यज्ञों पर आधारित लेख श्रृंखला का चतुर्थ  लेख 

परम पूज्य गुरुदेव ने नरमेध यज्ञ के समापन पर अगले दो वर्षों में 108 स्थानों पर यज्ञ आयोजन का आह्वान किया था लेकिन उनकी शक्ति इतनी दिव्य कि यह संकल्प चार माह में ही पूर्ण हो गया।  सात दशक पूर्व प्राप्त हुई इस सफलता को “यज्ञ आंदोलन” का नाम दिया गया था। आज तो यह आंदोलन गृहे गृहे गायत्री यज्ञ का विराट रूप ले चुका  है। 

आइये चलें इस विराट स्वरूप की पृष्ठभूमि कि ओर।    

राजस्थान के झालरापाटन गांव से आये कार्यकर्ताओं  ने अपने यहाँ गायत्री महायज्ञ का तुरंत इस प्रकार निर्धारण कर लिया जैसे वे पहले से  ही मुहूर्त निकाल कर आये हों ।  “मंदिरों या घंटियों वाले नगर” नाम से प्रसिद्ध नगर में  प्रथम महायज्ञ संपन्न किया गया। पूर्णाहुति महायज्ञ संपन्न होने के बाद आचार्यश्री ने क्षेत्रों में महायज्ञों की शृंखला चलाने का आह्वान किया था। अगले दो वर्षों  में 108 स्थानों पर आयोजन होने थे। वह संदेश पूरा हुआ ही था कि घनश्याम शर्मा ने एक पत्र लिखा और आचार्यश्री के सामने रख दिया। पत्र में अपने यहां अगले महीने गायत्री महायज्ञ का प्रस्ताव था। तिथियां भी लिखी गई थीं 22,23 और 24 मई । पत्र रख कर वे हाथ जोड़े खड़े हो गए। आचार्यश्री ने पत्र खोलकर देखा और इतना ही कहा, “महीना भर है। तैयारी के लिए इतना समय कम नहीं रहेगा ?” घनश्याम शर्मा ने कहा, “आपके आशीर्वाद से यह समय पर्याप्त रहेगा। हम लोग आसपास के कस्बों में भी कार्यक्रम रखने की कोशिश करेंगे।”

माताजी भी यह वार्तालाप सुन रही थीं। उन्होंने कहा कुछ नहीं। उनकी दृष्टि समझने में यदि कोई समर्थ होता तो कह सकता था कि उन्होंने स्वीकृति दे दी है। आचार्यश्री ने माताजी की ओर देखा और घनश्याम शर्मा की पीठ थपथपा दी। यह स्वीकृति का सूचक था। घनश्याम शर्मा और उनके साथ खड़े चंदालाल, गोकुल प्रसाद और कृष्ण गोपाल भी आचार्यश्री की स्वीकृति से गदगद हुए। उन्होंने भी आचार्य श्री और माताजी को प्रणाम किया। उस समय इतना ही संवाद हो सका। जाते-जाते प्रणाम करने के लिए खड़े साधकों और कार्यकर्त्ताओं की एक लंबी कतार थी। बातचीत का समय नहीं था । घनश्याम शर्मा आदि कार्यकर्ता  तुरंत अपने गृहनगर वापस चले गये क्योंकि उन्हें अपने यहां के श्रद्धालुओं को यह नई  दायित्व की सूचना देनी थी क्योंकि बहुत से  पूर्णाहुति महायज्ञ में नहीं पहुँच पाये थे। 22  से 24  मई तक नौ कुंडीय गायत्री महायज्ञ की रूपरेखा बनाई और दो दिन बाद वापस मथुरा रवाना हो गए।

