वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

इक्कीसवीं सदी उज्जवल भविष्य की गंगोत्री, शांतिकुंज

 21  मार्च 2023 का ज्ञानप्रसाद

युगतीर्थ शांतिकुंज के गेट नंबर 1  पर बड़े शब्दों में लिखा है “ इक्कीसवीं सदी उज्जवल भविष्य की गंगोत्री, शांतिकुंज”, आज के लेख में हम इस quotation को समझने का प्रयास करेंगें। आजकल हम इक्कीसवीं सदी के 23वें वर्ष में हैं, आने वाले 77 वर्षों में किस प्रकार का विश्व होने वाला है इसकी हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं क्योंकि नियति ने सब कुछ नियत कर के रखा हुआ है, नियत समय पर, नियत परिस्थितियां स्वयं ही इस विश्व का नियंत्रण अपने कण्ट्रोल में ले लेंगीं।      

युगतीर्थ शांतिकुंज के पांच प्रवेश द्वार हैं, तीन द्वार ( द्वार नंबर 2,4,5 ) हरिद्वार-ऋषिकेश हाईवे की तरफ हैं और दो द्वार( द्वार नंबर 1 और 3) सप्तऋषि रोड की तरफ हैं। आज के ज्ञानप्रसाद लेख के साथ संलग्न लेख चित्र में हम देख सकते हैं कि प्रवेश द्वार 1 पर बड़े शब्दों में लिखा हुआ है “इक्कीसवीं सदी उज्जवल भविष्य की गंगोत्री शांतिकुंज।” इस quotation का क्या अर्थ है और शांतिकुंज को उज्जवल भविष्य की गंगोत्री कहने का क्या  अर्थ है, यही है आज के ज्ञानप्रसाद का विषय। बहुत ही संक्षिप्त शब्दों में हम उस दिव्य प्रांगण के वातावरण की चर्चा करेंगें जहाँ आज भी हर प्रातः करोड़ों गायत्री मंत्रोउच्चारण के साथ यज्ञ संपन्न कराये जा रहे  हैं।        

दैनिक ज्ञानप्रसाद की वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति अगस्त 1996 का  अंक है। इस अंक को युगतीर्थ शांतिकुंज की रजत जयंती (1971-1996) विशेष अंक से सम्मानित करके प्रकाशित किया गया  था। हालाँकि दो वर्ष पूर्व हम 2021 में युगतीर्थ शांतिकुंज की स्वर्ण जयंती भी मना चुके हैं लेकिन कंटेंट के हिसाब से इस अंक की महत्ता कम नहीं होती। इतने विशाल एवं विस्तृत विवरण को कुछ एक पन्नों में सीमाबद्ध करना कितना कठिन कार्य है ऐसा हमारे पाठक भली भांति जानते हैं। इसी विशाल विवरण को  इन लेखों में चित्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। रजत जयंती विशेष अंक में 25 वर्षों की उन घटनाओं का विवरण हैं जिनकी  हमारे पाठकों को (शायद) जानकारी न हो। हमारा परम कर्तव्य  है कि अपने पाठकों के समक्ष अधिक से अधिक, स्पष्ट से स्पष्ट तथ्य प्रस्तुत करें ताकि युगतीर्थ शांतिकुंज जाने से पूर्व एक नई  ज्ञानऊर्जा एवं उत्साह के साथ  इस तीर्थयात्रा को संपन्न करें।        

जब भी युगतीर्थ शांतिकुंज जैसे विशेष स्थान के बारे में लिखने की बात आती है जो 1968-69 में  केवल डेढ़ एकड़ भूमि के  छोटे से टुकड़े से  शुभारम्भ करके एक विराट  में परिणत हुआ हो तो मन असमंजस में पड़ ही जाता है। अभी-अभी एक वीडियो में श्रद्धेय डॉक्टर प्रणव पंड्या जी बता रहे थे कि 8500 शक्तिपीठ, 11 करोड़ से भी ऊपर का विशाल परिवार कुछ भी कर पाने को समर्थ है।

शांतिकुंज कैसे है उज्जवल भविष्य की गंगोत्री ? 

शांतिकुंज एक ऐसा स्थान है जिसने दो अवतारी चेतनाओं  के गलने और उनके माध्यम से करोड़ों लोगों के जोड़े जाने से विशाल विस्तार पाया है,इस विस्तार का  वर्णन शब्दों में कैसे सम्भव है? यह चर्चा विशेष रूप से परम  पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय  माताजी के तप से अनुप्राणित शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के बीज से वटवृक्ष बनने के इतिहास के संबंध में की जा रही है ।

अनेकानेक भव्य भवन तो आध्यात्मिक स्तर पर ऊँचे पहुँचे महापुरुषों द्वारा बनाये ही  जाते हैं। वैभव भी देखने में कुछ कम नहीं होता बल्कि विशाल विस्तार भी लिए हुए होता है, लेकिन  जिन भवनों में “प्राण प्रतिष्ठा” की गई हो, जिनकी एक-एक ईंट में ऋषि सत्ता की तप -ऊर्जा समाहित हो, उन भवनों की आलीशान निर्माणों के साथ तुलना करने का कोई औचित्य नहीं होता। हमारे परिजन भलीभांति इस तथ्य से परिचित हैं कि शांतिकुंज के प्रांगण  में प्रवेश करते ही साधक सुख-सुविधाओं आदि को भूल सा जाता है। उसे स्मरण  रहता है केवल अपने गुरु के सानिध्य में कुछ अविस्मरणीय क्षण जो उसके व्यक्तित्व को संवारने और ढालने में चिरकाल तक सहायक रहते हैं।     

