  श्रीरामकृष्ण देव बचने का एक रास्ता बताते हैं : जब उनसे पूछा गया कि काम, क्रोध आदि रूपी षडरिपुओं से छुटकारा कब मिलेगा तो उन्होंने उत्तर दिया, “जबतक इन वासनाओं की दिशा संसार और उसके विषयों की ओर होती है, तबतक वे शत्रु के समान बर्ताव  करतीं हैं परंतु जब उनको ईश्वर की ओर मोड़ दिया जाता है तो वे मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ मित्र बन जाती हैं क्योंकि वे उसे ईश्वर की ओर ले जाती हैं। सांसारिक विषयों की कामना को ईश्वर पाने की कामना में बदल देना चाहिए। मनुष्य दूसरों के प्रति क्रोध का जो भाव पोषित करता है , उसे ईश्वर की ओर यह कहकर मोड़ना चाहिए- प्रभो ! तुमने दर्शन नहीं दिये। अन्य वासनाओं के साथ भी इसी तरह पेश आना चाहिए। ये वासनाएं समाप्त नहीं की जा सकतीं , पर इनको संस्कारित किया जा सकता है।

श्रीरामकृष्ण देव का अपने इस कथन से कि  “वासनाएं निर्मूल नहीं की जा सकतीं , पर इनको संस्कारित किया जा सकता है ” यह तात्पर्य रहा होगा कि वासनाओं को नष्ट नहीं किया जा सकता , किन्तु उनपर लगाम लगाया जा सकता है और उन्हें शुद्ध किया जा सकता है।  यदि हम अपनी वासनाओं को निम्न चीजों में लगायेंं तो हम निम्न  स्तर पर रहते हैं ; उन्हें उच्चतर लक्ष्यों में नियुक्त करने से हम ऊपर उठ आते हैं।  यदि हम उन्हें परमात्मा से युक्त कर दें तो उनकी नियोजक शक्ति के द्वारा हम परमात्मा तक उठ आते हैं और दूसरी ओर ये वासनाएं संस्कारित और पवित्र हो जातीं हैं तथा सामान्य अर्थ में ये फिर वासनाएं नहीं रह जातीं । जब साधक अनुभव के द्वारा यह जान लेता है कि वह आत्मा है और देह- मन का समन्वय नहीं, तो वासनाएं शान्त हो जातीं है , क्योंकि गलत दिशा में जानेवाली कामना ही वासना है। दूसरे शब्दों में, हम कामना को जैसी दिशा प्रदान करते हैं, उसके अनुरूप वह हमारी मित्र या शत्रु बन जाती है। जब कामना नित्य को अपना लक्ष्य बनाती है, तो यह मुक्ति और आनन्द का साधन बन जाती है  पर जब वह अनित्य की ओर जाती है, तो उससे बन्धन और दु:ख ही हाथ लगता  है।  

वेदान्त मंनुष्य की इस सुखैषणा का मूल उसके तात्विक स्वरूप में पाता है; आनन्द में ही वस्तुतः उसकी स्थिति है जिससे उसे कभी अभिन्न नहीं किया जा सकता। उपनिषद शिक्षा देता है- वह जो प्रसिद्ध सुकृत ( स्वयं रचा हुआ है, सो निश्चय रस ही है इस रस को पाकर मनुष्य  आनन्दी हो जाता है। यदि हृदयाकाश में स्थित यह आनन्द ( आनन्दस्वरूप आत्मा ) न होता, तो कौन व्यक्ति अपान- क्रिया करता और कौन प्राणन- क्रिया करता? यही तो  लोगों को  आनन्दित करता है ; आनन्द से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं , उत्पन्न होने पर आनन्द के द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्द में ही समा जाते हैं।      

मनुष्य की सत्ता का मूल ही आनन्दात्मक होने के कारण उसमें सहजरूप से आनन्द के साथ तद्रूप होने की सहज- प्रेरणा का रहना स्वाभाविक है, किन्तु जब वह अज्ञान में होता है और देह मन के साथ अपने को एक मानता है, तब वह आनन्द को उसके वास्तविक स्थान “आत्मा” में न खोजकर अज्ञानवश एक गलत जगह “शरीर और मन” में खोजता है। ज्ञान आनन्द को यह जो गलत स्थान पर खोजना है, वह हमारी सुख की लालसा एवं उससे पैदा होने वाले बन्धन को जन्म देता है।

जैसा हम ऊपर कह चुके हैं  , आनन्द सुख नहीं है , वह सुख और दु: ख दोनों से परे है, उसे शरीर और मन के स्तर पर कभी भी अलग नहीं किया जा सकता। मनुष्य का मूल स्वभाव ही उसे आनन्द की खोज में प्रेरित करता है जब वह उसे भौतिक और मानसिक स्तरों पर खोजते , सीमित वस्तुओं में उसकी खोज करते करते थक जाता है , तब अन्त में अपनी आत्मा में उसका पता पाता है , यह आत्मा परमात्मा से अभिन्न होने के कारण असीम ही है। तब वह उपनिषद की इस शिक्षा की सत्यता का अनुभव करता है, ” सुख तो अनंत (असीम)  में है, अल्प  ( सीमित ) में सुख नहीं है”  इस सत्य के ज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य एक न एक दिन यह समझ ले कि आनन्द  सुख और दुख दोनों से भिन्न है एवं उसकी प्राप्ति के लिए उसे अपने मन को वश में करना होगा तथा अपनी सुखैषणा को एक उच्चतर दिशा देनी होगी।

जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

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आज का स्कोरबोर्ड :

आज के स्कोरबोर्ड  में  जिन 15  समर्पित सहकर्मियों ने अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर निस्वार्थ भाव से 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण किया है उनके नाम प्रकाशित कर हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है।  (1) सरविन्द कुमार पाल – 49 ;(2) रेनू श्रीवास्तव बहन जी – 35; (3) अरूण कुमार वर्मा जी – 35; (4) पिंकी पाल बेटी – 32; (5) पुष्पा सिंह बहन जी – 31;(6) डा. अरुन त्रिखा जी – 30; (7) प्रेरणा कुमारी बेटी – 30; (8) कुसुम बहन जी – 29; (9) संध्या बहन जी – 27; (10) अरुण कुमार वर्मा जी – 26; (11) रजत कुमार जी – 25; (12) किसान उच्चतर माध्यमिक – 25; (13) निशा भारद्वाज बहन जी – 25; (14) लता गुप्ता बहन जी – 24; (15) पुष्पा पाठक बहन जी – 24 , हम सबके परम प्रिय अनुज अरूण कुमार जी ने दो बार 24 आहुतियों के संकल्प को पूरा कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार में अपना कीर्तिमान स्थापित किया है।  सभी लोग बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं! धन्यवाद!

स्कोरबोर्ड का इतिहास :

प्रतिदिन हम स्कोरबोर्ड पर अपने  कुछ सहकर्मियों के नाम और उनके आगे एक नंबर अंकित करके आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।  आखिर क्या है इस स्कोरबोर्ड का रहस्य ? हमारे कुछ सहकर्मियों ने इस रहस्य को जानने की जिज्ञासा व्यक्त की है।  तो आइये देखें यह क्या है। 

जो सहकर्मी हमारे साथ लम्बे समय से जुड़े हुए हैं वह जानते हैं कि हमने कुछ समय पूर्व काउंटर कमेंट का  सुझाव दिया था जिसका पहला उद्देश्य  था कि जो कोई भी कमेंट करता है हम उसका आदर सम्मान रखने के लिए रिप्लाई करेंगें। अर्थात जो हमारे लिए अपना   मूल्यवान समय निकाल रहा है हमारा कर्तव्य बनता है कि उसकी भावना की कदर की जाये।  कमेंट चाहे छोटा हो य विस्तृत ,हमारे लिए अत्यंत ही सम्मानजनक है। दूसरा उद्देश्य था एक परिवार की भावना को जागृत करना।  जब एक दूसरे के कमेंट देखे जायेंगें ,पढ़े जायेंगें ,काउंटर कमेंट किये जायेंगें ,ज्ञान की वृद्धि होगी ,नए सम्पर्क बनेगें , नई प्रतिभाएं उभर कर आगे आएँगी , सुप्त प्रतिभाओं को जागृत करने  के अवसर प्राप्त होंगें,परिवार की वृद्धि होगी और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का दायरा और विस्तृत होगा उससे और  अधिक युग शिल्पियों की सेना का विस्तार होगा। हमारे सहकर्मी जो हमसे कुछ समय  से जुड़े हैं जानते हैं कि किन -किन सुप्त प्रतिभाओं का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, किन-किन महान व्यक्तियों से हमारा संपर्क  संभव हो पाया है।  अगर हमारे सहकर्मी चाहते हैं तो कभी किसी लेख में मस्तीचक हॉस्पिटल से- जयपुर सेंट्रल जेल-मसूरी इंटरनेशनल स्कूल तक के विवरण  compile कर सकते हैं। 

इन्ही काउंटर कमैंट्स के चलते आज सिलसिला इतना विस्तृत हो चुका  है ऑनलाइन ज्ञानरथ को एक महायज्ञशाला की परिभाषा दी गयी है। इस महायज्ञशाला में  विचाररूपी हवन सामग्री से कमैंट्स की आहुतियां दी जा रही हैं।  केवल कुछ दिन पूर्व ही कम से कम 24 आहुतियों  (कमैंट्स ) का संकल्प प्रस्तुत किया गया।  इसका विस्तार इस स्कोरबोर्ड के रूप में आपके समक्ष है।  आप सब बधाई के पात्र है और इस सहकारिता ,अपनत्व के लिए हमारा धन्यवाद्।  प्रतिदिन स्कोरबोर्ड को compile करने के लिए आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का धन्यवाद् तो है ही ,उसके साथ जो उपमा आप पढ़ते हैं, बहुत ही सराहनीय है। सहकर्मीओं से निवेदन है कि स्कोरबोर्ड की  अगली पायदान पर ज्ञानप्रसाद के संदर्भ में कमेंट करने का प्रयास करें -बहुत ही धन्यवाद् होगा

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अध्याय 4-सुखभोग  की  स्पृहा को कैसे जीता जाय ? भाग 1

17 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद –   सुखभोग  की  स्पृहा को कैसे जीता जाय

आज का ज्ञानप्रसाद स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के  स्वाध्याय के उपरांत आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा  जी की  प्रस्तुति है। यह प्रस्तुति अध्याय 4 का प्रथम भाग है, द्वितीय भाग कल का ज्ञानप्रसाद होगा। यूट्यूब में  शब्द सीमा होने  के कारण हम अध्याय चार को दो भागों में बाँटने के लिए विवश हैं । आज का लेख भी पूर्णतया  मूलरूप में बिना किसी बदलाव के प्रस्तुत किया जा रहा है। हाँ, दो शब्द जो हमें कठिन लगे उनका अनुवाद लेख के बाहिर ही अपनी और अपने पाठकों की सुविधा के लिए लिख रहे हैं। स्पृहा का अर्थ है कामना और  का उदात्तीकरण को अंग्रेजी में समझना अधिक सरल है ।इसका  अंग्रेज़ी अनुवाद sublimation यानि भाप बनकर उड़ना है।  हर बार की तरह आज भी  हम किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हैं और प्रत्येक परिवारजन को अपने विचार रखने की पूर्ण स्वतंत्रता है। 

हमने कहा है, “जबतक सुखभोग  की  स्पृहा  दूर  नहीं  होती  , तबतक  हम  चाहे  जो  करें  , मन  को  कभी पूरी  तरह  वश  में  नहीं  कर पाएंगे.'” यह कथन बहुत  से  साधकों को  चोट  पहुंचा  सकता है, पर  बात  तो सत्य ही  है। हमें  इस बात  को  अधिक गहराई से समझ  लेना चाहिए। यह फट  से कह  देना तो  सरल  है कि जबतक  सुखभोग की  स्पृहा का त्याग  नहीं किया  जाता  , तबतक  मनोनिग्रह के लिए  दृढ़  इच्छाशक्ति  नहीं  पैदा हो सकती, लेकिन सुख – स्पृहा हममें  स्वाभाविक होने  के  कारण  हमारे रक्त और मांस  में इस  गहराई  तक गढ़ी  हुई है कि  उसे  अत्यंत कठिनाई  से ही  निकाला  जा  सकता है। तथापि  हम  ऐसा  सोचकर  अपने  भीतर  की  अवस्था जटिल  न  बना  लें कि  चूंकि हममें सुखभोग की स्पृहा  है  इसलिए हम  बुरे  हैं।  सुखभोग  की  स्पृहा  अपने आप  में  कोई पाप  नहीं  है।  पर , हाँ  यदि हम  अनैतिक  इन्द्रिय – भोगों  में  लग जाते हैं  तो उससे हमारा  बन्धन और दृढ़ हो  जाता है  तथा  हमारा उच्चतर आत्मिक विकास रुक  जाता है।  इसे हम  अवश्य  पाप  कह  सकते हैं।  जो  उच्चतर  आदर्शों से  प्रेरित  होकर समस्त  सांसारिक  एषणाओं का त्याग  कर  देते हैं  ऐसे  इने- गिने व्यक्तियों को छोड़कर,  जिनके  लिए  हम  यहाँ  पर चर्चा  नहीं कर  रहे हैं ,  शेष  सबके  लिए तो  सुखभोग की  लालसा  की  सन्तुष्टि  के  बिना  यह  जीवन  ही  सम्भव  न होगा  , ”  यदि  सुखभोग  के लिए न  जियें तो किसके  लिए जियें ? ‘  यह  लालसा मनुष्य  में एक जीवन शक्ति है  और वह  मनुष्य को  जीवित रखती है।  तथापि  यह  भी  सत्य है कि  सुख  की यह  लालसा  मन:संयम की इच्छाशक्ति को  खा  जाती है।   तब इस आन्तरिक  समस्या  का  समाधान  क्या है ?  यह सत्य है कि बहुलांश  जनता  के लिए  भोग-सुख  का अस्वीकार  कोई  समाधान  नहीं हो सकता।  

फिर तपस्वी रहना  भी कोई उत्तर  नहीं  हो  सकता। समाधान तो  अपनी  सुख की  प्रेरणा को धीरे-धीरे संस्कारित  करने  में  तथा  अपने  यथार्थ  स्वरूप  को पहचानने  में  है। समाधान इसमें है कि हम जान  लें इस सुख की प्रेरणा को आत्म  उत्थान में  कैसे  लगाया  जाय।  यहाँ पर  कुछ  स्पष्टीकरण  की  आवश्यकता होगी।     

यहाँ  पर  स्पष्ट  कर  देना  उचित  होगा कि  हम  ऐसी  सामान्य  समस्या  पर विचार  कर  रहे हैं  जो  नौसिखियों के  सामने आती  है  , जो  दुनियादार  हैं  पर  अध्यात्म  के  पथ  पर चलने की इच्छा  रखते हैं।  जो  आगे  बढे  हुए  साधक हैं, उनके लिए  यहाँ पर  विवेच्य  कुछ  बातें  लागू  नहीं होंगी।  वे जान  पाएंगे  कि  वो  बातें  कौन सी हैं।  उदाहरणार्थ, मर्यादित  इन्दिरा – भूखों का उपभोग  उस  साधारण  व्यक्ति  के  लिए तो  ठीक है जिसे आध्यात्मिक जीवन  में  शुरुआत  करनी  है,  लेकिन  उसके  लिए  ठीक  नहीं है जो  कुछ  कदम  आगे बढ़ चुका है। जिसके स्वभाव में सुख-भोग  की  लालसा  विशेष रूप से  बनी  हुई है, उससे  कहना  कि ‘सुखभोग की  स्पृहा त्यागो ‘ , कोई  व्यवहारिक  बात  नहीं  होगी।  भारत  के  ऋषि- मुनि सत्य के  द्रष्टा  तो  थे ही,  साथ  ही  वे  मानव – मनोविज्ञान के भी सुरक्षित ज्ञाता  थे तथा  करुणावान्  उपदेशक  थे। इस  विषय  पर उन्होंने  जो  शिक्षा  दी, उसे  कुछ  शब्दों में  यों  रखा  जा  सकता है —यदि  सुख  की  चाह है  तो  उसका  भोग  करो , पर  ख्याल  रखो  कि तुम्हारा शारीरिक या  मानसिक स्वास्थ्य नष्ट न  हो  पाये ,  तुम्हारा  आत्मिक  विकास रुक  न पाये। यदि  शारीरिक सुख  तुम्हें  चाहिए  ही  , तो इस प्रकार  उनका  भोग करो  जिससे  मानसिक  सुख  के  उपभोग  की  क्षमता तुममें  बनी  रहे।  मानसिक सुखों का भोग  इस  प्रकार करो  कि  आत्मा  के सुख  को  प्राप्त  करने  की तुम्हारी  शक्ति  सुरक्षित  रहे। सुख के  पीछे  इस प्रकार  न दौड़ो कि वह तुम्हें ही नष्ट कर दे। विचारवान  व्यक्तियों  को यह  बात  सारवान  मालूम पडेगी।  मन:संयम में  सहायक  जितने  नैतिक नियम हैं , वे  इसलिए  बनाये  गये  हैं  कि मनुष्य स्वयं अपनी  हानि करने  से  अपने  को बचा सके। इस  प्रकार  वे  उसी  का  सर्वोच्च हित- साधन  करते हैं। 

सर्वप्रथम उच्छृंखल  ऐन्द्रिय सुख  की  लालसा  को  आत्मविकास के चौखटे में  बिठाकर  पालतू  बनाना  पड़ता है, तब  कहीं  उसके  उन्नयन की पारी  आती है। यहाँ पर ‘उन्नयन’  से हमारा क्या  तात्पर्य है?  श्रीरामकृष्ण  उपदेश  देते हैं : आनन्द  तीन  प्रकार के  होते  हैं;  विषयानन्द  , भजनानन्द  और ब्रहमानन्द।  जिसमें  लोग  सदा  ही  लिप्त  रहते  हैं ,जो कामिनी  और  कानून का आनन्द है, उसे  विषयानन्द  कहते हैं।  ईश्वर  के  नाम  और  गुणों  का  गान  करने  से  जो आनन्द मिलता है, उसका नाम  है भजनानन्द और  ईश्वर के  दर्शन में जो आनन्द है, उसका  नाम  है  ब्रह्मानन्द। ब्रह्मानन्द को  प्राप्त  करके  ऋषि स्वेच्छा – विहारी हो जाते थे।   

उन्नयन का अर्थ है  उपर्युक्त  आनन्द के स्तरों में  नीचे  के  स्तर  से  ऊपर के स्तर में जाना। हमें  ध्यान  रखना चाहिए कि ब्रह्मानन्द की  प्राप्ति  मात्र सैद्धांतिक नहीं है  बल्कि  वास्तविक है। इस  सत्य  पर दृढ़  विशवास  , सुख  लालसा के उन्नयन  के लिए आवश्यक है। यदि आवश्यक ही है तो विषयानन्द  खोजो , पर  इस प्रकार कि  जिससे  वह  भजनानन्द की  प्राप्ति  में बाधक  न  हो जाय।  विवेक के  अभ्यास  के द्वारा  यह  कार्य  सध  सकता है। विषयानन्द  का  भोग करते  समय  विवेक  से काम  लो।  भगवान कृष्ण  ‘ गीता ‘  में हमें  सिखाते  हैं  तथा अनुभव  भी  यह  बताता है कि  समस्त  स्पर्शजन्य सुख दुख को  जन्म  देता  है।  विषयानन्द का  उपभोग  करते  समय  इसका स्मरण  रखना  भी विवेक के अभ्यास  को  दृढ़ करेगा।  तब मनुष्य के लिए नैतिक  नियमों  की  सीमा  के  भीतर  रहकर  विषयानन्द का भोग करना सहज  होगा। यह  सीमा  इसलिए  निर्धारित की  गयी है कि  मनुष्य  सर्वोच्च आनन्द  के भोग के लिए  अपने  को  बचाकर रख  सके।  इसके  साथ- साथ वह  ऐसी उपयुक्त  साधना  -प्रणाली में  अपने  को लगाये  रक्खे  जो भजनानन्द  के अनुकूल हो। ज्यों – ज्यों  उसका  मन  अधिकाधिक  पवित्र  होता  जायगा ,  त्यों – त्यों विषयानन्द में  उसकी  रुचि  कम  होती  जाएगी  और भजनानन्द  में  उसकी  प्रवृत्ति  उसी  अनुपात में बढ़  जाएगी।   

अन्त  में  उसके  जीवन  में एक दिन  ऐसा  आएगा  जब  भजनानन्द भी  उसे  फीका  मालूम  पड़ने  लगेगा  और वह उसे त्यागकर  परमात्मा  का  खोजी  बन  जाएगा।  ईश्वर  की खोज  से मिलनेवाले  लाभ  की  खोज  करना  एक बात  है,  और  ईश्वर की  स्वयं उन्हीं  को  पाने  की  इच्छा से खोज  करना बिल्कुल  भिन्न  बात है ,  फिर  लाभ  हो  या  न  हो। जब  साधक का भीतरी  विकास इतना हो  जाय कि वह परमात्मा को  केवल  उन्हीं को  पाने के  उद्देश्य से  खोजे  ,  जब  ईश्वर  की खोज  के  पीछे  उसका  तनिक  भी  दूसरा  उद्देश्य  न  हो, तब उसकी  सुख – भोग  की  लालसा  का  उदात्तीकरण  हो  जाता है  और  इससे  उसके पूर्ण  मनोनिग्रह में  सहायता  मिलती है।

क्रमशः जारी भाग 2 

जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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अध्याय 3 -मन: संयम के रास्ते में जोखिम क्या है ?  

16 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – मन: संयम के रास्ते में जोखिम क्या है ?  

आज का ज्ञानप्रसाद केवल 720 शब्दों का  बिल्कुल  ही संक्षिप्त है।  लगभग 1900 शब्दों से केवल 720 शब्दों के ज्ञानप्रसाद का एक विशेष कारण है। आदरणीय  अनिल कुमार मिश्रा जी के निर्देशानुसार “मन और उसका निग्रह” के 30 चैप्टर का हूबहू उसी रूप में स्वाध्याय होना चाहिए।  कॉमा ,बिंदु ,विराम भी उसी तरह से लिखें तो बेहतर रहेगा। प्रतिदिन एक चैप्टर ही शेयर किया जाये तो ठीक रहेगा , ऐसा स्वाध्याय सभी पाठकों को  पुष्ट करेगा और सत्यनिष्ठ बनाएगा। कुछ चैप्टर लगभग 200 शब्दों के हैं और कुछ बड़े।  हो सकता है बड़े चैप्टर्स को  एक से अधिक दिन भी लग जाएँ।  उनके अनुसार अगर 35 -36 दिन भी लग जाएँ तो कोई बात नहीं।  जब बात आती है हूबहू  उसी तरह की , तो हम यह कहना चाहेंगें कि यह सारे  का सारा कंटेंट अनिल जी का ही लिखा हुआ है, हमारा योगदान केवल वाक्यों में extra spaces को एडिट करना ही है जो कि न के बराबर है।  जब सारे का सारा योगदान अनिल जी का है तो श्रेय भी उन्ही को देना  उचित होगा। हालाँकि अनिल जी ने कहा था कि मेरा नाम मत शेयर करना लेकिन यह कहना कि  “स्वामी आत्मानंद जी द्वारा  लिखित पुस्तक के  स्वाध्याय के उपरांत अनिल जी द्वारा प्रस्तुत”  अनुचित नहीं होगा। हर बार की तरह हम किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी हैं और प्रत्येक परिवारजन को अपने विचार रखने की पूर्ण स्वतंत्रता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का उदेश्य केवल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देना , सुप्त प्रतिभाओं को जगाना , परमपूज्य गुरुदेव के विचारों को जन जन तक पहुँचाना – यह सब बिना किसी लालच के य लालसा के।

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हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि मन संयम के रास्ते में जोखिम क्या है ? मन के असंयम के फलस्वरूप व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक बुरा परिणाम जो हो सकता है वह है मानसिक विकृति। समष्टिगत रूप से देखें तो मन का असंयम एक समूची सभ्यता के पतन का कारण हो सकता है, फिर भले ही वह कितनी ही प्रगतिशील क्यों न दिखती हो। इसके अतिरिक्त कई ऐसी कुछ दुर्भाग्यपूर्ण बातें हो सकती हैं जो प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्ष रूप से मन के असंयम से उपजती हों। मन का असंयम व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में विशेष रूप से बाधक होता है। 

जिस व्यक्ति का मन नियंत्रित नहीं है, वह सदैव अस्वाभाविक मानसिक विकारों का शिकार हो सकता है और भीतरी द्वन्द्व के कारण उसका मस्तिष्क  असन्तुलित हो सकता है। अत्यंत अनुकूल परिस्थितियों में भी वह अपनी सम्भावनाओं को नहीं पहचान पाएगा और न ही अपेक्षाओं की ही पूर्ति कर सकेगा। जिसे अपने मन पर नियंत्रण नहीं, उसे मन की शान्ति नहीं मिल सकती। जिसे मन की शान्ति नहीं , उसे सुख कैसे मिल सकता है ??  वह तो वासनाओं, भावनाओं और तनावों का शिकार होकर, सम्भव है, दु:साध्य मानसिक रोगों से आक्रान्त हो जाय अथवा एक  अपराधी बन जाये। यदि वह  एक परिवार का मुखिया है , तो परिवार में अनुशासनहीनता, अव्यवस्था, दुराचार और दु:खद मानवी सम्बन्धों का व्याप जाना सम्भव है , जिसके फलस्वरूप परिवार दुर्भाग्य का शिकार बन सकता है।  

 बंगला में एक कहावत है : ” गुरू , कृष्ण , वैष्णव तीन की दया हुई , एक  की दया के बिना जीव की दुर्गति हुई . ” यह एक है अपना मन ,  मन की दया होने का मतलब है उसका पकड़ में आ जाना। लाभ  की  दृष्टि से  , मनोनिग्रह के द्वारा जो उच्चतम फलप्राप्ति हो सकती है वह है आध्यात्मिक ज्ञान।  

इसके अलावे मन: संयम से प्राप्त होनेवाले छोटे- छोटे लाभ तो बहुत से  हैं। नियंत्रित मन को सहज ही एकाग्र किया जा सकता है।  मन की एकाग्रता से ज्ञान उपलब्ध होता है और ज्ञान ही शक्ति है🌷 मनोनिग्रह का एक स्वत:स्फूर्त फल है— व्यक्तित्व की पूर्णता. ऐसा पूर्ण व्यक्ति  प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सफल होता है मन का नियमन उसे निश्चंचल बनाता है और चंचलता का अभाव मन में शान्ति को जन्म देता है। मन की शान्ति सुख को उत्पन्न करती है। एक सुखी  व्यक्ति दूसरों को भी सुखी बनाता है। उसके कार्य की गुणवत्ता क्रमश: बढती ही जाती है और वह स्वाभाविक रूप से बहुधा अक्षय उन्नति का भागी होता है।  ऐसी बात नहीं कि ऐसे व्यक्ति को जीवन में परीक्षा की घड़ियों में से नहीं जाना पड़ता। बात यह है कि ऐसी घड़ियों का सामना करने की शक्ति और साहस  का  उसमें कभी अभाव नहीं होता।  वह जिस परिवार का मुखिया होता है, वहाँ व्यवस्था , अनुशासन , सुना, संस्कार और मानवी सम्बन्धों का सौरभ भरा रहता है।  समाज ऐसे व्यक्ति को अच्छे जीवन की मिसाल के रूप में देखता है। जिसका मन नियंत्रित है, वह मानसिक रोगों से मुक्त रहेगा, तथा मानसिक तनाव से उत्पन्न शारीरिक पीड़ाएं भी उससे दूर रहेंगी। जिस पुरूष ने अपने मन को वश में कर लिया है , उसमें उसका उच्चतर स्वभाव कार्यशील होता है तथा उसकी निहित शक्तियां अभिव्यक्त हो जाती हैं।मित्रगण अचरज करने लगते हैं कि कैसे उनके देखते ही देखते यह इतना महान बन गया संस्कृत में एक सुभाषित है जो कहता है, ” संसार को कौन जीतेता है?? वही , जो अपने मन को जीतता है ” मनोनिग्रह के बिना किसी भी क्षेत्र में मनुष्य को न तो स्थायी उन्नति प्राप्त होती है और न समृद्धि या शान्ति ही. मन: संयम के अभाव में मनुष्य प्राप्त समृद्धि से भी हाथ धोना बैठता है। मनोनिग्रह के रास्ते  ये  ही संकट है। मनोजय की इच्छा को दृढ़ता बनाने के लिए हमें अपने मन को यह समझाना चाहिए कि बिना उसके हम कहीं के न रहेंगे। हमें अपने मन में यह बात अंकित कर लेनी चाहिए हमारे समग्र भावी जीवन का ढांचा इस पर निर्भर करता है कि हम अपने मन को अपने वश में करते हैं या नहीं जीवन में शरीर की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बाद, अन्य बातें भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं  लेकिन जीवन के आध्यात्मिक पूर्णतारूप  उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मनोनिग्रह से बढ़कर महत्व की कोई बात नहीं है। एकबार यदि हम इस बात को सचमुच समझ लें , तो मन को वश में करने की अपनी इच्छाशक्ति को हम इच्छानुसार दृढ़ बना सकेंगे।

जय गुरुदेव  

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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अध्याय 1,2-मनोनिग्रह कठिन किन्तु  सम्भव एवं इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनायें 

15  नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद -मनोनिग्रह कठिन किन्तु  सम्भव एवं इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनायें 

मित्रो आज से हम सभी “मन को वश में करने” के विषय पर एक श्रृंखला का श्रीगणेश कर रहे हैं। यह एक ऐसा दिलचस्प विषय है जिससे  हर कोई प्रभावित होता ही है। हर लेख की तरह हमने इसे भी सरल करने का प्रयास किया है हिंदी की पुस्तक तो उपलब्ध न हो सकी लेकिन अंग्रेज़ी एडिशन The Mind and its Control को साथ में रख कर ,अनिल जी द्वारा दिए गए कंटेंट और गूगल का सहारा लेकर यथासंभव  प्रयास किया है, अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा प्रार्थी हैं। इस विषय को और भी सरल बनाने के लिए हमने एक पांच मिंट का वीडियो लिंक भी दिया है।  https://drive.google.com/file/d/1UT-j9_ZyBF8duTMaC6kbyviO5cLA4LfH/view?usp=sharing

मन का विषय एक  फिलोसोफिकल विषय है ,इसे समझने के लिए बहुत ही एकाग्रता की आवश्यकता है। हो सकता है हमारे पाठकों को कोई- कोई वाक्य बार- बार पढ़ना  पढ़े लेकिन उन्हें बहुत ही उच्स्तरीय मार्गदर्शन मिलने की सम्भावना है ,हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारे सूझवान सहकर्मी कमैंट्स में इस मार्गदर्शन की  अवश्य ही चर्चा करेंगें। 

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मन और उसका निग्रह एक ऐसा विषय है, जिसमें हम सब  बड़ी गहरी दिलचस्पी रखते हैं, क्योंकि  हमारा मन ही हम पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। मनोनिग्रह का अर्थ होता है -.मन को विषय वासनाओं में रमने से रोकना, मन को वश में करना ,मनोवृत्तियों पर अंकुश लगाना,.विषय वासनाओं में प्रवृत्त होने से मन को रोकना एवं .मन को वश में रखना।

हम सभी अपने मन को वश में लाने का प्रयत्न करते हैं लेकिन  फिर भी  हमें इस सम्बन्ध में और अधिक जान लेना चाहिए एवं  और अधिक अच्छे से प्रयत्न करना चाहिए।  क्या  इस विषय में हमारी कोई  सहायता कर सकता है?  हाँ , वही लोग  जिन्होंने अपने मन को  पूरी तरह वश में कर लिया है, वे ही  हमारी सहायता कर  सकते हैं।  ऐसे लोगों से  प्राप्त हुए ज्ञान को हम  एक साधना प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करेंगे। 

मनोनिग्रह एक बहुत मजेदार भीतरी खेल है।  यदि हमारी  मनोवृत्ति एक  खिलाड़ी की है तो  हारने  की सम्भावना के  बावजूद  हम   इस खेल का भरपूर मजा ले सकते हैं ।  यह एक ऐसा खेल है जो  हमसे पर्याप्त  मात्रा में  कौशल, सतर्कता , विनोद -प्रियता सहृदयता, रणचातुर्य, धीरज  और  शौर्य  की आशा   रखता है जो  सैकड़ों  असफलताओं के बावजूद हमें टूटने से बचाता है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में  भगवान कृष्ण   अर्जुन को समझा रहे   थे  कि  योग  की  चरम  स्थिति  कैसे प्राप्त  हो सकती है। उनकी  बात  सुनकर अर्जुन ने   हताशा  के  स्वर  में उनसे   कहा,

 “हे  मधुसूदन! आपने  मन  की  समता रूप  जिस  योग  की  बात  कही  है,  मैं  नहीं जानता    कि   मन  की चंचलता  को   देखते   हुए   वह  स्थिति   कैसे  टिक  सकती है क्योंकि  मन  तो   बडा  ही , उद्दण्ड  , बली  और  हठी  है और हमेशा  अपनी ही करता है।  मैं  तो उसको  वश में करना  वायु को  वश  में   करने  के   समान  दुष्कर मानता हूँ।” मानव-चरित्र  का  प्रतिनिधित्व करने वाले  अर्जुन  की   इस  शिकायत  को भगवान   सुनते  हैं और जो उत्तर देते  हैं वह   सभी   युगों  के मानवों  के लिए  महत्वपूर्ण है। मनोनिग्रह पर समस्त भारतीय चिन्तन  और  साधना- प्रणाली भगवान कृष्ण  के इसी उपदेश पर आधारित है। वे  कहते हैं :

” हे  महाबाहो! निस्सन्देह  मन बड़ा  चंचल  और  कठिनता  से  वश  में  आनेवाला है परन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा उसका निग्रह सम्भव है। “

उपर्युक्त  वार्तालाप  से  हमें  मनोनिग्रह  के  सम्बन्ध में  तीन आधारभूत  तथ्य   प्राप्त    होते  हैं:

1.मनोनिग्रह  अर्जुन   के  समान   वीर्यवान ( शक्तिशाली )   मानवों   के  लिए  भी  सदैव  से  अत्यंत   कठिन   रहा  है। 

2.तिस पर  भी  मन  को  वश  में  करना  सम्भव  है।                           

3.मनोनिग्रह  के   सुनिर्धारित  तरीके  हैंं।                                    

अभ्यास  और वैराग्य-   इन  दो  शब्दों में भगवान कृष्ण ने मनोनिग्रह  का सारा  रहस्य  ही  व्यक्त  कर  दिया है। भारत   के  सभी  सन्त- महात्माजन  युग -युग से एक  स्वर  से  यही कहते  रहे हैं कि   “अभ्यास  और  वैराग्य “   के इलावा मन  को  वश  में करने का  और  कोई  उपाय है ही नहीं।   इसे   “अभ्यासयोग ” भी कहा जाता है। हम यहाँ पर श्रीरामकृष्ण परमहंस और उनके एक  भक्त  के  बीच  हुए वार्तालाप  को बताते  हैं:   

श्रीरामकृष्ण परमहंस : कुछ प्राप्ति  नहीं   हो रही है, यह देखकर  चुप्पी  न  साध  जाना , आगे बढ़  जाओ,  चन्दन की  लकड़ी  के बाद और  भी  चीजें हैं -चांदी  की  खान, सोने की खान आदि । 

भक्त : पैरों  में जो  बेड़ियां   पड़ी   हुई हैं, उनके  कारण आगे नहीं बढ़ा  जाता। 

श्रीरामकृष्ण परमहंस: पैरों के बन्धन  से  क्या  होता है?  बात असल   मन  की  है। मन  के द्वारा  ही आदमी  बंधा  हुआ है और  उसी  के द्वारा  छूटता  भी  है।  

भक्त: यह मन मेरे बस  में भी तो नहीं है। 

श्रीरामकृष्णपरमहंस : यह क्या ? “अभ्यासयोग” ही है जो यह कर सकता है। अभ्यास  करोगे  तो  फिर  देखोगे , मन  को  जिस  ओर  ले जाओगे, उसी  ओर  चलता जायगा।  मन  धोबी  के कपडे की तरह  है।  धोबी चाहे तो   उसे  लाल रंग  में रंग ले ,चाहे तो  आसमानी रंग में ।  जिस रंग से धोबी रंगेगा वही रंग उस पर चढ़ जायगा।                               

निस्सन्देह ही  अभ्यास और वैराग्य  ही  मनोनिग्रह  का  रहस्य  है, पर  प्रश्न  यह  है कि  इन दोनों  गुणो  को  जीवन में   लाया कैसे  जाए।   इसके  लिए 

1.मन पर संयम पाने  की  इच्छाशक्ति  को दृढ़ बनाना पड़ता है  

2.मन  के    स्वभाव   को  जानना   पड़ता है 

3.कुछ साथना- प्रणालियां  सीखकर  लगन  और विचार पूर्वक  उनका नियमित अभ्यास  करना  पड़ता है      

“अब प्रश्न उठता है कि मन पर   संयम पाने की इच्छाशक्ति को दृढ़  कैसे  बनाया जा सकता है ?”  