दिल्ली, मुंबई, रेलमार्ग पर स्थित झालरापाटन कोटा से करीब 45  किलोमीटर दूर एक छोटा सा कस्बा है। तपोभूमि की स्थापना के समय ही यहाँ पर  गायत्री परिवार का गठन हो गया था। इस क्षेत्र में साधक  इतना काम कर चुके थे कि उन्हें आयोजन की सफलता को लेकर कोई संदेह नहीं था। मथुरा में हुए 108  कुंडीय गायत्री महायज्ञ की व्यवस्था के लिए भी यहाँ से कई कार्यकर्ता  पहुँचे थे। झालरापाटन में हुई बैठक के समय कार्यकर्ताओं  ने अपने अनुभव पर विश्वास जताया था। दावे के साथ कहा था कि झालरापाटन में नौ कुंडीय महायज्ञ का प्रबंध करने, यज्ञशाला और प्रवचन पंडाल आदि बनाने के लिए एक सप्ताह का समय पर्याप्त होगा। वह जिम्मेदारी पांच कार्यकर्त्ताओं ने संभाली। उनका साथ देने के लिए आठ दस कार्यकर्त्ता और आगे आए। इस तरह एक अच्छी टीम तैयार हो गई। क्षेत्र के प्रचार और साधन सहयोग जुटाने के लिए भी एक अलग टीम बना ली थी।

मथुरा पहुँचने के बाद आचार्यश्री से भेंट हुई तो बैठक में किए गए निर्धारणों के बारे में बताया। तैयारियों की रूपरेखा और कार्यकर्ताओं के बारे में जानकर आचार्यश्री ने  संतोष व्यक्त किया। मथुरा के 108 कुंडीय महायज्ञ में  आचार्यश्री ने इनकी क्षमता देखी  थी । दूसरे पक्षों पर भी आवश्यक परामर्श किया और बोले आयोजन में एक बात का जरूर ध्यान रखना कि हिसाब किताब के मामले में कोई अंगुली न उठा पाए। लोगों के सहयोग से यज्ञ होगा । आयोजन के असली कार्यकर्ता  लोग ही  हैं। उनके सामनेएक एक पैसे का खर्च स्पष्ट रहना चाहिए। हम लोगों ने भी पूर्णाहुति महायज्ञ के समय यही किया था। लोगों के सामने अपनी प्रमाणिकता सिद्ध करो और  प्रामाणिक रहो। जब आचार्यश्री ऐसा कह रहे थे तो  कार्यकर्ताओं  को मथुरा में यज्ञशाला के पास रखे रजिस्टर याद आ गए। महायज्ञ के तीनों दिन उनमें प्रविष्टियाँ (entries)  दर्ज की जाती थीं। दिन भर का हिसाब किताब शाम के समय लिखा जाता। रसीद कटा कर सहयोग करने वालों की राशि तो उसी समय हिसाब में आ जाती थी, दानपात्र और चढ़ावे की रकम शाम को ही संभाली जाती और उन सबका हिसाब शाम को ही होता। उसे शाम के समय ही लिखा जाता और सार्वजनिक रजिस्टर में भी अंकित किया जाता। आखिरी दिन जब पूरे आयोजन का हिसाब हुआ तो पता चला कि 17668 रुपए दान और सहयोग के विभिन्न स्रोतों से आएहैं। सभी खर्च हो गये। बल्कि खर्च कुछ अधिक  ही हुआ था ।