बैलूर मठ के सौ वर्ष पूर्ण होने को हैं , किन्तु आज भी कोलकाता  जाने पर जब इस स्थान के दर्शन का सौभाग्य मिलता है, तो मस्तिष्क में उस महापुरुष की स्मृति जाग्रत हो उठती है, जिसकी साधना और तप ने एक विश्वगुरु स्वामी  विवेकानंद और उन्ही के समकक्ष 13  से अधिक गुरुभाई तैयार कर आध्यात्मिक ऊर्जा की दृष्टि से एक विशिष्ट निर्माण कर दिखाया । इसी तरह पाण्डिचेरी स्थित अरविंद आश्रम तथा ओरोविल देखने पर वहाँ एक जाग्रत चेतना का आभास मिलता है। महापुरुषों की तप साधना से अनुप्राणित इन निर्माणों के माध्यम से एक प्रेरणा स्थली, एक तीर्थ चेतना का परिचय मिलता है। ऐसे होते हैं तीर्थ स्थानों के अनुभव एवं आभास।

शाँतिकुँज का जो रूप आज हमारे परिजन देखते हैं, उसका शुभारम्भ 1968-69 में जिस छोटे रूप में हुआ था, उसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसका बीजारोपण शक्तिस्वरूपा वंदनीय  माताजी के संरक्षण में 24  घण्टे जप में निरत देव कन्याओं की तप ऊर्जा के माध्यम से हुआ था। वंदनीय माता जी के संरक्षण में सम्पन हुए 27 विराट विश्वव्यापी अश्वमेध यज्ञ एवं एक भव्य श्रद्धाँजलि समारोह से  माता जी की शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।  

यह जानने की जिज्ञासा हर उस परिजन को होगी, जो इस परिवार से बाद में जुड़ा या जो नन्ही और युवा  पीढ़ी अब आने वाले दिनों में जुड़ेगी  कि आज का शाँतिकुँज 50 वर्ष पूर्व कैसा था, किस तरह छोटी सी शुरुआत से विस्तृत होते-होते वर्तमान विराट रूप को पा सका।  

शाँतिकुँज तप-ऊर्जा से ओत-प्रोत एक जाग्रत चेतना केन्द्र है:

यहाँ से उठने वाले प्रेरणा प्रवाहों के माध्यम से 21 वीं सदी में “सतयुगी समाज” का निर्माण हो रहा है। शाँतिकुँज तप-ऊर्जा से ओत-प्रोत एक जाग्रत चेतना केन्द्र है। इसमें ऋषि युग्म के अतिरिक्त लाखों व्यक्तियों की साधना ही नहीं जुड़ी, बल्कि  अप्रतक्ष्य  रूप से हिमालयवासी ऋषि सत्ताओं द्वारा निरंतर किए जाने वाले तप  की ऊर्जा का भी मिलाप  है। हो सकता है युगतीर्थ शांतिकुंज आश्रम किसी को देखने में इतना वैभवपूर्ण न लगे,आधुनिक भवनों की तुलना में साधन विहीन लगे परन्तु  जीवनभर ब्राह्मणोचित जीवन जीने वाले सद्गुरु ने अपने प्रचण्ड तप से इस स्थान को जिस तरीके से घनीभूत ऊर्जापुँज बनाया है, इसे कोई भी भावुक व्यक्ति अंदर प्रवेश करके ही अनुभव  कर सकता है। जो परिजन शांतिकुंज जा चुके हैं उन्होंने ऐसी ऊर्जा अवश्य ही अनुभव की होगी । इसीलिए तो अक्सर कहा जाता है कि शांतिकुंज के कण-कण में गुरुदेव का वास है। समाधि स्थल, अखंड दीप, ऋषि क्षेत्र, गायत्री मंदिर, गुरुदेव-माता जी के कक्ष इत्यादि कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ परिजनों को ऊर्जावान होते हुए एवं गुरुदेव-माता जी की साक्षात् अनुभूति होती देखी गयी है।    

यहाँ यह स्पष्ट करने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है  कि जो  कुछ भी लिखा जा रहा है, वही बिना किसी लाग लपेट के इस  “शक्ति केन्द्र” का अभूतपूर्व इतिहास है। वर्तमान ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से एक ऐसा प्रयास किया जा रहा है कि विश्व भर में फैले परिजन  युगतीर्थ  शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस रिसर्च सेंटर,गायत्रीनगर, श्रीरामपुरम, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय एवं विश्वविद्यालय प्रांगण में स्थित महाकाल मंदिर के साथ साथ अनेकों  केंद्रों  के गर्भ में पक रही अनमोल  तीर्थ चेतना से परिचित हो पाएं। जिस तीर्थ चेतना की बात हम कर रहे हैं,इसे चर्म चक्षुओं से देखना संभव नहीं है। यह तो “गूँगें के गुड़” की भांति है जिसे गुड़ के स्वाद का आनंद  तो अनुभव हो रहा है लेकिन उस अनुभव तो व्यक्त करने के लिए उसके पास ज़ुबान नहीं है।   

अखंड ज्योति अगस्त 1996 का अंक शाँतिकुँज के रजत जयंती वर्ष विशेषांक में परिजन परम  पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय  माताजी की उस विलक्षण जीवन यात्रा का विवरण पढ़ सकते हैं  जिसने छोटे से निर्माण को उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं का ब्ल्यू प्रिंट बना दिया। इसीलिए हम हर ज्ञानप्रसाद लेख को ध्यान से  पढ़ने का आग्रह कर रहे हैं ताकि उन्हें उस इतिहास को, जो विगत 50 वर्षों का है,जानने का सौभाग्य प्राप्त हो। अभी भी बहुत सारे तथ्य जानबूझ कर गुप्त रखे गए हैं। 

समापन

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