ऐसा तो कहा ही नहीं जा सकता कि हमारे अंदर मन को वश में लाने के लिए कोई इच्छाशक्ति  नहीं है।  हममें से प्रत्येक के अपने भीतरी संघर्ष हैं और इसी से इच्छाशक्ति का होना सूचित हो जाता है। परन्तु यह बात अवश्य है कि हममें से बहुतों में मनोनिग्रह की यह इच्छाशक्ति विशेष प्रबल नहीं होती।  जब तक  हम  ऐन्द्रिक ( इन्द्रियों ) सुख  की प्राप्ति   को  जीवन  के  प्रमुख  प्रयोजनों में गिनते रहते  हैं  और जब तक हम  विचार पूर्वक  उसका  सर्वथा  त्याग नहीं कर देते , तब तक  मन को वश में करने का संकल्प सबल हो ही  नहीं  सकता।  ऐन्द्रिक सुख की लालसा वास्तव में नासूर के समान है जो मनोनिग्रह के संकल्प को चूसकर शिथिल कर देती है। उदाहरण के लिए  यदि  तुम्हारा नौकर जानता  है कि तुम   अवैध मादक द्रव्यों के लिए उसी    पर निर्भर हो और यदि तुम दोनों एक साथ मिलकर उनका  सेवन  करते हो, तो तुम  उस नौकर को अपने  वश  में नहीं रख सकते।  मन  के  साथ  भी  ऐसा  ही  होता है। मन हमारा नौकर है।   जिस मन  को  हम  इन्द्रिय सुखों   की  खोज में  तथा  उनके  भोग   में  लगाते  रहते हैं   हैंं, उसे  तब तक  वश  में  नहीं  लाया जा सकता जब तक हम सुख  की  लालसा  को छोड़ नहीं  देते। सुख-भोग    की लालसा  को  त्याग देने के बाद भी  मन  को  नियंत्रण में लाना सहज  नहीं  होगा  क्योंकि  वह  पुरानी यादों  को  उठाकर  हमें  सदैव  परेशान  करता  रहेगा। 

सुख-भोग  की  लालसा   का  त्याग   जिस  मात्रा  में तीव्र  होगा उसी  मात्रा  में हमारा  मन को वश करने  का संकल्प  भी  सुदृढ़  होगा।

जब तक   सुख पाने  की  लालसा  बनी हुई है तब तक  हम चाहे  जो  करें  , हम मन को  किसी भी  प्रकार   पूर्ण     नियंत्रण में नहीं  ला  सकते।  इसका  तात्पर्य   यह  हुआ कि हममें से   जो कोई भी  सुख-प्राप्ति  की  लालसा   को  छोडने  के  अनिच्छुक हैं  , वे  ऊपर  से  चाहे  जैसी  भी  घोषणाएं करें, उनमें   मनोनिग्रह की चाह  है ही नहीं। 

“सुख- भोग    की लालसा  के त्याग  का  अर्थ  आनन्द- प्राप्ति  की लालसा   का  त्याग  नहीं है।”

 सुख  का  अर्थ   है   इन्द्रिय- सुखों का उपभोग  य  “Unripe ego -कच्ची मैं” I यह उपभोग और “मैं”  दोनों  आनन्द ( ultimate bliss )  की  प्राप्ति में  बाधक हैं। यह आनन्द  ही  जीवन का  परम लक्ष्य है और उसे पाने  के लिए  हमें सुख-दुख  दोनों से  ऊपर  उठकर जाना  पड़ता है। इसलिए   आनन्द- प्राप्ति की इस  इच्छा को  छोड़ने का  प्रश्न ही  नहीं  उठता क्योंकि हम “सत्- चित्- आनन्द- स्वरूप” हैं  और  यह  आनन्द हमारी पूर्णता का अविच्छिन्न अंग है।   सुख भोगने की लालसा  का त्याग करने के लिए  किन किन उपायों  का पालन  करना चाहिए, इसकी चर्चा  आगे  चलकर  करेंगे।                                        .                                             

कभी-भी दो विरोधी बातें एक जैसी  दिखायी देती हैं। दो प्रकार के लोग होते हैं जिनमें मानसिक संघर्ष नहीं  होता।   एक तो वे है जो  पूरी तरह अपनी निम्न प्रकृति ( low  Nature )  के ऐसे  दास बन गये हैं जो कभी प्रश्न ही नहीं कर पाते  और दूसरे वे हैं, जिन्होंने अपनी निम्न प्रकृति को पूरी तरह  जीत लिया है। एक दास हैं  और दूसरे  विजेता।   शेष सभी  के भीतर किसी न किसी  परिपेक्ष्य में  संघर्ष होता ही रहता है। ये संघर्ष मन: संयम के अपर्याप्त अथवा असफल प्रयत्नों  के फलस्वरूप उपजा  करते हैं। अपर्याप्त प्रयत्न हमारी दुर्बल इच्छा शक्ति  तथा  मनोनिग्रह के उपायों की जानकारी के अभाव  के सूचक हैं।                                              

“सबसे महत्वपूर्ण बात है इच्छा शक्ति  को  इतना  सुदृढ़ बनाना  कि  यदि  हम बार-बार बार असफल  हो जाये   तो  भी  हम  निराश  न हों बल्कि  इसके  विपरीत मन:संयम  की हर  असफलता  हममें  नवीन  उत्साह भर दे तथा  मनोनिग्रह में  हमें  पुनर्नियुक्त कर दे”                             

अब  प्रश्न  यह  है कि  मन  को वश  में लाने  की  इस  इच्छाशक्ति को  सुदृढ़  कैसे  बनाया जायेगा ?    इच्छाशक्ति  को  जो  बातें  दुर्बल बना  देती   हैं  , उन्हें  दूर  करना  होगा  और  उनके स्थान पर  अनुकूल तत्वों को उपस्थित  कर  उसमें  शक्तिसंचार   करना  होगा। यह संभव है कि  हममें  से  कई  लोगों ने   मन  के  साथ  संघर्ष  किया  होगा  और  कई बार असफल हुए होंगे।  इसलिए   स्वाभाविक है वह   सोचते  होंगे  कि मनोनिग्रह  हमारे बस  की  बात  नहीं  है। इच्छाशक्ति के   कमजोर  होने  का  दूसरा  कारण  यह भी   है कि हममें  से  अधिकांश  यह  स्पष्ट धारणा  ही  नहीं  कर  पाते कि असल में   मनोनिग्रह के मार्ग   में   बाधा  कौन सी  है।  मनोनिग्रह  में असफल हो जाने से ऐसा कभी भी नहीं होना चाहिए  कि  हम  अपने आप  को   अनुचित रूप से  कोसते  रहें। अच्छे से अच्छे  व्यक्ति  के लिए भी मन का संयम सहज  बात नहीं है।  इसका कारण   यह है कि मन  बड़ा चंचल है.  श्रीमद्भगवद्गीता में  भगवान कृष्ण कहते हैं : हे कौन्तेय: अभ्यास शील  बुद्धिमान पुरूष  के मन  का  भी   ये  उद्दण्ड  इन्द्रियाँ  बलपूर्वक हरण   लेती  हैं ( मन का हरण  ।  जैसे  वायु जल  में  नाव का  हरण   लेती  है,  वैसे ही   इन्द्रियों  के  पीछे- पीछे चलने वाला  मन व्यक्ति   के  विवेक का  हरण   कर   लेता  है।   भगवान बुद्ध   उपदेश  देते  हैं :मनुष्य  हज़ारों   मनुष्यों को  युद्ध में हज़ार  बार  जीत  ले, पर उससे बढकर युद्ध विजेता   वह  है,   जिसने अपने  पर  विजय  प्राप्त कर  ली   है। इन उदाहरणों   से  हम  समझ  सकते हैं कि  मन  का  निग्रह  संसार में  सबसे   कठिन  काम   है। वास्तव में  यह एक    वीरोचित  कार्य ( Hero’s task)    है इसलिए   यदि   मन   को   वश   में   लाने  के  प्रयत्न  में   हम   यदा -कदा  असफल   हो  गये    अथवा   लगातार  ही असफल  होते  रहे हैं      तो  उसे  बहुत  गम्भीर रूप से नहीं लेना चाहिए  बल्कि  असफलताओं  को  बढावा  मानकर     हमें   अधिक  लगन  , धैर्य  और  बुद्धि से  अभ्यास  में  लग  जाना  चाहिए।   हताश  होने  की  कोई  बात नहीं  , क्योंकि  महापुरुष  हमें  भरोसा  दिलाते  हैं  कि  मन  का  पूर्ण निग्रह  सम्भव है। 

तो आज के लिए इतना ही। जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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“मन और उसका निग्रह” लेखों  की शृंखला आरम्भ करने से पूर्व भूमिका

13 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – “मन और उसका निग्रह” लेखों  की शृंखला आरम्भ करने से पूर्व भूमिका 

अभी अभी हमारे सहकर्मियों ने आदर्श परिवार श्रृंखला के अंतर्गत  आदरणीय  सरविन्द कुमार पाल जी द्वारा लिखित 13  लेखों का बहुत ही श्रद्धा और समर्पण के साथ अध्यन किया। इस शृंखला में प्रस्तुत किये गए सभी लेख “सुख और प्रगति का आधार -आदर्श परिवार” नामक पुस्तक के स्वाध्याय के उपरांत अत्यंत चिंतन -मनन और यथासम्भव एडिटिंग के उपरांत आपके समक्ष प्रस्तुत किये गए। प्रत्येक लेख की लेखन -शैली एवं त्रुटियों का पूरा ध्यान रखा गया था लेकिन अगर कोई भी त्रुटि रह गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं -आखिर  इंसान गलती का पुतला ही तो है। 

15 नवम्वर 2021 सोमवार से एक और  श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं जिसमें हमारे समर्पित सहकर्मी आदरणीय अनिल कुमार मिश्रा जी का सहयोग बहुत ही सराहनीय एवं वंदनीय है। जब हम आदर्श परिवार की श्रृंखला आरम्भ करने की अंतिम स्टेज पर थे , उन्ही दिनों अनिल जी का “मन और उसका निग्रह” लेखों का सुझाव आया था। 22 अक्टूबर को आये उस  सुझाव को हम आज क्रियान्वित करने में सफल हो पाएं हैं जिसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं। हालाँकि हम यहाँ लिख रहे हैं कि यह लेख  अनिल जी के स्वाध्याय पर आधरित हैं लेकिन उन्होंने हमें लिखा है कि हमारा नाम कहीं भी शेयर न किया जाये ,साथ में यह भी लिखा है कि हमारे लिए इतना ही बहुत है कि हमारा स्वाध्याय अनेकों के काम आया – कितने उच्च विचार हैं – हम सब नतमस्तक हैं। 

आज के ज्ञानप्रसाद में इन लेखों संक्षिप्त भूमिका देते हुए, मायावती आश्रम अल्मोड़ा (उत्तराखंड ) की जानकारी दी जाएगी। साथ में एक वीडियो लिंक भी दे रहे हैं। https://drive.google.com/file/d/1gHQBlz7OMdQFIadQCcyPeYOZx-XZFpmU/view?usp=sharing

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 मन और उसका निग्रह:

The Mind and its Control शीर्षक से अंग्रेजी भाषा में  श्रीरामकृष्ण मिशन  के  स्वामी बुद्धानन्द जी द्वारा लिखित बहुप्रचलित पुस्तक है। स्वामी बुद्धानन्द जी 1969 से 1976 तक मायावती आश्रम उत्तराखंड के अध्यक्ष रहे। श्रीरामकृष्ण  मिशन रायपुर (छत्तीसगढ़) के वरिष्ठ स्वामी आत्मानन्द जी ने  इस बहुप्रचलित पुस्तक का हिंदी भाषा में अनुवाद किया। अनिल जी की प्रस्तुति हिंदी  पुस्तक “मन और उसका निग्रह” के स्वाध्याय पर आधारित है। 

अक्सर कहा गया है मन चंचल होता है ,लेकिन मन को कण्ट्रोल करना ,मन का नियत्रण करना ,मन को वश में करना कठिन तो है ,असंभव नहीं। मन- संयम एक वीर पुरुष के लिए भी सदैव से कठिन कार्य रहा है ; किन्तु वह असम्भव नहीं है।मन: संयम का सारा रहस्य  श्रीकृष्ण ने  ‘अभ्यास ‘ और  ‘ वैराग्य ‘ इन  दो  शब्दों में  व्यक्त कर दिया है। इन  दोनों को जीवन में  उतारने के लिए  हमें  मन: संयम के   दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास करना चाहिए। हमें  अपने मन का  स्वभाव  समझना चाहिए। हमें  कुछ  प्रक्रियाएँ  जान लेनी चाहिए   और  उनका  अभ्यास  करना  चाहिए। इच्छा शक्ति को दृढ़ करने के लिए हमें अपनी  सुखभोग  की इच्छा/कामना   पर  विजय पानी पड़ती है तथा  यह  भी  समझ  लेना  पड़ता है कि  मनोनिग्रह  में  किस  बात की  आवश्यकता है  . 

मन: संयम के लिए हमें दो प्रकार के  भीतरी अनुशासनों  की  आवश्यकता होती है ,1.  मन को स्वस्थ सामान्य दिशा प्रदान करने के लिए  और 2.  आपातकालीन स्थिति में  हमारी  रक्षा  के लिए। मन  जितना  शुद्ध  होगा , उसे  वश  में  करना  उतना  ही  सरल  होगा।  अतएव हमें  मन  को  शुद्ध  करने की   साधनाओं का  अभ्यास करना होगा।  अपने  भीतरी  स्वभाव में   सत्व  की  प्रधानता  लाना  और   तत्पश्चात प्रामाणिक साधनाओं के अनुसार सत्व को  शुद्ध  करके  लांघ जाना “ यही  हमारा  लक्ष्य  होना चाहिए” 

आने वाले लेखों में ऐसे ही अनगनित विषयों पर चर्चा होने की सम्भावना है। आशा करते हैं कि हमारे पाठकगण ,हमेशा  की तरह इन लेखों की सफलता के लिए भी अपनी सहकारिता और सहभागिता सुनिश्चित करायेंगें।  

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 मायावती आश्रम द्वारा पुस्तक  भूमिका :

मन का निग्रह  सभी  के लिए  आकर्षण का विषय है।  किसी धर्म को मानने वाले साधक  की तो बात  ही  क्या , आत्मोन्नति चाहने वाले प्रत्येक व्यक्ति से इस विषय का  निजी सम्बन्ध है। भीतरी  जीवन  के  अनुशीलन  के लिए  तथा  धर्म के व्यवहारिक क्षेत्र में इस समस्या से जूझना ही  पड़ता है। मन का  नियंत्रण  किये बिना व्यक्ति  अथवा  समाज के  गुणात्मक विकास का बुनियादी काम कभी भी  सुचारू रूप से  सम्पन्न नहीं हो सकता। अत: यह विषय  स्वत: हमारा ध्यान  अपनी  ओर  आकर्षित  करता है। भिन्न भिन्न प्रकार के लोग मन का  निग्रह करना  चाहते हैं -आस्तिक , नास्तिक, संशयवादी  तथा   धर्म के प्रति  उदासीन  व्यक्ति। मन के  रास्ते  सभी के लिए  खुले  हैं। यद्यपि  सच्चा  ईश्वर-भक्त  इस फायदे  मे  रहता  है कि  उसकी  दृढ़ भक्ति  मन की  समस्याओं को सुलझाने में  एक बड़े   हद  तक  सहायक   होती  है। मन  की  प्रकृति  और  उसके  निग्रह  के उपायों  के बारे में  वेदान्त  और  योग  से  बहुत  कुछ  शिक्षा  मिलती  है  अपने  विवेचन में लेखक प्रामाणिक  शास्त्रों  एवं  योग  तथा  वेदान्त के आचार्यों द्वारा  प्रदत्त ऐसी  ही  सूचनाओं  और  ज्ञान  पर  निर्भर  रहा  है।        अद्वैत  आश्रम मायावती  के स्वामी बुद्धानन्द जी द्वारा अंग्रेजी में भाषा में  लिखी  मूल  पुस्तक    The   Mind   and     It’s   Control  अक्टूबर 1971 में प्रकाशित हुई और मात्र पांच माह उपरांत ही , अप्रैल  1972   में  इसका Revised Edition   इस  बात का   सूचक है कि इस  प्रकार की  एक  पुस्तक  की  अपेक्षा  थी। रायपुर छत्तीसगढ़  रामकृष्ण मठ  के  स्वामी  आत्मानन्द जी  ने  इस पुस्तक का   सुन्दर हिंदी  अनुवाद  किया है , ताकि  अंग्रेजी न जानने वाले   हिन्दी  भाषा- भाषी  जनता  के  बीच  इसका  प्रसार  हो  सके। यह  आशा  की  जाती है कि  जीवन की  एक प्रमुख समस्या “ मन और इसका कण्ट्रोल”  का  विवेचन करने वाली  यह  छोटी सी पुस्तक उन लाखों  व्यक्तियों के लिए  सहायक   सिद्ध होगी जिनकी मातृभाषा हिंदी है।                                         .                                    

प्रकाशक                                  .                

अद्वैतआश्रम  मायावती , 

पिथौरागढ , हिमालय ,

14   जनवरी  1974 

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अद्वैतआश्रम  मायावती  की कथा बहुत ही रोचक एवं आध्यात्मिक है। 

मायावती आश्रम उत्तराखंड राज्य के कुमाऊ मंडल में स्थित है. यह कुमाऊ मंडल का एक बहुत ही प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। मायावती आश्रम लोहाघाट तहसील और चम्पावत जिले के अंतर्गत आता है. यह आश्रम समुद्र तल से 1940 मीटर की ऊंचाई पर  स्थित है। लोहाघाट से 9 कि.मी और चम्पावत शहर से 22 कि.मी. की दूरी  पर स्थित  मायावती आश्रम हिमालय  की गोद  में बसा हुआ है | यहाँ पहुँचने के लिए अंतिम  रेलवे स्टेशन टनकपुर है जो 77 किलोमीटर दूर है। पहाड़ी क्षेत्र  में स्थित होने के कारण  यहाँ  केवल सड़क  द्वारा ही  पहुँचा जा सकता है।  टनकपुर रेलवे स्टेशन से रोडवेज बस, प्राइवेट टेक्सी, य फिर  खुद की गाड़ी ही विकल्प हैं। यह आश्रम बहुत ही खूबसूरत और हराभरा है।  हर वर्ष  देश और विदेश से भारी संख्या में पर्यटक यहाँ आते हैं।   इस आश्रम को “अद्वैत आश्रम” के नाम से भी जाना जाता है | मायावती आश्रम या अद्वैत आश्रम में किसी भी भगवान की मूर्ति स्थापित नही है। यहाँ आध्यतम की शिक्षा दी जाती है।  लोहघाट के अलावा अल्मोड़ा में भी अद्वैत आश्रम की शाखा है। स्वामी विवेकानन्द अक्सर अपने संन्यासी शिष्यों के साथ  यहाँ आया करते थे।  सन 1898 में जब स्वामी विवेकानंद अपनी तीसरी यात्रा के दौरान अल्मोड़ा आए थे तो उस समय स्वामी विवेकानंद ने “प्रबुद्ध  भारत” -Awakened India-  के प्रकाशन कार्यायल को मद्रास से मायावती आश्रम में स्थापित करने का फैसला किया था। स्वामी स्वरूपानंद और अंग्रेज कप्तान  जे. एच. सेवियर स्वामी विवेकानन्द के प्रमुख शिष्य थे। कप्तान सेवियर  हमेशा स्वामी विवेकानन्द के साथ ही सफ़र किया करते थे।  उत्तराखंड भ्रमण के दौरान जब एक बार स्वामी विवेकानन्द लोहाघाट आए तो यहाँ के घने जंगलों और हरे भरे पेड़ पौधों ने उनके  मन को  मोह लिया और उन्हें  यहाँ का शांत वातावरण  बहुत ही पसंद आया।  बाद में स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से दोनों शिष्यों ने  तथा कप्तान सेवियर  की  पत्नी श्रीमती सी. ई. सेवियर ने मिलकर मार्च 19, 1899 को इस  आश्रम की स्थापना की।  1899 में आश्रम की स्थापना होने के बाद से उनके शिष्य यही रहने लगे और अध्यात्म की शिक्षा देने लगे।स्वरूपानंद (1871-1906) स्वामी  विवेकानंद द्वारा दीक्षित शिष्य थे और अद्वैत आश्रम के पहले अध्यक्ष थे।1898 में चेन्नई से स्थानांतरित होने पर स्वामी  स्वरूपानंद मासिक पत्रिका “प्रबुद्ध भारत” के संपादक के रूप में बने रहे। सन् 1901 में स्वामी विवेकानंद कप्तान  जे. एच. सेवियर के देहांत की खबर सुनकर यहाँ  आए थे  और 3 से 17 जनवरी तक रहे इसी आश्रम में रहे  थे। 

1895 में जेम्स हेनरी सेवियर  जिन्होंने 5 साल तक ब्रिटिश भारतीय सेना में एक कप्तान के रूप में काम किया था, और उनकी पत्नी चार्लोट एलिजाबेथ सेवियर, इंग्लैंड में विवेकानंद से मिले। स्वामी जी से दोनों इतने प्रभावित हुए कि वह उनके समर्पित शिष्य बन गए। 1896 में  लगभग नौ महीनों के लिए सेवियर दंपति ने  स्वामी जी के साथ स्विट्जरलैंड, जर्मनी और इटली की यात्रा की। पति -पत्नी  के साथ  Alps की यात्रा करते समय  स्वामी विवेकानंद ने इच्छा व्यक्त की कि  हिमालय में भिक्षुओं के लिए एकआश्रम बनाया जाए । हिमालय की तरह Alps यूरोप की विशाल पर्वत श्रृंखला है।  दिसंबर 1896 में  सेवियर दंपति स्वामी  विवेकानंद के साथ  इटली से एक स्टीमर पर सवार होकर अल्मोड़ा के पास जगह खोजने और एक आश्रम स्थापित करने के उदेश्य से भारत आए । फरवरी 1897 में स्वामी जी मद्रास पहुंचे जहाँ से वह  कलकत्ता के लिए रवाना हुए और  सेवियर दम्पति  अल्मोड़ा के लिए। अल्मोड़ा में उन्होंने एक बंगला किराए पर लिया जो  अगले दो वर्षों के लिए स्वामी जी  और सेवियर्स का निवास स्थान बन गया। बाद में जब स्वामी जी कश्मीर के लिए रवाना हुए, तो  स्वामी स्वरूपानंद , सेवियर दंपति के साथ आश्रम के लिए उपयुक्त  स्थान की तलाश में भीतरी  क्षेत्र की यात्रा करने  के लिए निकले । जुलाई 1898 में घने देवदार  जंगलों के बीच स्थित  भूमि खरीदी  और  आश्रम बनाने का  निर्णय लिया गया। अंत में 19 मार्च 1899 को लगभग उसी समय जब कोलकाता के पास बेलूर मठ की स्थापना की जा रही थी,स्वामी स्वरूपानंद की मदद से  भिक्षुओं, आश्रमियों और स्वयं सेवियर दंपति के लिए एक छोटे से आवास के साथ  आश्रम की स्थापना की गई।

तो आज के लिए इतना ही। जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान का आवाहन

12 नवंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान का आवाहन

आज का ज्ञानप्रसाद लिखते समय हमें अपनी निर्धारित लेखन-योजना से थोड़ा हटना पड़ा जिसके लिए हम ह्रदय से क्षमा प्रार्थी हैं। योजना तो थी अनिल मिश्रा भाई साहिब के मन निग्रह श्रृंखला की बैकग्राउंड की, सरविन्द भाई साहिब की आदर्श परिवार प्रतिक्रिया की, लेकिन समयदान का यह टॉपिक हमारे मन के भीतर कई दिनों से हिचकोले ले रहा था। भय था कि कहीं विचारों के भंवर में यह पुण्य विचार डूब आकर लुप्त ही न हो जाएँ। कल वाले ज्ञानप्रसाद में चार कमेंट शामिल किये तो शब्द 1700 के लगभग थे ,लेकिन अकेले सरविन्द भाई साहिब की प्रतिक्रया 1437 शब्द की है – नमन है उनकी लेखनी को। देखते हैं इस प्रतिक्रिया को कहाँ/ कब शामिल करें। ज्ञानरथ प्रचार -प्रसार में अधिकतर समस्या यही उभर कर आयी है -कोई सुनता ही नहीं है ,हर कोई यही कहता है समय नहीं है। आज का लेख उदाहरण सहित इस समस्या के निवारण को ध्यान में रख कर लिखा गया है। समय सबके पास है ,आवश्यकता है समय के महत्व की और कार्य के महत्व की। ठीक उसी प्रकार जैसे हम कहते आ रहे हैं – बुद्धि तो सबके पास है ,आवश्यकता है सद्बुद्धि की। हमारे समस्त सहकर्मी यथाशक्ति ज्ञानरथ में सहयोग दे रहे है – दें भी क्यों न, यह उनका अपना ज्ञानरथ जो ठहरा। और हर कोई किसी श्रेय के लिए नहीं बल्कि कर्तव्यनिष्ठ होकर कार्य कर रहा है -नमन है सभी को। आज ही हमारे बहुत ही समर्पित अरुण जी ने रिप्लाई करके हमें लिखा – भाई साहिब ज्ञानरथ के प्रचार- प्रसार के लिए हमें कहने की आवश्यकता नहीं है ,हम पूरा प्रयास कर रहे हैं। तो चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद की ओर, आशा करते है समयदान की समस्या का अवश्य निवारण होगा।

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जिस प्रकार स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म प्राण की शक्ति अधिक मानी जाती है उसी प्रकार स्थूल यज्ञों की अपेक्षा सूक्ष्म यज्ञ की महत्ता असंख्य गुनी अधिक होती हैं। घी, सामग्री, समिधा आदि के द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ “स्थूल” कहलाते हैं और ज्ञान-यज्ञ को “सूक्ष्म” कहा गया है। वैसे तो स्थूल यज्ञों की महिमा भी कम नहीं है, पर ज्ञान यज्ञ तो सर्वोपरि है। “गीता में भगवान ने कहा है कि ज्ञान से बढ़कर इस संसार में पवित्र और कुछ नहीं। निस्संदेह आत्मा को प्रकाश से परिपूर्ण बनाने के लिए ज्ञान ही एकमात्र आधार होता है। अज्ञान को ही माया एवं भव बन्धन के नाम से पुकारते हैं और ज्ञान को मुक्ति का आधार माना गया है।”

शिक्षा और ज्ञान का अंतर्:

स्कूली पढ़ाई जिसमें गणित, भूगोल, इतिहास, साहित्य आदि की जानकारी कराई जाती है शिक्षा कहलाती है और जीवन का स्वरूप-उसका लक्ष, कर्तव्य एवं दृष्टिकोण निर्धारित करने संबंधी पढ़ाई को ज्ञान कहते हैं। ज्ञान को ही अमृत कहते हैं। आत्मा का स्वरूप समझ कर उसके अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने से मनुष्य महापुरुष ऋषि, युगदृष्टा और अवतार बन जाता है। आत्मोत्कर्ष ( ऊँचा उठना ) की सीढ़ी ज्ञान ही तो है। ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है। इसीलिए ज्ञान-दान महत्ता अत्यधिक मानी जाती है।

1.अन्न से शरीर की भूख मिटती है, ज्ञान से आत्मा की भूख शान्त की जाती है।

2.अन्न से शरीर पुष्ट होता है और ज्ञान से आत्मबल बढ़ता है।

3.अन्न, वस्त्र आदि के दान करने की अपेक्षा ज्ञान-दान का पुण्य असंख्यों गुना अधिक माना गया है।

4.अन्न के दान का फल मनुष्य को अन्य योनियों को दान करने से भी मिल सकता है परन्तु ज्ञान का फल मनुष्य योनि में ही प्राप्त हो सकता है।

इसलिए अन्न, जल, धन आदि से शरीर की आवश्यकताएं पूरी होती हैं। कुछ समय के लिए शारीरिक असुविधाएँ ही दूर हो जाती हैं। इसलिए अन्न दान का पुण्य फल भी सीमित ही माना गया है। ज्ञान-दान से आत्मा का विकास होता है तथा संसार में प्रेम, पुण्य, शान्ति और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होने की व्यवस्था बनती है। इतने महत्वपूर्ण कार्य का प्रतिफल भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। इसीलिए सब दानों से “ज्ञान-दान” की गरिमा अधिक है। सब दानियों में ज्ञान-दानी की प्रशंसा अधिक होती है। ब्राह्मण लोग निर्धन होते हुए भी निरन्तर ज्ञान-दान में लगे रहने के कारण भूसुर यानि पृथ्वी के देवता-जैसी गौरवशाली पदवी प्राप्त करते थे। इस ब्रह्मकर्म में रत रहने वाले ब्राह्मणों को भोजन कराने का भी पुण्य इसीलिए था कि उस अन्न से निर्वाह होने पर वे शरीर से अधिक ब्रह्म-कर्म कर सकते थे। ब्रह्म शब्द इतना विशाल और विस्तृत है कि इसको समझने के लिए उच्स्तरीय पात्रता/बुद्धि का होना अनिवार्य है लेकिन लेख के परिपेक्ष्य में ब्रह्म का अर्थ ‘ज्ञान’ भी कहा जा सकता है। ज्ञान की उपासना ब्रह्म की उपासना के रूप में ही की जाती है।

जिस प्रकार दैनिक जीवन में हम अनेकों कार्य नियमित रूप से करते हैं उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए भी कुछ समय निर्धारित करना चाहिए। उत्कृष्ट जीवन के लिए प्रेरणा देने वाले सद्ज्ञान को स्वयं पढ़ना-समझना और मनन-चिन्तन करना आत्म कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है। सद्भावनाओं की शिक्षा दूसरों को देना परोपकार की सबसे पुनीत प्रक्रिया है। इन दोनों का समावेश ज्ञान यज्ञ में होता है। प्रेरणाप्रद सद् विचारों की सम्पत्ति अपने लिए जमा करना और उस श्रेय-साधन से दूसरों को लाभान्वित बनाना इतना श्रेष्ठ सत्कर्म है कि उसकी तुलना और किसी शुभ कार्य से नहीं हो सकती।

“ज्ञान यज्ञ की तुलना में अन्य सब यज्ञ तुच्छ ही माने जा सकते हैं।”

ज्ञान-यज्ञ में समय-रूपी घी की आहुतियाँ देनी पड़ती हैं। जिस प्रकार बिना घी यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार समय-दान के बिना कोई भी ज्ञान-यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता। अग्निहोत्र में कुछ न कुछ धन खर्च करना ही पड़ता है उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ में समय लगाये बिना काम नहीं चल सकता। समय न मिलने का बहाना करके इस सत्कर्म के लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। स्वाध्याय के लिए, मनन चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना आदि समय लगाकर ही संभव होगा। सुबह से लेकर रात तक हम कमाते हैं -किसके लिए- शरीर के पोषण के लिए ,परिवार के पालन पोषण के लिए , पारिवारिक उत्तरदायित्व के लिए। ठीक इसी प्रकार आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में भी कुछ समय लगाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए। समय न मिलने का शाब्दिक अर्थ कुछ भी हो, वास्तविक अर्थ यह है कि उस कार्य को दूसरे कर्मों की अपेक्षा कम महत्व का समझा गया है। जो काम जरूरी प्रतीत होता है उसे अन्य सब काम छोड़ कर प्राथमिकता दी जाती है। बच्चा बीमार हो जाय, मुकदमे की तारीख हो, य व्यापार संबंधी कोई जरूरी काम आ जाय तो अन्य कामों को छोड़ कर भी हम पहले उसे करते हैं। शरीर में रोग उठ खड़ा हो तो सबसे पहले उसी की चिन्ता करते हैं। जो सबसे जरूरी काम समझा जाता है उसके लिए सबसे अधिक समय दिया जाता है। समय की प्रतीक्षा में वे कार्य पड़े रहते हैं जो अनावश्यक, महत्वहीन और उपेक्षणीय समझे जाते हैं। ज्ञान यज्ञ की पुण्य प्रक्रिया को इतना महत्वहीन नहीं समझा जाना चाहिए कि समय न मिलने का बहाना बना कर उससे पिण्ड छुड़ाना पड़े। स्नान, भोजन, शयन, नित्यकर्म जैसे आवश्यक कार्यों में ही हमें इस पुण्य-प्रक्रिया को भी अपने दैनिक कार्यों में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करना चाहिए।

अन्य शुभ कार्य धन देने से भी हो सकते हैं जैसे कि धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, सदावर्त, प्याऊ, कथा, पाठ आदि के आयोजन पैसा खर्च करके बिना समय लगाये भी हो सकते हैं, पर कुछ काम ऐसे हैं जिनके लिए स्वयं ही कष्ट उठाना पड़ता है। हम में से बहुतों ने देखा होगा कि पैसे का इतना बोलबाला है कि दो करोड़ महामृत्युंजय मन्त्र य गायत्री महामंत्र, पैसे देकर पंडों से करवाए जाते हैं। मन्त्र करवाने वाले परिवार को कितना पुण्य प्राप्त होता है, यह तो चर्चा का विषय है, लेकिन हमारे समाज में इस प्रथा का प्रचलन है और रहेगा ,तब तक रहेगा जब तक परमपूज्य गुरुदेव जैसे क्रन्तिकारी विचारों वाले महामानव का इस धरती पर अवतरण नहीं होगा। हम सब गुरुदेव के सैनिक हैं और हमारे भी कुछ कर्तव्य हैं ,उत्तरदाईत्व हैं। कब तक हम इन दकियानूसी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए दूसरों का मुँह ताकते रहेंगें।

अपने मुँह से खाये बिना पेट नहीं भरता , स्वयं पढ़े बिना विद्या नहीं आती , स्वास्थ्य सुधारने के लिए स्वयं ही व्यायाम करना पड़ता है। यह कार्य दूसरों से नहीं कराये जा सकते। इसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए अपनी अभिरुचि, अपनी श्रद्धा, अपना श्रम, अपना समय लगाना अत्यंत आवश्यक है।

युग-निर्माण योजना के अंतर्गत “आत्म-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया” का श्रीगणेश हमें आज से ही, अभी से ही आरम्भ करना चाहिए। इसका प्रथम चरण है ज्ञान-यज्ञ का आयोजन। भोजन की तरह ही सद्विचारों का अध्यन एक अनिवार्य आध्यात्मिक आवश्यकता समझा जाय और उसकी टाल मटोल किसी भी बहानेबाजी का सहारा लेकर न की जाय। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि समय का सदुपयोग पेट के धंधे करते रहने में ही नहीं है।

भौतिक सम्पत्ति से सद्ज्ञान की दिव्य -सम्पत्ति का महत्व तनिक भी कम नहीं है। पैसे की कमाई ही दौलत नहीं कहलाती। सच्ची दौलत तो आन्तरिक सदवृत्तियों का बढ़ना ही है। नश्वर सम्पत्ति की तुलना में शाश्वत विभूतियों का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिए।

सद्विचारों की दिव्य -सम्पत्ति से समृद्ध बनने के लिए, परिवार को सुसंस्कृत एवं सुविकसित बनाने के लिए, समाज में सभ्यता, सदाचार, विवेकशीलता जागृत करके स्नेह और सदाचार का वातावरण उत्पन्न करने का एक ही उपाय हो सकता है और वह है-“सद्भावनाओं की वृद्धि।” जिस प्रकार प्रयत्न करने से खेतों और कारखानों में पैदावार पढ़ाई जा सकती है उसी प्रकार मनुष्यों के मस्तिष्कों और अन्तःकरणों में भी सद्विचारों और सद्भावों का उत्पादन विशाल स्तर में किया जा सकता है। सच्ची लगन वाले मनुष्य निष्ठापूर्वक इस कार्य को अपने हाथ में लें तो आज की स्थिति बदल सकती है और स्वार्थ-परता का शुष्क श्मशान परमार्थ की सुरम्य हरियाली से हरा-भरा उद्यान बन सकता है। ज्ञान-यज्ञ का आयोजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होना चाहिए। सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म के रूप में हममें से प्रत्येक को इसे एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में अपनाना चाहिए।

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सदस्यों के लिए यह guideline सहायक हो सकती। नए पाठकों को प्रेरित करते समय यह बताने की आवश्यकता है कि ज्ञान-यज्ञ के लिए कुछ नियत निर्धारित समय नियमित रूप से निकालना ही चाहिए और उसका उपयोग अपने सोशल सर्किल में ,परिवारों में ,सोशल मीडिया साइट्स के माध्यम से सद्भावनाएं उत्पन्न करने के लिए करना चाहिए। जिस प्रकार प्रत्येक सत्कार्य के आरंभ में हवन-पूजन आवश्यक होता है, युग-परिवर्तन का शुभारंभ हम ज्ञान-यज्ञ के द्वारा ज्ञान प्रसार से कर सकते हैं। इतना करना तो आवश्यक है इससे कम में काम नहीं चलेगा। तो आज के लिए इतना ही। जय गुरुदेव कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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13. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला(ख)  – सरविन्द कुमार पाल

10 नवंबर  2021 का ज्ञानप्रसाद , 13. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला(ख)  – सरविन्द कुमार पाल

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत 13वां लेख। 

परिवार निर्माण पर आधारित लेखों की कड़ी में आज प्रस्तुत है अंतिम एवं  13वां  लेख। Opening remarks में सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम कार्य है ऐसे सहकर्मियों को सम्मानित करने का जिन्होंने 24 आहुतियों के टारगेट को पूरा किया है। भाइयों ,बहिनों और हमारी प्रेरणा बिटिया के समेत इस बार ऐसे 6  नाम हैं – रेनू श्रीवास्तव -33 ,सुमन लता-25 ,संध्या कुमार -24 ,सरविन्द पाल-26 ,अरुण वर्मा -25 ,प्रेरणा कुमारी -24 आइये सब सामूहिक तौर से इन 6 ग्रुपों को तो सम्मानित करें हीं लेकिन उनको भी जिन्होंने यह टारगेट प्राप्त करने में योगदान दिया। Three cheers for all of them. आज  का लेख कल वाले लेख का ही दूसरा भाग है। परमपूज्य गुरुदेव आज फिर कुछ ऐसे सूत्र बताएंगें जिनका पालन करने पर अवश्य ही हमारा परिवार एक आदर्श परिवार की उपाधि प्राप्त करने का हक़दार हो जायेगा। हथेली पर सरसों जमाने की कहावत से हम सब भली-भांति परिचित हैं ,परमपूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ साधना में धीरे -धीरे ही उपलब्धियों की प्राप्ति का मार्गदर्शन दिया है। एकदम कुछ भी नहीं होने वाला -धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होये माली सींचित सौ घड़ा ऋतू आये फल होये। आदरणीय सरविन्द पाल जी के अथक परिश्रम को हम नमन करते हैं ,हमारा सहयोग तो है ही। 