हमारे पाठकों को स्मरण होगा कि पैसे के हिसाब-किताब की बात हमने पूर्वप्रकाशित अंकों में भी प्रकाशित की थी। पाठकों को यह भी समरण होगा कि महायज्ञ में आलोचना करने आये लोगों ने  भी हिसाब को उलटा-पलटा करके भी देखा था । ऐसे ही एक आलोचक  रामप्रसाद विद्यार्थी भी थे जो पूरी तरह संतुष्ट होकर गए थे । राम प्रसाद दरभंगा बिहार  के कार्यकर्ता  डॉ० काशीनाथ झा के साथ आये थे। उनके साथ और भी कार्यकर्ता आये थे जिनका  उद्देश्य महायज्ञ और पूर्णाहुति समारोह में शामिल होना था जबकि विद्यार्थी सिर्फ घूमने फिरने के इरादे से ही आए थे। लगे हाथों अपने मित्रों की मान्यताओं और विश्वासों की खाल उधेड़ना भी मकसद रहा होगा। तभी तो वे मथुरा में आकर महायज्ञ के कार्यक्रम देखने के बजाय इधर-उधर  घूमते रहे। समापन के दिन उन्होंने महायज्ञ के हिसाब का रजिस्टर देखा, अन्य कई लोगों ने देखा परखा और अपने ढंग से प्रतिक्रिया भी  की लेकिन  विद्यार्थी महोदय की प्रतिक्रिया तो  लिखित थी। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया स्थानीय समाचार पत्रों  में भी छपवा डाली । ‘अमर ‘उजाला’ के संवाददाता से विद्यार्थी ने कहा था कि करीब 6000  लोग एक सप्ताह की अवधि में आये होंगे। औसतन 1000  व्यक्ति प्रतिदिन । उनके रहने, खाने, ठहरने और यहीं घूमने फिरने में औसतन तीन रुपये प्रतिदिन तो खर्च हुए ही होंगे, अधिक  भी हो सकते हैं। यहाँ रखा गया हिसाब किताब देखकर मन उम्मीद और उत्साह से भर उठा।

मथुरा के इस  प्रसंग को याद करते हुए झालरापाटन के कार्यकर्ताओं  ने कहा कि पैसे-पैसे  का हिसाब रखा जाएगा। आयोजन के दिनों में अपने ऊपर जो भी खर्च होगा वह हम स्वयं वहन करेंगे। प्रबंध समिति के लोग भी अपने या आयोजन के निमित्त किए गए अपने लिए किसी भी खर्च को महायज्ञ के हिसाब में नहीं लिखेंगे। आचार्यश्री के सामने महायज्ञ का संकल्प करते हुए उन्होंने कलावा बंधाया और विदा ली।

भीड़ नहीं संस्कार की आवश्यकता है 

झालरापाटन में हुआ गायत्री महायज्ञ उन आयोजनों की एक कड़ी था जो अगले दो वर्षों  में जगह-जगह होने थे। चंद्रभागा नदी के तट पर मई के चौथे सप्ताह में सम्पन्न हुए यज्ञ में तीन दिन तक लोगों का तांता लगा रहा। यज्ञस्थली  बस्ती से कुछ दूर थी । कस्बे की आबादी भी अधिक  नहीं थी। 5000-7000  हजार लोगों से ज्यादा की बस्ती नहीं थी। फिर उतरते हुए अप्रैल-मई  के गर्म दिन देखते हुए  किसी ने आचार्यश्री से कहा  कि आपने यहाँ आने के लिए गलत समय चुना है। यह  पत्थरों की बस्ती है, इन दिनों में यहाँ  धरती दिन-रात तपती है, सर्दी  के दिन चुनते तो अधिक  अच्छा रहता और बड़ी संख्या में लोग सुनने के लिए आते भी और  यज्ञ में  भाग भी  लेते। यह प्रश्न  राह चलते तब  किया गया था जब आचार्यश्री रामगंज मंडी में एक गोष्ठी को संबोधित कर पैदल ही लौट रहे थे। उनके साथ कुछ कार्यकर्त्ता भी थे। 

