कल से आरम्भ हो रही लेख श्रृंखला की पृष्ठभूमि-मेरे साहित्य का मक्खन    

10 जनवरी 2023  का ज्ञानप्रसाद

आज सप्ताह का दूसरा दिन सभी सहकर्मियों के  मंगल की  कामना करता हुआ मंगलवार है। परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी से निवेदन करते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के किसी भी सदस्य का कभी भी अमंगल न होने दें और सदैव अपना सुरक्षा कवच प्रदान करते रहें। ऐसी कामना हम अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए तो करते ही हैं लेकिन निम्नलिखित सारभौमिक प्रार्थना एवं मंत्र का उच्चारण करके विश्वशांति की भी कामना करते हैं।     

“ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ।सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख का समापन करते हुए लिखा था कि बहुत दिन हो गए हैं अपने साथियों के साथ बात किये हुए और कुछ खालीपन का अनुभव हो रहा था तो सबसे पहले उसी बात को एक बार फिर से दोहराते हुए सभी को समरण करवाते हैं कि पूज्यवर के चरणों में अपनी अनुभूतियाँ समर्पित करने का अवसर बहुत तेज़ी से पास आ रहा है। जिन सहकर्मियों ने अपनी contributions भेजी हैं उनका ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं और जो लिखने के लिए मन बना रहे हैं, स्मृतियों के ताने-बाने में उलझे हुए है,ideas और विषय ढूढ़ रहे हैं उन्हें गुरुदेव अवश्य ही मार्गदर्शन प्रदान करेंगें, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।  एक बात तो अटल सत्य है कि गुरुदेव कहते हैं “बेटा तू एक कदम तो उठा ,बाकी सब मैं संभाल लूँगा” हम बार-बार आग्रह करते आये हैं कि सहकर्मियों के कमैंट्स पढ़े जाएँ, इस दिशा में उनसे बहुत बड़ा मार्गदर्शन मिल सकता है। हमारा सौभाग्य है कि इस छोटे से परिवार में बहुत ही सूझवान साधक हैं जिनके कारण ही यह ज्ञानरथ गतिशील हुए जा रहा है। आपके पास ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का  open format, open platform उपलब्ध  है, अब आप पर निर्भर करता है कि  आप कितना लाभ उठा सकते हैं। गायत्री परिवार से,अखंड ज्योति पत्रिका से, OGGP से, शांतिकुंज से यां  फिर किसी भी सम्बंधित विषय पर आप अपनी अनुभूति भेज सकते हैं  लेकिन भेजिए ज़रूर, यह आपके समर्पण की परीक्षा की घड़ी है, समर्पण के बाद आपकी आत्मिक शांति  की घड़ी है, ध्यान  रखना यह अवसर फिर अगले वर्ष ही आएगा।

इस प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्रयास के बाद हम बात करते हैं अभी-अभी उस लेख शृंखला की जिसका  समापन कल ही  हुआ है। 28 दिसंबर 2022 को आरम्भ होकर इस लेख श्रृंखला में प्रस्तुत दिव्य कंटेंट का हम सभी ने एक सत्संग की भांति दो सप्ताह के लिए अमृतपान किया। दो मुख्य विषय -नरमेध यज्ञ और रामेश्वरम यज्ञ- के इलावा अनगनित जानकारियां प्राप्त कीं, अनेकों विभूतियों से सूक्ष्म साक्षात्कार हुए, अनेकों दिव्य तीर्थस्थलियों के सूक्ष्म दर्शन हुए, अनेकों तथ्यों का critical analysis करते हुए यथासंभव clarifications ढूढ़ने के प्रयास किये गए । इस प्रक्रिया में सहकर्मियों के कमैंट्स का बहुत बड़ा एवं महत्वपूर्ण योगदान रहा जिसके लिए हम सदैव ही आभारी रहेंगें। ज्ञानप्रसाद लेखों में सहायता के इलावा यूट्यूब एवं व्हाट्सप्प की टेक्निकल समस्याओं के बारे में भी समझने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। उचित तो यही होना चाहिए कि एक-एक सहकर्मी के योगदान का विस्तृत व्योरा दिया जाए लेकिन यह विषय किसी स्पेशल सेगमेंट के एपिसोड के लिए रिज़र्व कर दें तो ठीक रहेगा। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के एक-एक सदस्य से इसी प्रकार के सहयोग की आशा करते हैं ताकि ज्ञानप्रसाद अमृतपान की प्रक्रिया सच में “अमृतपान” का आभास कराते हुए हमें अमर कर दे। गुरुवर का साहित्य अगर हमारी  अंतरात्मा को झकझोड़ कर नहीं रख रहा तो फिर कमी तो हम  में ही है, न कि उनकी लेखनी में।  उन्ही की  वाणी में अगर रिपीट करें तो शायद उचित रहेगा। गुरुवर कहते हैं, 

