अपने सहकर्मियों की कलम से -3 दिसंबर, 2022

बहिन सुमनलता, सरविन्द जी एवं अरुण वर्मा जी की कलाकृति

आज गीता जयंती का पावन दिन है और आदरणीय शैल जीजी का जन्म दिवस, 1952 को अवतरित हुई परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी की सुपुत्री को जन्म दिन की हार्दिक शुभकामना। क्या संयोग है की बात है कि जब तपोभूमि मथुरा की भूमि की रजिस्ट्री हुई तो जीजी का जन्म हुआ और जब शांतिकुंज का निर्माण कार्य शुरू हुआ तो जीजी का विवाह हुआ। यह सारे संयोग यूँ ही घटित नहीं हो जाते , यह दिव्य सत्ताओं का administration process है। इसी प्रोसेस, प्रणाली के तहत हम सरविन्द जी की और अरुण जी अनुभूतिआँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। इन्हे पढ़कर आपको स्वयं ही विश्वास हो जायेगा की हम कितना ठीक कह रहे हैं। बहिन सुमनलता जी ने जीजी के जन्म दिवस के बारे में रात को मैसेज किया था लेकिन उस समय भारत में बहुत रात हो चुकी थी, रिप्लाई करना उचित नहीं समझा ,क्षमा प्रार्थी हैं किसी unknown reason के कारण संकल्प सूची केवल दो सहकर्मियों संध्या कुमार और सुजाता उपाध्याय जी तक ही सीमित होकर रह गयी है। कमैंट्स भी केवल 180, और व्यूज भी केवल 378 ही हैं। ऐसी दुर्लभ वीडियो के लिए यह numbers अवश्य ही अविश्वसनीय हैं। ********************

1.बहिन सुमनलता जी : 1970 से पूर्व के शांतिकुंज के आस पास के क्षेत्र से तो हम परिचित हैं। उस समय सिटी बस सेवा शुरु ही हुई थी और वह भी बहुत बहुत देर में मिलती थी।उसके रूट भी सीमित ही थे। हमें याद है ,गुरुकुल कांगड़ी (Deemed to be university) में गुरुकुल की प्रारंभिक शिक्षा के लिए अध्यापक होते थे। वहीं पर एक अध्यापक थे पंडित महीधर शास्त्री। शास्त्री जी बहुत ही विद्वान और सीधे सज्जन पुरुष थे ।वह गुरुकुल छोड़ कर शांतिकुंज में ही पढ़ा रहे थे। वहीं पर कुछ पुराने घर थे , एक बाग जैसी जगह थी । यह जगह अभी भी ब्रह्मवर्चस परिसर में है। शास्त्री जी ने ही बताया था कि यहां कोई नया विद्यालय है, जहां बहुत अच्छी शिक्षा दी जाती है और अभी उसे और बढ़ाने की योजना है। हम तो उस समय स्कूली शिक्षा में थे तो ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया। आज समझ में आ रहा है कि वो किस की बात करते थे। शांतिकुंज का नाम आते ही बचपन की सारी स्मृतियाँ फिल्म की तरह आंखों के सामने चलने लगती हैं ,दबी छुपी स्मृतियां फिर से जीवित हो जाती है। हमारा बचपन हरिद्वार से जुड़ा है। शांतिकुंज बनने से पहले उस स्थान को बहुत बार देखा है।अगर सड़क मार्ग से दिल्ली से शांतिकुंज जाएँ तो ज्वालापुर- हरिद्वार बाइपास मार्ग पर गुरुकुल कांगड़ी है। हम वहीं पर रहते थे और वहाँ से शांतिकुंज वाले पुराने स्थान तक पैदल जाया करते थे। सवारी के साधन पर साइकिल रिक्शा ही होता था और वो भी एक दो ही। बहिन जी ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का आभार व्यक्त करते हुए लिखती हैं : आपने शांतिकुंज की लेख शृंखला आरंभ कर हमारी सारी स्मृतियां ताजा कर दीं जिसके लिए हम हृदय से आभारी हैं। हम तो एक सद्गुरु की खोज में कहाँ-कहाँ फिरते रहे लेकिन जब सद्गुरु की कृपा हुई तो उन्होंने स्वयं ही हमें खोज लिया, यह भी रहस्य जैसा ही लगता है। अब तो बस उनकी कृपा बनी रहे, यही प्रार्थना करते हैं। अब हम हमेशा यही सोचते हैं कि यदि गुरुदेव से पहले मिल पाने का अवसर प्राप्त होता तो शायद कुछ कर पाने में सक्षम हो पाते लेकिन फिर यही समझ आता है कि जब उचित समय आया तो गुरुवर ने स्वयं हमारे अंतर्मन में जागृति के रूप में प्रवेश कर लिया जो हर समय हमारे साथ है ।आज आपके माध्यम से हमें ज्ञानरथ का एक परिजन बनाना भी तो उन्ही का उपकार है।