आचार्यश्री कुछ बोलें कि उनका ध्यान सामने से आ रही एक स्त्री पर गया। इस स्त्री ने  सिर पर पानी से भरे तीन घड़े उठाये रखे थे।  बाईं बगल  में भी एक घड़ा  दबा रखा था और दाहिने हाथ से साथ चल रही 7-8  वर्ष  की एक लड़की का हाथ भी  थाम रखा था। उस स्त्री को देखकर आचार्यश्री ने सलाह दे रहे व्यक्ति से कहा कि इस बहिन को देख रहे हो, किस कठिनाई से पानी ले जा रही है। थोड़ा भी ध्यान हटा तो घड़े तुरंत गिर सकते हैं हैं  और पानी फैल सकता है। मां-बेटी को भी चोट लग सकती है। उस व्यक्ति ने हामी भरी। हामी  भरते हुए वह अपना प्रश्न या सलाह भूल गया था। आचार्यश्री ने कहा लेकिन  फिर भी उसे यह सब करना होता है। धूप हो या वर्षा इस तरह पानी लाना ही पड़ता है। 

यही बात यहां काम कर रहे गायत्री साधकों के ऊपर लागू होती है। साधकों को भी कष्ट और असुविधाओं के बावजूद इस तरह का आयोजन आवश्यक लगा क्योंकि क्षेत्र में सद्भावनाओं का अकाल पड़ चुका है, चेतना पथराई हुई है और अनास्था ने लोगों के मन प्राण को बुरी तरह तपा से दिया है। कुछ रुक कर आचार्यश्री ने कहा कि तुम पूछोगे झालरापाटन के यज्ञ में लोग नहीं आयेंगे लेकिन हम कहते हैं  जिन्हें आना है वे तो आयेंगे ही। हमारा उद्देश्य  भीड़ इकट्ठी करना नहीं है। गिने चुने लोग ही यज्ञ में शामिल होंगे। शायद 300  लोग। इन लोगों ने कई दिनों से विधिविधान के अनुसार बताई गई उपासना की है एवं निश्चित अनुशासन में रहे हैं। यह आयोजन उन लोगों के आत्मतेज को प्रखर बनाने के लिए है। आचार्यश्री ने कहा यहाँ के लोगों को आत्मतेज बढ़ाने से आत्मविश्वास प्राप्त होगा जो किसी भी कार्य के लिए अति महत्वपूर्ण है।  इतना लंबा समाधान सुनकर वह व्यक्ति प्रफुल्लित हो उठा। आचार्यश्री कहा कि मैंने कुछ विस्तार से ही कहा है लेकिन यह मत समझना कि यह सिर्फ आपके लिए ही  कहा है, यहां चल रहे और साथियों ने भी बात सुनी है इसलिए उनके लिए भी है कि आयोजन का उद्देश्य लोगों की भीड़ इकट्ठी करना नहीं होता। जो लोग आ जाते हैं उनको संस्कारित करना होता है। 