तो चलते हैं लेख की ओर 

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सहजीवन की सर्वोपरि आवश्यकता: 

सहजीवन का अर्थ Joint Family System से है।  हम सब जानते हैं कि ऐसी पारिवारिक संस्था में रहना कितना कठिन है -इसलिए तो गृहस्थाश्रम  को एक तपोवन की संज्ञा दी गयी है।  परमपूज्य गुरुदेव ने योग साधना की प्रयोगशाला अपना घर को संबोधित कर बताया है कि गृहस्थ धर्म अन्य सभी धर्मो से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।  महर्षि व्यास के शब्दों में गृहस्थाश्रम ही सभी धर्मो का मूल आधार है और चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है। जिस प्रकार  समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी प्रकार  सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित हैं। अतः परिवार संस्था सहजीवन के व्यवहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है।  तभी तो परिवार संस्था को  समाज संस्था की इकाई माना जाता है।  परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करने में अपनी प्रतिष्ठा, कल्याण व गौरव की भावना रखकर खुशी-खुशी उन्हें निबाहने का प्रयत्न करता है।  जब हम परिवार के साथ सहजीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सदस्य अपने व्यक्तिगत सुख-स्वार्थो का त्याग करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है।  सहजीवन की यही  सर्वोपरि आवश्यकता होती है। हम सब परिवार में रहकर पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करते हैं और इसे अपना परम कर्त्तव्य समझते हैं, तो हम किसी योगी से कम नहीं हैं।  अतः हमें प्रतिदिन प्रातःकाल मन ही मन भावना करनी  चाहिए कि 

“मैं एक गृहस्थ योगी हूँ।”  मेरा जीवन साधनामय है, दूसरे कैसे हैं,क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं इसकी  मैं तनिक भी परवाह नहीं करता।  मैं अपनेआप में संतुष्ट रहता हूँ, मेरी कर्त्तव्य पालन की सच्ची साधना इतनी महान, इतनी शांतिदायिनी और इतनी तृप्तिकारक है कि उसमें मेरी आत्मा आनंद में सराबोर हो जाती है।  मैं अपनी आनंदमयी साधना को निरंतर जारी रखूंगा, गृह क्षेत्र में परमार्थ भावनाओं के साथ ही काम करूंगा।”  

परिवार के सभी सदस्यों को सोने से पहले दिन भर के कार्यो पर विचार करना चाहिए कि

(1) आज परिवार से संबंध रखने वाले क्या-क्या कार्य किए 

(2) परिवार से संबंध रखने वाले कार्यो में क्या भूल की   

(3) परिवार में स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया 

(4) परिवार में भूल के कारण क्या अनुचित काम किया  

(5) परिवार में कौन -कौन से  कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप किये 

इस तरह से पारिवारिक उन्नति हेतु इन पाँच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यो का विभाजन करते हुए भविष्य में  गलतियों के सुधार का मूलभूत उपाय सोचना चाहिए जो निम्लिखित हो सकते हैं :

(1) भूल की तलाश करना 

(2) भूल को स्वीकार करना 

(3) भूल के लिए लज्जित होना/ पश्चाताप करना 

(4) भूल को सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना  

जो कोई व्यक्ति इन चार सूत्रों को अपने जीवन में लाने का प्रयास करता है,उसकी गलतियां दिन-ब-दिन कम होती जाती हैं।  ऐसा करने से शीघ्र ही  इन दोषों से छुटकारा पाकर सुखमय व शांतिमय जीवन जिया जा सकता है। यह चार सूत्र केवल परिवार के लिए ही नहीं बल्कि किसी भी परिवेश में  अभ्यास किये जाएँ तो लाभ ही लाभ मिलने की आशा है। 

गृहस्थाश्रम एक तपोवन है :

गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित्यप्रति नई कठिनाइयाँ आती रहती हैं।  

-साधक सोचता है कि इतने दिनों से प्रयत्न कर रहा हूँ लेकिन स्वभाव पर विजय नहीं हासिल हो रही  और प्रतिदिन नई-नई गलतियां होती ही रहती हैं।  

-साधक सोचता है कि ऐसी दशा में यह साधना हमसे चल नहीं पाएगी। 

-साधक सोचता है कि हमारे घर वाले उजड्ड, मूर्ख और कृतघ्न हैं, यह लोग मुझे परेशान और उत्तेजित करते हैं। 

-साधक सोचता है कि परिजन  मेरी  साधना को सही दिशा में नहीं चलने दे रहे , इसलिए  साधना करना व्यर्थ है। 

इस तरह के नकारात्मक व निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर साधक अपने व्रत को छोड़कर भटक जाता है और अपनी पुरानी आदत को सर्वोपरि मानकर पुनः गलत मार्ग का अनुसरण करने लगता है।  परमपूज्य गुरुदेव  समझाते हैं कि उपर्युक्त कठिनाई से प्रत्येक साधक को आगाह हो जाना चाहिए क्योंकि मनुष्य स्वभाव में त्रुटियाँ व कमजोरियाँ रहना निश्चित है। जिस दिन मनुष्य पूरी तरह से इन त्रुटियों और कमजोरियों से मुक्त  हो जाएगा, उसी दिन वह परम पद को प्राप्त कर लेगा और जीवन मुक्त हो जाएगा। जब तक  मनुष्य  उस मुक्ति की  मंजिल तक नहीं पहुँच जाता है, तब तक वह “मनुष्य योनि” में ही है और “देवयोनि” से बहुत ही  पीछे है। इसलिए कहावत है -इंसान गलती का पुतला है। 

साधना का मूल-मंत्र  है – “त्रुटियों के सुधार का अभ्यास। ”

परिवार ऐसे लोगों का समूह है जिसमें कोई तो आत्मिक भूमिका में बहुत आगे और कोई बहुत पीछे, इस तरह के setup  में सबके समक्ष  नित्यप्रति नई-नई त्रुटियों का, कमजोरियों का व कठिनाइयों का प्रकट होना स्वाभाविक है , प्राकृतिक है। यह त्रुटियां, कमज़ोरियाँ। कठिनाइयां  कुछ अपनी गलतियों के कारण उत्पन्न हुई होंगी और  कुछ दूसरों की गलतियों के कारण। लगातार सहजीवन व्यतीत करते ,इक्क्ठे रहते हुए  यह कठिनाइयां  धीरे-धीरे दूर तो जाती हैं  लेकिन परिवार का  पूरी तरह से देव परिवार बनना फिर भी कठिन ही है। ऐसी  कठिनाईयां तो आये दिन आती रहेगीं। इनसे डरने,घबराने य विचलित होने की कोई  आवश्यकता नहीं है। क्योंकि  साधना का मूल-मंत्र  है – “त्रुटियों के सुधार का अभ्यास। ” इसलिए हर साधक को अपनी साधना के अभ्यास को अनवरत जारी रखना चाहिए। यही कारण है कि  योगीजन नियमित प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा व ध्यान आदि की साधना करते हैं  क्योंकि उनकी मनोभूमि अभी दोषपूर्ण है।  जिस दिन उनके दोष हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे उसी क्षण,उसी दिन वह “ ब्रह्म निर्वाण” को प्राप्त कर लेंगे। दोषों का पूर्णतया अभाव हो जाना ही सिद्ध अवस्था की अंतिम सीढ़ी के ल क्षण हैं ।  जो मनुष्य इस अंतिम सीढ़ी  तक पहुँच जाता है फिर उसके लिए करने को कुछ  शेष नहीं रह जाता है। 

परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि साधकों को यह आशा कभी नहीं करनी चाहिए कि अल्प साधना से ही बहुत कम समय में बहुत बड़ी उपलब्धि मिल जायेगी, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है।  यह तो एक कल्पना मात्र है।  विचार तो क्षण भर में बन जाते हैं, परंतु उसे संस्कार का रूप धारण करने में बहुत समय लगता है ,कहने का तात्पर्य यह हुआ कि हथेली पर सरसों नहीं जमती।  पत्थर पर निशान करने के लिए रस्सी की रगड़  बहुत लम्बे समय तक जारी रखनी पड़ती है। हर साधक या योगीजन, चाहे वह गृहस्थ योगी क्यों न हो, को सदैव याद रखना चाहिए कि दोषों से सर्वथा मुक्ति-लक्ष्य है, ध्येय है व सिद्ध अवस्था है और साधक का शुरूवाती लक्षण यह नहीं है।  आम का पौधा उगते ही यदि मीठे आम तोड़ने के लिए उसके पत्तों को टटोलेंगे, तो मनोकामना पूर्ण नहीं होगी और इस तरह के  साधक की आशा निराशा में बदल जाएगी। अतः हम सबको अपनी साधना सफल बनाने के लिए उचित मार्ग पर चलते हुए कठिन तपस्या और योग साधना का सहारा लेना चाहिए तभी इच्छित फल मिल सकता है। हम सबको गृहस्थ योग की साधना आरम्भ करते हुए इस बात के लिए कमर कसकर तैयार हो जाना चाहिए ( बिल्कुल एक सैनिक की तरह ,एक विद्यार्थी की तरह ) कि परिवार में रहकर भूलों, त्रुटियों, कठिनाइयों, कमजोरियों और असफलताओं का  नित्य सामना करना पड़ेगा,  उनसे लड़ना पड़ेगा ,नित्य उनका संशोधन और परिमार्जन करना होगा और   इस तरह से अंत में  एक न एक  दिन परिवार की सारी कठिनाइयों को परास्त कर देना होगा। तब हम अपने परिवार को देव परिवार बना सकते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि व सुख-शांति बिना बुलाए ही  आ जाएगी।  हमारे सभी  ऋषि-मुनियों का ऐसा मत है। गृहस्थाश्रम समाज को अच्छे नागरिक देने की खान है। भक्त, ज्ञानी, संत, महात्मा, महापुरुष, विद्वान  पंडित गृहस्थाश्रम से ही निकलकर आते हैं और उनके जन्म से लेकर शिक्षा, दीक्षा, पालन, पोषण व ज्ञानवर्धन गृहस्थाश्रम के बीच ही होता है।  परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि देखरेख व शिक्षा होती है, इसलिए परिवार में रहकर उपासना साधना व आराधना करना किसी बहुत बड़ी तपस्या से कम नहीं हैं।  तभी तो परमपूज्य गुरुदेव ने कहा है – गृहस्थाश्रम एक तपोवन है।

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कल का ज्ञानप्रसाद हमारे सहकर्मियों  की ओर  से होगा :

आदर्श परिवार की 13 लेखों की इस लम्बी कड़ी को समाप्त करते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है।  सरविन्द जी का ह्रदय से आभार व्यक्त करते है, सभी सहकर्मियों को नमन जिन्होंने 24 आहुतियों के संकल्प को सहर्ष पूर्ण करने में अपना योगदान दिया। अगले लेखों की शृंखला  में हम मन को शांत करने, कण्ट्रोल करने, मन निग्रह पर कुछ लेख लेकर आयेंगें। लेकिन उनको आरम्भ करने से पहले हम आप सबकी आदर्श परिवार लेखों पर प्रतिक्रिया जानने का निवेदन कर रहे हैं।  आपको पूर्ण स्वतंत्रता है, आप जो चाहें अपने विचारों  के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया लिख  सकते हैं। हम आपके विचारों को कमैंट्स के माध्यम से तो  प्रतिदिन देख ही  रहे हैं लेकिन  आज कुछ और अधिक लिखने के लिए  निवेदन कर रहे  हैं जी हम गुरुवार के ज्ञानप्रसाद में शामिल करेंगें।   इस मार्गदर्शन से हमें हमारी कार्यशैली में सुधार लाने का अवसर मिलेगा। तो गुरुवार  वाले लेख पर विचार रुपी कमैंट्स की आहुतियां आपकी प्रतिक्रियों पर आधारित होंगीं।  तो अभी से मन बना लीजिये की आपने क्या लिखना है। 

मननिग्रह लेखों की श्रृंखला आरम्भ करने से पूर्व आपको पूरी बैकग्राउंड देते हुए भी ज्ञानप्रसाद लिखने की योजना है। 

तो आज के लिए इतना ही। जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।       

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12. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला(क) -सरविन्द कुमार पाल 

9 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद,12. हमारा घर ही है योग साधना की प्रयोगशाला -सरविन्द कुमार पाल 

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत 12 वां लेख। 

परिवार निर्माण पर आधारित लेखों में आज की कड़ी का विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है – हमारा अपना घर ही योग साधना की लेबोरेटरी है ,प्रयोगशाला है। 

साधना के लिए लोग तीर्थ स्थानों पर जाते हैं ,अनुष्ठान करते हैं ,पहाड़ों पर जाकर तपस्या आदि करते हैं, लेकिन  आज के लेख में परमपूज्य गुरुदेव ने इतने सरल तरीके से समझा दिया है कि परिवार में रह कर ही योग साधना का पुण्य प्राप्त किया जा सकता है। गुरुदेव ने परिवार को ,हमारे घर को एक प्रयोगशाला का नाम दिया है -क्यों दिया है यह नाम ?  आइये देखते हैं। बेसिक विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि लेबोरेटरी में किये जाने वाले प्रयोग के तीन मुख्य स्टैप होते हैं -EXPERIMENT(प्रयोग) , OBSERVATION(अवलोकन, जो हमें दिखा ) और INFERENCE (निष्कर्ष )I हम जो भी प्रयोग करते हैं ,उससे जो हमें प्राप्त होता है उसी से निष्कर्ष  निकालते हैं।  घर- परिवार में भी तो यही कुछ कर रहे हैं ,प्रतिदिन नए -नए प्रयोग कर करके ,अपनी धारणाएं बना रहे हैं। जिस प्रकार लेबोरेटरी में काम करने की कुछ मान्यताएं होती हैं ,ठीक उसी तरह परिवार की भी कुछ मान्यताएं होती हैं जिनका पालन करना  हम सबका कर्तव्य है। इन मान्यताओं के कारण ही इस सारी  क्रिया को योग साधना  कहा गया है। आज के लेख में आपको 16 सूत्री मार्गदर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त होगा। आशा करते हैं कि हम दोनों भाइयों के अल्प ज्ञान और अथक परिश्रम के पुष्पों से गुंथी हुई माला आपके परिवार में एक नई ऊर्जा का संचार करने  में  सहायक होगी और आप कमेंट रुपी आहुतियां  अर्पित कर पुण्य प्राप्त करेंगें।

आज का ज्ञानप्रसाद वितरित करने से पहले हम निवेदन करते हैं कि बहुत से यूट्यूब सहकर्मियों  को कल वाला लेख मिलने  में कुछ कठिनाई आयी थी। अगर आप ऐसे सहकर्मियों में से हैं तो इस लेख का अध्यन करके कमेंट करके हमें बताने का कष्ट करें ,बहुत कृपा होगी।        

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परमपूज्य गुरुदेव ने योग साधना की प्रयोगशाला – अपना घर बताया है और कहा है कि  योग साधना की इससे उत्तम जगह अन्यत्र कोई नहीं है।  परिवार में एक व्यवस्था व  क्रम में रहने वाले व्यक्तियों में अनुशासन की भावना का रहना  अति आवश्यक है क्योंकि परिवार समाज की इकाई है और समाज की सुव्यवस्था और सुख-शांति उसके सदस्यों की अनुशासन-निष्ठा पर निर्भर करती है। अनुशासन एक ऐसा गुण है जो  परिवार में रहते हुए ही सीखा जा सकता है।  

अनुशासन का अर्थ है  “सह-आस्तित्व के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए कुछ अनिवार्य नैतिक नियमों  का पालन करना। 

यह नियम मनुष्य के व्यक्तित्व और जीवन को सजाते-सँवारते हैं।  घर के सभी सदस्यों में अनुशासन की भावना हो इसके लिए घर के बड़े सदस्यों को अनुशासन की ओर से विशेष सतर्क रहना चाहिए।  बच्चों में जीवन की यह आधारशिला उपदेशों से नहीं रखी जा सकती,बल्कि यह स्वयं के आचरणों द्वारा ही बच्चों के सम्मुख “आदर्श” प्रस्तुत कर बनाई जा सकती है।  सादगी, समानता, घर के प्रत्येक सदस्य में परिवार के प्रति उत्तरदायित्व की भावना, प्रेम, आत्मीयता, त्याग, उदारता व अनुशासन-निष्ठा जैसे सद्गुण जिस परिवार के सदस्यों में होंगे, उस परिवार में दुख-क्लेश कोसों दूर रहेंगें। आर्थिक अभाव और सामयिक समस्याओं के होते हुए भी उस परिवार के सदस्यों में स्थापित स्नेह और आत्मीयता के सूत्र उन विपत्तियों से जूझने का बल प्रदान करेंगे। 

यही तो है  परिवार संस्था की योग साधना है 

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को छोड़कर सामान्य श्रेणी के सभी सहकर्मियों  के लिए गृहस्थ योग की साधना को बहुत ही उपयुक्त, उचित, सुलभ एवं सुख-साध्य समझा गया है  क्योंकि गृहस्थ योग की साधना भी राजयोग, जपयोग व लययोग की ही श्रेणी में आती हैं।  सही तरीके से इस महान व्रत का अनुष्ठान करने पर मनुष्य, जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।  जैसे कोलतार पोत देने पर हर वस्तु काली और कलई  पोत देने पर सफेद हो जाती है उसी प्रकार योग की, साधना की, परमार्थ की व अनुष्ठान की दृष्टि रखकर कार्य करने से  वे सभी कार्य साधनामय व परमार्थप्रद हो जाते हैं।  अहंकार, तृष्णा, भोग, मोह आदि का भाव रखकर काम करने से अच्छे काम भी घटिआ  परिणाम उपस्थित करने वाले होते हैं।  घर-परिवार की संस्था सुचारु रूप से चलाने में भावनाएँ यदि उच्चकोटि की,पवित्र,निस्वार्थ और प्रेममय रखी जाएँ तो निसंदेह यह काम अति सात्विक व सदगति प्रदान करने वाला बन सकता है। अपनी आत्मा ही अपने को ऊपर-नीचे व उन्नति-अवनति की ओर ले जाती है।  यदि आत्मनिग्रह (SELF- CONTROL), आत्मत्याग व आत्मोत्सर्ग के साथ अपने जीवनक्रम को चलने दिया जाए, तो इस सीधे-साधे तरीके की सहायता से ही मनुष्य परम पद को प्राप्त कर अपने जीवन को कृतार्थ कर सकता है। स्वयं का  कायाकल्प करने का  सबसे उत्तम मार्ग यही है। परिवार संचालन के संबंध में  दो दृष्टिकोण हैं –  

1.एक दृष्टिकोण  ममता, मालकी, अहंकार और स्वार्थ का है।  

2.दूसरा दृष्टिकोण आत्मत्याग, सेवा, प्रेम और परमार्थ का है। 

पहला दृष्टिकोण बंधन, पतन, पाप और नरक की ओर ले जाने वाला है तथा दूसरा दृष्टिकोण मुक्ति, उत्थान, पुण्य और स्वर्ग को प्रदान करता है क्योंकि शास्त्रकारों व संत पुरुषों ने जिस गृहस्थ या परिवार की निंदा की है, बंधन बताया है और छोड़ देने का आदेश दिया है , वह आदेश प्रथम दृष्टिकोण के संबंध में है।  परमार्थमय दृष्टिकोण का गृहस्थ या परिवार तो बहुत ही उच्चकोटि की “आध्यात्मिक साधना” है और उसे हमेशा सभी ऋषि, मुनि, महात्मा, योगी तथा देवताओं ने अपनाया है, इसी  उच्चकोटि की आध्यात्मिक साधना से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया है।  इस साधनामयी मार्ग को अपनाने से गृहस्थ य परिवार में न तो किसी को बंधन में पड़ना पड़ा और न ही नरक को जाना पड़ा।  यदि गृहस्थ या परिवार बंधनकारक व नरकमय होता तो उससे पैदा होने वाले बालक पुण्यमय कैसे होते ? बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, महात्मा, योगी, यती व देवता इस मार्ग को क्यों अपनाते ? परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि निश्चय ही गृहस्थ धर्म एक परम पवित्र, आत्मोन्नतिकारक व जीवन को विकसित करने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है, एक आध्यात्मिक साधना है।  गृहस्थ या परिवार का कुशल नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को ऐसी हीन भावना मन में लाने की कोई भी आवश्यकता नहीं है कि वह अपेक्षाकृत नीचे स्तर पर है , आत्मिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ य  कमजोर है।  

परमपूज्य गुरुदेव आगे लिखते हैं कि जीवन का परम लक्ष्य आत्मा को परमात्मा में मिला लेना या विलय कर देना है। 

व्यक्तिगत स्वार्थ को प्रधानता न देते हुए लोकहित की भावना से काम करना ही आध्यात्मिक साधना है।  

इस साधना को क्रियात्मक जीवन में लाने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके हो सकते हैं और उन तरीकों में से एक बहुत ही सर्वश्रेष्ठ तरीका “गृहस्थ योग” भी है।  अपने जीवन को उच्च, उन्नत, सुसंस्कृत, व्यवस्थित, संयमित, नियमित, सात्विक, सेवामय व परमार्थमय बनाने की सर्वश्रेष्ठ प्रयोगशाला अपना घर ही हो सकता है। घर से  उत्तम और कोई जगह  हो ही नहीं  सकती।  देवता भी ऐसी जगह के लिए लालायित रहते हैं और ऐसी जगह अत्यंत  भाग्यशाली को ही मिलती है। जिसको यह जगह मिल जाती है वह  उसका  सदुपयोग कब, कैसे और कितना करता है ,यह इस्तेमाल  करने वाले के ऊपर निर्भर होता है। इसके सदुपयोग के लिए हम सब स्वतंत्र हैं  और  ब्रह्माण्ड की कोई भी शक्ति इसमें  हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसलिए परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि स्वाभाविक  दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रेम, उत्तरदायित्व, कर्त्तव्यपालन, आश्रय, स्थान, स्थिर क्षेत्र व लोकलाज आदि अनगिनत कारणों से यह क्षेत्र ऐसा सुविधाजनक हो जाता है कि आत्मत्याग और सेवामय दृष्टिकोण के साथ काम करना इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाता है। 

गृहस्थ योग साधना के 16 सूत्रीय मार्गदर्शन  :

गुरुदेव ने गृहस्थ योग साधना के विषय में बहुत ही श्रेष्ठ  विश्लेषण लिखा है कि गृहस्थ योग के हर साधक के मन में यह विचारधारा हमेशा चलती रहनी चाहिए कि 

1.यह परिवार मेरा साधना क्षेत्र है, इस परिवार के  साथ हिल-मिलकर रहना मेरी “उपासना” है। 

2. इस वाटिका को सब प्रकार से सुन्दर, सुरभित और पल्लवित बनाने के लिए सच्चे हृदय से सदा शक्तिभर प्रयत्न करते रहना मेरा “कर्मकांड” है।  

3.भगवान ने जिस वाटिका को सींचने  का भार मुझे दिया है उसे ठीक तरह सींचते  रहना मेरी “ईश्वर परायणता” है। 

4. घर का कोई भी सदस्य ऐसा हीन दर्जे का नहीं है  जिसे मैं तुच्छ समझूं , उपेक्षा करूं य उसकी  “सेवा” से जी चुराऊँ।  

5. मैं मालिक, नेता, मुखिया य  कमाऊ होने का अहंकार नहीं करता हूँ, यह मेरा “आत्मनिग्रह” ( self -control ) है। 

6. हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएँ लगाते रहना मेरा परमार्थ है, बदले की जरा-सी भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्त्तव्य भाव से सेवा में तत्पर रहना मेरा “आत्मत्याग” है। 

7.अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करते हुए औरों की सुख-सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न करना मेरा “तप” है। 

8. घर के हर सदस्य को सद्गुणी,  सदाचारी एवं धर्मपरायण बनाकर विश्व की सुख-शांति में वृद्धि करना मेरा “यज्ञ” है। 

9. सबके हृदयों पर मौन उपदेश हो, अनुकरण से सुसंस्कार बने,अपना आचरण  पवित्र एवं आदर्शमय रखना मेरा “व्रत” है। 

10. धर्म उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा “संयम” है। 

11. प्रेम, उदारता, सहभागिता, सक्रियता, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना से ओतप्रोत रहना, औरों को रखना, प्रसन्नता, आनंद और एकता की वृद्धि करना मेरी “आराधना” है। 

12. मैं अपने गृह-मंदिर में भगवान की चलती-फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध “भक्ति-भावना” रखता हूँ। 

13. सद्गुण, सत स्वभाव और सत आचरण के दिव्य श्रृंगार से इन प्रतिमाओं को सुसज्जित करने का प्रयत्न ही मेरी “पूजा” है। 

14. मेरा साधन सच्चा है, साधना के प्रति मेरी भावना सच्ची है, अपनी आत्मा के सम्मुख मैं सच्चा हूँ। 

15. सफलता-असफलता की ज़रा  भी परवाह न करके सच्चे “निष्काम कर्मयोगी” की भाँति मैं अपने प्रयत्न की सच्चाई में संतोष अनुभव करता हूँ। 

16. मैं सत्य हूँ, मेरी साधना सत्य है, मैंने सत्य का आश्रय ग्रहण किया है, उसे सफलता पूर्वक निबाहने का हर सम्भव प्रयत्न करूंगा। 

आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी सहकर्मी  गृहस्थ योग साधक हैं।  अतः हमारा आपसे करबध्द अनुरोध है कि हम सबको इस मार्गदर्शन को  भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए , दिन में कई बार दोहराना चाहिए। हो सके तो  छोटे से  कार्ड पर स्पष्ट शब्दों में लिखकर अपने पास रख लेना चाहिए और जब भी समय  मिले, एक-एक शब्द का चिंतन-मनन करते हुए पढ़ना चाहिए। एक  सुन्दर चित्र की भाँति इसे अपने कमरे में भी  लगाया जा सकता है।  प्रातःकाल की मधुर वेला में निद्रा त्यागने पर पलंग पर पड़े-पड़े ही कई बार इन संदेशों को  दोहराना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज दिन भर इन भावनाओं को अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ण करने  का यथासम्भव प्रयास करेंगे।आपकी सुवजिधा के लिए हमने मैं  को COMMAS डाल कर अलग से दिखाने का प्रयास किया है। 

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं जय गुरुदेव। 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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11. परिवार में नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष -सरविन्द कुमार पाल

8  नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद,11. परिवार में नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष -सरविन्द कुमार पाल 1226 words  नवम्बर 

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत 11 वां    लेख। 

परिवार निर्माण की आज की कड़ी का विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है -नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष। सरविन्द भाई साहिब द्वारा लिखित , हमारे द्वारा एडिटेड  इस लेख में आप हमारे व्यक्तिगत विचार भी देखेंगें। अपने विचारों को व्यक्त करते हुए हमने अपनेआप को सावधान भी किया है कि पाठक कहीं यह धारणा न बना लें कि हमारी सोच नकारात्मक है , हम भी एक सुखी आदर्श परिवार की इकाई हैं। जो भी हो  हर बार की तरह परमपूज्य गुरुदेव का मार्गदर्शन इस लेख में भी रामबाण का कार्य करने में सफल होगा -ऐसा हमारा अटल विश्वास है। 

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 परम पूज्य गुरुदेव ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में लिखा है कि आज के युग में अक्सर  दो पीढ़ियों के बीच संघर्ष और खींचातानी चलती दिखाई देती है। दो पीढ़ियों का संघर्ष कोई नई बात नहीं है। आज से पहले  वाली पीढ़ी में भी था ,आज भी है और आगे भी रहेगा। एक प्रकार से  यह प्रकति  का नियम ही समझ लेना चाहिए क्योंकि प्रत्येक  माता पिता अथक परिश्रम करके अपने बच्चों को अपने से बेहतर बनाने का प्रयास करते  हैं , बच्चों के सुनहरी भविष्य के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा देते हैं। उनकी हार्दिक अभिलाषा रहती  है कि जो हम न कर पाए हमारे बच्चे करें ,जो हम न बन पाए ,हम अपने बच्चों को बनाएं।   जब बच्चे उनसे अच्छे बन भी जाते हैं तो माता पिता गर्व भी अनुभव करते हैं ,लोगों के आगे बताते भी फिरते हैं।  लेकिन बच्चों की सोच ,परिस्थियों का नवीनीकरण , आधुनिकता माता पिता को सहन नहीं होता। अक्सर  माता पिता से  सुनने को मिलता है- हमारे समय में ऐसा नहीं होता था। अगर समय बदल गया है ,एक पीढ़ी  बदल गयी है तो उसे स्वीकार करने में क्या आपत्ति है ? आधुनिक परिवारों में जहाँ दोनों पीढ़ियां एक दूसरे से  कंधे से कन्धा मिला कर सहयोग दे रही हैं , विचारों का सम्मान कर रही हैं वहां ऐसा संघर्ष ,खींचातानी कम देखने में मिलता है।  इसका एक जीवित  उदाहरण हमारा सबका ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार है जिसमें कितनी ही पीढ़ियों के सदस्य एक दूसरे के साथ 12 मानीवय मूल्यों की पालना  करते हुए बिना किसी मतभेद और संघर्ष के कार्य कर रहे हैं। इन 12 मानीवय मूल्यों -शिष्टाचार,स्नेह,समर्पण,आदर,श्रद्धा ,निष्ठा,विश्वास ,आस्था,सहानुभति , सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन – को हर कोई सदस्य ऑनलाइन ज्ञानरथ  के  स्तम्भ समझ कर  रक्षा करना अपना  परम् कर्तव्य समझता है।  

आधुनिक  स्कूल, कालेजों से निकलने वाली  युवा-पीढ़ी , नवीन सभ्यता से प्रभावित होने के कारण , पुरानी परम्परा, विचारधारा व संस्कारों से ओतप्रोत पुरानी पीढ़ी की विचारधाराओं से ताल-मेल नहीं बना पाती । इस स्थिति  के  कारण परिवारों में असंतुष्टि और परेशानी का वातावरण है  जो कि एक अभिशाप है। हम इस चर्चा में अपनेआप को सावधान करते हुआ लिखना कहते हैं कि यह कोई GENERAL STATEMENT नहीं है ,अपने आस पास हम कितने ही आदर्श परिवार भी देखते हैं। 

पुरानी सभ्यता के लोग नवीन सभ्यता में पले हुए युवक-युवतियों से अपने समय  की परम्पराओं का पालन कराना चाहते हैं।  लेकिन नई सोच और सभ्यता  के बच्चे जब उनकी  परम्पराओं को नहीं मानते हैं तो उन्हें कोसा जाता है, धिक्कारा जाता है, उल्टा-सीधा  बोला जाता है तथा बच्चों को  गाली-गलौज का सामना भी करना पड़ता है। परिणाम यह होता है कि परिवार में तनाव की स्थिति बन जाती है, एक ऐसी स्थिति जो  परिवार के लिए परमाणु बम का कार्य  करती  है।   

अक्सर ऐसी धारणा बनती हुई दिखती  है कि नवीन सभ्यता के स्वतंत्र बच्चों  को परिवार के  पुरानी सभ्यता के लोगों द्वारा यह रोक-थाम बुरी लगती है। इसलिए परिवार के नवीन सभ्यता के बच्चे अनुशासनहीनता, लापरवाही, उपेक्षा व अनादर का मार्ग अपनाते हैं। परिवार में पुरानी और नई पीढ़ी का यह संघर्ष एक साधारण सी   बात बन चुकी  है। आज परिवारों में बहुधा देखने को मिलता है कि पुराने ज़माने  में पली-पोसी घर की महिलाएं तो अपने समय की मर्यादा, मान्यता और परिस्थितियों में अपनी  बहुओं को ढालना चाहती हैं, लेकिन दूसरी ओर आजकल के स्वतंत्रता एवं समानाधिकार के माहौल से ओतप्रोत आधुनिक नारी अपने जीवन के कुछ और ही स्वप्न लेकर अपनी ससुराल आती है। दोनों की विचारधारा में अंतर होने के कारण सास-बहू में  प्रतिकूलता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है  जिससे  पारिवारिक संघर्ष का सूत्रपात होता है। ऐसे परिवार से  सुख-शांति कोसों दूर चली जाती है और वातावरण अशुद्ध हो जाता है।  

परमपूज्य गुरुदेव समझाते हैं कि  यह संघर्ष सनातन से चला आ रहा है और थोड़ी-बहुत मात्रा में हमेशा रहता है लेकिन वर्तमान युग में अचानक भारी और बहुत तेज़ी से  परिवर्तन हो जाने के कारण टकराव की परिस्थितियाँ अधिक प्रबल, स्पष्ट व प्रभावशाली बन गई हैं। ऐसी परिस्थियों में संघर्ष को और भी बल मिलता है जिससे  परिवार के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाता है जिसे संभाल पाना सामान्य व्यक्ति के लिए असम्भव हो जाता है।

पारिवारिक कलह को रोकने का अत्यंत सरल  विकल्प: 

पूज्यवर  ने इस समस्या का समाधान सुझाते हुए लिखा है कि  यदि इस पारिवारिक कलह को रोकना है तो इसका बहुत ही सरल व सहज विकल्प है   

“समन्वय” (COORDINATION ) . “लें” और “दें”  (GIVE AND TAKE) की समझौतावादी नीति से लड़ाई-झगड़े की तमाम गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं।  

इस नीति में  थोड़ा-थोड़ा दोनों को झुकना पड़ता है, तो मिलन का एक केन्द्र बिन्दु सहज ही मिल जाता है।  परिवार में यदि नये-पुराने का मत-भेद मिटाना है तो नई पीढ़ी को उग्र व उच्छ्रन्खल नहीं होना चाहिए।  उसे भारतीय परम्पराओं का मूल्य और महत्व समझना चाहिए जिससे शिष्टता, सभ्यता और सामाजिक सुरक्षा की बहुमूल्य मर्यादाओं में रहते हुए  शांति व्यवस्था और उन्नति का समुचित अवसर प्राप्त होता रहे। पुरानी पीढ़ी को भी अपने उत्तरदाईत्व निभाने में पूरी तरह से शिक्षित होने की आवश्यकता है। उन्हें  बच्चों के स्वभाव व चरित्र पर  विशेष ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।  पहनने-ओढ़ने या फिर हँसने-खेलने में बच्चे आधुनिक तरीके अपनाते हैं, तो उन पर इतना अधिक  नियन्त्रण भी नहीं करना चाहिए जिससे बच्चे  विरोधी, विद्रोही, उपद्रवी व अवज्ञाकारी के रूप में सामने आएं, इस विषय में थोड़ी  ढील छोड़ना ही बुद्धिमानी है। पुरानी परम्परा से जकड़े रहना ठीक नहीं है, समय के साथ-साथ चलना पड़ता है और उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ बनानी पड़ती हैं, अपनेआप को ढालना पड़ता है।

संसार परिवर्तनशील है, जो समय के साथ चलता है, समय के अनुरूप परिवार का कुशल नेतृत्व करता है उसका परिवार  सुखमय व शांतिमय होता है।  

परिवर्तन के तथ्य को बल देने के लिए हमने हरीश भिमानी जी की लगभग 4  मिंट की वीडियो शामिल की है।  हरीश भिमानी जी सुप्रसिद्ध मैगा  सीरियल  महाभारत के अदृश्य पात्र “समय” थे। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :इस तरह से पारिवारिक संघर्ष के निवारण के लिए दोनों पक्ष, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी को विवेकशील व विचारशील कदम उठाने चाहिए। पुरानी  पीढ़ी जिसने अपना सर्वस्व  लुटाकर स्नेह, प्यार व दुलार के साथ नई पीढ़ी के निर्माण में अपना योगदान दिया, हम सबका  परम कर्त्तव्य बनता है कि अपना उत्तरदायित्व समझकर उन वृद्धजनों को चाहे वे किसी भी हालत में हों, उनकी देख-रेख व सेवा की जाए।  वृद्धजनों को  संतुष्ट रखना,उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने का हर सम्भव प्रयास करते रहना चाहिए। हमारे ऋषि-मुनियों ने “मातृ देवो भव”,”पितृ देवो भव” व  “आचार्य देवो भव” का सन्देश इसी अर्थ से दिया होगा। दूसरी ओर वृद्धजनों को भी चाहिए कि  जीवन में ऐसी तैयारी करें  कि वे नई पीढ़ी के लिए भार बनकर तिरस्कार  का कारण न बने बल्कि अपने जीवन की ठोस अनुभवयुक्त शिक्षा, योग्यता से नई पीढ़ी को जीवन यात्रा का सही-सही मार्ग दिखाएँ।  अपनी योग्यता व कुशल नेतृत्व से पारिवारिक सामंजस्य ठीक रखें।वानप्रस्थ और सन्यास का विधान इसीलिए रखा गया था कि  पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को अपने ज्ञान और अनुभवों से सद्ज्ञान की प्रेरणा देकर उन्नति एवं कल्याण की ओर अग्रसर करने हेतु मार्गदर्शन करती रहे। परिवार में रहकर घर में पड़े-पड़े चारपाई तोड़ना, बेटे-बहुओं की बातों  से पीड़ित होना, उनके स्वतंत्र जीवन में रोड़ा बनना, मोह से ग्रस्त होकर बच्चों के बच्चों से लिपटे रहना वृद्धावस्था का अपमान करना है। 

आधुनिक रिसर्च  के आधार पर वृद्धावस्था को  मानव-जीवन की उत्कृष्ट स्थिति कहा गया है ।This is the Golden period of life .