“यह कोई खेल तमाशा नहीं है, कभी मन किया तो पढ़ लिया, फिर 10 दिन पुस्तक को हाथ तक नहीं लगाया।  सम्पूर्ण परिश्रम से एक निष्ठावान-समर्पित  विद्यार्थी की भांति, रेगुलर टाइम-टेबल से मेरे साहित्य का अमृतपान करेगा तभी लाभ की आशा कर, मेरे साथ ड्रामेबाज़ी मत कर, गुरूजी में आपसे बहुत प्यार करता हूँ, मैं आपकी टांगें दबा दूँ आदि आदि ,यह सब चापलूसी है, यह चापलूसी कहीं और जगह जाकर कर, मुझे सबसे प्रिय वही है जो मेरे विचारों को खुद अपने अंदर उतारता  है और 100 अन्यों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता है ”

यह पंक्तियाँ कल से आरम्भ हो रही लेख शृंखला का की पृष्ठभूमि बनाती हुई दिख रही हैं। 

कल से हम एक ऐसी लेख-श्रृंखला का आरम्भ कर रहे हैं जिसे परम पूज्य गुरुदेव ने अब तक के “सभी साहित्य का मक्ख़न” कहा है। हम बात कर रहे हैं “क्रांतिधर्म साहित्य” की। महाप्रयाण से पूर्व 1988-1990 के दो वर्षों  में परम पूज्य की  लेखनी  से सुशोभित 20 पुस्तकों का यह संग्रह अनेकों परिवारों में सुख शांति एवं समृद्धि की वर्षा कर चुका  है तो ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार कैसे इस अनमोल रत्न से वंचित रह पाए। हम अपने  अनुभव से कह सकते हैं कि सुखशांति एवं समृद्धि के लिए यह साहित्य  कोई जादू की छड़ी नहीं है और न ही जन्मघूटी है।  इस साहित्य में  जीवन की छोटी-छोटी बातें  इस तरीके से समझायी गयी हैं कि उनका ठीक तरीके से पालन करने से ही जीवन सफल हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर हम “बोओ और काटो”  के सिद्धांत की  फिर से, विस्तार से बात करेगें तो बहुत से पाठक  तो यही समझेंगें कि हम तो इसके  बारे में पहले से ही  जानते हैं, गुरूजी क्या नया  बताने वाले हैं, यहीं  पर हमारी नासमझी आड़े आती है।  पता तो हमें   है ही लेकिन क्या हम पालन करते हैं ? Stop Sign एक अनुशासित पुलिस अधिकारी की भांति हमें रुकने को तो कह रहा है, लेकिन हम उसे एक बेज़ुबान खम्बा समझ कर निकल जाते हैं बिना इस बात का विचार किये हुए कि इस चौराहे पर भी कैमरा लगा हुआ है, जुर्माना आपके घर पहुंच जाता है। इसी प्रकार “हे मानव तू जितना भी कुकर्म कर ले, उस परमसत्ता का Hidden Camera तेरे अपराध का जुर्माना वसूल  करके ही छोड़ेगा।

बार-बार उन्ही बातों का, तथ्यों का अमृतपान करने का उद्देश्य बहुत सारी नई बातों को जानना होता है जिनका  समय के साथ जन्म होता रहता है और उद्देश्यों को स्मरण करवाना भी होता है, इसके बावजूद मानव गलती करता ही रहता है यह कहते हुए कि “ मानव गलती का पुतला है।”

जब हमने  क्रांतिधर्मी साहित्य की 20 पुस्तकों पर सरसरी सी दृष्टि दौड़ाई तो  अधिकतर पुस्तकें 25-30 पन्नों की हैं , हर पुस्तक में करीब 15000 शब्द हैं। इसका अर्थ तो यह निकलता है कि तीन लाख शब्दों का अमृतपान यानि महीनों का अमृतपान। और उससे भी ऊपर केवल ज्ञान ही ज्ञान ,हम कैसे इस ज्ञान को रोचक बनायेंगें, कितने उदाहरण दे पायेंगें। समस्त ज्ञान को गंभीरता से पढ़ने की आवश्यकता है। यह तभी संभव हो सकता है अगर हमारे सहकर्मी इस गंभीरता में सहयोग दें, अमृतपान की गंभीरता। सब कुछ साथियों  की राय  से होगा लेकिन एक बात तो अटल सत्य है कि इस साहित्य के अमृतपान के बिना गुज़ारा नहीं है “ यह सफलता की एक बहुत ही लाभदायक कुंजी है” इस तथ्य को परम पूज्य गुरुदेव स्वयं ही कह रहे हैं। ध्यान से देखिये ज़रा निम्लिखित अमृतवाक्यों को :  

  ‘‘बेटे ! क्रान्तिधर्मी साहित्य मेरे अब तक के सभी साहित्य का मक्खन है। मेरे अब तक का साहित्य पढ़ पाओ या न पढ़ पाओ, इसे जरूर पढ़ना। इन्हें समझे बिना मिशन को न तो तुम समझ सकते हो, न ही किसी को समझा सकते हो।’’

‘‘बेटे ! ये इस युग की युगगीता है। एक बार पढ़ने से न समझ आये तो सौ बार पढ़ना। जैसे अर्जुन का मोह गीता से भंग हुआ था, वैसे ही तुम्हारा मोह इस युगगीता से भंग होगा।

‘‘हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में समाहित है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए। हमको आगे बढ़ने दीजिए, सम्पर्क बनाने दीजिए।’’

‘‘आवश्यकता और समय के अनुरूप गायत्री महाविज्ञान मैंने लिखा था। अब इसे अल्मारी में बन्द करके रख दो। अब केवल इन्हीं (क्रान्तिधर्मी साहित्य को-युग साहित्य को) किताबों को पढ़ना। समय आने पर उसे भी पढ़ना। महाकाल ने स्वयं मेरी उँगलियाँ पकड़कर ये साहित्य लिखवाया है।’’…..