साथ चल रहे कार्यकर्ताओं  से बातचीत करते हुए आचार्य श्री ने झालरापाटन की राह पकड़ी। झालरापाटन यज्ञ में भाग लेने वाले परिजनों  ने नौ दिन का गायत्री अनुष्ठान किया था। यह अनुष्ठान नवरात्रि साधना से अलग था । मथुरा में हुए पूर्णाहुति समारोह के बाद ही अनुष्ठान के संकल्प हुए थे और 8-10  दिन में ही 300  साधकों ने तैयारी कर ली थी । संकल्प लेने वालों में पाटन, बारा, जुल्मी, सुकेत आदि गांवों के लोग भी थे। चंद्रभागा नदी में अच्छा पानी भरा हुआ था। चंबल नदी  की यह सहायक नदी गर्मी में भी  सूखती नहीं  थी। उसके किनारे बसे करीब 20  कुटियाएँ तैयार की गई थीं। एक कुटी में 4-5  साधकों के हिसाब से अगले दिन के यज्ञ अग्निहोत्र में भाग लेने वालों के लिए ठहरने की व्यवस्था थी । अनुष्ठान करने वाले कुछ साधक अपनी बारी का इंतजार करते हुए अपने घरों में भी ठहरे थे। 22 मई की शाम को आचार्यश्री झालरापाटन पहुँचे। उनके ठहरने की व्यवस्था शहर में की गई। आचार्यश्री ने यज्ञ स्थल पर ही ठहरना ठीक समझा  जहाँ गायत्री साधक और याजक ठहरे हुए थे। उनका कहना था कि आयोजन स्थल का प्राकृतिक आकर्षण खींच ही रहा है। उससे भी अधिक  साधकों का सान्निध्य आकर्षित कर रहा है। उनके साथ रहेंगे, बैठेंगे और संवाद करेंगे तो सुखकर होगा। आचार्यश्री ने महायज्ञ में आये साधकों के साथ उनके गांवों की भी यात्रा की।  3-4  दिन के प्रवास और कार्यकर्त्ताओं के संपर्क का परिणाम ही था कि  रामगंजमंडी में ही एक विराट गायत्री महायज्ञ के संकल्प के रूप में सामने आया। उससे पहले गायत्री मंत्र का सामूहिक अनुष्ठान किया जाना था। जप की संख्या 24  करोड़ नियत हुई। तिथियां निर्धारित हुई। शरदपूर्णिमा – आश्विन मास की पूर्णमाशी।उस संकल्प के साथ सुकेत, वनवास, जुल्फी और चेयर कस्बों में भी 24000  आहुतियों वाले यज्ञ का निश्चय किया। झालरापाटन में हुए यज्ञ के समय आसपास के गांव से लोग आते और उन्हीं में से कोई प्रभावशाली व्यक्ति उठता और अपने यहां भी यज्ञ का संकल्प कर लेता। संकल्प की एक ही विधि थी। वह याजक उठकर आचार्यश्री के पास जाता अपने यहाँ आयोजन का प्रस्ताव रखता। आचार्यश्री उस याजक से तैयारियों के बारे में कुछ पूछते और संतुष्ट होने के बाद संकल्पबद्ध कर देते और उसके हाथ में कलावा बांध देते। संकल्पों की झड़ी लगते देखकर झालरापाटन स्कूल के प्रधानाचार्य नारायण सिंह ने पूछा, “पूज्यवर जितने भी लोग संकल्प ले रहे हैं, उन सबके बारे में आपको विश्वास है कि वे अपने यहां आयोजन भी करेंगे।” आचार्यश्री ने कहा, “जो कोई  भी संकल्प ले रहे हैं, आयोजन के लिए ही कर रहे हैं। सिर्फ दिखाने के लिए तो  कर नहीं रहे हैं।” नारायणसिंह ने फिर कहा, “इस बात की क्या गारंटी है कि संकल्प लेकर गये लोग अपने यहाँ आयोजन करेंगे ही। वे मुकर भी तो सकते हैं।” इस पर आचार्यश्री का उत्तर था कि  ऐसे लोगों की संख्या आधा प्रतिशत से भी कम है। वे यज्ञ भगवान को साक्षी मान कर संकल्प लेकर जा रहे हैं। लोग कोर्ट कचहरी में कोई बात कह कर मुकर सकते हैं लेकिन यज्ञ के माहौल में या गंगा और गाय की सौगंध खाकर की गई प्रतिज्ञा अधूरी नहीं छोड़ते।

डगर-डगर में यज्ञ

झालरापाटन से शुरू हुई यज्ञ श्रृंखला के 16 सप्ताह (4 माह)  के भीतर ही 108 जगह गायत्री महायज्ञों का संकल्प पूरा हो गया जो दो वर्ष में होने निश्चित हुए थे। सभी में तो आचार्यश्री का जाना नहीं हो पाया  पर जहां नहीं जाना हो पाया उनके प्रभाव को, सूक्ष्म उपस्थिति को अनुभव किया। तपोभूमि कार्यालय में जितने प्रस्ताव आये थे उनके अनुसार 24  करोड़ गायत्री जप और 24  लाख आहुतियों के संकल्प पूरे हो रहे थे। उस उत्साह को देखते हुए आचार्यश्री ने कहा कि यह महायज्ञ पूर्णाहुति का उत्तरार्ध है। तीर्थयात्रा से लौटने पर लोग जैसे अपने घरों पर ब्राह्मण भोजन, हवन, कथा आदि कराते हैं उसी तरह 108  कुंडीय महायज्ञ में भाग लेने आये लोग उस आयोजन की अग्निशिखा अपने यहां भी प्रदीप्त कर रहे हैं।