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि पुरानी पीढ़ी के लिए यदि अपने सदुपयोग, सम्मान व उत्कृष्टता का यदि  कोई रास्ता है तो केवल वही है जो  हमारे पूर्व मनीषियों ने सुझाया था – घर के बंधन, परिवार का मोह, वस्तुओं के आकर्षण से मुक्त होकर वानप्रस्थ या सन्यास का जीवन बिताना और अपने जीवन के अनुभव, ज्ञान व योग्यता से जन-समाज को सही रास्ता बताना। वानप्रस्थ का अर्थ तो होता है वन की ओर प्रस्थान करना लेकिन अगर घर परिवार में ही उस सिद्धांत को अपना लिया जाए तो कितनी ही समस्याओं का निवारण हो सकता है।    “जीवन का उत्तरार्ध्द लोक सेवा में लगाएँ” नामक पुस्तक का स्वाध्याय करने से वृद्धावस्था के कितने ही उलझे प्रश्नों का निवारण हो सकता है। केवल 43 पन्नों की यह पुस्तक अखिल विश्व गायत्री परिवार की वेबसाइट पर उपलब्ध है। गुरुदेव ने  नई-पुरानी पीढ़ी की आपसी खायी को पाटने का  बहुत ही प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक समाधान बताया है जिसे आत्मसात कर हम  कुशल नेतृत्व कर परिवार का सही संचालन कर सकते हैं और परिवार के मत-भेद मिटाकर  सुख-शांति का वातावरण बना सकते हैं। 

संयुक्त परिवार की कुछ सामुहिक पाबंदियां होती हैं। यह पाबंदियां तो नाना प्रकार की हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या वित्तीय समस्या होती है। आज के विकासशील समय में पदार्थवाद ने हम सबको  इस तरह जकड़ कर रखा हुआ है कि न-न करने के बावजूद हम अपने घरों को पदार्थों से इस प्रकार भर रहे हैं जैसे वह घर न होकर एक गोदाम हों। ऐसी  प्रवृति के  कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण तो एक ही है -सब कुछ किस्तों पर ,क्रेडिट कार्डों पर, ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टलस पर  उपलब्ध होना है।  यह सुविधा कुछ समय पहले तक तो नहीं थी , हर खरीद के लिए नकद पैसे देने होते थे और जब तक हमारे पास  पैसे  नहीं होते थे हम खरीदने का साहस  ही नहीं करते थे। इस समस्या से जूझने के लिए गुरुदेव कहते हैं कि संयुक्त परिवार में किसी को भी अपव्यय (wastage ) न करने दिया जाए लेकिन  उचित  आवश्यकताओं की पूर्ति अवश्य की जानी चाहिए।  जो प्राप्त है वही पर्याप्त है का सिद्धांत अमल में लाना चाहिए लेकिन उस सिद्धांत के चक्कर में परिवार कलह -क्लेश का मैदान न बन जाए, इसका भी ख्याल रखना ज़रूरी होना चाहिए। जी भी हो पैसे की फिज़ूल खर्ची  व फूकने की आदत नहीं पड़ने देनी चाहिए।  प्यार-दुलारऔर मोह  में बच्चों को अपव्ययी बना देने का अर्थ है, उन्हें भावी जीवन में दुख-दारिद्रय भुगतने का शाप देना।  

मित्रो, यह तो हमने केवल एक ही पहलु -वित्तीय पहलु -पर चर्चा की है, संयुक्त परिवार में आये दिन इससे भी जटिल और कितनी ही समस्याएं आती रहती हैं।  हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारे सूझवान ,विवेकशील ,बुद्धिमान सहकर्मी परमपूज्य गुरुदेव की शिक्षाओं से अपने परिवारों में स्वर्गीय वातावरण बनाने में सफल तो होंगें हीं ,साथ में आस-पास के परिवारों के लिए एक उदाहरण भी बनेगें – यही है हमारे गुरुदेव का मार्गदर्शन, ऑनलाइन ज्ञानरथ का सन्देश। 

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं जय गुरुदेव। 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें

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10 – परिवार निर्माण के लिए स्वाध्याय की प्रवृत्ति बढ़े – सरविन्द कुमार पाल 

 7 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद  10 – परिवार निर्माण के लिए स्वाध्याय की प्रवृत्ति बढ़े – सरविन्द कुमार पाल 

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत दसवां   लेख। 

आज का ज्ञानप्रसाद  बहुत ही संक्षिप्त था लेकिन हमने इसको आकर्षक ,सरल और रोचक बनाने की दृष्टि से इसमें कुछ additions की हैं ताकि हमारे परिजनों को अपने अन्तःकरण में उतारने  में कोई भी कठिनाई न हो।  यही कारण है कि हम गुरुदेव के साहित्य में से कंटेंट निकाल- निकाल कर, स्वयं चर्चा करके , परिजनों से भी चर्चा की आशा रखते हुए कार्य कर रहे हैं।  हमने बहुत ही  कम परिजनों के साथ बात की है लेकिन  ऐसा प्रतीत हो रहा है कि “ एक virtual प्रज्ञा मंडल” कार्यरत है जिसमें हर कोई अपने अपने विचार रख रहा है।  इन्ही  विचारों के आदान -प्रदान की प्रक्रिया का सुझाव हमने  कुछ समय पूर्व काउंटर कमैंट्स का दिया था।  इस प्रक्रिया ने आज  जो विराट रूप धारण किया  है उसकी एक छवि हमअलग अपडेट में पोस्ट कर रहे हैं । कई बार प्रश्न  उठता  है कि ज्ञानप्रसाद के भरी भरकम लेख लिखने के बजाए उन्ही साहित्य का रेफरन्स क्यों  नहीं दे देते – एकदम उत्तर आता है -तो फिर तूने क्या किया।  तुन्हे कैसे पता चलेगा कि सहकर्मियों ने इनको  पढ़ा भी है कि नहीं, अगर पढ़ा है तो किसके अन्तःकरण में यह ज्ञान घर कर गया ,क्योंकि इस बात का पता तो तभी चलेगा जब  कोई अपने विचार शेयर करेगा, क्योंकि विचारों की भाषा आत्मा की भाषा होती है ,और आत्मा की भाषा परमात्मा की भाषा होती है। आप सब स्वयं देख रहे हैं  कि जो  परिजन केवल “जय गुरुदेव ,धन्यवाद्” कमेंट करते थे आज इतने विस्तृत ,ज्ञानवर्धक कमेंट कर हैं जिनसे औरों को भी ज्ञान तो मिल ही रहा है साथ में सहकारिता ,निष्ठां ,समर्पण और सहभागिता के सिद्धांत को भी बल मिल रहा है। हम  सभी सहकर्मियों की श्रद्धा को नतमस्तक हैं।  सरविन्द  भाई साहिब ने   यह summary  रात के दो बजे ( भारतीय समय )भेजी।  रामलीला में उनकी व्यस्तता के बावजूद वह हमारे साथ व्हाट्सप्प पर जुड़े रहे -धन्यवाद् भाई साहिब -आपके समर्पण को नतमस्तक हैं।

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प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद :

परमपूज्य गुरुदेव ने अति सुन्दर विश्लेषण कर उल्लेख किया है कि हमें परिवार में  स्वाध्याय करने की आदत डालनी चाहिए। स्वाध्याय अधिक से अधिक  लोगों को परिष्कृत( refinement )  करने का सबसे सरल,सहज व सर्वसुलभ विकल्प है। उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने,नहाने-धोने, सोने-जागने और दैनंदिन काम करने की आदत अपनेआप ही अनुकरण से विकसित होती जाती है  लेकिन अच्छी  भावनाओं और विचारों का बीजारोपण केवल अच्छे  साहित्य द्वारा ही संभव हो पाता  है । सृष्टि और मानव जीवन के विषय में मनुष्य की धारणा साहित्य से ही बनती है। ज्ञान अथाह है,असीमित है,अनंत है। कोई भी मनुष्य सब कुछ नहीं जान सकता है। कहने का तात्पर्य यह हुआ कि हम सब लोग सर्वज्ञाता ( जिसे सब किसी का ज्ञान हो ) नहीं बन सकते हैं। यह क्षमता  केवल परमपूज्य गुरुदेव को ही प्राप्त है। मनुष्य के लिए तो  समय भी सीमित है और उस सीमित  समय में से स्वाध्याय के लिए समय निकाल पाना  बहुत बड़ी समस्या हो सकती है।परमपूज्य गुरुदेव ने इस समस्या के निवारण के लिए हमसे कुछ प्रश्न पूछे हैं। इन प्रश्नों के उत्तर जानने का केवल एक ही मार्ग है और वह है -स्वाध्याय।  आइये देखें  कौन से हैं वह प्रश्न ? 

1.मनुष्य क्या है ? 

2.जीवन क्या है ? 

3.जीवन का प्रयोजन क्या है ?

4.प्रयोजन की प्राप्ति के मार्ग कौन-कौन से हैं ?

5.हमारे लिए  अधिक अनुकूल मार्ग कौन-सा हो सकता है ?

6.उस मार्ग पर  बढ़ते रहने की व्यवस्था किस प्रकार बनाई जा सकती है ?

7.उस मार्ग में संभावित अवरोध क्या होंगे ?

8.उन अवरोधों का  सामना कैसे किया जाएगा ? 

9.परिष्कृत व्यक्तित्व किसे कहा जा सकता है ?

10. स्वयं के व्यक्तित्व का वैसा परिष्कार कैसे किया जा सकता है ?

इन प्रश्नों के इलावा  भी और हज़ारों प्रश्न होंगें जिनके उत्तर हमारे पास नहीं हैं इसलिए  इन प्रश्नों को एक से दस तक लिखना केवल symbolic ही है। 

यही है स्वाध्याय –  ज्ञान प्राप्त करने के प्रयास ही स्वाध्याय के अंतर्गत ही  आते हैं। 

परमपूज्य गुरुदेव बताते हैं कि  “व्यक्ति निर्माण” की प्रक्रिया का मार्ग यही है कि प्रत्येक परिवार में श्रेष्ठ वातावरण के निर्माण का सराहनीय प्रयास किया जाए और स्वाध्याय की आदत विकसित की जाए। हमारे परिजन व्यक्ति निर्माण से भलीभांति परिचित हैं।  व्यक्ति निर्माण -परिवार निर्माण -समाज निर्माण -राष्ट्र निर्माण गायत्री परिवार का ,हमारे परमपूज्य गुरुदेव का सबसे उत्कृष्ट उद्घोष है। इसीलिए युगतीर्थ शांतिकुंज को व्यक्ति बनाने की टकसाल कहा जाता है।  जिन परिजनों को इस युगतीर्थ में जाने का ,वहां कुछ समय रहने का ,वहां के वातावरण का स्वाद चखने का सौभाग्य हुआ है वह हमारी बात से पूर्णतया सहमत होंगें।  जिन्हे अभी तक युगतीर्थ शांतिकुंज जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका  है उनके लिए ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार पूर्णतया कार्यरत है कि प्रत्येक घर में शांतिकुंज की स्थापना हो सके। यह स्थापना स्वाध्याय से अवश्य हो सकेगी -ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।   

स्वाध्याय के लिए परिजनों  से प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट के  “समयदान” के लिए निवेदन किया जाए  जिससे वह अपना कायाकल्प करके अपने जीवन को कृतार्थ कर सकें। आजकल के  तथाकथित शिक्षित परिवारों में धार्मिकता की पुरानी परम्पराओं को अधिकांश लोग  अनुपयोगी ही समझते हैं। ऐसे  अधिकतर  परिवारों  में अंदर ही अंदर  धार्मिकता के  प्रति नज़रअंदाज़  का भाव घर कर चुका है।  इसलिए धार्मिकता के सही स्वरूप को समझाने के लिए स्वाध्याय एवं धार्मिक क्रियाओं का समन्वित स्वरूप अपनाना चाहिए। यह बात शत प्रतिशत सही है कि हमारा युवावर्ग  कभी भी ऑंखें   मून्दकर किसी भी  रूढ़ि सिद्धांत  को नहीं मानेगा। युवावर्ग की तो  बात ही छोड़ देतें हैं -क्या हमारा छोटा ,नन्हा बच्चा हमारी कोई भी बात बिना counter question  किए  स्वीकार कर लेता  है ? -नहीं – आज से कुछ वर्ष पूर्व तो माता-पिता यह कह कर चुप करा देते थे -NO ARGUMENTS   यह समय की पुकार है ,नया  युग है।  आज  का युग प्रतक्ष्यवाद का युग है।  आज का मानव उपयोगिता को  समझना चाहता है , आँख मूँद कर किसी की बात पर विश्वास करने का युग नहीं है।  आधुनिकता के नाम पर बढ़ रही त्रुटियों के कारण वह इस पुरातन  साहित्य के स्वाध्याय  को रूढ़िवादिता के साथ  जोड़ा तो जा  सकता है लेकिन आत्मावलोकन प्रणाली (introspection system) से स्वयं उन्हीं निष्कर्षों तक पहुँचने पर वह दुगुने उत्साह के साथ इन विचारों  के प्रचार-प्रसार में जुट सकता है।  

“आत्मावलोकन की सर्वोत्तम पद्धति स्वाध्याय ही है। आत्मावलोकन का अर्थ होता है -अपनेआप को जानना।” 

ऊपर लिखे 10 प्रश्नों के उत्तर शायद ही किसी तथाकथित शिक्षित व्यक्ति के पास हों – हमारे पास तो नहीं हैं। 

यही कारण है कि गुरुदेव ने  धार्मिकता के प्रगतिशील स्वरूप को  स्वाध्याय की आदत से जोड़ा जाना आवश्यक माना  है। सत्साहित्य (अच्छा साहित्य ) के पठन-पाठन से व  श्रेष्ठ परम्पराओं के संयुक्त प्रयास से धार्मिकता का सात्विक विकास निर्मित होकर प्रेरणा एवं प्रकाश के केन्द्र का काम करता है।  व्यक्ति और समाज में जब रूपान्तरण की घटना घटती है, तो उसका प्रमुख माध्यम “स्वाध्याय” ही होता हैं और स्वाध्याय से सत्प्रेरणा मिलती है। जब यह सत्प्रेरणा  आचरण में उतरती  है,तो उसका परिवर्तन सामने आता है। एक ऐसा परिवर्तन, जो यदि अनवरत चलता रहे तो  नर को नारायण, मानव को महामानव और समाज को स्वर्ग बना देता है।  परमपूज्य गुरुदेव ने  सम्पूर्ण जगत के लिए  “युगसाहित्य” रूपी एक ऐसा अमूल्य रत्न देकर समूची मानव जाति के लिए एक प्रकाश-पथ की रचना कर दी है। 

अब आवश्यकता है कि हम सब इस साहित्य का  नियमित रूप से स्वाध्याय करें और अपने अंतःकरण में महानता के अवतरण को साकार करें।ऑनलाइन ज्ञानरथ में हम सब इसी प्रयास में जुटे हुए हैं। प्रतिदिन सूर्य की प्रथम किरण के साथ दैनिक ज्ञानप्रसाद इसी दिशा में एक प्रयास है।     

हमारा प्रयास है कि प्रत्येक परिवार में स्वाध्याय की परंपरा चले और इसके लिए घर में यथासंभव एक अलग कमरा रखा जाए जैसे  पूजन-कक्ष होता है। इस कमरे में आधुनिक अच्छी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही उत्कृष्ट पुस्तकें भीरहें  और इस कमरे की  तथा अलमारी में राखी सभी पुस्तकों की साफ-सफाई व स्वच्छता का ध्यान पूजा-कक्ष की ही तरह ही रखा जाना चाहिए। समय-समय पर पुस्तकों को धूप-स्नान कराना न भूलें तथा फिनाइल की गोलियां भी उस अलमारी में रख दी जाएं, ताकि किताबों में कीड़े-मकोड़े न लग सकें। जीवन निर्माण में सहायक पुस्तकें,अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना जैसी  पत्रिकाओं के नियमित पाठक बनाकर अपना सुधार करते हुए औरों को सुधारने एवं परिष्कृत करने का पुण्य कमाया जा सकता है।

अगर हम कहते हैं कि  समय बदल गया है तो  नए साधन भी  तो उपलब्ध हो गए हैं। हमारे पूर्वर्जों के पास कहाँ मोबाइल  फ़ोन थे ,इंटरनेट था। इतनी दूर से हमारा ज्ञानप्रसाद आपके पास एकदम पहुँच रहा है – कभी कल्पना की थी क्या ? अगर कहा जाये कि आज स्वाध्याय करना अधिक  सरल है तो शायद गलत न हो।  सत्प्रेरणा देने, सद्विचार व सद्भावनाएं जगाने वाला साहित्य कहाँ से मिल सकता है? सम्भव प्रयास करने पर इसकी जानकारी कर पाना कोई कठिन समस्या नहीं है। आजकल तो कहीं भी जाकर ढूंढने की समस्या नहीं है।  गूगल महाराज हमारे सबसे बड़े मार्गदर्शक के रूप में 24 घंटे हमारी सेवा में उपस्थित हैं। श्रेष्ठ विचार, उत्कृष्ट भावनाएँ और बड़ी कल्पनाएँ अच्छी पुस्तकों में ही उपलब्ध हो सकती हैं।  अतः सत्साहित्य के नियमित स्वाध्याय से जीवन को विकास एवं प्रगति की दिशा में अग्रणी बना सकने में परिवार के सभी सदस्य समर्थ हो सकें, इसके लिए उनमें स्वाध्याय की आदत विकसित की जानी चाहिए जिससे कि वह नशीले पदार्थो की तरह नियमित सत्साहित्य पढ़ने के आदी हो जाएं और यह महत्वपूर्ण  जिम्मेदारी परिवार के मुखिया की होनी चाहिए कि वह अपना परम कर्त्तव्य समझकर या गुरु आज्ञा मानकर अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को पूरा करे।  विचारों और भावनाओं के संघर्ष में यही पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती हैं।  इसलिए परिवार में जीवन निर्माण की प्रेरणा भरने वाले साहित्य का होना और उसके स्वाध्याय की आदत परिवार के सभी सदस्यों में होना आवश्यक है।  यदि परिवार में  स्वाध्याय की आदत न हुई  तो पुस्तकों या साहित्य का संग्रह किस काम का ? अतः  परिवार का हर सदस्य स्वाध्याय को अपनी आदत में ढाले और स्वाध्याय का समय नियत और नियमित हो जो कि अति उत्तम है। यदि परिवार के सभी सदस्य आपस में मिलकर साथ-साथ बैठकर महत्वपूर्ण एवं मार्मिक प्रसंगों की सहचर्चा या सत्संग करें  तो अति उत्तम है। सहचर्चा या सत्संग से सद्भावना पुष्ट होती है। परिवार में एक साथ रहकर, उठते-बैठते, चलते-फिरते व खाते-पीते भी उन पर चर्चा होती रह सकती है। ऐसी चर्चा से एक तो परिवार के सभी सदस्यों में आत्मीयतापूर्ण संवाद की स्थिति बनी रहेगी, दुसरे  सूझ-बूझ का विकास होगा क्योंकि  “खाली दिमाग, शैतान का घर” होता है। प्रत्येक परिवार में “ज्ञान-देवता” की इस उपासना, साधना व आराधना के साथ-साथ “भाव-देवता” की नियमित उपासना साधना व आराधना भी चलनी चाहिए  तभी पारिवारिक संतुलन को साधा जा सकता है और परिवारों में स्वाध्याय की आदतों को बढ़ाया जा सकता है। 

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं जय गुरुदेव। 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें

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9. परिवार में आस्तिकता का वातावरण कैसे बनाएं  – सरविन्द कुमार पाल  

5 नवम्बर 2021  का ज्ञानप्रसाद  9. परिवार में आस्तिकता का वातावरण कैसे बनाएं  – सरविन्द कुमार पाल  

परमपूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु  पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत नौंवां  लेख। 

परिवार निर्माण की शृंखला में नौंवां लेख प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। हम  दोनों गुरुभाई अथक परिश्रम करके आपके  समक्ष अपनी अल्प बुद्धि एवं अल्पज्ञान से सर्वश्रेष्ट कंटेंट लाने का प्रयास तो कर ही रहे हैं ,लेकिन आप सब भी अपनी भूमिका निभाने में कोई कसर  नहीं छोड़ रहे हैं।  पंचशील से आरम्भ करके आज ज्ञानरथ के सप्तऋषियों की सूची रिलीज़ करते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है। सभी को बधाई और शुभकामना। सविंदर जी ,अरुण वर्मा जी ,निशा भरद्वाज जी ,रेनू श्रीवास्तव जी ,विदुषी बहिन जी , बबिता तंवर जी और प्रेरणा बिटिया सभी सप्तऋषि आत्मओं ने 24 आहुतियों का संकल्प पूर्ण किया है।  दिन -प्रतिदिन नए सहकर्मी इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं और जानकरी भी प्रपात कर रहे हैं।

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आस्तिकता क्या है ?

परम पूज्य गुरुदेव ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में लिखा है कि संसार की शांति और सुव्यवस्था इसी बात पर निर्भर है कि मनुष्य हमेशा उच्चस्तरीय भावनाओं से ओतप्रोत रहे।  मनुष्य की यह भावनाएं अंतःकरण से निकलती हैं, बाहर से नहीं थोपी जा सकती हैं और अंतःकरण में प्रभाव डालने की शक्ति श्रद्धा, समर्पण व विश्वास में ही सन्निहित रहती है जिसे परमात्मा की आवाज कहते हैं। इसके लिए यह अति आवश्यक है  कि परिवार में आस्तिकता, आध्यात्मिकता व धार्मिकता का माहौल विकसित होता रहे, उसका विशेषकर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए और आस्तिकता के साथ कर्मफल का अपना अलग महत्व है क्योंकि बिना कर्मफल के ईश्वर में विश्वास की बात कम जँचती है।  इस तरह से पारिवारिक आस्तिकता का वातावरण हम सबको गलत रास्ते से बचाते हुए सत्कर्म करने की प्रेरणा प्रदान करता है,क्योंकि चरित्र निष्ठा के लिए यह बहुत जरूरी है कि मनुष्य आत्मगौरव का अनुभव करे, आत्मविश्वासी बने और अपने कर्त्तव्य पालन का महत्व समझे। 

मनुष्य को मनुष्य बनाना बहुत कठिन है मनुष्य को सच्चे अर्थो में मनुष्य बनाने की सम्भावना उच्च आदर्शवादिता पर आधारित है और उसे विकसित करने के लिए हर परिवार में, हर घर में जन-जन तक आस्तिकता का वातावरण बनाना चाहिए। 

इसके लिए बहुत आवश्यक है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य आत्मकेन्द्रित व आत्मनिर्भर होकर विचार करे और किसी न किसी रूप में परम पिता परमात्मा से सम्पर्क स्थापित करने का सुअवसर प्राप्त करता रहे ताकि वह आनंदमय होकर परमात्मामय हो जाए, इसे कहते हैं पारिवारिक आस्तिकता का वातावरण जो कि बहुत ही सुहाना  होता है।

हम पूजा पाठ क्यों करते हैं ?  

परम पूज्य गुरुदेव लिखकर बताते हैं कि ईश्वर की उपासना, साधना व आराधना से लेकर स्वाध्याय-सत्संग तक सभी धर्मो का मूल उद्देश्य यह है कि मनुष्य चरित्रनिष्ठ व समाजनिष्ठ बने क्योंकि “ईमानदारी को ईश्वरभक्ति” का ही एक रूप माना जाता है। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि- क्या सारे भक्त ईंमानदार होते हैं ? य ऐसे कहें- क्या सारे ईमानदार भक्त होते हैं ? इस प्रश्न के निवारण के लिए हमने ( डॉ अरुण त्रिखा ) कुछ समय पूर्व एक चर्चा पढ़ी  उसी को आपके साथ शेयर करते हैं। चर्चा इस प्रकार है:

ईमानदारी का अर्थ है कि  आपको पता हो कि जिस वस्तु  का आप प्रयोग कर रहे हो वह किसकी है। यदि यह वस्तु  किसी दूसरे की  है और आप  उसे बिना पूछे प्रयोग करें तो वह चोरी होगी। जी हाँ, इसलिए  एक ईमानदार व्यक्ति सदा ही किसी दूसरे की वस्तु को अपना नहीं समझता अपितु उसकी आज्ञा अनुसार ही उस वस्तु  का प्रयोग करता  है। अब समझने वाली बात यह है कि हमारी कौन सी वस्तु है और हमारे पड़ोसियों की कौन सी  हैं? इस प्रश्न का उत्तर तो बिल्कुल  सीधा है। जो वस्तु जिसने खरीदी, वह उसी की है। है ना? एक भक्त यह भलिभांति  समझता है कि  उसका तो  कुछ भी नहीं है।कबीर जी ने कितनी विशालता से समझाया है -“मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा  ” असली ईमानदारी यही  है। वह जानता है कि 

 इस ब्रह्माण्ड में जो भी कुछ है वो भगवान् का दिया हुआ है और हमे बस उसे प्रयोग करने का अधिकार मिला है। 

कुछ भी हमारा नहीं  है। न ही कोई वस्तु, न ही कोई रिश्ता और न ही यह घर अथवा देश। हम ईश्वर के हैं और उन्होंने हमारे लिए अनेक प्रबंध किये हैं ताकि  हमारे भौतिक शरीर को कोई  कष्ट न हो। अब आप कहेंगे की क्या यह गैस चूल्हा भगवान् ने बनाया? या यह  जो कार का आप इस्तेमाल करते हैं वो ईश्वर ने बनाई है क्या ? इसका एक उदाहरण ऐसा भी  हो सकता है -आप भले डॉक्टर बन जाए या इंजीनियर लेकिन जिन माता पिता के कारण आप पढ़ना सीखे अथवा जिन्होंने अपने पैसे खर्च करके आपको इस योग्य बनाया  उनका एहसान कभी भी नहीं  उतरता, जो भी आपका है वो उन्ही के कारण है, उसी प्रकार इस धरती पर जो भी है प्रकृति की ही  देन है, वह ईश्वर द्वारा ही निर्मित है। जो आपके पास दिमाग है, वो भी ईश्वर द्वारा ही दिया गया है, तो यहाँ की कोई भी वस्तु  आपकी कैसे हो गयी ? यहाँ सब  कुछ ईश्वर का है और जो आपने खरीदा, आपको केवल उसका  उपयोग करने का अधिकार मिला है । वह आपका नहीं हो गया। यहाँ पर  दो बाते चिंतन  करने की हैं। 1.एक तो यह कि हम जब भी कुछ भी ग्रहण करें, ख़ास कर के भोजन, उसके लिए पहले भगवान्  का आभार व्यक्त करें कि “हे भगवान्  यह सब आपका है, कृपया मुझे ग्रहण करने की आज्ञा दें” 2.दूसरी बात यह, कि  जब हमारा कुछ है ही नही है तो लालच कैसा? आपका शरीर जितना भोजन पचा सकता है, आप उतना ही खाएंगे, आप एक ही बिस्तर पर सो सकते हैं, उसी पर सोएंगे, आप एक ही जगह रह सकते हैं, तो एक ही घर की आवश्यकता है तो लालच कैसा? इसलिए ईमानदारी ज़रूरी है, यह जानना ज़रूरी है की हमारा किसी पर कोई अधिकार नही है, हमे जो भी भौतिक सुख मिले हैं वे भक्ति करने के लिए उपयोग में होने चाहिए ना कि  दूसरों को कष्ट पहुचाने के लिए।

“आस्तिकता, आध्यात्मिकता व धार्मिकता की त्रिवेणी :”

उदार-भाव व परमार्थ-परायणता की नीति अपनाने पर ही किसी मनुष्य को धर्मात्मा कहा जा सकता है।  आस्तिकता, आध्यात्मिकता व धार्मिकता की त्रिवेणी एक ही पुण्य फल प्रदान करती है।  मनुष्य सही मायने में मनुष्य बने तथा मनुष्य को मनुष्य बनने का यही सही विकल्प है। परमात्मा का अवतार धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश करने के लिए होता है, अतः हर ईश्वरभक्त  मनुष्य के अंतःकरण में देवत्व का उदय और आसुरी शक्तियों के प्रति संहारक का भाव होना चाहिए। हमारा प्रयास होना चाहिए कि परिवारों में आस्तिकता की जड़ों को मज़बूत किया जाए और  उसके तत्वज्ञान को समझा जाए। हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य व विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयास करना चाहिए।  भगवान का भय मनुष्य को सही रास्ते में चलाते रहने का सबसे बड़ा नियंत्रक है।  राजकीय कानून या सामाजिक दंड की अवहेलना दुस्साहसी लोग करते रहते हैं। आजकल अपराधियों का इतना अधिक  बाहुल्य है कि  जेल जाने तक का भय भी इस बाहुल्य को कम  नहीं कर पाता है।  लेकिन यदि परिवार में किसी भी सदस्य का भगवान पर अटल विश्वास है और हम चारों ओर, प्रत्येक इंसान में  कण-कण में भगवान को समाया हुआ देखें  तो किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना सम्भव  नहीं हो सकता है। जिस मनुष्य की  आस्था कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर है तो वह अपना भविष्य अंधकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने की हिम्मत कैसे कर सकेगा। दूसरों को ठगने या परेशान करने का मतलब है कि आप सीधे भगवान को ठग रहे हैं य परेशान कर रहे हैं। आस्तिक प्राणी से ऐसी भूल कभी भी नहीं हो सकती  क्योंकि उसके अंतःकरण में भगवान पर विश्वास, भय और कर्मफल की आवश्यकता गहराई तक जमी होती है  और वह गलतियों से बहुत डरता है। वह हमेशा सच्चाई के मार्ग पर अटल रहता है और जल्दी विचलित नहीं होता है।  परमपूज्य गुरुदेव  कहते हैं कि  ईमानदार और चरित्रवान को  आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है।  झूठी भक्ति जिसमें 24 घंटे में 23 घंटे 30 मिंट  पाप करते रहना  और शेष 30 मिंट   ज़ोर -ज़ोर से पूजा-पाठ करना आस- पास के लोगों को सुना कर जप करना बिल्कुल ही व्यर्थ है। ऐसा करने से  पापों से मुक्ति मिलने की आशा करना व्यर्थ है। यह प्रक्रिया  हँसी का कारण बनती है और देवी-देवताओं के दर्शन करने मात्र से सभी मनोकामना  पूर्ण हो जाने की मान्यता  अज्ञानता कही जा सकती है।  ईश्वर में  विश्वास होना  और आस्तिकता के होने  का प्रतिफल एक ही होना चाहिए कि सन्मार्ग का ग्रहण  और कुमार्ग का त्याग। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्त्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर दूसरा कोई प्रभावशाली माध्यम हो ही नहीं सकता है जिस पर चला जा सके! 

परमपूज्य गुरुदेव हमें  समझा रहे हैं कि जिस मनुष्य को अपने परिवार से प्यार है उसे अवश्य ही  प्रयत्न करना  चाहिए कि परिवार के हर सदस्य के जीवन में  उपासना, साधना व आराधना का  बीजारोपण कर आस्तिकता के  बीज को अंकुरित करे ताकि   अध्यात्म के प्रति उनकी  रुचि बढ़े और वह ऊर्जावान, निष्ठावान, उदारवान, विचारवान, श्रद्धावान, सामर्थ्यवान, सूझवान, प्रतिभावान, प्राणवान, संस्कारवान व पवित्रवान आत्मा बनें। 

आनलाइन ज्ञानरथ परिवार के प्रयासों से  प्रेरित होकर अपने परिवार में ऐसे संस्कारों  का बीजारोपण करें  जिससे परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वव्यापी बने। जिस प्रकार शरीर के विकास  के लिए हम  भोजन की व्यवस्था करते हैं , उसी प्रकार आत्मिक विकास के साधन ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। इस दिशा में सबसे सरल मार्ग श्रद्धा,  समर्पण एवं  निष्ठा के प्रति निरंतर  अभिरुचि बनाए  रखना है। समझाने-बुझाने का तरीका, चर्चा करने का तरीका, वीडियो का माध्यम,  शिक्षाप्रद  टीवी प्रोग्राम देखने आदि कुछ  विकल्प सुझाये जा सकते हैं। व्यक्तिगत स्थितियों को ध्यान में रखते हुए और भी विकल्प ढूढ़े जा सकते हैं  

अधिकतर देखा गया है कि  परिवार के सदस्य मुखिया का अनुकरण करते हैं और उसी के  बताए हुए मार्ग पर चलते हैं। इसलिए परिवार के मुखिया को  चाहिए वह एक मार्गदर्शक की तरह ,एक  ROLE MODEL की तरह दिनचर्या का निर्वाह करे।  देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, आय से अधिक  खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि कोई भी बुराईयाँ हों तो उन्हें छोड़ने के लिए मुखिया को  उचित प्रयास करने चाहिए।  ऐसा प्रयास करने से  पारिवारिक वातावरण संस्कारित होगा  क्योंकि यह बातें परिवार के बाकी सदस्यों के  भविष्य की हैं। अगर इन आदतों तो अन्यथा लिया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। गुरुदेव ने एक और अच्छी बात लिखी है कि नास्तिकता, उपासना, साधना व आराधना की अवहेलना करने जैसे आध्यात्मिक दुर्गुणों को  घर से निकालने के लिए  सदस्यों को सावधानी से समझाना  चाहिए ताकि पारिवारिक वातावरण दूषित न होने पाए।  इस तरह से पारिवारिक वातावरण को संस्कारित व पवित्र बनाने के लिए हम सबको परिवार का कुशल नेतृत्व करते हुए नियमित परिवार के सभी सदस्यों का बारीकी से निरीक्षण करते रहना चाहिए और घर के प्रत्येक सदस्य को आस्तिक बनाया जाना चाहिए ताकि उस मार्ग को अपनाकर वे अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकते हैं।  परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि यह परिवार की सबसे बड़ी सेवा, धर्म और  कर्त्तव्य है। जब हम परिवार के मुखिया द्वारा मार्गदर्शन के बात कर रहे हैं तो अन्य सदस्यों विशेषकर युवा पीढ़ी को भी साथ लेकर चलना चाहिए।  हम तो कहेंगें कि आज के युग में नन्हे -नन्हे बच्चे भी कितना  कुछ सिखा जाते हैं।

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को विराम देते हैं जय गुरुदेव। 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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8. परिवार निर्माण के लिए  सुसम्पन्ता (ऐश्वर्य ) ही नहीं,सुसंस्कृत भी बनाएं -सरविन्द कुमार पाल  

3 नवम्बर 2021 का ज्ञानप्रसाद –  8. परिवार निर्माण के लिए  सुसम्पन्ता (ऐश्वर्य ) ही नहीं,सुसंस्कृत भी बनाएं -सरविन्द कुमार पाल  

 परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत आठवां   लेख। 

आज का ज्ञान प्रसाद आरम्भ करने से पहले आइए हम सब भाई बहिन सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से उन पांच ग्रुपों  के सहकर्मियों को बधाई दें , अपने श्रद्धा सुमन  भेंट करें जिन्होंने पंचशील का सम्मान प्राप्त किया है।  अभी कुछ ही दिन पूर्व सरविन्द भाई साहिब ने  कमैंट्स की 24 आहुतियों का सुझाव दिया था और आग्रह किया था कि सभी भाई बहिन इस संकल्प में अपना योगदान देकर पुण्य के भागीदार बनें।  उनके आग्रह का सम्मान करते हुए एक नहीं ,दो नहीं पांच ग्रुपों ने इस टारगेट को पार करते हुए ऑनलाइन ज्ञानरथ की श्रद्धा और समर्पण में चार चाँद लगाए हैं। यह पांच ग्रुप -हमारी प्रेरणा बिटिया -२४, सरविन्द भाई साहिब -३१,रेनू श्रीवास्तव बहिन जी -२७,संध्या बहिन -२७ और अरुण वर्मा भाई साहिब – २६  हैं।  इस संकल्प और पुरषार्थ को ऐसा -वैसा न समझा जाये ,यह एक milestone है,  जो ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की संकल्प शक्ति का  साक्षी  है। 

अब बात आती है आज के लेख की – यह लेख बहुत ही छोटा था, इसे किसी और लेख  के साथ club भी नहीं किया जा सकता था। तो हमें अवसर मिला कि हम  इतने महत्वपूर्ण लेख में अपने विचार व्यक्त करें। विचार व्यक्त करने को  हमारा मन तो रोज़ ही करता था लेकिन शब्द सीमा हमें आज्ञा नहीं देती थी।  हो सकता “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है” सिद्धांत   और अल्प  साधनों वाली  बातें कई पाठकों के मन को भाती हों लेकिन यह हमारे  व्यक्तिगत विचार है ,किसी का भी हमारे साथ सहमत होना य न होना उनकी स्वंत्रता है।  हमने तो वही लिखा जो हमने सम्पूर्ण जीवन भर किया य देखा। 

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 परम पूज्य गुरुदेव बहुत ही सरल भाषा में लिखकर समझाते हैं कि धन निर्वाह की एक सर्वविदित आवश्यकता है, लेकिन वह आवश्यकता उतनी बड़ी भी नहीं है कि जिसके उन्माद में उन्नति की अनेक प्रकार की आवश्यकताओं को पूरी तरह से भुला ही दिया जाए,यह कदाचित ठीक नहीं है। 