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2.सरविन्द पाल जी : नवंबर 2022 जिसके सिर पर महाकाल का हाथ होता है उसका कभी अमंगल नहीं हो सकता है। आनलाइन ज्ञान रथ गायत्री परिवार के अपने सभी आत्मीय सूझवान व समर्पित सहकर्मियों को बहुत ही श्रद्धा व आदर के साथ अवगत कर रहे हैं कि 24 नवंबर,2022 गुरूवार को हमारे परम मित्र आदरणीय महेश कुशवाहा जी जो घुरुवाखेड़ा ग्राम ,कानपुर के निवासी हैं, की लड़की की शादी थी। हम सपरिवार इस शादी में आमंत्रित थे, हम अपनी बड़ी बेटी पिंकी पाल के साथ शादी में शामिल हुए। शादी समारोह अपने चरम पर था व सभी कार्यक्रम सुचारु रूप से चल रहे थे। लगभग शाम 6 बजे का समय होगा कि एक जानलेवा दुर्घटना हुई जिसने सभी के दिल दहला दिए। दुर्घटना तो जानलेवा थी लेकिन सभी बाल बाल बच गए। शादी का आयोजन बिल्डिंग में चार फ्लोर्स (Floors) पर किया गया था। Ground Floor में बरातियों के भोजन की व्यवस्था थी, First Floor पर जयमाला का आयोजन था, Second Floor में मंडप का आयोजन था और Third Floor में अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था थी। Ground Floor में ही जहाँ भोजन व्यवस्था थी, वहीं पर Coffee Machine के पास हम कई लोगों के साथ बैठकर व्यवहार लिख रहे थे। अचानक Coffee Machine के ब्लास्ट होने का जोरदार धमाका हुआ और मशीन व मशीन के नीचे रखी मेज के परखच्चे उड़ गए। ब्लास्ट बहुत ही ज़ोर से हुआ लेकिन परम पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माता जी की असीम अनुकम्पा से किसी को किसी भी प्रकार की कोई खरोंच नहीं आयी, सब बाल-बाल बच गए। Coffee Machine के टुकड़े हाल में चारों तरफ बहुत दूर-दूर तक बिखर गए थे व लगभग 60 फुट दूरी पर बनी दीवार का प्लास्टर व वायरिंग तक टूट गई थी, इतने ज़ोरदार धमाके से छत भी टूट सकती थी। धमाका देखकर तो ऐसा लगता था कि हम सबका खेल खत्म हो गया। इस विस्फोट से इतनी बड़ी बिल्डिंग गिरने में कोई संदेह व संशय नहीं था और बहुत बड़ा हादसा हो सकता था l उस समय बिल्डिंग में नीचे से लेकर ऊपर तक लगभग 500 लोगों की संख्या होगी l परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि से बहुत बड़ा हादसा टला और 500 लोगों की जान बची और उन 500 लोगों में एक हम भी थे l हम तो उस ब्लास्ट Coffee Machine के बिल्कुल पास ही बैठे थे। जब इतने ज़ोर का धमाका हुआ है तो आँखों के सामने अंधेरा छा गया, बैग और कपड़े भीग गए, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आज क्या होने वाला था लेकिन परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि से किसी का कुछ भी अमंगल न हुआ क्योंकि हमें पूर्ण विश्वास है कि परम पूज्य गुरुदेव साक्षात महाकाल हैं और जिनके सिर पर महाकाल का हाथ होता है उसका कभी अमंगल नहीं हो सकता। यह एक कटु सत्य है जिसमें तनिक भी संदेह-संशय नहीं है l सच में परम पूज्य गुरुदेव अपने बच्चों को सुरक्षा कवच प्रदान करते अनवरत रक्षा करते हैं और अपना सूक्ष्म संरक्षण व दिव्य सानिध्य सदैव प्रदान करते हैं। हम तो ऐसे महान गुरु को पाकर धन्य हो गए हैं। इस महान गुरु के श्रीचरणों में शत-शत नमन वन्दन करते हैं l जब भी हमें इस घटना की याद आती है तो दिल दहल जाता है क्योंकि यह हमारी आँखों देखी ऐसी घटना है जिसे कभी भी भूलाया नहीं जा सकता है l अगर परम पूज्य गुरुदेव की कृपा दृष्टि न होती तो हम आनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में पुनः न तो अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर पाते और न ही आप सबसे सम्पर्क स्थापित कर पाते और किसी और ही दुनिया में होते l परम पूज्य गुरुदेव हम सबके सुरक्षा कवच हैं l