नरमेध यज्ञ  के बाद जगह-जगह हुए आयोजनों में उत्साह के कई रंग दिखाई दिए। 

मध्य प्रदेश के भिंड कस्बे में हुआ गायत्री महायज्ञ वहां के लोगों के लिए अनूठा अनुभव था। वहां 24000  आहुतियों का यज्ञ हुआ। उस आयोजन के संपन्न होते ही स्थानीय निवासियों ने कहा कि महीने में एक बार तो इस तरह के कार्यक्रम होने ही चाहिए। हम उस क्षेत्र की बात कर रहे हैं जहाँ कुछ  समय पूर्व ही  चोर-डाकुओं के आतंक के कारण इतनी असुरक्षा थी कि  यज्ञ इत्यादि की बात सोचना भी अविश्वसनीय सी लगती थी। परम पूज्य गुरुदेव ने असंभव को सम्भव कर दिखाया और वह भी 1950 के दशक में। नमन करते हैं ऐसे गुरु को।    

इसी क्षेत्र में यज्ञों के आयोजन का  विरोध भी हुआ।  एक जगह तो विरोध के कारण गुरुदेव को गांव में यज्ञ कुंड भी नहीं बनाने दिए।  गांव वालों ने खेत में ही यज्ञ करने का निश्चय किया। उन्होंने ने कहा कि खेत तो हमारे हैं इन पर तो किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। गांव से खेत तक जाने का साधन केवल बैलगाड़ी ही थी,गुरुदेव बैलगाड़ी पर बैठकर ही यज्ञस्थली तक पहुंचे थे। इस विषय पर  रिसर्च करके भविष्य में लिखने की योजना है।    

पंडित विष्णु प्रशाद की भविष्यवाणी 

इकलेरा गांव में यज्ञ के समय वर्षा होने लगी। यज्ञ में शामिल लोग बारिश से बचने के बजाय खुश होते हुए भीगते रहे। घरों में दुबके बैठे लोग भी बाहिर  निकल आये। इतने लोगों के यज्ञ में शामिल होने जैसी स्थिति तो नहीं थी। उन्होंने यज्ञशाला की परिक्रमा में ही संतोष किया। पाँच कुडों की यज्ञशाला ज्यादा बड़ी नहीं थी। परिक्रमा के लिए वह जगह कम पड़ने लगी। वर्षा के कारण लोगों में इतना उत्साह उमड़ने का रहस्य बाद में पता चला। 5-7  वर्ष पूर्व  इकलेरा गांव  के एक बुज़ुर्ग  पंडित विष्णु प्रसाद ने शरीर छोड़ते समय कहा था कि 

कुछ समय बाद यहाँ मथुरा वृंदावन का एक महात्मा आकर यज्ञ करायेगा। यज्ञ में गायत्री मंत्र की आहुतियाँ होंगी। यज्ञ चल ही रहा होगा कि वर्षा होने लगेगी। जब वर्षा होने लगे तो समझना कि इकलेरा की खुशहाली लौट आई है।

 महायज्ञ में वर्षा होने लगी तो लोगों को पंडित विष्णु प्रसाद की वह बात याद आ गई।

झांसी में चिदे लुटेरे की बगिया में नौ कुंडीय गायत्री महायज्ञ हुआ। वहाँ  24000 आहुतियों का संकल्प था। लोगों का उत्साह इस कदर उमड़ा कि आहुतियों की संख्या दो गुनी बढ़ानी पड़ी। 