धन बहुत कुछ  है लेकिन धन ही   सब कुछ नहीं है।  

मनुष्य का सम्पूर्ण विकास ही वास्तविक विकास माना जाता है।  यदि शरीर का एक अंग बहुत ही मोटा या फूल जाए  तो यह कोई उपलब्धि नहीं बल्कि बीमारी ही कही  जाएगा।  इसी प्रकार यदि परिवार की अर्थव्यवस्था तो बहुत ठीक है, लेकिन यदि परिवार के  सदस्यों का स्वास्थ्य, स्वभाव व चिन्तन-चरित्र गड़बड़ाने लगे और वे सभी निरंतर दुष्प्रवृत्तियों  के कुचक्र में उलझते जाएं तो समझ लिया जाना चाहिए कि परिवार में संकटों के  के बादल घिरने लगे हैं  और परिवार में बहुत बड़ा संकट खड़ा होने वाला है।  इन  विषम परिस्थितियों में पारिवारिक सम्पन्नता  दुर्गुणों की वृद्धि में सहायक सिद्ध होगी। ऐसी स्थिति  बहुत ही भयानक विनाश का कारण बनेगी और पारिवारिक सम्पन्नता या अर्थव्यवस्था एक दिन जलकर राख हो  जाएगी।  गुरुदेव लिखते हैं कि इससे  अधिक फायदे में  तो  वह गरीब  हैं जो कि रोज कमाते हैं और रोज खाते हैं , दुर्व्यसनों के लिए उन गरीबों के पास खाली समय ही नहीं रहता है और  अनावश्यक खर्च करने के लिए उनके पास इतनी धन-सुविधा है  ही नहीं । 

 गरीब “जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है” को ईश्वर मानकर अपने परिवार में मस्त रहता है। 

वह  परिवार को ही सर्वोपरि मानकर उसी की जीवन साधना  में दिन भर उपासना करता रहता है और परिवार को सुसंस्कृत ( संस्कारवान ) बनाकर समुन्नत जीवन जीता है।   वही भगवान का सबसे बड़ा व सच्चा भक्त होता है।  निर्वाह साधनों की तरह स्वास्थ्य भी एक महती आवश्यकता है और उसे वास्तविक व आधारभूत माना जाना चाहिए।  स्वास्थ्य की प्राप्ति  महँगे-महँगे स्वादिष्ट व्यंजनों या पौष्टिक दवाओं के सहारे नहीं बल्कि  प्रकृति का अनुसरण करने से  होती है। इन्द्रिय संयम आहार में ही नहीं, विहार में भी करना चाहिए। देखा गया  है कि अधिकतर लोग आवश्यकता से अधिक मात्रा में अभक्ष्य पदार्थों का समय-कुसमय  भक्षण करते रहते हैं।  रसोईघर में क्या बने, किस प्रकार बने और उसे कौन कितनी मात्रा में, किस प्रकार खाए, इसकी सुव्यवस्था बना लेना, घर को एक सुरक्षित किला बना लेना है।  

आहार, श्रम और दिनचर्या में सुव्यवस्था का नियम एक ऐसा सिद्धांत है  जिसका ठीक तरह से पालन करते रहने पर स्वस्थ रहने की गारंटी मिल जाती है।  

स्वास्थ्य के अभाव में सब कुछ नगण्य हो जाता है और नाना-प्रकार के स्वादिष्ट व पौष्टिक व्यंजन का महत्व कुछ मायने नहीं रखता है।  परिवार के  मुखिया  उचित-अनुचित तरीकों से अपनी व अपने परिवार की सम्पन्नता बढ़ाने में अनवरत जुटे रहते हैं और इसी में वे अपना गौरव मानते हैं तथा वर्तमान व भविष्य को सुख-शांति से भरा-पूरा होने की निरंतर कल्पना भी करते रहते हैं।  लेकिन होता ठीक इससे विपरीत ही है। परिवार में जब अनावश्यक  धन आ  जाता है तो फिर अपव्यय ( wastage ) सूझता है और उसके बदले में बुरी संगति में पड़कर व्यसन व दुर्गुणों का पिटारा ही हाथ पल्ले पड़ता है।  सम्पदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपक जाते हैं और खून पीते रहते हैं।  इस तरह से पारिवारिक सम्पन्नता हमें  विलासिता सिखाती है, आलसी, प्रमादी व अहंकारी बनाती है। इस सत्यता को न समझ पाने वाले ही यह सोचते रहते हैं कि धन-वैभव ही सब कुछ है और उसकी बड़ी मात्रा हाथ लगने पर  सुख- सुविधा के प्रचुर साधन जुटाए जा सकते हैं। ऐसे लोग  अपने को व अपने परिवार को सर्वगुणसम्पन्न मान लेते हैं जो  परिवार के हितार्थ नहीं है। परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसे ही लोगों को भटका हुआ देवता की संज्ञा दी है जो एकदम सत्य है। परिवार को सुसम्पन्न बनाने के लिए जितना प्रयास किया जाता है, उसकी अपेक्षा यदि परिवार को परिष्कृत कर सुसंस्कृत  बनाने का प्रयत्न किया जाए तो कितना ही अच्छा हो। धन कमाने की इस RAT- RACE ने परिवारों का सत्यानाश सा कर रखा है।  हम-आप सभी वर्तमान युग के ही प्राणी हैं।  इस RAT RACE का आँखों देखा हाल हमें आए  दिन  देखने को मिलता रहता है जो हमारे परिवारों में कलह का कारण बन चुका  है। और सबसे बड़ी हैरानगी वाली बात तो यह है कि इस रेस में हमारे इर्द -गिर्द हर कोई लगा हुआ है, हर कोई criticize भी कर रहा है।  इसी double -standard  ने हमारा सत्यानाश कर दिया है।  घर का मुखिया अक्सर यही कहता सुना जायेगा – “ मैं  रात दिन मर -मर कर आप के लिए ही तो कमा रहा हूँ” और ऐसे मुखिया लोगों  के पास समय ही नहीं है कि वह अपनी संतान को कुछ  अच्छे संस्कार दे सकें।  परमपूज्य गुरुदेव कहते   हैं “संस्कारवान पीढ़ी  वह सम्पदा है जो जीवन भर तो साथ देती ही है, आने वाली कई पीढ़ियों  को भी संस्कारित करती जाती है । ऐसे वातावरण से ही नर- रत्न निकलते हैं। यह पंक्तियाँ हम अपने एक सहकर्मी के कमेंट से प्रेरित होकर लिख रहे हैं। कमेंट करने वालों के  नाम का ज्ञान होता तो नाम से  धन्यवाद् कर देते परन्तु इस कमेंट की ID  किसी स्कूल के  नाम से सेव की हुई है।  संस्कारवान एवं  सद्गुणी मनुष्य  अपनों के बीच ही नहीं दूसरों के बीच भी सम्मान और सहयोग प्राप्त करता है। इतिहास साक्षी है कि महापुरषों को हम उनके सद्गुणों के कारण ही जानते हैं क्योंकि  सद्गुणों से उनके  व्यक्तित्व का वजन बढ़ता है, उन्हें  हर जगह  मान-सम्मान मिलता है और समाज में उनका  बढ़- चढ़कर मूल्यान्कन होता है।  

परमपूज्य गुरुदेव  समझाते हैं कि सुसंस्कृतता ही  वह आधार है जिसके कारण सबका स्नेह, सहयोग व सद्भाव परिपक्व रहता  है।  जिस किसी के पास यह  उच्चस्तरीय पूंजी है, उसके पास निर्वाह के बहुत ही कम  साधन रहते हुए भी आत्मसंतोष एवं लोकसम्मान की कभी कमी नहीं रहती , वह सदा सुखी व समुन्नत जीवन जीता है और  वही भगवान का सबसे प्रिय भक्त होता है। ऐसा मनुष्य इतना अर्जित कर सका कि  उसके पास सामान्य सुविधाएं ( BASIC NEEDS) हैं। सामान्य सुविधाएँ होने के बावजूद ऐसे मनुष्य को कभी भी  अनुभव नहीं होता है कि वह दरिद्र है य  उसे दूसरों से  कम प्रसन्नता मिल रही है। वह तनिक भी   चिन्ता  नहीं करता है कि दूसरों के पास क्या है ,कौन सी गाड़ी है ,कितने  बैड रूम का घर है। और सबसे बड़ी बात वह हमेशा खुश रहता है।

हमारे पाठक/ सहकर्मी  अवश्य ही सोच रहे होंगें कि यह बातें लिखने के लिए  /प्रवचन करने लिए बहुत अच्छी लगती है -रियल लाइफ में बहुत ही कठिन है ,कुछ और ही है। ऐसे पाठकों से हम एकदम सहमत हैं -बहुत कठिन है – इसलिए तो  संस्कारित परिवार को “ तपस्या” की संज्ञा दी गयी है। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से हमें अवश्य  सीखना चाहिए नहीं तो चाहे हम 400 लेख लिख दें य 4000 , यह केवल पन्नें काले करने जैसा ही होगा।       

परिवार को सुसम्पन्न बनाने के व्यापक प्रचलन में बदलाव अवश्य ही  होना चाहिए और विचार करना चाहिए कि इस ललक को अधिक मात्रा में परिपोषण करने का दुष्परिणाम एक न एक दिन सामने आकर ही रहेगा।  इसलिए जितना निर्वाह के लिए नितान्त आवश्यक है, उतना ही कमाया जाए ताकि किसी को पूर्वजों की गाढ़ी कमाई पर गुलछर्रे उड़ाते  दिन काटने की ललक न उठे।  परिवार के हर सदस्य को यह सोचने का मौका देना चाहिए कि हमारे बच्चों को अपने पैरों खड़े होना है और उसे स्वावलंबी बनना है। हर प्रगतिशील को सद्गुणों की पूंजी ही शुरू से अंत तक काम देती रही है और उसी के भरोसे अपने को समर्थ, सुयोग्य, प्रमाणिक व सम्मानित बनने का सुअवसर मिलता रहा है और यदि दूरदर्शिता की तनिक भी कमी रही तो उसका सदुपयोग नहीं बन पड़ता है बल्कि दुखों का जखीरा जमा करते जाते हैं।  

परमपूज्य गुरुदेव बताते हैं कि जिस प्रकार  शिल्प, संगीत, साहित्य व कला-कौशल अर्जित करने के लिए  बहुत दिनों तक लगातार अभ्यास करना पड़ता है, उसी प्रकार सद्गुणों को स्वभाव का अंग बनाने के लिए हमें  दैनिक जीवन में भरपूर स्थान देने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना पड़ता है। ऐसा इसलिए है कि आदतें देर से  पकती हैं, वे  हथेली पर  सरसों जमाने की तरह न तो तुरत-फुरत उपलब्ध होती हैं और न ही हम  जमी हुई आदतों को जल्दी -जल्दी छोड़ पाते हैं।  उन्हें योजनाबद्ध तरीके  से अपनाकर व्यवहार में उतारना पड़ता है।  इसलिए परिवार के वरिष्ठों  का  ध्यान इस पर  पर केन्द्रित रहना चाहिए और उन्हें अपने पारिवारिक सदस्यों को सुशिक्षित व सुसंस्कारी बनाने के लिए पूरी सतर्कता के साथ निरंतर प्रयत्न करना चाहिए। इस पुनीत कार्य  में परिवार के मुखिया  को रत्ती भर भी कंजूसी  नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही नरक का द्वार खोल सकती है।अभी  पिछले ही लेख में लिखा था “सावधानी हटी दुर्घटना घटी” -यह signboard हमें वार्निंग देने के लिए ही होते हैं। हम क्षमा चाहते हैं -हमारे लेख भी अवगत कराने  के लिए ही हैं। 

आज इतना ही ,जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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7  पारिवारिक उन्नति के लिए  पंचशीलों का पालन -सरविन्द कुमार पाल 

2 नवम्बर 2021का ज्ञानप्रसाद : 7  पारिवारिक उन्नति के लिए  पंचशीलों का पालनसरविन्द कुमार पाल 

आज के ज्ञानप्रसाद में हम  पांच विशेषताओं- अनुशासनों पर चर्चा करेंगें जिनका किसी भी कार्य क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान है।  परिवार निर्माण में  इन अनुशासनों की अधिक आवश्यकता है क्योंकि यहीं से तो समाज की ,राष्ट्र की, नींव डाली जाती है। हमने पंचशील नामक पांच अनुशासनों  की सरल परिभाषा बनाने का प्रयास किया तो और ही अधिक confuse होने लगे क्योंकि यह बहुत ही विस्तृत विषय है। इसलिए बेहतर है कि आप सब  हम दोनों भाइयों के प्रयास का अमृतपान करें और सूर्य भगवान् की प्रथम किरण से अपने दिन को और अधिक ऊर्जावान बनाएं। 

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पारिवारिक उन्नति के लिए “पंचशीलों” का पालन करना अति आवश्यक है जिसमें परिवार के सभी सदस्यों को मर्यादित अनुशासन में रहना पड़ता है। यह कोई सामान्य सी बात नहीं है, इसका बहुत बड़ा गूढ़  रहस्य है जिसे जानना और समझना हमारा परम कर्त्तव्य है। पंचशील, परिवार का कुशल नेतृत्व करने में बहुत  बड़ा हथियार है। पंचशील के द्वारा  हम पारिवारिक उन्नति कर सकते हैं, पारिवारिक उन्नति से  समाज की उन्नति है, समाज उन्नति से राष्ट्र की उन्नति है और राष्ट्रीय उन्नति से सम्पूर्ण विश्व की उन्नति सम्भव है।

“इससे वसुधैव कुटुंबकम का सिद्धांत  चरितार्थ होता  है” 

परमपूज्य गुरुदेव ने आदर्श परिवार की दिशा में पाँच प्रमुख सत्प्रवृत्तियाँ लिखी हैं जिन्हें पंचशील कहा गया है। भगवान बुद्ध ने मनुष्य जाति का वर्गीकरण किया। कार्यक्षेत्र के हिसाब से इन वर्गों के लिए  पाँच अनुशासन सुनिश्चित किए हैं। इन अनुशासनों  का पालन करना ही शील है और  संख्या पाँच होने के कारण  इन्हें पंचशील कहा गया है। सत्प्रवृत्तियों की दृष्टि से पारिवारिक पंचशील निम्नलिखित पाँच प्रकार के  हैं :

(1) सुव्यवस्था 

(2) नियमितता 

(3) सहकारिता 

(4) प्रगतिशीलता 

(5) शालीनता  

गुरुदेव बताते हैं कि इन सिद्धांतों को  अपनाने से व्यक्ति, परिवार व समाज को  विकृतियों से बचने का भरपूर लाभ मिलता है। इन सिद्धांतों को  अपनाने से चारों दिशाओं में उन्नति के  द्वार खुलते हैं  और उज्ज्वल भविष्य के पवित्र मार्ग पर चलने  का सुअवसर मिलता है।  जीवन में इन पांचों सिद्धांतों को उतारने  के लिए आवश्यक है कि एक-एक करके इनकी चर्चा की जाए। हमें विश्वास है कि लगभग प्रत्येक पाठक इन सिद्धांतों का जानकार है लेकिन चर्चा से और स्पष्टता प्राप्त हो सकती है।  

(1) सुव्यवस्था :

साधनों को सुनियोजित व सुव्यवस्थित रखने का नाम ही “सुव्यवस्था” है।वस्तुओं की “सुव्यवस्था” का ही दूसरा नाम “स्वच्छता” है,जो कि वस्तुओं को देखने में सुन्दर, सुसज्जित व नयनाभिराम बनाती हैं! इस प्रकार सुव्यवस्थित रखी हुई वस्तुएं अपनी मौन या मूक भाषा में यह दर्शाती हैं कि हम किसी सभ्य, सुशील व सुसंस्कृत हाथों की छत्रछाया में रह रही हैं। जहाँ वस्तुएं मैली-कुचैली, टूटी-फूटी, अस्त- व्यस्त की स्थिति में पड़ी रहती हों तो समझना चाहिए कि वहाँ पर आलस्य और प्रमाद का  राज्य है।  परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि कुरुपता व अस्वच्छता एक ही बात है। अतः  “सत्यम शिवम सुंदरम” की प्राप्ति में प्रथम सौन्दर्य, द्वितीय श्रेष्ठ और तृतीय सत्य की प्राप्ति का क्रम है तथा इसी क्रम में सम्पूर्ण सृष्टि चल रही है। प्राकृतिक सुन्दरता विधि का विधान है।  यह जो सृष्टि चल रही है उसका द्वितीय सृष्टा  मानव  है जो वस्तुओं को सुव्यवस्थित रखकर इस सृष्टि को  सुन्दर बनाए रखता  है। सुसज्जा सनातन से स्वच्छता व व्यवस्था का ही मिला-जुला स्वरूप है जिसे अपने जीवन में उतारने से सम्पूर्ण जीवन कृत- कृत हो जाता है। 

(2) नियमितता :

श्रम और समय के समन्वय को “नियमितता” कहा जाता  है। समय ही जीवन है और उसका एक-एक पल हीरे मोतियों से तोलने  योग्य है।  हम सबको इस दिव्य सम्पदा का एक क्षण भी गँवाना नहीं चाहिए।  समय के मूल्य पर हर प्रकार की विभूतियाँ व सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं।  समय गँवाना अर्थात जीवन के ऐश्वर्य, वैभव व आनंद को बरबाद करना है। हम सबको यह सुनिश्चित करना चाहिए  कि परिवार का कोई भी सदस्य व्यर्थ समय न बरबाद करे और इसे श्रम के साथ जोड़े  क्योंकि श्रम से जी चुराना, बेकार के कामों में समय गुजारना व परिश्रम में अनादर अनुभव  करना आदि  ऐसे दुर्गुण हैं जिनके रहते दरिद्रता से छुटकारा नहीं पाया जा सकता है। मानव  के सबसे बड़े दो शत्रु- “ शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाद”  ही  हैं जिन्हें शरण देने वाला मनुष्य हमेशा परेशान रहता है।  काम को भगवान की पूजा ( WORK IS WORSHIP ) माना जाए और काम में सम्मान का अनुभव किया जाए जिससे  शरीर कमजोर नहीं ताकतवर बनता है। काम में नियमितता बनाए रखने से प्रतिष्ठा बढ़ती है। कामकाजी मनुष्य स्फूर्तिवान, दीर्घजीवी, समृद्धि- शाली और  समुन्नत होते हैं और ऐसे मनुष्य  दुर्गुण व दुर्व्यसन से कोसों दूर रहते  हैं। 

समृद्धि, प्रगति व सफलता  “साधना” से ही संभव हो पाती  हैं। साधना को अंग्रेजी में MEDITATION कहते हैं। हम सब अपने ह्रदय में झांक कर देखें कि जिसने भी समय का  MEDITATION की तरह  सदुपयोग किया,  सफलता  ने उसके चरण चूमे हैं  कि नहीं । आलसी, प्रमादी, कामचोर अभागे ही होते हैं  जो अपने पैरों पर आप ही  कुल्हाड़ी मारते हैं और कोसते हैं भविष्य और प्रारब्ध को। ऐसे लोग  आत्मप्रताणना व लोकभर्त्सना (self-incrimination and public condemnation ) का त्रास सहते हैं और  उनका भविष्य अंधकारमय होता है।  समय के  सदुपयोग का महत्व जिसने जान लिया और दिनचर्या बनाकर योजनाबद्ध तरीके  से काम करने का अभ्यास कर लिया तो समझना चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य की कुंजी उसके हाथ लग  गई। 

हम अपने  सहकर्मियों से  करबध्द अनुरोध करते हैं कि हमें  परिवार में व्यस्त रहने का स्वभाव बनाना चाहिए, हर काम समय पर नियमितता पूर्वक करने का प्रयास करना  चाहिए।  अगर किसी कारणवश ,किसी विवश परिस्थिति में अनियमितता आ भी  जाए तो परिवार के किसी भी सदस्य को सूचित किया जा सकता है। 

(3) सहकारिता:

सहकारिता उन्नति का  मूलमंत्र है और इसकी  अनुपस्थिति में उन्नति नगण्य है। सहकारिता अपनाने से  सहानुभूति व सद्भावना की वृद्धि होती है , नजदीकता आती है और घनिष्ठता बढ़ती है। परिवार में एक साथ मिलजुल कर  काम करने से, काम का आनंद व स्तर दोनों बढ़ते हैं।  परिवार का प्रत्येक सदस्य इस सामूहिक प्रयास को अपना ही कार्य समझकर करता है। सहकारिता से काम करने पर और अधिक ज्ञानवान  लोगों से सीखने को मिलता है तथा कम ज्ञानवान  लोगों को सीखने/सिखाने का सुअवसर मिलता है। ऑनलाइन ज्ञानरथ की कार्यशैली पर यह पंक्तियाँ 100% पूरी उतरती हैं। हमें गर्व है कि हमारे सहकर्मी हमारी सभी योजनाओं और सुझावों को सम्मान देते हुए नियमितता से पूरा कर रहे हैं।  परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं – अधिक अनुभवी लोगों को कम अनुभवी लोगों की स्थिति के अनुरूप सहायता करने का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि परिवार का प्रत्येक सदस्य  किसी दूसरे का  पूरक होता है।  इसलिए अधिक पढ़े ,कम पढ़ों   को पढ़ाया करें और  एक-दूसरे के कार्यों  में हाथ बँटाया करें।  ऐसी सहकारिता  से  परिवार के एकाकीपन को दूर किया जा सकता है। परिवार व्यवस्था के प्रत्येक कार्य की  सफलता के लिए सहकारिता को  यथासंभव अधिकाधिक स्थान दिया जाना निहायत आवश्यक है जो पारिवारिक उन्नति में सहायक है।  

(4) प्रगतिशीलता: 

परिवार के सभी सदस्यों को ज्ञान  होना चाहिए कि भौतिक दृष्टि से आगे बढ़ने और आत्मिक दृष्टि से उँचे उठने की प्रक्रिया को प्रगतिशीलता कहते हैं। प्रगति के लिए हम सबको आवश्यक योग्यता बढ़ाने में ही अपनी मनास्थिति नियोजित करनी चाहिए। सफलताओं की लालसा तभी सार्थक है जब उसके उपयुक्त परिस्थिति उत्पन्न करने के लिए मजबूत प्रयास किया जाए। प्रगति के लिए  परिस्थिति और योग्यता दोनों का अपना-अपना योगदान है।  योग्यता के बिना केवल परिश्रम से सफलता मिल पाना असम्भव है। परमपूज्य गुरुदेव  लिखते हैं कि परिवार के सदस्यों को सुशिक्षित बनाने के लिए अध्ययन का, बलिष्ठ बनाने के लिए व्यायाम का, कुछ कमाने के लिए गृह-उद्योगों का, शिल्प-कौशलों का व गायन-वादन की तरफ रुचियाँ बढ़ायी जाएं और उनके  लिए साधन जुटाए जाएं ताकि अगले दिनों अधिक सुयोग्य बनाने के अवसर प्राप्त हो सकें।  कभी-कभी धन-सम्पदा की इच्छा इतनी प्रबल हो जाती है कि  योग्यता बढ़ाने और परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने को छोड़ कर  अनीतिपूर्वक सफलता पाने की इच्छा उठने लगती है। इसलिए योग्यता बढ़ाने के लिए प्रत्येक परिवार में कुछ न कुछ प्रयत्न करना अत्यंत आवश्यक है। उच्च शिखर पर पहुँचने व आगे बढ़ने के लिए कहाँ, किस प्रकार, क्या हो सकता है, इसके मार्गों को  खोजने के प्रयास करने चाहिए। ऐसा करने से  पारिवारिक उन्नति में आशातीत सफलता मिल सकती है। 

(5) शालीनता :

परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं – शिष्टता,सज्जनता,मधुरता,नम्रता आदि सद्गुणों के समुच्चय को “शालीनता”  कहते हैं। ईमानदारी, प्रामाणिकता, नागरिकता व सामाजिकता की मर्यादाओं को निष्ठापूर्वक अपनाना शालीनता का प्रतीक है।  दूसरों का सम्मान करने और अपने को विनम्र सिद्ध करने के लिए वाणी में मधुरता , व्यवहार में शिष्टता का समावेश होना बहुत ही आवश्यक है।  उदारता,सेवा व सहायता  से ही दूसरों का स्नेह, सम्मान व सहयोग मिलते हैं। दूसरों को अपना बनाने की जितनी शक्ति शालीनता में है, उतनी ताकत प्रलोभन देकर फुसलाने तथा दबाव देकर विवश करने में नहीं है। जन-जन के मन पर आधिपत्य स्थापित करने की  असाधारण विशेषता को शालीनता कहा जा सकता  है।  परिवार के हर सदस्य को इस विशेषता से  परिचित और  अभ्यस्त कराया जाना चाहिए। 

पारिवारिक उन्नति के लिए  पंचशीलों का किस घर में किस  प्रकार का अभ्यास किया जाए, इसके लिए  कोई ऐसा  नियम बनाना जो समान रूप से सब पर लागू हो असंभव है , क्योंकि हर परिवार की स्थिति अलग होती है। इसलिए निर्धारण व क्रियान्वयन परिस्थितियों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।  

पंचशीलों में जिन पाँच सत्प्रवृत्तियों का उल्लेख किया गया है उनको परिवार के सभी सदस्यों के स्वभाव का हिस्सा बनाने के लिए ऐसी गतिविधियों को पैदा करना होगा जिनके सहारे उन्हें परिवार के सदस्यों के स्वभाव का हिस्सा बनाया जा सके।  परिवार के वरिष्ठ  सदस्यों को समय की कमी का रोना नहीं रोना चाहिए क्योंकि धन  कमाना ही एकमात्र कार्य  नहीं है। धन से  परिवार के भरण पोषण की ज़रूरतें   तो पूरी की जा  सकती है लेकिन संस्कारों का विकास  कहीं और  नहीं हो सकता है।  परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि अगर लोगों को यह बात समझ आ जाए तो यह स्वीकारना बहुत ही आसान हो जायेगा  कि गुण, कर्म व स्वभाव के समन्वय से बना हुआ व्यक्तित्व ही परिवार की वास्तविक पूंजी है। 

जिसके पास यह  वैभव जितनी मात्रा में होगा, वह मनुष्य  उसी अनुपात में प्रभावशाली, संपत्तिशाली व सौभाग्यशाली बनेगा।  अगर आप सही मायनों में परिवार  का भला चाहते हैं तो उनके लिए साधन- सुविधा जुटाने तक ही सीमित  न रह  कर  संस्कारों के संवर्धन का  कार्य भी हाथ में लेना चाहिए। संस्कार संवर्धन का कार्य केवल परिवार ही कर सकता है ,परिवार के सदस्य ही कर सकते हैं कोई और दूसरा नहीं।   

अंत में परमपूज्य गुरुदेव मार्गदर्शन देते हैं कि  यदि परिवार के सदस्यों को इन पांच विभूतियों से अलंकृत करने का प्रयास चलता रहे,तो समय-समय पर सदस्यों की  कमियों का ज्ञान भी होगा  और उन कमियों को पूरा करने के प्रयास भी ढूढ़ने होंगें।  पंचशीलों से परिवार को भरने का प्रयास ऐसा ही है जैसे  पाँच रत्नों के भंडार से घर को भरना और  कुबेर से और अधिक  वैभववान बनना। परिवार एक ऐसी अनमोल धरोहर है जहाँ अनुभवी शिल्पकार अच्छे व संस्कारित नागरिक को घड़ने का अद्भुत,अनवरत प्रयास रहते हैं। भक्त, ज्ञानी, संत, महात्मा, महापुरुष, विद्वान व पंडित परिवार से ही निकलकर आते हैं और उनके जन्म से लेकर शिक्षा-दीक्षा, पालन-पोषण व ज्ञानवर्धन आदि  के सभी कार्य  परिवार में रहकर ही पूरे होते हैं।  परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि शिक्षा होती है। 

इन्ही शब्दों के साथ आज के ज्ञानप्रसाद को विराम देते हैं। 

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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6. पारिवारिक संगठन को बिखरने  से कैसे  बचाएँ- सरविन्द कुमार पाल 

1 नवम्बर का ज्ञानप्रसाद   2021  6. पारिवारिक संगठन को बिखरने  से कैसे  बचाएँ सरविन्द कुमार पाल 

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत छठा  लेख। 

आदरणीय सरविन्द भाई साहिब द्वारा रचित और हमारी  कठिन एडिटिंग के पश्चात आज का लेख आपके समक्ष प्रस्तुत है।  कठिन इस कारण कि कुछ अंश ऐसे थे जिन्हे delete करना उचित था और कुछ अंश अगले भाग में से शामिल करने पड़े। यही कारण है कि भूमिका लिखने के लिए समय ही नहीं बचा, पहले ही यह लेख नार्मल समय से थोड़ा लेट हो गया है।  आशा करते हैं कि हमारे सहकर्मी ऑनलाइन ज्ञानरथ की इस महायज्ञशाला में अपने विचारों  की हवन सामग्री से कमैंट्स की कम से कम 24  आहुतियों  की प्रथा का अवश्य ही  पालन करेंगें। 

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तो प्रस्तुत हैं पारिवारिक संगठन को बिखरने से बचाने  के उपाय :    

परिवार में स्वतंत्रता का अधिकार :

परमपूज्य गुरुदेव ने परिवार निर्माण से संबंधित बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा  है कि परिवार के हर  सदस्य की प्रकृति स्वतंत्र रहने की होती है और रहे भी क्यों न , स्वतंत्रता उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए स्वतंत्र विचारधारा पर परिवार में किसी के द्वारा विरोध नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसी स्थिति में यह ध्यान रखना  बहुत जरूरी होगा कि स्वतंत्र  विचारधारा से पारिवारिक शांति में किसी तरह का कोई व्यवधान तो नहीं हो रहा है और उस विचारधारा से प्रभावित होकर परिवार का कोई सदस्य अपनी नैतिकता तो नहीं खो रहा है। वह विचारधारा हम सबके पारिवारिक जीवन को कहीं अस्त-व्यस्त तो नहीं कर रही है। हम सबका परम कर्त्तव्य बनता  है हम  बारीकी से हर स्थिति का  निरीक्षण करें ताकि  परिवार में किसी तरह का कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और सुख-शांति का  वातावरण सदैव बना  रहे। अगर परिवार में कभी कभार प्रतिकूल स्थिति बन भी जाये तो  उसका विरोध और आलोचना उसी  सदस्य के समक्ष ही करना चाहिए। यदि किसी परिवार में रूढ़िवादी परम्परा का प्रचलन है जिसे  मानकर चलने में परिवार के किसी सदस्य को आपत्ति है तो इसके लिए  न तो किसी को लाचार  करना चाहिए और न ही  होना चाहिए।  हम सबका उत्तरदायित्व बनता है कि एक-दूसरे की रुचियों को अपने हृदय में स्थान दें जिससे आपसी संबंधों  में प्रगाढ़ता आएगी  और आपस में सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना का समावेश होगा। 

परिवार संस्था एक शरीर : 

परिवार संस्था एक शरीर है और इस शरीर का आस्तित्व तभी सुरक्षित है जब उसके अंग-अवयव एक-दूसरे के लिए काम करें,  एक-दूसरे से सहयोग करें , परिवार के आस्तित्व में ही अपना आस्तित्व सघन बनाएं, आपस में मिल -जुलकर रहें ,निरन्तर पारिवारिक शांति  बनाए रखें ताकि  परिवार को बिखरने  से बचाया जा सके।  यदि परिवार के सभी सदस्य अपनेआप को स्वतंत्र और अलग-अलग मानने लगें और अपनी मेहनत का लाभ स्वयं अकेले ही लेने की चेष्टा करने लगें तो यह  परिवार-रूपी शरीर व्यवस्था निश्चित ही लड़खड़ाएगी।  इस स्थिति में परिवार संस्था का बिखरना सुनिश्चित है। 

इस तथ्य को समझने के लिए एक अति- प्रकृतिक उदाहरण दिया जा सकता है।  हाथ ,मुंह ,पेट,ह्रदय आदि हमारे शरीर के (स्वतंत्र) अंग हैं लेकिन अगर स्वार्थी होकर सब अलग -अलग कार्य  करें तो क्या दशा होगी , आइये देखें।   

1,अगर  हाथ कहने लगें कि हम  जो उपार्जन करते हैं , जो भोजन उठाते  हैं , उसे मुँह में क्यों जाने दें? वह तो हमारा  परिश्रम है,  इस परिश्रम का लाभ स्वयं हमें  ही मिलना चाहिए। 

2.मुँह बीच में टपककर कहने लगे कि मैं जो कुछ भी खाता-चबाता हूँ  उसे अपने तक ही सीमित क्यों न रखूं और पेट में क्यों जाने दूँ। 

3.पेट कहने लगे  कि मैं जो पचाता हूँ  उसका रस  मैं  अपने तक ही सीमित क्यों न रखूं  और इस रस को   दूसरे अंग-अवयवों में   बिल्कुल न बांटूं। 

4.हृदय कहाँ पीछे रहने वाला है और वह भी दौड़ता हुआ, भागता हुआ व चिल्लाता हुआ आएगा और बोलेगा कि यदि मैं  अपने पास आने वाले रक्त को संचित  करने लगूँ  और उसे शरीर के दूसरे अंगों में न जाने दूँ , यह सोचूं  कि मैं  अपना संचित कोष किसी  दूसरों को क्यों वितरित करूँ।

तो ऐसी दशा  में शरीर की क्या स्थिति होगी? शरीर जीवित ही नहीं बचेगा, मर जाएगा और निष्प्राण  हो जाएगा।  शरीर तो निष्प्राण होगा ही साथ में  अपने को ही केन्द्र बिन्दु मानकर व्यवहार करने वाले अंग-अवयवों को नष्ट होने में  भी देर नहीं लगेगी। शरीर के अंग-अवयवों में किसी भी प्रकार की संकुचितता (compactness) नहीं है इसी कारण देह नगरी जीवित रहती है। 

परिवार क्यों टूट रहे हैं ?

परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि परिवार इसलिए  टूट या बिखर रहे हैं कि  परिवार का प्रत्येक सदस्य आत्मकेन्द्रित (self-centered ),आत्मनिर्भर (self-dependent ) होकर विचार करने लगा है।  हर कोई सदस्य यही सोचता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ ,मेरे बिना तो परिवार चल ही नहीं सकता, बाकी सदस्य तो मेरे परिश्रम करने से ही ऐश कर रहे हैं।  इस स्थिति के उत्प्न्न होते ही  एक नकारात्मक सोच जन्म  लेती है और उसके अंतःकरण में उसी सोच के  अनुरूप परिस्थितियाँ बनती हैं और वह सदस्य  उसी के अनुसार व्यवहार करने लगता है। इस स्थिति के आते ही  परिवार के सदस्यों  की नजदीकियाँ धीरे -धीरे  दूरियों में बदल  जाती हैं। ऐसी  स्थिति  पारिवारिक संगठन को कमजोर कर देती है।  इस कमजोरी को दूर करने के लिए हमें “कुशल नेतृत्व” की जरूरत है ताकि पारिवारिक संगठन को बिखरने से बच सकें।  

“सावधानी हटी, दुर्घटना घटी” वाली बात परिवार निर्माण में भी apply  होती है। अगर परिवार निर्माण में जरा सी भी चूक हो गई तो, परिवार-विघटन की सम्भावना हो सकती है। इस विघटन का मूल कारण परिवार के सदस्यों में   कुशल नेतृत्व की कमी है। परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि परिवार का कुशल नेतृत्व करना किसी तपस्या से कम नहीं है।  परिवार का भार-वहन करना, सभी सदस्यों को जीवन के साधन जुटाना, सभी सदस्यों की सेवा करना कोई आसान  तपस्या नहीं है।  जो सदस्य इस प्रकार अपने कर्तव्य का पालन करता है वह बहुत बड़ा तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी होता है।

स्नेह, सहकार, सेवा एवं त्याग की प्रवृत्तियाँ ही  सुखी दांपत्य जीवन और  परिवार को एक सूत्र में बांधने के आधार हैं। इन्ही  प्रवृतियों के कारण अभावों में रहते हुए भी, कष्टमय जीवन-यापन करते हुए भी ऐसे परिवार कभी एक-दूसरे से अलग नहीं  होना चाहते। अगर इन प्रवृतियों  का ठोस आधार न हो तो  एकांगी भौतिक समृद्धि दांपत्य जीवन को बाँधे नहीं रख सकती। बढ़ते हुए  पारिवारिक असंतोष और टूटते हुए दांपत्य जीवन का दुष्प्रभाव केवल  परिवार के  सदस्यों पर ही नहीं  बल्कि समाज के ऊपर भी असाधारण रूप से पड़ता है। ऐसे में  अविश्वास, असंतोष व अरूचि की भावना बढ़ती है तथा परिवार के सभी सदस्य अपने जीवन को असुरक्षित महसूस करते हैं और  बच्चों का भविष्य संकट में पड़ जाता है। बच्चों को माता-पिता के स्नेह  से वंचित रहना पड़ता है और  उनके  विकास में रुकावट आती है। मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि ऐसे पारिवारिक संकट में पलने वाले बच्चे ही अधिकांशतः अपराधी बनते हैं और अवांछनीय गतिविधियों द्वारा समाज को  भारी क्षति पहुंचाते  हैं। 

आधुनिक समाज में  विलासिता प्रधान विवाहों का प्रचलन और इन विवाहों कीअसफलता की दिशा में   सुधार लाने के लिए  सरकार के कानूनी प्रतिबंध य  सामाजिक अनुबंध काफी नहीं हैं। इस समस्या का सकारात्मक समाधान तो उस धर्म धारणा को अंतरात्मा की गहराई में उतारने से ही संभव हो सकता है जिसे पतिव्रत/पत्नीव्रत धर्म कहते हैं और इन्हीं दोनों सूत्रो के माध्यम से हम पारिवारिक संगठन को बिखरने से बचा सकते हैं। अगर  स्नेह, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना से हम परिवार को एक सूत्र में बाँध सकें तो  परिवार निर्माण में  कुशल नेतृत्व की पराकाष्ठा होगी।

कैसे होगा कुशल नेतृत्व ? 