‘‘ये उत्तराधिकारियों के लिए वसीयत है। जीवन को-चिन्तन को बदलने के सूत्र हैं इसमें। गुरु पूर्णिमा से अब तक पीड़ा लिखी है, पढ़ो।’’ …..

‘‘हमारे विचार, क्रान्ति के बीज हैं, जो जरा भी दुनिया में फैल गए, तो अगले दिनों धमाका करेंगे। तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’’…..

1988-1990  तक लिखी पुस्तकें जीवन का सार हैं-सारे जीवन का लेखा-जोखा हैं 1940  से अब तक के साहित्य का सार हैं।’’…..

‘‘जैैसे श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को सभी तीर्थों की यात्रा कराई, वैसे ही आप भी हमें (विचार रूप में,क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में) संसार भर के तीर्थ प्रत्येक गाँव, प्रत्येक घर में ले चलें।’’.

‘‘बेटे, गायत्री महाविज्ञान एक तरफ रख दो, प्रज्ञापुराण एक तरफ रख दो। केवल इन किताबों को पढ़ना-पढ़ाना व गीता की तरह नित्य पाठ करना।’’

‘‘ये गायत्री महाविज्ञान के बेटे-बेटियाँ हैं, ये (इशारा कर के ) प्रज्ञापुराण के बेटे-बेटियाँ हैं। बेटे,  तुम सभी इस साहित्य को बार-बार पढ़ना। सौ बार पढ़ना और सौ लोगों को पढ़वाना। दुनिया की सभी समस्याओं का समाधान इस साहित्य में है।’’

‘‘हमारे विचार क्रान्ति के बीज हैं। इन्हें लागत मूल्य पर छपवाकर प्रचारित प्रसारित करने की सभी को छूट है। कोई कापीराइट नहीं है।’’

‘‘अब तक लिखे सभी साहित्य को तराजू के एक पलड़े पर रखें और इन पुस्तकों को दूसरी पर, तो इनका वजन ज्यादा भारी पड़ेगा।’’

‘‘शान्तिकुञ्ज अब क्रान्तिकुञ्ज हो गया है। यहाँ सब कुछ उल्टा-पुल्टा है। सातों ऋषियों  का अन्नकूट है।’’

‘‘बेटे, ये 20  किताबें सौ बार पढ़ना और कम से कम 100  लोगों को पढ़ाना और वो भी सौ लोगों को पढ़ाएँ। हम लिखें तो असर न हो, ऐसा न होगा।’’…..

‘‘आज तक हमने सूप पिलाया, अब क्रान्तिधर्मी के रूप में भोजन करो।’’…..

‘‘प्रत्येक कार्यकर्ता को नियमित रूप से इसे पढ़ना और जीवन में उतारना युग-निर्माण के लिए जरूरी है। तभी अगले चरण में वे प्रवेश कर सकेंगे। ’’…..

वसन्त पंचमी 1990  को वंदनीय माताजी से पूज्यवर ने कहा:

‘‘मेरा ज्ञान शरीर ही जिन्दा रहेगा। ज्ञान शरीर का प्रकाश जन-जन के बीच में पहुँचना ही चाहिए और आप सबसे कहियेगा,सब बच्चों से कहियेगा कि मेरे ज्ञान शरीर को-मेरे क्रान्तिधर्मी साहित्य के रूप में जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास करें।’’

तो इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को संकल्प सूची के साथ  विराम देते हैं।

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आज की  24 आहुति संकल्प सूची में 12 सहकर्मियों ने संकल्प पूरा किया है। अरुण वर्मा जी को  गोल्ड मैडल प्राप्त  करने के लिए बधाई और उन सभी का धन्यवाद् जिन्होंने गोल्ड मैडल दिलवाने और संकल्प पूर्ण करने में सहायता की।    

(1)संध्या कुमार-34,(2)अरुण वर्मा-44 ,(3)वंदना कुमार-40,(4) सरविन्द कुमार-37,(5) सुजाता उपाध्याय-25,(6) रेणु  श्रीवास्तव-27,(7) पुष्पा सिंह-25 ,(8)  सुमनलता-24,(9 ) पूनम कुमारी-29,(10 )चंद्र बहादुर, ध्रुव दर्शन-25,(11) अरुण त्रिखा-24(12),निशा भारद्वाज-32 

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