दिगोडा (टीकमगढ़) के यज्ञ में भी आहुतियों की संख्या 24000  से 40000  करनी पड़ी। जोधपुर में गायत्री जयंती से ज्येष्ठ पूर्णिमा तक महायज्ञ चला। सात दिन तक चले इस महायज्ञ के बाद सप्ताह में एक बार आयोजन का क्रम शुरू हो गया।

टाटानगर (जमशेदपुर) में नौ वेदियों पर 24000  आहुतियाँ दी गईं। साधकों ने मिलजुल कर 24  लाख मंत्र जप किया था। कार्यकर्त्ताओं को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि चार मन (लगभग 125  किलोग्राम) अनाज का उपयोग भंडारा या प्रसाद के लिए किया गया था। इतने अनाज से बना भोजन 1500  लोगों ने किया। 1500  लोगों में प्रसाद के तौर पर ही बांटा जाए तो एक व्यक्ति के हिस्से में 100 ग्राम  से ज्यादा भोजन नहीं आता। कार्यकर्ताओं  ने कोतुहलवश आचार्यश्री से यह बात कही तो आचार्यश्री ने कहा कि इसमें कोई चमत्कार नहीं है। लोगों ने प्रसाद समझ कर ही भोजन किया होगा। श्रद्धालुजन भंडारे आदि का भोजन नहीं करते। यह भी  हो सकता है यज्ञ में आने वालों ने उपवास कर रखा हो,उन्होंने भोजन किया ही न हो। 

आयोजन से मथुरा वापस लौटते समय ऋषिकेश के स्वामी अखंडानंद आचार्यश्री से चर्चा छेड़ी। जोधपुर के लोगों को हुए अनुभव के बारे में उन्होंने कहा कि यज्ञ आयोजनों में यह संभव है। निश्चित संभव है कि उस समय की गई व्यवस्था अक्षयपात्र ( कभी न खाली होने वाला पात्र) की तरह फलीभूत हो जाए और थोड़े से साधन भी हज़ारों  लोगों को तृप्त करने में समर्थ हो जाए। आचार्यश्री ने कहा मैं भी मानता हूँ स्वामीजी  लेकिन मैं इस तरह की बातों को स्थापित करने के पक्ष में नहीं हूँ। ऐसी मान्यताओं से लोगों में पुरुषार्थं की भावना कम होगी। ऐसी मान्यताओं को बढ़ावा दिया या समर्थन किया तो यज्ञ का मूलभाव गुम हो जाएगा।

मल्लेश्वरम (बैंगलोर) में हुआ यज्ञ मथुरा से गये पुरोहितों को भी वर्षों तक याद रहा। यहां एक जगह महायज्ञ हुआ उसमें जितने लोगों ने भाग लिया सबने एक-एक आयोजन का संकल्प और लिया। करीब 250  लोगों ने आहुतियाँ दी थीं। उतने ही व्यक्तियों ने एक-एक कुंड की व्यवस्था का जिम्मा लिया और आने वाले दिनों में 50  महायज्ञों का इंतजाम कर लिया। 5 वर्ष  के लिए आयोजनों की अच्छी श्रृंखला बन गई थी।

बिजनौर के हंसपुरा, सौराष्ट्र में खेरासा, ओडिशा में खरियार, बिलासपुर में बम्हनी बंजर मुजफ्फर नगर में टोडा कल्याणपुर, बांदा-राजापुर, बुलंदशहर, सेंधवा (निमाड़) जैसे नगरों और गांवों की संख्या बहुत लंबी है। उन सबके विवरण में जाने के बजाय यह जान लेना ही पर्याप्त होगा कि “यज्ञ आंदोलन” आरंभ हुआ। गंगोत्री से निकली एक छोटी सी धारा के रूप में बहती हुई गंगा की तरह मथुरा के पूर्णाहुति महायज्ञ में उठी यज्ञशिखाएँ दिगदिगंत में फैलने लगी। वह प्रवाह अपने तमाम और छोर पार करने के लिए उमंग उठा- बह चला।

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