प्रत्येक परिवार में एक  मुखिया होता है जिसे हम HEAD OF THE FAMILY कहते हैं। यह मुखिया अपने  परिवार को सुसंस्कृत व परिष्कृत करने के लिए परिवार का कुशल नेतृत्व करता  है और परिवार के प्रत्येक सदस्य की कार्य प्रणाली का समय-समय पर बारीकी से निरीक्षण भी  करता  है ताकि वह  इस संसार को छोड़ने के बाद अपने सिर पर  पापों की गठरी का बोझ न लेकर जाये। वैसे तो हम अक्सर सुनते आये हैं ,पढ़ते  आये हैं -मानव इस संसार में खाली  हाथ आता है और खाली  हाथ  ही जाता है ,फिर भी  यदि उसे कुछ  ले ही जाना है तो वह पुण्य की गठरी  अपने साथ लेकर जाए ताकि उसके  अगले जन्म की जगह/ योनि का  चयन ऐसा हो जहाँ  उसे  स्वर्ग की अनुभूति हो सके । 

परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ग और नरक की बहुत ही सुन्दर शब्दों में व्याख्या लिखकर हम सबका मार्गदर्शन किया है कि स्वर्ग और नरक कहीं और  जगह नहीं बल्कि हमारे अपने ही  छोटे से घर में ही  हैं। गुरुदेव कहते हैं कि  अयोध्या  निवासियों का पारिवारिक जीवन आदर्शो से ओतप्रोत था।  यदि हमारे  पारिवारिक जीवन में भी  आदर्श या उदात्त भाव पैदा किया जाये  तो छिन्न-भिन्न दिखाई पड़ रही परिवार संस्था को  स्वर्गीय बना कर एक आदर्श परिवार की श्रेणी खड़ा किया जा सकता है ।  रामायणकाल में जिन आदर्शो का पालन किया गया है, उसे राष्ट्रीय जीवन की संस्कृतिक धरोहर कहा जाए तो कोई अत्युक्ति नहीं, और यदि उन विभिन्न पक्षो को अपने जीवन का केन्द्र-बिंदु मानकर चलें,तो परिवार में स्वर्गीय  वातावरण होना कोई बड़ी बात नहीं है।  इसके विपरीत यदि पारिवारिक जीवन में उत्कृष्ट  भाव न रखें जाएं तथा आदर्शो का अच्छे से पालन न किया जाए तो परिवार संस्था एक दिन छिन्न-भिन्न होती चली जाएगी और पारिवारिक  वातावरण नारकीय होता जाएगा। इस तरह हम देख सकते हैं कि हम जैसा  समाज   बनाना चाहें  उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ बनानी पड़ेंगीं। उसी के अनुसार परिवार या समाज में लोगों से व्यवहार करना  पड़ेगा। पारिवारिक  वातावरण को खुशहाल बनाने के लिए हम सबको कुशल नेतृत्व करते हुए अपने परिवार के सदस्यों के बीच घनिष्ठता, आत्मीयता व स्नेह-सद्भाव के आधार पर परिवार को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है। 

परिवार में पनप रही  संकीर्णता परिवार को विश्रंखलित व तहस-नहस कर डालती है। अपने ही परिवार के सदस्यों में आपसी  भेदभाव का होना एक ऐसी आग की चिंगारी  है जो परिवार को अंदर ही अंदर जलाती रहती है जो कि आगे चलकर विकराल रुप खड़ा कर देती है। इस विकराल रूप को  सँभालना किसी सामान्य सदस्य की बात नहीं है और वर्तमान में यह चिंगारी  अधिकांश परिवारों में जलती देखी जा सकती है।  परिवार के सदस्यों में जब तक समर्पण, त्याग व उत्सर्ग का भाव बना रहता है तब तक उसकी सुदृढ़ एकता पर आँच नहीं आने पाती। अगर  परिवार में रहने वाला प्रत्येक सदस्य आत्मकेन्द्रित व आत्मनिर्भर होकर कर्त्तव्यों को प्रधान व अधिकारों को गौण समझे और अपनी ही   नहीं दूसरों की सुख-सुविधा को भी स्थान  दे तो आपस में मन-मुटाव तथा विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती है।  परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :  माँ को त्याग की जीवंत प्रतिमा कहा जाता  है।यदि ऐसे  त्याग भाव का कुछ अंश परिवार के सभी   सदस्यों में भी  आ जाए तो लड़ाई-झगड़े की स्थिति  उत्पन्न ही  नहीं हो सकती। ऐसे  परिवार में साक्षात स्वर्ग दृष्टिगोचर होगा।  

जब हम कुशल नेतृत्व की बात कर रहे हैं तो परिवार के मुखिया का भी परम् कर्तव्य बनता है वह प्रयास करे कि एक ROLE MODEL की छवि प्रस्तुत कर सके। ऐसी छवि जिसे देखकर सभी सदस्यों को प्रेरणा मिले।  हमारे युवा सहकर्मी धीरप सिंह ने पिछले दिनों एक कमेंट किया था जिसमें  उन्होंने बड़ों के आचरण पर चिंता व्यक्त की थी।  उन्होंने लिखा था कि अगर बड़े ही सुधरने का नाम नहीं लेते तो हम बच्चे उनसे क्या प्रेरणा लेंगें।  बिलकुल  ठीक लिखा था। परिवार के  मुखिया का पद प्राप्त  करना तो बहुत आसान है लेकिन उस पद की पालना करना अक्सर दो- धारी तलवार की भांति होता है।संयम -संयम एवं संयम।

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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अपने सहकर्मियों के संग विचार विमर्श

30 अक्टूबर 2021 के ज्ञानप्रसाद में अपने सहकर्मियों के संग विचार विमर्श “

धीरे -धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये माली सींचत सौ घड़ा ऋतू आये फल होये” -हिंदी भाषा के महान कवि संत कबीर जी कह रहे हैं कि हमें हर काम एक नियमित गति से ही करना चाहिए। यह ज़रूरी नहीं है कि जल्दबाज़ी करने से कोई काम जल्दी हो ही जाए। कबीरदास जी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार माली भले ही पेड़ में हर दिन सौ घड़े पानी डाले, लेकिन पेड़ पर फल तो फलों की सही ऋतु आने पर ही लगते हैं। ठीक उसी प्रकार, हम चाहे कितनी भी जल्दबाज़ी कर लें। सही काम उचित समय आने पर ही सफल या पूरे होते हैं। अतः हमें धैर्यपूर्वक अपने काम करते रहने चाहिए और फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब सही समय आएगा, तो आपको आपके अच्छे कामों का फल ज़रूर मिल जाएगा।

आज कल तो ग्रीनहाउस टेक्नोलॉजी से जब चाहें ,जो चाहें पैदा कर लें – NO COMMENTS.

इस सुप्रसिद्ध, ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक दोहे से अपनी बात आरम्भ करने का एक नियत उदेश्य है। बहुत से सहकर्मियों से अक्सर बात होती रहती है कि हम तो अपना प्रयास पूरे जी-जान से करते है लेकिन कोई सुनता ही नहीं है। हम तो व्यक्तिगत मैसेज भी भेज कर कहते हैं। पर्सनली मिलने पर भी कहते हैं लेकिन कोई सुनता ही नहीं है। हमारा हर बार एक ही उत्तर होता रहा है ,धीरे -धीरे सब कुछ होता है। परमपूज्य गुरुदेव के साथ जुड़ना, इस विशाल विश्व्यापी मिशन के कार्य में अपनेआप को समर्पित करना,कोई ऐसा वैसा ,छोटा कार्य नहीं है। यह एक परम सौभाग्य है जो किसी विरले को ही प्राप्त होता है। हम सब उन विरलों में से ही हैं जिन्हे परमपूज्य गुरुदेव ने बहुत सोच समझ कर, परखकर चुना है। इस चुनाव के सन्दर्भ में गुरुदेव अक्सर कहा करते थे – “जब मथुरा की गलियों में बाढ़ आती है तो सफाई कर्मचारी नालियों में से कुछ ढूंढते रहते है और उनके हाथों कई बार सोने, और हीरे लग जाते थे ,ठीक उसी प्रकार हमने आपको ढूँढा है।” जो हमारी बात नहीं सुनते यह उनका दुर्भाग्य है। गुरुदेव ने तो बार -बार कहा है “ तू मेरा काम कर मैं तेरा काम करूँगा।” हम तो यही कहेंगें कि इस रथ के सारथि स्वयं हमारे गुरुदेव ही हैं – हाँ एक बात अवश्य है – यह तभी संभव है अगर हमारी intentions clear हैं और हम निस्वार्थ गुरुकार्य कर रहे हैं।

हम सब देख ही रहे हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में कहाँ-कहाँ से, कितने-कितने समर्पित परिजन जुड़ रहे हैं। और इस पुनीत कार्य में हर वर्ग के सहकर्मी जी -जान से अपना सहयोग दे रहे हैं। इतना ही नहीं सभी परिजन , मानवीय मूल्यों का ( शिष्टाचार,स्नेह,समर्पण,आदर,श्रद्धा ,निष्ठा,विश्वास ,आस्था,सहानुभति , सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन) जो ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भ हैं ,इतनी श्रद्धा से पालन कर रहे हैं कि हम निशब्द हो जाते हैं। आपका तो पता नहीं, हमने तो कई बार स्कूल में क्लासें मिस की होंगी ,लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ पाठशाला की एक भी क्लास न तो कभी मिस की और न ही कभी लेट हुए। हमसे अधिक अनुशासन प्रिय हमारे परिजन हैं जी बिना किसी भी स्वार्थ के अपना कार्य पूरी श्रद्धा और समर्पण से संपन्न किये जा रहे हैं।

हमने अपडेट में अक्सर प्रेरणाप्रद शब्दों का प्रयोग करते हुए और अधिक परिजन जोड़ने के लिए कहा होगा ,कमैंट्स के लिए भी कहा होगा , काउंटर कमैंट्स के लिए भी प्रेरित किया होगा , अपने परिजनों के कमैंट्स पढ़कर प्रेरणा लेकर उन्हें रिप्लाई करने के लिए भी कहा होगा -लेकिन यह प्रयास केवल गुरु की शिक्षा के प्रचार -प्रसार के लिए ही था और है। परमपूज्य गुरुदेव की शिक्षा से इस भटकी हुई मानवता को सही मार्गदर्शन मिल जाये ,हर परिवार में, हर घर में अगर गायत्री का वास् हो जाये तो इससे बड़ा सुख क्या होगा। इसमें प्रयास में हमारा व्यक्तिगत कोई भी स्वार्थ नहीं था /नहीं है। हमारा यह सौभाग्य है कि हमारे गुरु ने हमें इतने समर्पित परिजनों के साथ जोड़ दिया जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है।

हर वर्ग के ,हर आयु के परिजन हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं – एक -और -एक ग्यारह का सिद्धांत हूबहू कार्यरत होता दिखा रहा है। हमारा भी सदैव प्रयास रहता है कि सब किसी को सम्मान की दृष्टि से देखें, हर किसी के सुझाव का सम्मान करें , चाहे वह हमसे कितना ही छोटा क्यों न हो। हमारे एक परिजन ने “ चरित्र और आचरण “ पर लेख लिखने का सुझाव दिया। हमने उसी समय रिसर्च करके स्वध्याय करना आरम्भ कर दिया और उन्हें कमेंट करके सूचित भी किया कि शीघ्र ही आपके समक्ष इस विषय पर लेख लेकर आयेंगें। आदरणीय सरविन्द भाई साहिब के लेखों की कड़ी को बीच छोड़ कर अपना लेख लिखना उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने से कम न होगा और यह हम कभी भी न करेंगें। सभी परिजन ऑनलाइन ज्ञानरथ में अपना कार्य एक कुशल कार्यकर्ता की भांति निभा रहे हैं जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। जो वरिष्ठ हैं वह अपने जीवन भर के अनुभव से हमारे बच्चों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। रेनू श्रीवास्तव जी ,संध्या जी ,साधना जी , निशा जी ,राधा जी ,अरुण वेर्मा जी, सरविन्द पाल जी JB Paul ji ,रेनू गंजीर जी ,सुमन लता जी ,सुधा जी ,मृदुला श्रीवास्त्व जी, ,कुसुम त्रिपाठी जी ,पुष्पा पाठक जी, राजकुमारी जी -यह कुछ ऐसे नाम हैं जो सम्पूर्ण नियमितता से अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहे हैं। सभी नामों का विवरण देना शायद हमारे लिए कठिन होगा इसलिए अगर कोई मिस हो गया हो तो क्षमा प्रार्थी हैं। रेनू श्रीवास्तव बहिन जी की तरह कइयों को तो यह भी मालूम है कि जब हम शुभरात्रि सन्देश भेजते हैं तो हमारे यहाँ दिन होता है और वह शुभदिन भेजते हैं। शुभरात्रि सन्देश भेजते हुए प्रयास किया जाता है कि यह सन्देश आपकी नींद को सुखमय बनाने में सहायक हो। जो हमारा युवा वर्ग है वह एकदम आकर login करके सारा कार्य इतनी efficiency से करके चला जाता है जिसको मेरे जैसे अल्पज्ञान और अल्पबुद्धि वाले परिजन अभी सोच ही रहे होते हैं। प्रेरणा बिटिया, प्रीती बिटिया,पिंकी बेटी ,धीरप बेटा इसी category में आते हैं जो जॉब भी कर रहे रहे हैं ,पढ़ भी रहे हैं और इस महायज्ञशाली में आहुतियां भी डाल रहे हैं। कोई ऐसे भी परिजन भी हैं जो सात -आठ घंटे रेगुलर जॉब करने के बाबजूद एक नियमित सा नियम बना चुके हैं कि चाहे जो कुछ भी हो ऑनलाइन ज्ञानरथ के भावरूपी महायज्ञ में विचारों की हवन सामग्री से कमैंट्स रुपी आहुति तो डालनी ही है। उन सहकर्मियों की भी कोई कमी नहीं है जो परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए भी ,बच्चों का पालन पोषण करते हुए भी ,खाना पकाना ,झाड़ू पोछा करके थकान के बावजूद इस भावरूपी यज्ञशाला में अपनी उपस्थिति अवश्य ही दर्ज़ करवाते हैं। इस नियमितता में कहीं कोई अड़चन आती दिखती है तो परिजन तुरंत मैसेज भेजकर सूचित करना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं। यह अनुशासन का अद्भुत उदाहरण है। हमारा भी यही प्रयास रहता है कि अगर किसी परिजन का एक -दो दिन किसी कारणवश सन्देश नहीं आता तो सम्पर्क करने का प्रयास करते हैं। कुछ एक परिजन ऐसे भी हैं जो कभी -कभार कमेंट करते हैं ,छोटे कमेंट करते हैं , वह भी हमारे दिल के बहुत ही करीब हैं। अपने गुरु से जो सीखा है ,उसी को अन्तःकरण में ढालने का प्रयास कर रहे हैं ,कितना सफल हो पाए हैं आप ही बता सकते हैं। पत्र -पाथेय नामक पुस्तक जो परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के पत्र -व्यव्हार की एक अद्भुत पुस्तक है , अमूल्य आत्मीयता दर्शाती है।

सम्मान की दृष्टि से देखा जाये तो हमारे सभी परिजन एक -दूसरे के विचारों का जी -जान से सम्मान कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही आदरणीय सरविन्द जी ने 24 आहुतियों का प्रस्ताव रखते हुए निवेदन किया जिसे सभी ने बहुत बड़ा समर्थन दिया। अरुण वर्मा भाई साहिब के कमेंट में तो हमने एक दिन 25 आहुतियां देखीं। सभी को धन्यवाद् तो है ही ,बधाई भी है। हमारा सपना कि हमारे परिजन भी कुछ लिखें -साकार होकर ही रहा। सरविन्द भाई साहिब ने 12 लेख लिख दिए हैं और अनिल मिश्रा जी के 30 लेख पहले ही हमारे पास हैं। और जो परिजन इतने विस्तृत कमेंट लिख रहे हैं वह कमेंट किसी लेख से कम नहीं हैं। अगर हम इन कमैंट्स को एडिट करके लिखना आरम्भ कर दें तो शायद कितने ही full -length लेख बन जाएँ। एक दूसरे के लेख पढ़कर ,कमेंट करके ,सहकारिता ,सहभागिता का एक बहुत ही उज्वल वातावरण प्रकट हो रहा है। ऐसे पारिवारिक वातावरण को हमारा नमन और आदरणीय सरविन्द भाई साहिब के आदर्श परिवार वाले लेखों के outcome को नतमस्तक हैं।

इन सभी नई developments को देखते हुए हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कहीं हम लेखक की , researcher की अल्पप्रतिभा को भूल न जाएँ और भविष्य में एक बार फिर लेखक orientation करनी पड़े। आज कल तो editor का कार्य कर रहे हैं जो भी कोई आसान नहीं है। आपके समक्ष THE BEST प्रस्तुत करना हमारा धर्म एवं कर्तव्य है। धन्यवाद् जय गुरुदेव, आज के लिए केवल इतना ही। रविवार को अवकाश होगा और सोमवार को सरविन्द जी का अगला लेख प्रस्तुत करेंगें। कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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5. परिवार निर्माण से ही व्यक्ति और समाज का निर्माण संभव

29 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद  5. परिवार निर्माण से ही व्यक्ति और समाज का निर्माण संभव हैसरविन्द कुमार पाल

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत चतुर्थ लेख। 

आदर्श परिवार के विषय पर  यह हमारा पांचवां लेख है। आपके कमैंट्स बता रहे हैं कि आपको यह लेख बहुत ही रोचक लग रहे हैं , लगें  भी क्यों न, हम सबके के साथ हो तो  सम्बंधित हैं यह लेख। 

आज का लेख “परिवार निर्माण में वातावरण के योगदान” पर आधारित है। हम  देखेंगें कि  वातावरण कैसे व्यक्ति निर्माण, समाज निर्माण राष्ट्र निर्माण में भूमिका निभाता है।      

सरविन्द भाई साहिब ने मैसेज किया कि  स्वास्थ्य  ठीक न  होने के कारण अगला भाग भेजने  में  विलम्ब  हो सकता है।  उनके अच्छे स्वास्थ्य का कामना करते हुए हमने कहा -आप तो इतनी स्पीड से लेख  भेज रहे हैं ,चिंता न करें अभी हमारे पास पांच भाग और  पड़े हैं जिनको ऑनलाइन ज्ञानरथ के समक्ष प्रस्तुत करने से पूर्व  एडिट करना भी  बाकि है, अपने सहकर्मियों के साथ बातचीत ,विचार विमर्श भी तो करना है।  दो -तीन लेख के बाद ही सहकर्मियों के  ज्ञानवर्धक-नवीन  विचारों का इतना अनमोल कोष  इकट्ठा हो जाता है की अगर उनका विश्लेषण न किया जाये तो गुम होना संभव है। इस प्लेटफॉर्म का परमकर्तव्य है कि सभी कमैंट्स को देखा जाये ,रिप्लाई किया जाए  और सुझावों का सम्मान किया जाए।  कल वाला ज्ञानप्रसाद सहकर्मियों के विचारों पर  चर्चा  करने की योजना है।

तो चलते हैं आज के लेख की ओर :          

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परमपूज्य गुरुदेव ने परिवार निर्माण से संबंधित बहुत ही सुन्दर शब्दों में लिखा है :

परिवार एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आत्मनिर्माण व समाज निर्माण के दोनों उद्देश्य अपनेआप पूरे होते चले जाते हैं। गुरुदेव कहते हैं अपने घरों को तपोवन बनाने की बात कही जाती रही है , तभी तो गृहस्थ को योग की संज्ञा दी गई है।  इसलिए परिवार में बच्चों का संस्कारित होना बहुत जरूरी है। 

परिवार के वरिष्ठ सदस्य  चरित्रवान, पवित्रवान, संस्कारवान, उदारवान, विचारवान, श्रद्धावान, निष्ठावान, ऊर्जावान,प्रतिभावान व प्राणवान बनकर परिवार  निर्माण हेतु कुशल नेतृत्व करें, तभी परिवार निर्माण की उपलब्धियाँ मिल सकती हैं। हम परिवार निर्माण से ही अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करते हुए तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी विभूतियाँ  राष्ट्र को समर्पित करते आ रहे हैं। यह विभूतियाँ कहीं आसमान से नहीं आ टपकती हैं बल्कि  हमारे  कुटुम्ब या परिवार से ही निकलकर आती हैं। पतिव्रत, पत्नीव्रत, पितृ-सेवा, शिशु-प्रेम व समता-सहकार की सत्प्रवृत्तियाँ, यदि सघन सद्भावना की मनःस्थिति सम्पन्न की जा सकें तो उसका महत्व योगाभ्यास एवं तप-साधना से किसी भी प्रकार कम नहीं होता। इस विषय में हजारों,लाखों व करोड़ों कथा- गाथाओं से इतिहास  के पन्ने भरे पड़े हैं। 

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :

कर्मयोग की जितनी उत्तम साधना परिवार में रह कर हो सकती है तो उतनी उत्तम साधना अन्यत्र कहीं नहीं हो सकती है।  अतः उपासना, साधना व आराधना (USA)  के लिए गृहस्थाश्रम ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वसुलभ जगह है। परम पूज्य गुरुदेव ने इस प्रक्रिया के लिए  बहुत ही सही जगह का  उल्लेख किया है, वह है  हमारा  परिवार।  गुरुदेव कहते हैं  परिवार से विलग होने की कोई आवश्यकता नहीं, परिवार में  रहकर ही  समयानुकूल घर पर ही यह प्रक्रिया  पूरी की जा सकती है।  हमें परिवार छोड़कर कहीं दूर-दराज, सूनसान,बियाबान जंगलों की डरावनी गुफाओं मे जाने की कोई जरूरत नहीं  है। परिवार निर्माण की प्रक्रिया समाज निर्माण के रूप में होने की बात समझने में परिवार के किसी भी विवेकशील व विचारशील सदस्य को कोई समस्या नहीं हो सकती है। सम्पूर्ण जगत में  जिन महापुरुषों ने महती भूमिकाएं सम्पन्न की हैं उनके  व्यक्तित्व संस्कारित परिवार वातावरण  में ही ढले थे।  यही  कारण है कि   उनकी उपलब्धियाँ इतिहास के पन्नों में आज भी मौजूद हैं , पढ़ी जाती हैं ,समझी जाती हैं और  उन्हीं के अनुसार पारिवारिक वातावरण  बनाया जाता है। परिवार के  प्रत्येक सदस्य को  इन उपलब्धियों का बखान करके  संस्कारित किया जाता है जिससे  परिवार निर्माण,समाज निर्माण में एक प्रभावी वातावरण बन पाता  है। इस वातावरण की  खुशनुमा महक दूर-दूर तक फैलती है  और अधिकाधिक लोग लाभान्वित होते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि निजी प्रतिभा का मूल्य स्वल्प ( बहुत थोड़ा ) होता है। यदि प्रतिभाएं कुसंस्कारी  वातावरण में ढलती हैं तो वह प्रतिभाएं दुरात्मा बनकर अपना और दूसरों का अहित ही करती  हैं। यदि उन्हें सुसंस्कृत परिस्थितियों में पलने व परिपक्व होने का अवसर मिला होता तो निश्चित ही स्थितियाँ अलग होतीं। जिन परिस्थितियों ने  चोर, डाकुओं को जन्म  दिया, सही दिशा व्  सहायता से ऐसे  व्यक्ति किसी सेना में  सेनापति होते। ऐसे व्यक्ति  अपने परिवार का साहसिक कुशल नेतृत्व कर सकने में  सर्वथा समर्थ सिद्ध हुए होते  और सुचारु रूप से परिवार का कुशल संचालन कर रहे होते। ऐसा परिवार एक संस्कारित परिवार होता तथा एक संदेशवाहक का परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का सराहनीय कार्य कर रहा होता जिसकी आज हमें  महती आवश्यकता है।  

तभी तो परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि

 “व्यक्ति की मौलिक प्रतिभा को कितना ही महत्व  क्यों न दिया जाए, वातावरण के प्रभाव को झूठलाया नहीं जा सकता है। व्यक्ति को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में सबसे ज्यादा ताकत परिवार के माहौल या वातावरण में ही होती है। “

जिस  परिवार का वातावरण अच्छा है, उस परिवार के संस्कार भी अच्छे होंगे और ऐसे ही वातावरण  में पलने वाले  बच्चे एक दिन राष्ट्र के काम आते हैं।  बच्चे ही राष्ट्र की धरोहर होते हैं और इनकी  प्राथमिक पाठशाला परिवार ही होती है।  हम जिस समूह में सौहार्द से रहते है उसे परिवार कहते हैं और हम सब परिवार रूपी पाठशाला में अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देकर संस्कारित करते हैं। एक दिन इन्हीं संस्कारित बच्चों का नाम  इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाता है। इसलिए सभी  माता पिता  का परम कर्तव्य बन जाता है कि हम अपने उत्तरदायित्वों का अक्षरश: पालन करते हुए अच्छे संस्कारों का बीजारोपण करें।  फिजूल के लोगों व फिजूल के कामों से हम सबको व बच्चों को  दूर रहना चाहिए क्योंकि संगति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है , इससे विरले ही लोग बच पाते हैं। इसीलिए तो कहा गया “ संगत  तरियो कुसंगत डूब मरियो ”

“रस्सा और कुछ नहीं बल्कि बिखरे हुए धागों का एक संयुक्त समुच्चय ही तो है।  उसी प्रकार समाज और कुछ नहीं बल्कि परिवार में बसे हुए मनुष्यों का एक समूह या समुदाय ही तो है और उसी समूह या समुदाय में व्यक्तियों का केवल उत्पादन ही नहीं, परिपोषण और परिष्कार भी  होता है।  समाज जैसा भी  है, पारिवारिक परम्पराओं की ही  देन है। समाज को जैसा भी बनाना है, वैसी ही अनुकूल  परिस्थितियाँ भी उत्पन्न करनी  होंगी।  यह एक  कटु सत्य है।  किसी भी राष्ट्र की सुख, समृद्धि, सामर्थ्य, प्रतिभा एवं वरिष्ठता सरकारी कार्यालयों या अफसरों तक सीमित नहीं होती बल्कि  वहाँ तो उस राष्ट्र की   झाँकी मात्र मिलती है।  छावनियों में रहने वाली सेना ही किसी राष्ट्र की शक्ति नहीं होती, वास्तविक शक्ति, शौर्य व पराक्रम तो गली-मोहल्लों और घर-परिवारों में फलता- फूलता है। छावनियों में सेना पैदा नहीं होती,  घर-परिवारों के वातावरण में पालकर लोग सेना में भर्ती होते हैं।  राष्ट्रीय समृद्धि के लिए सरकारी कोष की नाप-तोल करना आवश्यक है लेकिन समृद्धि तो परिवारों में संचित रहती है।  सरकार तो उन पर टैक्स लगाकर निचोड़ती भर है।  राष्ट्रीय चरित्र का मूल्यांकन अफसरों को देखकर नहीं,नागरिकों के स्तर से किया जाता है। संत, ऋषि, महापुरुष, सुधारक, प्रज्ञावान, मूर्धन्य व कलाकार आसमान से नहीं टपकते हैं बल्कि उन्हें आवश्यक प्रकाश पारिवारिक वातावरण से ही उपलब्ध होता है। 

परम पूज्य गुरुदेव हम सबके हितार्थ ,हमें समझाते  हुए  कितने  सुन्दर शब्दों में निरंतर लिखते जा रहे हैं :

अनाज घर की बखारियों (अनाज भरने की कोठी) में भरा तो रहता है परंतु उसका उत्पादन तो खेतों में होता है जहाँ   खेत का हर पौधा उस सम्पदा को बढ़ाने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर एक समर्थ तपस्वी की भाँति सहभागी की भूमिका निभाता है।  समाज निर्माण के लिए कुछ भी कहा जाता रहे, आंदोलन के लिए किसी भी प्रक्रिया को क्यों न अमल में लाया जाए, प्रचार तंत्र और सृजन संस्थान का कितना ही  बड़ा ढांचा क्यों न  खड़ा किया जाए ,किंतु वास्तविकता की आधारशिला परिवार में सुधारात्मक प्रवृत्तियों के समावेश से ही संभव हो सकेगी। जड़ को सींचे  बिना बगीचों को आकर्षक बनाने में दूसरे उपाय अधूरे ही  बने रहेंगे क्योंकि पौधों  को खुराक तो जड़ों से ही मिलती  है। समाज का अक्षयवट अपना परिपोषण परिवारों से ही उनमें व्यवस्थित, संयमित एवं  नियमित क्रम से रहने वाले  सदस्यों से ही प्राप्त करता है। अक्षयवट कौन सा वृक्ष है ? पुराणों में वर्णन आता है कि प्रलय में जब समस्त पृथ्वी जल में डूब जाती है उस समय भी वट का एक वृक्ष बच जाता है। अक्षय वट कहलाने वाले इस वृक्ष के एक पत्ते पर ईश्वर बालरूप में विद्यमान रहकर सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं। 

समाज निर्माण की, समाज सुधार की व व्यक्ति उत्थान की बात सोचने वालों को उस महान स्थापना के लिए परिवारों की छोटी-छोटी क्यारियाँ ही उर्वरता सम्पन्न बनानी होंगी।  परिवार निर्माण हेतु अपने क्यारी रूपी परिवार में कुशल नेतृत्व करते हुए व्यक्ति निर्माण व समाज निर्माण के तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाए, उतना ही हम सबके हित में है।ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के सभी सदस्य  आपस में मिलकर परिवार निर्माण पर विशेष ध्यान आकर्षित करने की कृपा करें जिससे हम सबको बहुत बड़ी प्रेरणा, हम सबका दृष्टिकोण  बदलेगा  और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। 

धन्यवाद जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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4. आत्मनिर्माण व आत्मसुधार की शुरुआत स्वयं से करें-सरविन्द कुमार पाल

28 अक्टूबर 2021  का ज्ञानप्रसाद 4. आत्मनिर्माण व आत्मसुधार की शुरुआत स्वयं से करें-सरविन्द कुमार पाल

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत चतुर्थ लेख। 

आज का ज्ञानप्रसाद पढ़ते ,लिखते, एडिट करते समय हम अपनेआप से बार-बार प्रश्न किये जा रहे थे कि जो बातें परमपूज्य गुरुदेव हमें बता रहे हैं ,जिन्हें आदरणीय सरविन्द भाई साहिब ने स्वाध्याय करके इतना परिश्रम के बाद यह लेख लिखे “क्या हमें इन बातों का पता नहीं है” क्या हमें पता नहीं है कि परिवार के वरिष्ठ ROLE MODEL होते हैं? ,क्या हमें पता नहीं कि हमारे  अध्यापकों में से कोई एक ऐसा अवश्य ही होगा जिसने हमको इतना प्रेरित किया कि आज हम जो भी हैं इन उच्च आत्माओं के कारण हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर हाँ और न दोनों हो सकता है।  हाँ इसलिए कि जिन दिनों परमपूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तकें लिखीं , इस अमूल्य साहित्य की रचना की उस समय में और आज के समय में बहुत बड़ा अंतर् आ चुका  है।  उस समय के  परिवार और आज के  परिवार में ज़मीन आसमान का अंतर् है। हमारे वरिष्ठ जो इन  पंक्तियों को पढ़  रहे हैं अवश्य ही हमारे साथ सहमत होंगें ,लेकिन  ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के सदस्य केवल वरिष्ठ ही तो नहीं हैं , बच्चे और युवक भी तो हैं।  समय का परिवर्तन एक वैज्ञानिक तथ्य है।  अगर समय में परिवर्तन आया है तो सोच में भी परिवर्तन आया है ,साधनों में भी परिवर्तन आया है। हम में से कितने प्रतिशत वरिष्ठ है जो अपने बच्चों के लिए ROLE MODEL हैं और कितने प्रतिशत   बच्चे अपने परिवार के साथ समय बिता कर खुश रहते  हैं। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ के लेखों का उदेश्य-चाहे उन्हें हम लिखें , आदरणीय सरविन्द  भाई साहिब लिखें , आदरणीय  अनिल मिश्रा जी लिखें य हमारे सहकर्मी  कमेंट करके लिखें -केवल एक ही  warning देते हैं कि हमें कुछ नहीं पता , हमें अभी और परिष्कृत होने की आवश्यकता है। अगर हम परिष्कृत हो गए  होते  तो हमारा निर्माण और सुधार न हो  गया होता। परमपूज्य गुरुदेव का साहित्य हमारे लिए एक बहुत ही DISCPLINED अध्यापक के डंडे की तरह प्रकट हो जाता है जो कहता है आत्मसुधार, आत्मनिर्माण की बात करने वाले पहले अपना सुधार  और निर्माण  कर। 

यही है आज के लेख की  SUMMARY. इस लेख की एडिटिंग करते हमें ऐसा लगा कि कुछ  बातें बार -बार रिपीट हो रही हैं , हमने उनको डिलीट करना आरम्भ किया तो लेख नार्मल लेखों से बहुत ही छोटा रह गया है -लगभग आधा।  आशा करते हैं इस लेख को भी आप उतनी ही श्रद्धा से पढ़कर कमैंट्स की बाढ़ लगा देंगें जैसे आपकी आदत सी ही बन गयी है।  सभी परिजनों का कमेंट ( छोटा य विस्तृत ) करने के लिए ह्रदय से नमन। 

तो आरम्भ करते हैं आज का लेख :

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परम पूज्य गुरुदेव ने “परिवार निर्माण में  आत्मनिर्माण व आत्मसुधार का बहुत बड़ा योगदान होने  की बात कही है। निर्माण और सुधार की शुरुआत अपने से करने की एवं  सद्विचारों,सद्गुणों को  प्रयोग करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।  यह एक बहुत बड़ा और सख्त   प्रशिक्षण ( training ) है जो   केवल बातों से नहीं संभव हो सकता। इस प्रशिक्षण के  लिए प्रशिक्षक को मुख्य रूप से अपना ही उदाहरण प्रस्तुत करना होता है। उसे एक role model  बन कर सभी को अपनी ओर आकर्षित करना होता है। तात्पर्य यह है कि किसी को समझाने से  पहले यह सुनिश्चित करवाया जाये कि जिस विषय की  बात की जा रही है, हमें वह विषय न केवल  पूरी तरह समझ आता है हमारे अन्तःकरण में भी विराजमान  है। । किसी को उपदेश देने से पहले वह गुण हमारे पास होने चाहिए वरना सामने वाले पर कोई भी  प्रभाव नहीं पड़ने वाला  यानि कि परिवार निर्माण के लिए एक कुशल नेतृत्व की जरूरत पड़ती है।  परिवार निर्माण का कुशल नेतृत्व करने के लिए सर्वप्रथम आत्मसुधार की शुरुआत स्वयं अपने आपसे करें, अपने अंतःकरण में झाँकें,अपनी बुराइयों को देखें, समझें तथा अपनी कमियों को बारीकी से खोजें।  हमेशा स्वयं का  निरीक्षण( self -inspection )  करते रहें ताकि  अपनी कमियों का पता चलता रहे क्योंकि  हम जैसा सीखते  व करते हैं , नैतिकता के आधार पर वैसा ही हमारे बच्चे भी करने लगते हैं जिससे  परिवार निर्माण में विपरीत प्रभाव पड़ता है। आज के बच्चे ही कल का भविष्य होते हैं , परिवार से  निकलकर यही बच्चे राष्ट्र के कर्मयोगी सिपाही बनते हैं  और राष्ट्र की बागडोर सँभालते हैं। अतः  बच्चों का संस्कारित होना बहुत ही जरूरी है, लेकिन  हम तो कहेंगें कि  बच्चों से भी अधिक  वरिष्ठ  सदस्यों  का संस्कारित होना और भी अधिक आवश्यक है ताकि पारिवारिक वातावरण संस्कारित व पवित्र हो जिसकी खुशबू समस्त विश्व ब्रह्माण्ड तक पहुँचे।  

परमपूज्य गुरुदेव ने बहुत ही सुन्दर तरीके से लिखा है कि जिन लोगों ने  कुम्हार के यहाँ गीली मिट्टी से सुन्दर खिलौने ढलते हुए देखा है वे सब जानते हैं कि यह चमत्कार वस्तुतः उस साँचे का है जिसमें खिलौने की छवि पहले से ही साफ-सुथरे ढंग से उभरी हुई है। यदि  इस छवि में कमी रहेगी तो उस मिट्टी से  बनने वाली आकृति भी  गड़बड़ वाली  बनेगी। कसूर तो फिर सांचे का ही  हुआ न, मिट्टी बेचारी को क्यों दुत्कारा जाता है। हमारी संतान तो गीली मिट्टी है और हम साँचा हैं।   

व्यक्ति निर्माण में कभी भी सिर्फ  बौद्धिक प्रशिक्षण ( intellectual  training ) कारगर सिद्ध नहीं हुआ है।  गुरुदेव लिखते हैं कि प्रभावी प्रवचनों, प्रदर्शनों से यदि व्यक्तित्वों को ढालना संभव रहा होता तो न  जाने कब का हो गया होता और इसे समर्थ लोगों ने कब का कर लिया होता।  ज्योति से ज्योति जलती है।  तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी लोगों के प्रभाव से नये व्यक्तित्व ढलते और बदलते हैं।  परिवार के जिन मूर्धन्य सदस्यों को अपने परिवार या क्षेत्र में नवसृजन का काम करना है तो उन्हें नवसृजन के सारे पहलु  पहले अपने अंतःकरण  में उतारने होंगें। यदि समझाने मात्र से काम चल जाता तो कितना अच्छा होता, तब तो हर जगह, हर गली में, हर परिवार में समझ की ही तूती बोलती और चरित्रनिष्ठा के दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता ही न पड़ती।  लेकिन विवशता है कि  क्या किया जाए? 

विवशता यह है कि  परिवार में उत्कृष्टता का वातावरण  लाना इतना आसान नहीं है , थोड़ा जटिल (काम्प्लेक्स ) तो  है परंतु उसकी तुलना में जो लाभ मिलता है उसे देखते हुए कठिनाई अथवा परिश्रम रत्ती भर भी नहीं है।  

गुरुदेव ने बार -बार कहा है :परिवार के सदस्यों को अपने उत्तराधिकारियों के लिए धन-वैभव छोड़ देना  उतना सुखद नहीं हो सकता  जितना कि उन्हें सुसंस्कारी बना देना।  यह वह  सम्पत्ति है जो उन्हें  सदा गौरवान्वित रखेगी और पग-पग पर श्रेय-सहयोग से लाभान्वित करेगी क्योंकि सफलताएं किसी भी क्षेत्र की क्यों न हों, उन्हें व्यक्तित्व सम्पन्न लोग ही प्राप्त करते हैं।  

उपदेशों से लोगों में जानकारियाँ भरी  जा सकती हैं और व्यक्ति को सुधारना व परिष्कृत करना उन्हीं महान आत्माओं के लिए सम्भव हो पाता  है जो अपनेआपको आदर्श के रूप में विकसित कर सकते हैं , हर प्रकार से संस्कारित व पवित्र हैं , निरंतर साधनात्मक पुरुषार्थ में संकल्पित होकर साधनामय जीवन जी रहे हैं। ऐसे मनुष्यों को  महान तपस्वी, दिव्य आत्मा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।   शिक्षा तो सहज ही सुनी जा सकती है, लेकिन प्रेरणा तभी मिलती है जब अनुकरण के लिए प्रभावशाली व प्रतिभावान आदर्श सामने हों।  जलता हुआ दीपक ही दूसरे तमाम नये दीपकों को जला सकता है, बुझा दीपक नहीं।  साँचे के अनुरूप ही खिलौने या पुर्जे ढाले जाते हैं , बनाए जाते हैं। 

परम पूज्य गुरुदेव आत्मनिर्माण व आत्मसुधार हेतु लिखते हैं कि परिवार को सँभालना और परिवार को सुसंस्कारी बनाने के प्रयास में परिवार के वरिष्ठों  को सर्वप्रथम अपनी ही मंजाई , गढ़ाई  करनी पड़ती है।  इस संदर्भ में जो वरिष्ठ जितनी सफलता प्राप्त कर लेंगे, उन्हें परिवार निर्माण में उसी अनुपात में सफलता मिलेगी। मनुष्य एक  अनुकरण प्रिय प्राणी है , वह  जो कुछ समझता है उसमें तो शिक्षकों के परिश्रम का फल ही  कहा जा सकता है परंतु जो बनता है, उसमें अक्सर उन्हीं के चरित्रों का योगदान होता है और जो हमेशा साथ रहते हैं, प्रभावित करते हैं।  

परम पूज्य गुरुदेव लिखते : आत्मसुधार और आत्मनिर्माण से पारिवारिक माहौल खुशनुमा बनेगा  जिससे परिवार में सुख-शांति की पारदर्शिता स्पष्ट दिखाई देगी।  ऐसे पारदर्शी परिवारों के परिवेश में आकर लोगों को बहुत बड़ी प्रेरणा मिलेगी,  सबका दृष्टिकोण बदलेगा  और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। नीचे लिखी पंक्तियों में गुरुवर ने कितना कुछ कह दिया है ज़रा विचार कीजिये :

अपना-अपना करो सुधार, तभी मिटेगा भ्रष्टाचार 

सावधान – युग बदल रहा है, 

सावधान – नया युग आ रहा है 

संकल्प शक्ति असंभव को भी संभव बना देती है 

जो दूसरों से चाहते हो,उसे पहले स्वयं करो  

धन्यवाद जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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3.असंख्य समस्याओं का समाधान -सरविन्द कुमार  पाल 

27 अक्टूबर  2021का ज्ञानप्रसाद : 3.असंख्य समस्याओं का समाधान -सरविन्द कुमार  पाल 

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत  तृतीय लेख।

आज के ज्ञानप्रसाद में आदरणीय सविंदर भाई साहिब ने  परिवारों में उठ रही समस्याओं के समाधान का विवरण दिया है।  आज के लेख एक वाक्य बहुत ही चिंतन  मनन वाला है -“परिवार में समस्याओं का अम्बार होता है और परिवार नाम ही समस्या का है” लेख छोटा अवश्य है लेकिन बहुत ही अर्थ पूर्ण है। लेख आरम्भ करने से पूर्व अपने सहकर्मियों को धन्यवाद् करते हुए निवेदन करते हैं कि निम्लिखित पंक्तियाँ अवश्य पढ़ें :

परमपूज्य गुरुदेव का संरक्षण और मार्गदर्शन हो तो कुछ भी असम्भव नहीं  है।अभी कुछ दिन  पूर्व ही हमने परमपूज्य गुरुदेव के निर्देश  अनुसार अपने सहकर्मियों के समक्ष कमेंट और काउंटर कमेंट का बीजारोपण किया था, आज उस बीज से उत्पन पौध ने जो रूप  लिया है आप सबके समक्ष है , यह सारे का सारा श्रेय आपको ही जाता है ।  कल वाले लेख पर सविंदर भाई साहिब ने  कमेंट किया कि था भावरूपी महायज्ञ में विचाररूपी हवन सामग्री के साथ कमैंट्स रुपी कम से कम 24 आहुतियां अवश्य डालें ,अधिक हो तो और भी अच्छा। इस  लेख को  लिखने समय तक रेनू  श्रीवास्तव बहिन जी के कमेंट पर 24 आहुतियां डल चुकी थीं और सरविन्द भाई साहिब के कमेंट पर 22  आहुतियां देखने को मिलीं।  यही है सहकारिता और अपनत्व का परिणाम जिसके लिए आप सबका  बहुत ही धन्यवाद् है।  725 शब्दों के विस्तृत कमेंट में से उस भाग को जहाँ  सरविन्द भाई साहिब ने 24 आहुतियों का सुझाव दिया था हमने  बहुतों के साथ शेयर  भी किया था लेकिन सारा कमेंट पढ़ने के लिए फिर से निवेदन करते हैं  क्योंकि उन्होंने अपने बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाएं लिखी हैं जिनसे बहुतों को गुरुदेव की शक्ति को  जानने में सहायता होगी। जब हम कमेंटस के परिपेक्ष्य में बात करते हैं तो हमारे पाठक यह मत समझें कि हमें कमैंट्स की  कोई भूख है।  हमारा केवल एक ही उदेश्य है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों में ,परिवारों में ,घरों में गुरुदेव के इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान हो ताकि इस भटकन भरी दुनिया में ,मारीमारी ,आपाधापी भरी दुनिया में हम सबको कोई प्रकाश की किरण मिल सके।

तो आरम्भ करते हैं आज का ज्ञानप्रसाद 

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आदर्श परिवार लेखों की श्रृंखला में  प्रस्तुत है  तृतीय लेख  जिसमें परम पूज्य गुरुदेव ने परिवार निर्माण के मार्ग में आने वाली  “असंख्य समस्याओं के  समाधान” को लेकर बहुत सुन्दर शब्दों में लिखा है।  

गुरुदेव लिखते हैं : 

परिवार का अर्थ एक-दूसरे के प्रति घनिष्ठ आत्मीयता :

परिवार में सुसंस्कारिता का माहौल बनाना प्रत्येक विचारशील, जागरूक और विवेकवान सदस्य का परम कर्त्तव्य है। यदि परिवार का हर कोई सदस्य इस परिवार रूपी संगठन में रहने तथा उसका लाभ उठाने का ही दृष्टिकोण अपने जीवन में उतार ले तो परिवार संस्था का कोई महत्व ही नहीं रह जाता। यदि एक साथ रहने का नाम ही परिवार है तो लोग धर्मशालाओं में, होटलों में, स्कूलों में, आश्रमों में, पिक्चर हालों में भी  तो एक साथ रहते हैं तो इन लोगों को  परिवार के सदस्य तो नहीं कहा जा सकता।   

परिवार एक साथ रहने वाले व्यक्तियों का नाम नहीं है बल्कि उसमें रहने वाले सदस्यों का एक समूह है। इस समूह में सदस्य  एक-दूसरे के प्रति घनिष्ठ आत्मीयता के सूत्र में बँधे रहते हैं। सभी सदस्य एक  साथ रहते हैं , एक चौके में खाना खाते हैं , एक-दूसरे से  बातचीत करते हैं, प्रेम-व्यवहार से जुड़े रहते हैं  और इसके  अलावा परिवारजन  आपस में मिलजुल  कर एक-दूसरे के प्रति कर्त्तव्यों में बँधे रहते हैं।  

परिवारजनों की परिभाषा :

पारिवारजन कहलाने के  उचित अधिकारी वह होते हैं जो कर्त्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन करते हैं क्योंकि नाबूझ, अबोध और छोटे बच्चों की अपेक्षा कर्त्तव्य पालन की आवश्यकता परिवार के बड़े सदस्यों के लिए अधिक होती  है।  छोटे बच्चों को तो अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों का ज्ञान ही नहीं होता, वह इन सब बातों से अनभिज्ञ होते है क्योंकि उन्हें वह भाषा ही समझ नहीं आती। बच्चों को अपने कर्त्तव्यों व उत्तरदायित्वों को समझाना तो  बहुत आगे की बात है। पहले परिवार के सभी बड़े-बुजुर्ग तो अपनेआप में  कर्त्तव्यपरायणता, श्रद्धा और निष्ठां को सुनिश्चित बनायें। ऐसे अनुशासनीय वातावरण में पल रहे बच्चों में परिवार के प्रति दृष्टिकोण व दिशा अवश्य बदलेगी। बच्चों में कुशल नेतृत्व की भावना जागृत होगी  क्योंकि आज का बच्चा ही  कल का भविष्य होता है। थोड़ी सी ही लापरवाही नरक का द्वार खोल सकती है। परमपूज्य गुरुदेव का स्वर्णिम उद्घोष 

“हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा” 

कोई ऐसा वैसा उद्घोष नहीं है। इसका एक-एक शब्द philosophical  है। तो आइये हम सब परिवार के  बड़े सदस्य यह संकल्प लें कि किसी को सुधारने य बदलने से पहले स्वयं सही मार्ग पर चलें। तत्पश्चात बच्चे स्वयं ही  अनुसरण करते चले जाएंगे।  

“परिवार में समस्याओं का अम्बार होता है और परिवार नाम ही समस्या का है” 

परिवार की सभी समस्याओं का समाधान इसके  सदस्यों के कुशल नेतृत्व से ही  किया जा सकता है क्योंकि समस्याओं का स्थायित्व नहीं होता है , वह अस्थाई होती हैं। परिवार को ठीक से  सँभाल कर रखना सभी वरिष्ठ  सदस्यों का परम कर्त्तव्य व उत्तरदायित्व होता है।उत्तरदायित्व ही परिवार के लोगों को संस्कारवान बनाता है तथा आदर्श व उत्कृष्ट व्यक्तित्व सम्पन्न समाज बनाने के लिए प्रयासों को किया जाता है। यदि इन प्रयासों को कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया जाए तो न केवल परिवार उत्कृष्ट व्यक्तित्वों को उत्पन्न करने में समर्थ हो सकेगा  बल्कि उन प्रयासों के माध्यम से असंख्य मानवीय समस्याओं का समाधान भी परिवार की परिधि में रहकर संभव हो पायेगा।  सामाजिक कुरीतियाँ और समस्याएं कोई आसमान से नहीं टपकती हैं, यह सब हमारी ही creation हैं, हम ही इन सबके रचयिता हैं। हमारी गतिविधियां और क्रियाकलाप ही समस्याएं खड़ी करते हैं। यदि अपने  दृष्टिकोण में थोड़ा सा भी  परिवर्तन किया जाए तो समस्याओं का जड़-मूल से समाधान किया जा सकता है क्योंकि गुरुदेव ने बार-बार कहा है – 

“नज़रें बदलते ही नज़ारा बदल जाता है”  

परमपूज्य गुरुदेव ने कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं का उल्लेख कर हम सब में गुणवत्ता लाने की बात लिखी है। अशिक्षा की समस्या,गरीबी की समस्या, स्वास्थ्य की समस्या, जनसंख्या वृद्धि की समस्या, चरित्र-निर्माण की समस्या, नागरिकता की समस्या , कुरीति उन्मूलन की समस्या, नारी-जागरण की समस्या, गोरक्षा की समस्या, लोकसेवियों की पूर्ति, दुर्व्यसन-दुष्प्रवृत्ति निवारण व सहकारिता की समस्या आदि कुछ एक समस्याएं हैं जिंनके बारे में जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है। इस तरह की  असंख्य समस्याओं का अम्बार लगा है जिसका  निपटारा करना  किसी सामान्य प्राणी के बस की बात नहीं है। इसके लिए हम सबको कुशल नेतृत्व की आवश्यकता  है। अगर हम परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों को आत्मसात् कर अपने जीवन में उतारें और अंतरात्मा की गहराई में पहुँच कर अनुभव करें तो एक दिन सब ठीक हो जाएगा। 

कैसे होगा समस्याओं का समाधान ?

परम पूज्य गुरुदेव परिवार निर्माण की असंख्य समस्याओं के  समाधान का विस्तृत विवरण बहुत ही सरल-स्वभाव में  लिखते हैं कि मानवी प्रगति में बुद्धि को प्रधान कारण समझा जाता है परंतु इससे भी अधिक महिमा सहकारिता की है। भौतिक य  आध्यात्मिक प्रगति का सारा खेल तो आपस में मिलजुल कर रहने की आदत में ही सन्निहित है। इसी सत्प्रवृत्ति को जीवनयापन के हर क्षेत्र में विकसित करना पारिवारिकता है, इसी का विकसित रूप समाजवाद व साम्यवाद है। अध्यात्म दर्शन भी इसी आस्था पर आधारित है।  “वसुधैव कुटुम्बकम” का सिद्धांत सम्पूर्ण मानव समाज को आत्मीयता के सूत्र में बाँधता है और संयुक्त रूप से प्रगति करने तथा आपस में मिल-बाँटकर खाने की प्रेरणा देता है। 

निर्जीव ( lifeless )  निर्माण  जैसे कि कुर्सी ,मेज़ ,इमारतें इत्यादि सरल है, लेकिन सजीवों ( मनुष्यों )  का निर्माण  बहुत ही  जटिल है।  यह इसलिए है कि  निर्जीव वस्तुयें जहाँ की तहाँ रखी रहती हैं और अपने मन से वह उलट-पुलट नहीं कर पाती हैं  परंतु सजीव प्राणी तो हर-पल, हर-घड़ी व हर-क्षण कुसंस्कारिता का परिचय देने और नई-नई समस्याओं को उत्पन्न करने से नहीं चूकते हैं।  ऐसी स्थितियों में प्राणियों का, विशेषकर मनुष्यों का भावनात्मक निर्माण कितना कठिन हो सकता है, इसे कल्पना से नहीं, अनुभव से ही जाना जा सकता है।  शरीर का पालन-पोषण करना तो सहज है, परंतु बौद्धिक व भावनात्मक निर्माण करने के लिए असाधारण दूरदर्शिता और तत्परता अपनानी पड़ती है तब कहीं  जाकर परिवार निर्माण अपना साकार रूप ले पाता है।  परिवार निर्माण का प्रत्यक्ष पक्ष इतना ही है कि जिस परिवार में रहने वाले हर किसी सदस्य का वर्तमान जीवन और भविष्य सुखद बनता है तो परिवार का वही सदस्य परिवार निर्माण का कुशल निर्माता बनकर परिवार का कुशल नेतृत्व कर सकता है।  परिवार निर्माताओं को इसके बदले में  बढ़ा हुआ आत्मविश्वास  और आत्मसंतुष्टि मिलती है। आत्मसंतोष, आत्मगौरव, श्रद्धा-सम्मान एवं यश-श्रेय प्राप्त कर निर्माता को  गर्व का आभास होता  है।  हरे-भरे उपवन  लगाने-सजाने वाला माली, सामान्य श्रमिकों की तुलना में कुछ अधिक ही श्रेय और लाभ कमाता है।  इसलिए परिवार निर्माण में तत्पर मनुष्यों की उपलब्धियाँ किसी भी कुशल माली, भवन निर्माता, सफल उद्योगपति से कम नहीं होती हैं और यह सब उपलब्धियाँ धीरे-धीरे हर किसी मनुष्य को प्राप्त हो सकती हैं। इन उपलब्धियों को  प्राप्त करने के लिए सरल, सुन्दर व बहुत ही छोटा मंत्र है – गायत्री महामंत्र।  इस मंत्र की  प्रतिदिन  स्वच्छ व निर्मल मन से ,उपासना,साधना व आराधना करने से आद्यिशक्ति जगत् जननी माँ गायत्री की असीम अनुकम्पा बरसती है और अपार शक्ति प्राप्त होती है।  इस  मंत्र  के नियमित जाप से  मनुष्य का  अंतःकरण प्रफुल्लित हो जाता है और  असीम आनंद की अनुभूति होती है। 

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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2.जीवन साधना एक बहुत कठिन तपस्या -सरविन्द कुमार पाल 

26 अक्टूबर  2021 का ज्ञानप्रसाद:  2.जीवन साधना एक बहुत कठिन तपस्या -सरविन्द कुमार पाल 

परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत   द्वितीय  लेख।

जब हम आज वाले लेख की एडिटिंग कर रहे थे तो हमारे मन में दुविधा थी कि इसका शीर्षक क्या रखा जाए क्योंकि  शीषक ही लेख को आकर्षित बनाते हैं। जो कुछ भी इस लेख में लिखा गया है वह  हम सब जानते हैं ,घर- घर की कहानी है।  Joint family system , Nuclear Family system जिन्हे हमने संयुक्त परिवार और छोटे परिवारों के नाम दिए हुए हैं, हर कोई इनसे परिचित है। हम में से हर कोई इनके  लाभ ,हानि से भी  परिचित है। अपने दिल से पूछने की आवश्यकता है कि क्या हम परमपूज्य गुरुदेव द्वारा निर्देशित  मापदंडों का पालन कर रहे हैं ? अगर कर रहे हैं तो फिर  समस्या  कहाँ है ? क्या हम  रोज़मर्रा की छोटी -छोटी समस्यायों के लेकर राई का पहाड़  नहीं बना रहे ? परिवारों में गिरते मानवीय मूल्यों को रोकने का हम क्या प्रयास कर रहे हैं  ? बुज़ुर्ग पीढ़ी  तो यही कहेगी -हमारे ज़माने में ऐसा नहीं होता था। नई पीढ़ी यही कहेगी -बूढी हो गयी आपकी पीढ़ी। हमारे गुरु ने तो  युगनिर्माण का संकल्प लिया हुआ है और हम हैं कि परिवार निर्माण में ही उलझे हुए हैं। 

अगर हम सब  आज का लेख पढ़कर इन दो पीढ़ियों  में पनप रही खाई को समाप्त करने में सफल हो गए तो अवश्य ही आदरणीय सरविन्द भाई साहिब का और हमारा प्रयास सफल समझा जायेगा।  यह हम इसलिए कह रहे हैं कि इस लेख में  परमपूज्य गुरुदेव स्वयं हमें बता रहे हैं कि जीवन साधना “एक बहुत बड़ी तपस्या है , इसे केवल तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी प्रवृत्ति के मनुष्य ही कर सकते हैं। इस प्रवृति के मनुष्य मर भले ही जाएं पर कृपणता नहीं करते। अग्नि बुझ भले ही जाए,पर ठंडी नहीं होती।” 

तो मित्रो इन्ही opening remarks के साथ हम सीधा चलते हैं आदर्श परिवार के द्वितीय लेख की ओर ।

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परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक एक लघु पुस्तक का स्वाध्याय कर विश्लेषण करते हुए लेख की अगली कड़ी में चलते हैं जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि दुर्भाग्यपूर्ण परिवार को ऐसी स्थिति से बचने  के लिए हम सबको कुशल नेतृत्व की जरूरत है।  अगर हम छोटे-छोटे परिवारों की अपेक्षा बड़े संयुक्त परिवार  बनाने  की परम्परा  के  चलन पर विचार करें तो  बहुत ही लाभदायक परिणाम निकल सकते हैं। ऐसे परिवारों की  उपयोगिता इसी शर्त पर निर्भर  है कि पारिवारिक सदस्यों में आपसी सघन-सद्भाव और सहकारिता का माहौल बना रहे।  यदि परिवार में द्वेष-दुर्भाव की,अवज्ञा और उपेक्षा  की व आपाधापी की दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हों तो घर को नरक बनाने से  अच्छा है कि लोग अपना-अपना परिवार लेकर अलग हो जाएं। सद्भाव की स्थिति में तो संयुक्त परिवार का लाभ लिया जा सकता है लेकिन  दुर्भाव पनपने की स्थिति में परिवार का बिखर जाना ही श्रेयस्कर है। बुज़ुर्गों  को चाहिए कि परिवार में एक पक्षीय (one-sided)  अनावश्यक आग्रह नहीं करना चाहिए।  स्थिति के अनुरूप संयुक्त परिवार को बनाए रखने की तरह ही दुर्भावग्रस्त परिवार को शांति व सद्भावनापूर्वक अलग करने में भी सहायता करनी चाहिए।  इससे  परिवार में पारदर्शिता परिलक्षित होगी और सुख-शांति का माहौल, स्नेह व प्यार के रूप में स्पष्ट दिखाई देगा जिसकी आज हम सबको महती आवश्यकता है। 

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं , “परिवार संस्था की सफलता उसकी भावनात्मक स्थिति और आदर्शवादी आचार संहिता पर टिकी हुई है। “

जब तक मनुष्य के अंतःकरण में यह आधार बने रहेंगे, तब तक अभावग्रस्त घर-परिवारों में भी ऐसी स्थिति सुख की अनुभूति कराएगी जिन पर स्वर्ग भी न्योछावर किया जा सके क्योंकि “शरीर की भूख” रोटी, कपड़ा और मकान, अन्न, जल एवं हवा तक ही सीमित है, परंतु “आत्मा की भूख” स्नेह, सम्मान व सहयोग की परिस्थितियाँ मिलने पर ही मिटती है।  परिवार में सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना लाने के लिए हम सबको कुशल नेतृत्व (leadership ) की जरूरत है जिसमें  परिवार के सभी बड़े सदस्यों का  नैतिकता के आधार पर उत्तरदायित्व बनता है। बड़े-बुजुर्ग  छोटे लोगों का विशेष ध्यान रखें ताकि वह बिगड़ने से बच सकें।  हम सबका परम कर्त्तव्य बनता है कि घर में स्वस्थ परम्पराएं डाली जाएं, परिवार का हर कोई सदस्य श्रमनिष्ठ बने, बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों  तक सभी सदस्य परिश्रमरत रहें।  किसी भी सदस्य का समय बरबाद न हो क्योंकि समय अमूल्य होता है। 

आज हर इंसान कितना भी सुखी सम्पन्न क्यों न हो पर वह गरीब है तो केवल  “समय”  के लिए। हर किसी को समय की कमी है । इस  युग की सबसे बड़ी मांग “समय” है -अक्सर हम लोगो को कहते सुने हैं -Time is money   यह आवश्यक है कि  हर कोई समय के महत्व को समझे और  उसे बिल्कुल व्यर्थ न जाने दें।  परिवार के छोटों  को हर बड़े सदस्य का सम्मान तो अवश्य ही  करना चाहिए परंतु  बुजुर्गो का  निठल्ले बैठे रहना तथा बात-बात पर बनावटी बादशाह की तरह हुक्म चलाना  अपना अधिकार नहीं मान लेना चाहिए। छोटे सदस्यों व बच्चों का परम कर्त्तव्य है कि सभी बड़ों  का सम्मान करें  परंतु बड़ों को भी चाहिए कि  छोटों को अपने पीछे नहीं आगे लेकर चलें।  बड़ों का  सम्मान करना ,शिष्टाचार बरतना, सम्मान-सूचक शब्द जैसे-आदरणीय या आप शब्दों को लगाकर संबोधित करना,नित्यप्रति प्रणाम करना, उनके शारीरिक कार्यो में सहयोग देना, कोई नया काम करते समय उनका आशीर्वाद लेना और उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना परिवार के सभी छोटे सदस्यों का परम कर्त्तव्य होना चाहिए।  यह सारी  आदतें  निहायत आवश्यक व न्याय संगत हैं  जिन्हें  धर्म भी स्वीकार करता है। 

परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं : कई बार  परिवार के  बड़े सदस्यों के विचार अनुपयुक्त, असामयिक एवं अवास्तविक होते हैं जो कि छोटे सदस्यों व बच्चों को सूट नहीं करते, फिर भी ऐसे हुक्म ठोकते हैं जो कि मानने लायक नहीं होते हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि यह बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ अभद्रता, छुआछूत, दहेज, धूमधाम में अपव्यय जैसी विकृत परम्पराओं को अपनाने का पुरजोर समर्थन करते हैं लेकिन  समाज-सेवा जैसे सर्वश्रेष्ठ कार्यों में अड़चन डालते  हैं। इस टेंशन की  स्थिति में वह केवल  अपने काम से मतलब रखने  की शिक्षा देने लगते हैं जो कि सरासर गलत है। ऐसे वातावरण में  सारे परिवारजनों  पर  प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और परिवार में मनुष्यता की जगह बैमनुष्यता जन्म ले लेती है।  ऐसी स्थिति  अशांति का कारण बनती  है।  इसलिए  आवश्यक है कि

“हम सबको उचित-अनुचित की बात विवेक की कसौटी पर परखने के बाद ही किसी आज्ञा का पालन करना चाहिएI” 

इस बात का  हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम सबको अनुचित आज्ञा का निसंकोच उलंघन या उपेक्षा अवश्य करना चाहिए लेकिन मर्यादा के बीच ही रहकर। यही कहेंगें कि परिवार में भी आनलाइन ज्ञान रथ  के  12 स्तम्भों  का पूर्णतया पालन करते हुए नम्रता बनाए रखनी चाहिए। यह 12 स्तम्भ – शिष्टाचार, स्नेह, समर्पण, आदर, श्रद्धा , निष्ठा, विश्वास ,आस्था, सहानुभति, सहभागिता,सद्भावना एवं अनुशासन हैं। परिवार के सभी सदस्यों को एक-दूसरे का परस्पर सहयोग करना एक संस्कारित परिवार की स्वस्थ परम्परा होनी चाहिए। यदि  परिवार में कोई सदस्य बीमार होता है तो सभी सदस्य आपस में मिलकर पूछताछ करें, देखभाल करें – चिकित्सा, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना व्यक्त करने के लिए सक्रियता दिखाएँ जिससे घर का माहौल सुखमय व शांतिमय होगा। परिवार के बड़े बच्चे छोटे बच्चों को पढ़ाएं, बड़े-बुजुर्ग फालतू न बैठे, बच्चों को कहानियों के माध्यम से  हँसाने, टहलाने, खेल-खिलाने, गृह-उद्योग सिखाने, प्रश्नोत्तरी से ज्ञानवृद्धि करने के नए  नवीन साधन ढूंढें।  अपनी सामर्थ्य के अनुसार पारिवारिक कार्यो में हाथ बँटाने में निरंतर सक्रिय रहें। आपस में मिल-जुलकर एक साथ काम करने की परम्परा डाली जाए तथा खाना बनाने, सफाई रखने, कपड़े  धोने  जैसे दैनिक कार्यो का बोझ किसी एक पर न डालकर ,सहयोग और  सहकार करें। ऐसा करने से  सबकी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया बहुत ही सराहनीय व प्रशंसनीय होगी जो कि बहुत ही प्रेरणादायक और  अनुकरणीय  होगी।   हम आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सभी आत्मीय सदस्यों  से करबध्द निवेदन  करते हैं कि  कुशल नेतृत्व गुणों ( expert leadership qualities) ) के साथ ही परिवार का संचालन करें  और इस दुर्लभ  जीवन साधना को निरंतर आगे बढ़ाते  जाएँ।  

हमें अपने व्यक्तित्व को उपरोक्त सिद्धांतों के अनुरूप ढालना चाहिए और परिवार में समयानुकूल परम्पराओं का समर्थन करना  चाहिए। ऐसे ही माहौल में पलकर बच्चे सुसंस्कारी बनते हैं।  परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं : यदि आपके पास अगली पीढ़ी के लिए सम्पत्ति छोड़ कर मरने की  स्थिति न भी हो तो कोई  बात नहीं है परन्तु  यदि आपने उस पीढ़ी को  सद्गुणी व सुसंस्कारी बना दिया  तो निश्चिंत है  कि वे हर परिस्थिति में सुखी रह सकेंगे। जिस किसी ने भी  अपने परिवार के साथ रहकर  कुशलता- पूर्वक  नेतृत्व किया ,  परिवार को सुसंस्कारी बनाकर सुखी व समुन्नत बना दिया तो समझ लेना चाहिए कि  इससे बड़ी और कोई  उपलब्धि नहीं हो सकती क्योंकि  यही तो है  “परिवार निर्माण की  जीवन साधना। ”  जीवन साधना एक ऐसी साधना है जो चौबीस घंटे अनवरत चलती रहती है, जिसे हम परिवार में रहकर आजीवन कर सकते हैं।  इस साधना से हम अपनेआप में  व अपने परिवार में अमूल-चूल परिवर्तन ला सकते हैं। लेकिन यह साधना  एक बहुत बड़ी तपस्या है , इसे केवल तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी प्रवृत्ति के मनुष्य ही कर सकते हैं। इस प्रवृति के  मनुष्य मर भले ही जाएं पर कृपणता नहीं करते। अग्नि बुझ भले ही  जाए,पर ठंडी नहीं होती। अतः परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि

“बिना संघर्ष प्रगति असंभव है ज्ञान से कर्म , कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है।”

इसलिए हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस प्रस्तुत लेख से आप सबको बहुत बड़ी प्रेरणा मिलेगी और आप सबका दृष्टिकोण व दिशा बदलेगी और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। 

जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें।

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1. परिवार निर्माण-एक जीवन साधना -सरविन्द कुमार पाल 

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23 अक्टूबर वाले अपडेट में  हमने आपके साथ अपने  दो सहकर्मियों के प्रयास की चर्चा की थी। अब वह समय आ गया है जब हम इस स्थिति में हैं कि आदरणीय सरविन्द भाई जी के अथक प्रयास से रचित आदर्श परिवार कड़ी के अंतर्गत लेखों को अपने सहकर्मियों के समक्ष प्रस्तुत कर सकें। हमारी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं हैं क्योंकि हम बार-बार आप सबसे निवेदन कर रहे थे कि आओ अपनी प्रतिभा को विकसित करो। हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार एक ऐसा अद्भुत परिवार है जिसमें कोई भी  सदस्य ऐसा  नहीं है जिसे परमपिता परमात्मा ने प्रतिभा का अनुदान न दिया हो। 

सरविन्द कुमार जी ने इन  लेखों को बहुत ही श्रद्धा और समर्पण से लिखा है लेकिन  आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पूर्व इस बात को सुनिश्चित किया गया है कि SYNTAX ,PUNCTUATION और दूसरे मापदंडों का आदर किया जाये।  इस क्रिया में हमारा समय तो लगता ही है लेकिन perfection को सुनिश्चित करना हमारी आदत सी बन गयी है। फिर भी कोई त्रुटि रह गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। 

तो प्रस्तुत है परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक  लघु पुस्तक का स्वाध्याय करने उपरांत प्रथम लेख।

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हम परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक एक लघु पुस्तक का स्वाध्याय कर रहे थे, जिसको पढ़ कर हमारा अंतःकरण हिल उठा।  हम अंतरात्मा की गहराई में पहुँच कर अनुभव करने लगे कि इस लघु पुस्तक के प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक विचारों का विश्लेषण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सूझवान व समर्पित देवतुल्य, आत्मीय सहकर्मीयों  के समक्ष क्यों न प्रस्तुत किया जाए ताकि सभी को भी   प्रेरणा मिल सके, सभी का  दृष्टिकोण भी  बदले और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो।  इसी आशा व विश्वास के साथ हम परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों को आप सबके समक्ष लेख के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि, आदरणीय अरुण भइया जी का आशीर्वाद व सभी आत्मीय  सहकर्मीयों  का स्नेह  चाहिए ताकि  हमारे अंतःकरण में ऊर्जा का संचार हो। 

इस कामना के साथ कि हम यह परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का कार्य करते रहें,  हम प्रथम लेख प्रस्तुति की ओर चलते हैं। 

परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि “परिवार निर्माण-एक जीवन साधना है। ”  सर्वप्रथम हम स्वयं आत्मसुधार कर प्रथम कक्षा में पहुँचें और एक तपस्वी का दर्जा प्राप्त करें , फिर परिवार निर्माण करते हुए दूसरी कक्षा में पहुँच कर एक मनस्वी का दर्जा प्राप्त करते हुए समाज परिवर्तन पर ध्यान केन्द्रित कर तेजस्वी का दर्जा प्राप्त करें।  “परिवार निर्माण-एक जीवन साधना है ” के सिद्धांत  को साकार रूप देने के लिए हमें एक तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी बनना ही पड़ेगा।  जिसने इन तीनो डिग्रियों को प्राप्त कर लिया तो समझ लो कि उसने  गृहस्थाश्रम में रह कर भी बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली।  वह परिवार का कुशल नेतृत्व करने में माहिर हो गया तो मान लें कि उसके द्वारा संचालित परिवार में सुख-शांति और संतोष का महौल विद्यमान हो गया।  वह परिवार या घर स्वर्ग के समान हो गया।  इसके विपरीत जिस परिवार या घर में कलह, अशांति और असंतोष हो, वह परिवार या घर नरक के समान हो जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। कौशल को निखारने के लिए कार्यक्षेत्र चाहिए जैसे  वैज्ञानिकों की  प्रयोगशाला , पहलवानों  की  व्यायामशाला , चिकित्सकों के अस्पताल, शिक्षकों की  पाठशालायें  और मैकेनिकों को कारखाने – ठीक उसी प्रकार परिवार निर्माण की प्रयोगशाला परिवार ही है। 

साधना का मूल उद्देश्य आत्मपरिष्कार है  और   अध्यात्म-साधना व जीवन-साधना का अभ्यास कहाँ किया जाए। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं –  इसके लिए दो स्थानों की आवश्यकता है, जिसमें  पहला स्थान पूजा-कक्ष और दूसरा स्थान प्रयोग क्षेत्र।  यदि प्रयोग क्षेत्र की दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रयोग के लिए परिवार ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वसुलभ है।  पूजा-प्रार्थना से अंतरंग व स्वाध्याय-सत्संग से बहिरंग की सत्प्रेरणाएं प्राप्त होती हैं उन्हें कार्यक्रम में परिणत करने व अभ्यास में उतारने की भी आवश्यकता है क्योंकि पूजा-पाठ, जप, उपासना, साधना व आराधना के बीजारोपण को खाद-पानी न मिलने से उसके सूखने व मुरझाने की अशंका बनी रहेगी।  परिवार की प्रयोगशाला में हम सबको अपने स्वयं के व समस्त प्रियजन माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, बेटा-बेटी व अन्य बच्चों के गुण, कर्म व स्वभाव परिष्कृत करने का नित्य-प्रति निष्ठावान व श्रद्धावान साधक बनकर नियमितता का निरंतर अभ्यास क्रम जारी रखना चाहिए।  इससे हम सबको दोहरे लाभ हैं, प्रथम लाभ भौतिक तथा द्वितीय लाभ आध्यात्मिक है।  भौतिक लाभ इस अर्थ में है कि परिवार के सभी सदस्यों को अपने व्यक्तित्व को सुविकसित करने के रूप में एक महान उपलब्धि का लाभ मिलता है और यह उपलब्धि इतनी बड़ी होती है कि उसे कुबेर की सम्पदा से भी बढ़कर माना जा सकता है।  उस परिष्कृत माहौल में रहने वाले हम सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन सामान्य परिस्थितियाँ रहने पर भी असमान्य प्रसन्नता का अपने जीवन में अनुभव करते हैं और हँसते-हँसाते उन्नति के उच्च-शिखर तक जा पहुँचते हैं।  इसलिए हम सब अपने परिवार में रहकर परम पूज्य गुरुदेव की तरह अपने सभी उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए अपना आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।  परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि “तपोवनो में घर बनाने की अपेक्षा, घरों को तपोवन बनाया जाए। ” 

जितनी सरलतापूर्वक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन व दुष्प्रवृत्तियों के  उन्मूलन की साधना घर-परिवार में हो सकती है, उतनी आसानी से और कहीं किसी अन्य जगह पर नहीं हो सकती है।  परिवार में रहकर पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा,चिकित्सा, आतिथ्य आदि रीति-रिवाजों के उत्तरदायित्वों व आपत्तिकालीन स्थिति का सामना कर सकने की सामर्थ्य भी रखनी होती है।  यदि सामान्य जीवनयापन करना है तो सामान्य ज्ञान व लोक व्यवहार के अनुभव से भी मनुष्य अपनी अल्प बुद्धि व बाजुओं में जो क्षमता है तो वह उसके लिए पर्याप्त है जिससे कि उसके सामान्य परिवार का जीवनयापन किसी प्रकार हँसी-खुशी के साथ होता चला जाए।  परिवार का निर्वाह करने में कठिनाई तो तब आती है जब परिवार के सदस्यों में आपसी वैमनुष्यता बढ़ जाती है और स्नेह-सौजन्य का,  सद्भाव-सहकार का अभाव हो जाता है। इस स्थिति में हम एक-दूसरे से नफरत करने लगते हैं और अपने में चौकस रहते हैं।  अनुशासन तोड़कर समय-कुसमय पर आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैंI जिस परिवार में ऐसी स्थिति होगी वह परिवार साधन-सम्पन्न होते हुए भी सुख-शांति से वंचित होगा और वहाँ पर मनुष्य विवशतापूर्वक जीवन जी रहा होगा।  ऐसी स्थिति में उन परिवारों में न घनिष्ठता रहती है और न ही आत्मीयता।  ऐसी अशांतिपूर्ण  स्थिति में दिन काटना तो स्वाभाविक है परंतु वह आनंद और उपलब्धियाँ नहीं मिल पाती हैं जो हम सबको एक अच्छे व संस्कारित पवित्र परिवार में मिल सकती हैं। 

वर्तमान में अधिकांश परिवार दुर्भाग्यपूर्ण जीवन जी रहे हैं जिसका सही संचालन करने के लिए कुशल नेतृत्व की जरूरत है और ऐसे परिवारों का कुशल नेतृत्व करने के लिए जीवन साधना करने वाला महान तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी मनुष्य होना चाहिए।  इसके लिए अलग से स्पेशलिस्ट नहीं लाए जाते , ऐसे प्रचण्ड तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी लोग हम सबके बीच से ही निकलकर आते हैं। अपनी जीवन साधना का गायत्री महामंत्र की उपासना साधना व आराधना के बीजारोपण को खाद-पानी देते हुए अपने आपको व्यवस्थित, संयमित व नियमित कर परिवार के सभी आत्मीय परिजनों के साथ स्नेह व प्यार देते हुए अपनी जीवन साधना को साकार रूप देने का प्रयास करें। इस प्रयास  हेतु अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर व पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करते हुए तहेदिल से अपनी भारतीय-संस्कृति की गरिमा को बनाए रखें।  परिवार के प्रत्येक परिजन के साथ श्रद्धा व समर्पण की भावना से ओतप्रोत होकर सक्रियता, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना का निस्वार्थ भाव से पूर्णतया पालन करें।  अपने परिवार निर्माण हेतु एक तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी जीवन साधक साधना के बल पर अपने परिवार का कुशल नेतृत्व करता रहता है।  ऐसे परिवारों में वास्तविक सुख-शांति देखने को मिलती है। यह  परिवार धन-वैभव को महत्व न देकर,अल्प-साधनों में सदैव खुश रहते हैं और “जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है” के सिद्धांत  को ही सर्वोपरि मानते हैं। 

इसी आशा व विश्वास के साथ लेख प्रस्तुति की प्रथम कड़ी का समापन कर द्वितीय कड़ी की प्रतीक्षा में अपनी लेखनी को विराम देते हुए अपनी हर किसी गलती के लिए आपसे क्षमाप्रार्थी हैं।  परम पूज्य गुरुदेव से आपके अच्छे स्वास्थ्य व उज्जवल भविष्य की शुभ मंगल कामना करते हैं।  परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे यही हमारी गुरू सत्ता से प्रार्थना है।  धन्यवाद जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

25 अक्टूबर 2021  का ज्ञानप्रसाद -1. परिवार निर्माण-एक जीवन साधना -सरविन्द कुमार पाल 

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23 अक्टूबर वाले अपडेट में  हमने आपके साथ अपने  दो सहकर्मियों के प्रयास की चर्चा की थी। अब वह समय आ गया है जब हम इस स्थिति में हैं कि आदरणीय सरविन्द भाई जी के अथक प्रयास से रचित आदर्श परिवार कड़ी के अंतर्गत लेखों को अपने सहकर्मियों के समक्ष प्रस्तुत कर सकें। हमारी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं हैं क्योंकि हम बार-बार आप सबसे निवेदन कर रहे थे कि आओ अपनी प्रतिभा को विकसित करो। हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार एक ऐसा अद्भुत परिवार है जिसमें कोई भी  सदस्य ऐसा  नहीं है जिसे परमपिता परमात्मा ने प्रतिभा का अनुदान न दिया हो। 

सरविन्द कुमार जी ने इन  लेखों को बहुत ही श्रद्धा और समर्पण से लिखा है लेकिन  आपके समक्ष प्रस्तुत करने से पूर्व इस बात को सुनिश्चित किया गया है कि SYNTAX ,PUNCTUATION और दूसरे मापदंडों का आदर किया जाये।  इस क्रिया में हमारा समय तो लगता ही है लेकिन perfection को सुनिश्चित करना हमारी आदत सी बन गयी है। फिर भी कोई त्रुटि रह गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। 

तो प्रस्तुत है आदर्श परिवार कड़ी का प्रथम लेख    

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हम परम पूज्य गुरुदेव के कर-कमलों द्वारा रचित “सुख और प्रगति का आधार आदर्श परिवार” नामक एक लघु पुस्तक का स्वाध्याय कर रहे थे, जिसको पढ़ कर हमारा अंतःकरण हिल उठा।  हम अंतरात्मा की गहराई में पहुँच कर अनुभव करने लगे कि इस लघु पुस्तक के प्रेरणादायक व ज्ञानवर्धक विचारों का विश्लेषण कर आनलाइन ज्ञान रथ परिवार के सूझवान व समर्पित देवतुल्य, आत्मीय सहकर्मीयों  के समक्ष क्यों न प्रस्तुत किया जाए ताकि सभी को भी   प्रेरणा मिल सके, सभी का  दृष्टिकोण भी  बदले और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो।  इसी आशा व विश्वास के साथ हम परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक व क्रान्तिकारी विचारों को आप सबके समक्ष लेख के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि, आदरणीय अरुण भइया जी का आशीर्वाद व सभी आत्मीय  सहकर्मीयों  का स्नेह  चाहिए ताकि  हमारे अंतःकरण में ऊर्जा का संचार हो। 

इस कामना के साथ कि हम यह परमार्थ परायण कार्य करके पुरुषार्थ कमाने का कार्य करते रहें,  हम प्रथम लेख प्रस्तुति की ओर चलते हैं। 

परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि “परिवार निर्माण-एक जीवन साधना है। ”  सर्वप्रथम हम स्वयं आत्मसुधार कर प्रथम कक्षा में पहुँचें और एक तपस्वी का दर्जा प्राप्त करें , फिर परिवार निर्माण करते हुए दूसरी कक्षा में पहुँच कर एक मनस्वी का दर्जा प्राप्त करते हुए समाज परिवर्तन पर ध्यान केन्द्रित कर तेजस्वी का दर्जा प्राप्त करें।  “परिवार निर्माण-एक जीवन साधना है ” के सिद्धांत  को साकार रूप देने के लिए हमें एक तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी बनना ही पड़ेगा।  जिसने इन तीनो डिग्रियों को प्राप्त कर लिया तो समझ लो कि उसने  गृहस्थाश्रम में रह कर भी बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली।  वह परिवार का कुशल नेतृत्व करने में माहिर हो गया तो मान लें कि उसके द्वारा संचालित परिवार में सुख-शांति और संतोष का महौल विद्यमान हो गया।  वह परिवार या घर स्वर्ग के समान हो गया।  इसके विपरीत जिस परिवार या घर में कलह, अशांति और असंतोष हो, वह परिवार या घर नरक के समान हो जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। कौशल को निखारने के लिए कार्यक्षेत्र चाहिए जैसे  वैज्ञानिकों की  प्रयोगशाला , पहलवानों  की  व्यायामशाला , चिकित्सकों के अस्पताल, शिक्षकों की  पाठशालायें  और मैकेनिकों को कारखाने – ठीक उसी प्रकार परिवार निर्माण की प्रयोगशाला परिवार ही है। 

साधना का मूल उद्देश्य आत्मपरिष्कार है  और   अध्यात्म-साधना व जीवन-साधना का अभ्यास कहाँ किया जाए। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं –  इसके लिए दो स्थानों की आवश्यकता है, जिसमें  पहला स्थान पूजा-कक्ष और दूसरा स्थान प्रयोग क्षेत्र।  यदि प्रयोग क्षेत्र की दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रयोग के लिए परिवार ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वसुलभ है।  पूजा-प्रार्थना से अंतरंग व स्वाध्याय-सत्संग से बहिरंग की सत्प्रेरणाएं प्राप्त होती हैं उन्हें कार्यक्रम में परिणत करने व अभ्यास में उतारने की भी आवश्यकता है क्योंकि पूजा-पाठ, जप, उपासना, साधना व आराधना के बीजारोपण को खाद-पानी न मिलने से उसके सूखने व मुरझाने की अशंका बनी रहेगी।  परिवार की प्रयोगशाला में हम सबको अपने स्वयं के व समस्त प्रियजन माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, बेटा-बेटी व अन्य बच्चों के गुण, कर्म व स्वभाव परिष्कृत करने का नित्य-प्रति निष्ठावान व श्रद्धावान साधक बनकर नियमितता का निरंतर अभ्यास क्रम जारी रखना चाहिए।  इससे हम सबको दोहरे लाभ हैं, प्रथम लाभ भौतिक तथा द्वितीय लाभ आध्यात्मिक है।  भौतिक लाभ इस अर्थ में है कि परिवार के सभी सदस्यों को अपने व्यक्तित्व को सुविकसित करने के रूप में एक महान उपलब्धि का लाभ मिलता है और यह उपलब्धि इतनी बड़ी होती है कि उसे कुबेर की सम्पदा से भी बढ़कर माना जा सकता है।  उस परिष्कृत माहौल में रहने वाले हम सभी आत्मीय पाठकगण व सहकर्मी भाई बहन सामान्य परिस्थितियाँ रहने पर भी असमान्य प्रसन्नता का अपने जीवन में अनुभव करते हैं और हँसते-हँसाते उन्नति के उच्च-शिखर तक जा पहुँचते हैं।  इसलिए हम सब अपने परिवार में रहकर परम पूज्य गुरुदेव की तरह अपने सभी उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए अपना आध्यात्मिक जीवन जी सकते हैं।  परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि “तपोवनो में घर बनाने की अपेक्षा, घरों को तपोवन बनाया जाए। ” 

जितनी सरलतापूर्वक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन व दुष्प्रवृत्तियों के  उन्मूलन की साधना घर-परिवार में हो सकती है, उतनी आसानी से और कहीं किसी अन्य जगह पर नहीं हो सकती है।  परिवार में रहकर पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा,चिकित्सा, आतिथ्य आदि रीति-रिवाजों के उत्तरदायित्वों व आपत्तिकालीन स्थिति का सामना कर सकने की सामर्थ्य भी रखनी होती है।  यदि सामान्य जीवनयापन करना है तो सामान्य ज्ञान व लोक व्यवहार के अनुभव से भी मनुष्य अपनी अल्प बुद्धि व बाजुओं में जो क्षमता है तो वह उसके लिए पर्याप्त है जिससे कि उसके सामान्य परिवार का जीवनयापन किसी प्रकार हँसी-खुशी के साथ होता चला जाए।  परिवार का निर्वाह करने में कठिनाई तो तब आती है जब परिवार के सदस्यों में आपसी वैमनुष्यता बढ़ जाती है और स्नेह-सौजन्य का,  सद्भाव-सहकार का अभाव हो जाता है। इस स्थिति में हम एक-दूसरे से नफरत करने लगते हैं और अपने में चौकस रहते हैं।  अनुशासन तोड़कर समय-कुसमय पर आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैंI जिस परिवार में ऐसी स्थिति होगी वह परिवार साधन-सम्पन्न होते हुए भी सुख-शांति से वंचित होगा और वहाँ पर मनुष्य विवशतापूर्वक जीवन जी रहा होगा।  ऐसी स्थिति में उन परिवारों में न घनिष्ठता रहती है और न ही आत्मीयता।  ऐसी अशांतिपूर्ण  स्थिति में दिन काटना तो स्वाभाविक है परंतु वह आनंद और उपलब्धियाँ नहीं मिल पाती हैं जो हम सबको एक अच्छे व संस्कारित पवित्र परिवार में मिल सकती हैं। 

वर्तमान में अधिकांश परिवार दुर्भाग्यपूर्ण जीवन जी रहे हैं जिसका सही संचालन करने के लिए कुशल नेतृत्व की जरूरत है और ऐसे परिवारों का कुशल नेतृत्व करने के लिए जीवन साधना करने वाला महान तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी मनुष्य होना चाहिए।  इसके लिए अलग से स्पेशलिस्ट नहीं लाए जाते , ऐसे प्रचण्ड तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी लोग हम सबके बीच से ही निकलकर आते हैं। अपनी जीवन साधना का गायत्री महामंत्र की उपासना साधना व आराधना के बीजारोपण को खाद-पानी देते हुए अपने आपको व्यवस्थित, संयमित व नियमित कर परिवार के सभी आत्मीय परिजनों के साथ स्नेह व प्यार देते हुए अपनी जीवन साधना को साकार रूप देने का प्रयास करें। इस प्रयास  हेतु अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर व पारिवारिक सदस्यों की जरूरतों को पूरा करते हुए तहेदिल से अपनी भारतीय-संस्कृति की गरिमा को बनाए रखें।  परिवार के प्रत्येक परिजन के साथ श्रद्धा व समर्पण की भावना से ओतप्रोत होकर सक्रियता, सहकारिता, सहानुभूति व सद्भावना का निस्वार्थ भाव से पूर्णतया पालन करें।  अपने परिवार निर्माण हेतु एक तपस्वी, मनस्वी व तेजस्वी जीवन साधक साधना के बल पर अपने परिवार का कुशल नेतृत्व करता रहता है।  ऐसे परिवारों में वास्तविक सुख-शांति देखने को मिलती है। यह  परिवार धन-वैभव को महत्व न देकर,अल्प-साधनों में सदैव खुश रहते हैं और “जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है” के सिद्धांत  को ही सर्वोपरि मानते हैं। 

इसी आशा व विश्वास के साथ लेख प्रस्तुति की प्रथम कड़ी का समापन कर द्वितीय कड़ी की प्रतीक्षा में अपनी लेखनी को विराम देते हुए अपनी हर किसी गलती के लिए आपसे क्षमाप्रार्थी हैं।  परम पूज्य गुरुदेव से आपके अच्छे स्वास्थ्य व उज्जवल भविष्य की शुभ मंगल कामना करते हैं।  परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे यही हमारी गुरू सत्ता से प्रार्थना है।  धन्यवाद जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

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विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति से मन को नियंत्रित करें

22 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद-  विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति से मन को  नियंत्रित करें 

 “हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे” शीर्षक से प्रकाशित कल वाले लेख पर हमारे बहुत ही समर्पित और रेगुलर सहकर्मी  आदरणीय JB Paul जी ने कमेंट  करते लिखा है कि -मन को कैसे नियंत्रित करें इस पर भी एक लेख की आपसे प्रार्थना करता हूँ – भाई साहिब ऑनलाइन ज्ञानरथ हम सबका सामूहिक प्लेटफॉर्म है जिसमें सभी सहकर्मियों के सुझावों का ह्रदय से सम्मान करना हम सबका उत्तरदाईत्व है। प्रार्थना शब्द लिख कर हमें सम्मान देने के लिए धन्यवाद् लेकिन यह शब्द  हम जैसे तुच्छ मानव के लिए बहुत बड़ी बात है। भाई साहिब के कमेंट के अनुसार हमने  अपनी रिसर्च आरम्भ कर दी और साथ -साथ में कमैंट्स भी पढ़ते  रहे।  इसी दौरान हमें देखा कि जिसका उत्तर देने का हम प्रयास कर रहे हैं वह तो हमारे सहकर्मियों ने अपने कमैंट्स में ही दिया हुआ है।  तीन बहिनों -सुधा जी  ,रेनू जी और साधना जी के कमेंट हमने इस ज्ञानप्रसाद में शामिल किये हैं।  समय की कमी तो  अवश्य ही  होती हैं लेकिन जैसा हम कहते आ रहे हैं   अगर एक -दूसरे के कमेंटस  पढ़  लें तो पारिवारिक भावना तो आएगी ही ,ज्ञान का प्रसार भी होगा। 

कमैंट्स के कार्य के लिए और भी सहकर्मी अपना योगदान देना चाहें तो उनका ह्रदय से स्वागत है।  सविंदर भाई साहिब लेखन -कड़ी  में व्यस्त होने के बावजूद समय निकाल रहे हैं। तीनो बच्चे भी अत्यंत व्यस्तता में कार्य कर रहे  हैं। कुछ सहकर्मी तो हमारे निवेदन  से पहले ही रिप्लाई कर रहे हैं ,उनका ह्रदय से धन्यवाद्।

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कल वाले लेख में लिखा था कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति मन को वश में करे। यदि हम  मानसिक शांति को प्राप्त करना चाहते है तो यह आवश्यक है कि हम मन को वश में करे। हमारे सारे दुख तथा कष्टों का कारण ही  है मन पर उचित नियंत्रण न होना। मन हमारा मालिक बन बैठा है तथा हमें यह नचा रहा है जबकि वास्तव में हम मन के मालिक हैं । अक्सर कहा जाता है कि मन तो चंचल है ,यह एक  स्थान पर टिक ही नहीं पाता है तो क्या करें।  इस स्थिति की तुलना हमने  नवजात शिशु  के साथ करके  समझने का प्रयास किया था। 

हमारी आदरणीय  बहिन सुधा जी ने बहुत ही सूंदर विश्लेषण करते लिखा है कि   हमारा पूरा मानव जीवन आरंभ से अंत तक इस मन के द्वारा ही संचालित हो रहा है।जिसने इसे जीत लिया वो एक अश्वारोही की भांति इसका नियंता होता है ,गुलाम नहीं।साधारण मानव पर तो यह मन ही शासन करता है और पूरा जीवन मृगतृष्णा में भटकाता रहता है।इसीलिए मनीषियों ने कहा है कि अपने मन को वश में करो ,तभी आगे बढ़ पाओगे।आदरणीय रेनू श्रीवास्तव बहिन जी ने लिखा है मन को वश में करने के लिये साधना और ग्यान की आवश्यकता होती है।ग्यान की प्राप्ति के लिये सत्संग और स्वाध्याय  आवश्यक है।इन सब  के लिये आत्म शक्ति ,मन की शक्ति की जरूरत होती 

यह  सर्व विदित तथ्य है कि  मन चंचल है लेकिन इस चंचल मन की लगाम भी तो हमारे  हाथ में ही है।  स्पीड ब्रेकर दिखाई दे रहा है , आहिस्ता का  साइन भी कह  रहा है- अरे भैया आहिस्ता हो जा ,आगे बच्चे सड़क पार कर रहे हैं ,यह स्कूल ज़ोन है , लेकिन हमारे चंचल मन पर इस सभी warnings का कोई भी असर नहीं होता।  परिणाम  हम सबको पता ही है। केवल एक ब्रेक न लगाने की लापरवाही ने हमें जेल  में पहुंचा दिया।  यही ब्रेक हमें अपने मन के अश्व को ,घोड़े को लगानी  है।     मन को कैसे वश में किया जाये। क्या करें  कि हमारा  मन हमारे काबू में रहे । 

तो आइये जानते है कि मन को अपने काबू में कैसे रखा जा सकता है –

सबसे पहला काम, जो हम सबको  करना है वो है “अपने मन को समझना और समझाना  ।” अपनेआप को ,स्वयं को मन से अलग करना । जब तक हम  आत्मा और मन, भावना और इच्छा में भेद नहीं कर लेते, हम  अपने मन को काबू में नहीं कर सकते । वास्तव में मन का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है ही नहीं । हमारी  ही कुछ आदतों , इच्छाओ और संस्कारों के समूह  को मन कहते है  जिसका संचालन भी स्वयं हम ,हमारी आत्मा ही कर रही है। दो अक्षर के इस  छोटे  से  शब्द “मन” का अगर संधिविच्छेद करें तो “म” और “न” दो अक्षर मिलते हैं जिनमें म का अर्थ  “मैं” और न का अर्थ “नहीं” माना  गया है। “मैं” का  अगर और विस्तृत  विश्लेषण करें  तो इसे आत्मा भी कह सकते हैं। हमारी आत्मा की आवाज़ , हमारी अंतरात्मा की आवाज़। जिस समय हमारा मन अंतरात्मा की आवाज़ नहीं सुनता , मन की आवाज़ अंतरात्मा की आवाज़ पर हावी हो जाती  है तब हम मन के नौकर बन जाते हैं।  आत्मा एक स्पीड ब्रेकर की तरह हमें अवगत कर रही है,  सावधान कर रही है लेकिन मन ( आदतें , संस्कार , इच्छाएं ,इन्द्रियां ) इस warning को अनसुना करने के लिए विवश कर रहा है। यह हम पर, हमारी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है कि हमने अपने मन की वाणी  सुननी है य आत्मा की।  हम सब  सुबह से रात  तक जो भी कर्म  करते हैं वह अपनी  इच्छाओं  और आवश्यकताओं से प्रेरित होकर करते हैं  ।यह दोनों शब्द बहुत ही आवश्यक  हैं-  इच्छा और आवश्यकता । दोनों में बहुत बड़ा अंतर है । 

हर आवश्यकता (need ) एक इच्छा(desire ) होती है, लेकिन हर इच्छा एक आवश्यकता हो, यह जरुरी नहीं । 

सारा खेल इन्हीं दो शब्दों  को समझने में है। तो आइये अब हम कुछ व्यवहारिक उदाहरणो से समझने की कोशिश करते है। मान लीजिये आप पानी पी रहे है । कोई  आपसे प्रश्न करता हूँ कि पानी  क्यों पी रहे हैं  ? स्वाभाविक है  य तो आपका  मन हुआ,  इच्छा हुई  य फिर  दूसरा उत्तर -आपको  प्यास लगी, आवश्यकता हुई । इच्छा  और  आवश्यकता का यह खेल हमारे हर कार्य में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान लिए हुए है । अगर हम दोनों का अंतर्  समझ  लेते हैं तो फिर  ज़िद की बात ही आती है।  इसी ज़िद को अध्यात्म की भाषा में साधना का नाम दिया गया है। हमने तो अपने लिए  साधना का अर्थ  “सीधा करना”  मान रखा है। साधना की बात चल रही है तो क्यों न हम अपनी  साधना सिंह बहिन जी के  कमेंट पर चर्चा करें।  बहिन लिखती  हैं – गुरुदेव बोलते हैं -ध्यान करते समय मन को शांत करो, मन को भागने मत दो, मन को  दबोच लो।  सच्चा साधक वह है जिसने  मन को साध लिया, मन ही है जो हर एक चीज़  की कामना करता है, तमन्ना करता है और  मांगता है लेकिन जब हम अपने मन को मित्र बना लेते हैं तो वह मन अपने आप सधता चला जाता है। जब मन चंचल होता है नहीं मानता है तो मैं गुरुदेव को प्रार्थना करती हूं प्लीज गुरुदेव मेरे मन को शांत कर दीजिए

अगर हम आवश्यकता और इच्छा का और विश्लेषण करें तो हमें लगेगा कि हमारी संकल्पशक्ति कितनी कमज़ोर है जो इच्छाशक्ति के आगे हार मान लेती है।  

हमें  भूख नहीं है लेकिन भांति भांति-भांति के व्यंजन देखकर मुंह में पानी आ रहा है, अथक प्रयत्न  करने के बावजूद  हम  अपनेआप  को रोक नहीं पाते और उन्हे खा लेते हैं जो हमारे लिए वर्जित हैं । ऐसा केवल संकल्पशक्ति की कमी के कारण ही होता है।  इस ज्ञान को आपके समक्ष रखते हुए हम अपनी संकल्पशक्ति का मूल्यांकन भी कर रहे हैं। इन लेखों के  लिखने का उदेश्य तो तभी सफल होगा जब हम सब इस ज्ञान को अपनी अंतरात्मा में उतार पायेंगें, नहीं तो  लाखों करोड़ों अन्य लेखों की तरह यह भी इंटरनेट का अंश बन कर ही रह जायेंगें। 

हमारा मन एक अड़ियल ,बिगड़ा हुआ ,ज़िद्दी घोडा है  यदि इस पर काबू न पाया  गया तो  समय, स्वास्थ्य और जीवन को रौंदता हुआ तबाह करता चला जायेगा। यदि हम  इसे  काबू करने  में सफलता  कर लें  तो हम  महानता और  सफलता के चरमोत्कर्ष तकपहुँच सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न  यह उठता है कि इस बेलगाम घोड़े पर लगाम कैसे लगाये, इसकी ज़िद  को कैसे तोड़ें। प्रश्न का उत्तर क्या दें जब प्रश्न ही गलत है।घोड़ा ज़िद्दी अवश्य है लेकिन बेलगाम नहीं है।  लगाम तो हमारे  हाथ में है। जब तक हमें  लगाम को कण्ट्रोल करने को पूरी ट्रेनिंग नहीं है हमें घुड़सवारी का कोई हक नहीं है। हम खुद भी मरेंगें ,आसपास वालों  को भी मारेंगें। इस स्थिति में सबसे बड़ा कार्य है घोड़े की लगाम को कण्ट्रोल करने की ट्रेनिंग प्राप्त करना , confidence पाना  यानि मन को समझाने की ट्रेनिंग। मन जिस भी कार्य के लिए ज़िद  करता है, आवश्यकता का वास्ता देता है  उसे ठीक उसी तरह समझाना पड़ेगा जैसे छोटे बच्चे को गोदी में बिठा कर समझाते  हैं। आखिर दिल  बच्चा ही तो है जी। उसे तरह -तरह के उदाहरणदेने पड़ेंगें , विशेषकर  अतीत का दृश्य दिखाना पड़ सकता  है। अपने मन के साथ वार्तालाप करते हुए  कह सकते हैं, ” देख ! तूने अतीत में  यही घटिया काम किया था, तो परिणाम क्या हुआ ?, दुःख, संताप, पश्चाताप , दर्द । तो इसे दुबारा करने के लिए ज़िद क्यों कर रहा है ?” उसे भविष्य का दृश्य दिखाना पड़ेगा  कि “ अगर तू वही गलती फिर से करेगा तो  क्षणिक स्वाद, आनंद और मनोरंजन के लिए अपने भविष्य को क्यों अंधकारमय  बनाता है। 

मन को चुनौती देकर ठीक करना

मन  को कण्ट्रोल करते समय  लाभ और हानि की बराबर समीक्षा करना आवश्यक होता है। किसी भी कार्य के करने से होने वाले फायदे और नुकसान के बारे मे मन को  यथार्थ रूप से अवगत कराना भी आवश्यक होता है  ।यदि विवेक और सही तर्क साथ -साथ चलें ,एक दूसरे  के सहायक बनें तो मन शीघ्र ही वास्तविकता को समझ जायेगा और ज़िद करना छोड़ देगा , घोड़े की लगाम काबू में आ जाएगी और बड़ी गलती से बचा जा सकता है। कई बार ऐसा करने पर भी मन नियंत्रित नहीं  होता , भटकता रहता है ,शैतान बच्चे की तरह।  

फिर तो एक ही इलाज है। कड़वी दवाई। इसको कहते  हैं विवेकपूर्ण संकल्पशक्ति। 

इस स्थिति में  मन को कण्ट्रोल करना, किसी  बुरी आदत को छोड़ना अपनी prestige बना लेने जैसा  होता है।  उस बुरी आदत को हम एक शत्रु का भांति देखते हैं और उसे परास्त करना अपना prestige issue  बन जाता है।  इस सन्दर्भ में हमें स्वामी रामतीर्थ जी की  प्रसिद्ध कहानी स्मरण आती है। स्वामी रामतीर्थ जी पर हमने एक पूरा लेख लिखा है।  यह बात उस समय की है जब स्वामी रामतीर्थ कॉलेज जाते थे। जिस रास्ते से वह कॉलेज जाते थे, उसी मार्ग में एक व्यक्ति प्रतिदिन रेहड़ी  लगाता था ।उस रेहड़ी पर  पर गरमा-गर्म  जलेबी बन रही होती थी।  जलेबी देख कर  छात्र तीर्थराम ( पूर्व नाम ) का मन  ललचाता था  । गरीब होने से के कारण वह जलेबी खा नहीं सकते,  लेकिन रामतीर्थ  मन के बड़े संयमी थे। वह मन की कमजोरी को समझ चुके थे और  इससे छुटकारा पाना चाहते थे। आखिर एक दिन उन्होंने जलेबी के लिए पैसे जुटा लिए और जलेबी खरीदी । जलेबी लेकर वह घर गये और एक धागे में पिरोकर उसे छत से लटका दिया  लेकिन खाया  नहीं।  स्वामी रामतीर्थ ने कठोर संकल्प शक्ति से  अपने मन की साधना की , यानि मन को सीधा किया । जब वह खाने लायक नहीं रही तो उन्होने उसे  कीड़े – मकोड़ो को डाल दी । इसे कहते है “मन को चुनौती देकर ठीक करना”

कामना करते हैं कि सविता देवता आपकी सुबह को  ऊर्जावान और शक्तिवान बनाते हुए उमंग प्रदान करें। आप हमें आशीर्वाद दीजिये कि हम हंसवृत्ति से  चुन -चुन कर कंटेंट ला सकें। 

जय गुरुदेव

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हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे 

21 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे 

आज का ज्ञानप्रसाद गुड्डी फिल्म की बहुचर्चित प्रार्थना “हमको मन की शक्ति देना मन विजय करे” से आरम्भ कर रहे हैं।  इस लेख में व्यक्त किये गए विचार केवल हमारी अल्पबुद्धि और अल्प-अनुभव पर आधारित हैं। इन विचारों से  सहमत य असहमत होना आप का व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है लेकिन हमारे विचार में यह लेख  तर्कसंगत है, हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपके सूझवान और ज्ञानवान कमेंटस  हमें मार्गदर्शन देने में अवश्य ही सहायक होंगें।  

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मन क्या है ?

मन एक ऐसा शब्द है जिससे हम सब भली भांति परिचित हैं  । मनुष्य का मन ही समस्त शक्तियों का स्रोत  होता है।  मन की दो शक्तियॉ होती है, एक कल्पना शक्ति तथा दूसरी  इच्छा शक्ति। मन की कल्पना शक्ति के बढ़ने पर व्यक्ति कवि, वैज्ञानिक, अनुसंधानकर्ता, चित्रकार,साहित्यकार बनता है।कल्पना शक्ति का विकास लोगों  को अच्छी कवितायें, अच्छा साहित्य.अच्छे चित्र तथा वैज्ञानिक खोजों से सुख और  सम्पन्नता का विकास होता है। कल्पना शक्ति से ही  तो हमारे मनोरंजन के  लिए टीवी सीरियल ,पिक्चरें  बनाई जाती हैं, हमारी खुशियों में बहार आ जाती है। मन की इच्छा शक्ति का विकास होने  से व्यक्ति अधिकतर कार्यों  को करने में सक्षम हो जाता है  वह चाहे तो अमीर बन सकता है, वह चाहे तो स्वयं स्वस्थ रह सकता है तथा औरों  को भी स्वस्थ रख सकता है। वह चाहे तो परमात्मा का भी अनुभव कर सकता है। 

आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी आवश्यक है कि व्यक्ति मन को वश में करे। यदि हम  मानसिक शांति को प्राप्त करना चाहते है तो यह आवश्यक है कि हम मन को वश में करे। हमारे सारे दुख तथा कष्टों का कारण भी है मन पर उचित नियंत्रण न होना। मन हमारा मालिक बन बैठा है तथा हमें यह नचा रहा है जबकि वास्तव में हम मन के मालिक हैं । अक्सर कहा जाता है कि मन तो चंचल है ,यह एक  स्थान पर टिक ही नहीं पाता है तो क्या करें।  इस स्थिति की तुलना तो हम उस नवजात शिशु के साथ कर सकते हैं जिसने अभी-अभी ,नया -नया चलना आरम्भ  किया है। वह तो चाहता है कि सब कुछ आज ही कर लूँ , अभी  सीख लूँ।  लेकिन ज्यों ज्यों समय व्यतीत होता जाता है उसकी इस चंचलता में थोड़ा ठहराव आना आरम्भ हो जाता है। इसका कारण केवल एक ही हो सकता है कि वह  शिशु जब इस संसार में आँख खोलता  है तो वह परमसत्ता उसे अनंत ऊर्जा का वरदान  भी देकर भेजती है।  वह शिशु सोफे पर ऐसी अठखेलियां मारता है जिसे देखकर बूढ़े दादा -दादी ,नाना – नानी ईर्ष्या किये बिना नहीं रहते जो सीढ़ियां पर कदम भी देख -देख  ध्यानपूर्वक  रखते हैं।    

मन की चंचलता को नियंत्रित करके केंद्रित करना और अपनी ऊर्जा को सही राह में channelise  करना अत्यंत आवश्यक है।  अगर हम यह महत्वपूर्ण स्टैप न ले सके तो हमारी दशा एक भटके हुए मानव की भांति होते देर न लगेगी। फिर हम यह भी भूल जायेंगें कि उस परमसत्ता ने हमें वह ऊर्जा एवं अनुदान देकर इस पृथ्वी पर भेजा है जो हमें मानव से महामानव और मानव से देवता बना सकती है।  क्या हमने कभी भी अपने अंदर  छिपी हुई प्रतिभा का विश्लेषण करने का प्रयास किया है ? क्या हमने  कभी भी अपनेआप को जानने का प्रयास किया है ? परमपूज्य गुरुदेव की प्रथम पुस्तक “मैं क्या हूँ”, केवल 50 पन्नों की एक  छोटी से पुस्तिका है। यह पुस्तिका इन  सभी प्रश्नों का समाधान कर सकती है। हम में से बहुत सारे परिजन इस पुस्तक से परिचित हैं ,जिन्हे जानकारी नहीं है वह Internet  archive से पढ़  सकते हैं।  आप केवल इस पुस्तक का नाम ही टाइप कीजिये पुस्तक आपके सामने होगी।    

मन पर कंट्रोल करना अत्यंत आवश्यक है 

मन की एकाग्रता , मन का कण्ट्रोल  ही है जो हमें एक दूसरे  से भिन्न बनाता  है  तथा कार्य करने की क्षमता में अंतर ला देता  है।  यही वह अंतर् है  जिससे कोई व्यक्ति तो जीवन में सफलता प्राप्त कर लेता है  जबकि कोई असफल व्यक्ति की श्रेणी में आ जाता है। यदि हम मन को केंद्रित कर लें , नियंत्रित कर लें तो हमारा पूरे का पूरा  व्यक्तित्व ही बदल सकता है और  मानसिक शांति प्राप्त होगी। जो  व्यक्ति एकाग्र ( concentration ) मन से, नियंत्रित (controlled ) मन से किसी भी  कार्य को  करेगा उसमें उसे  सफलता प्राप्त होने की सम्भावना अधिक है।

हमारे शरीर में “मन” नाम का कोई भी अंग नहीं है , हाँ हम कई बार ऐसा अवश्य कह देते हैं -आज काम करने को मन ( दिल ) नहीं कर रहा।  इस “दिल” का अर्थ ह्रदय से नहीं हैं जिसको हम heart कहते हैं।  ह्रदय को तो और  बड़े काम करने  हैं  जैसे रक्त को साफ़ करना , शरीर के हर हिस्से में एनर्जी देना आदि आदि।  वह कैसे देखेगा कि आपकी मर्ज़ी ,इच्छा ,रूचि काम करने की है कि नहीं। तो कौन है जो हमें यह सब मार्गदर्शन दे रहा है , कौन है जो हमारे “मन” को नियंत्रित कर रहा है।  बहुत से परिजन कहेंगें कि यह मस्तिष्क का काम है , हमारा दिमाग हमारे “मन” को  गाइड कर रहा है, लेकिन मन तो कहीं है ही नहीं। 

तो फिर  “मन” क्या है ?      

मन हमारे अंदर की एक शक्ति  है जो इन्द्रियों (senses) एवं मस्तिष्क के द्वारा देखती  है,सुनती  है,सूंघती  है , है,स्वाद लेती  है तथा स्पर्श की अनुभुति करती  है। हमने यहाँ 5 senses की ही बात की है ,आजकल तो sixth sense की भी बात हो रही है।  मन ही शरीर को सुख-दुख का आभास  करवाता  है। हम जीभ के द्वारा स्वाद का अनुमान तो लगा ही सकते है लेकिन अकेली जीभ कुछ नहीं कर सकती , उस परमसत्ता ने हमें taste buds दिए , स्वाद की इन्द्रियां दीं जिन्होंने हमें स्वाद को अनुभव करने की क्षमता दी। हम अक्सर  मस्तिष्क को  “मन” समझ लेते है लेकिन वह गलत है।  मस्तिष्क एक कम्पयूटर की तरह का उपकरण है जिसके द्वारा मन शरीर पर नियंत्रण रखता है। मस्तिष्क शरीर व मन को जोड़ने का कार्य करता है। व्यक्ति जब बेहोशी की अवस्था में होता है तो   मन का  शरीर से संपर्क  टूट  जाता है ,हम बेहोशी की अवस्था में होते हैं। यही  कारण है कि  ऑपरेशन करने के लिए बेहोशी का इंजेक्शन दिया जाता है  क्योंकि उस समय  दर्द महसूस( feel ) ही  नहीं होता। यह feeling  इन्द्रियों के माध्यम से ही होती हैं 

शरीर पॉच तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना हुआ है।  जिस प्रकार हमारा शरीर  एक निर्जीव पुतला है उसी प्रकार मस्तिष्क भी निर्जीव है

“परन्तु जब  इस शरीर में  मन या आत्मा प्रवेश करती है तो शरीर व