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3.अरुण वर्मा जी की अनुभूति, अगस्त 2019 परम पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म संरक्षण का कुछ अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूँ कि किस तरह गुरुदेव अपने बच्चों की जिज्ञासा को पढ़ कर समाधान करते हैं। हम अपने निवास स्थान दानापुर से जयपुर जा रहे थे , मथुरा स्टेशन पार किया तो अचानक परम पूज्य गुरुदेव की तपस्थली मथुरा का स्मरण हो आया। उस समय तो हम सीधे जयपुर चले गए लेकिन वहाँ एक दिन रूकने के बाद हम मथुरा आ गए । जयपुर में हमारी छोटी बेटी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी और उसके मामा भी यहीं रहते हैं। हम उन्ही से मिलने गए थे, उनसे कहा कि हमें मथुरा जाना है , कोई गाड़ी है तो बताईए। वहाँ से कोई डायरेक्ट गाड़ी तो नहीं थी, जयपुर से किसी और नगर में पहुंचे ( नाम याद नहीं है ), वहाँ से बस के द्वारा मथुरा के लिए रवाना हुए । पहली बार जा रहे थे , कोई अधिक जानकारी भी नहीं थी। बस स्टैंड पर पहुँचते ही बहुत जबरदस्त बर्षा शुरू हो गयी। मथुरा जाने वाली बस में बैठ गए , पूरे रास्ते वर्षा का प्रकोप रहा। मथुरा पहूंचने के बाद भी वर्षा हो ही रही थी। सड़क पूरी तरह पानी में डूबी हुई थी। वृंदावन रोड के लिए कोई सवारी नहीं मिल रही थी। लगभग दो घंटा इधर उधर दौड़ते रहे लेकिन पानी जमा होने के कारण तपोभूमि जाने को कोई भी राज़ी नहीं हो रहा था। अंतमें हम निराश होकर बस स्टैंड वापिस लौटने लगे, मन ही मन गुरुदेव का स्मरण हो आया, सोच ही रहे थे कि यहाँ तक आने के बाद भी गुरुदेव से मिलन का सौभाग्य नहीं है, यही सोचते हुए निराश मन से लौट रहे थे कि अचानक एक ऑटोवाला आया। हमारी तो जान में जान आयी। हमने पूछा, तपोभूमि जाना है तो उसने बोला कि रिजर्व चलेंगे और 200 रूपये लगेंगें, हमने 150 रुपये बोला, वह तैयार हो गया। ऑटो में दो लोग पहले से ही बैठे थे, फिर भी हमने 150 रूपए ठीक ही समझे। आखिरकार गुरुकृपा से तपोभूमि पहुँच ही गए, स्वागत कक्ष में अपना नाम पता रजिस्टर कराया और एक हाॅल में ठहरने का प्रबंध हो गया। हाल को देखकर तो मन एकदम विचलित हो गया क्योंकि हम शांतिकुंज जैसी व्यवस्था सोच रहे थे। एकदम विरान सा वातावरण लग रहा था। घर से फोन आया तो तपोभूमि की व्यवस्था का बताते हुए कहा कि बिल्कुल मन नही लग रहा। बात ख़तम हुई तो एक व्यक्ति जो हमसे 10 मिनट पहले ही इस हाल में आया था उससे बातचीत होने लगी। थोड़ी देर में ही हम इतना घुलमिल गये कि शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है। जहाँ एक दिन भी रुकना कठिन लग रहा था, वहाँ हम तीन दिन रूके। इसके बाद हमारा गुरुदेव की जन्मस्थली आंवलखेड़ा जाने का प्रोग्राम था, लेकिन किसी ने कहा कि गुरुदेव की तपस्थली घीया मंडी स्थित भूत बंगला वाली बिल्डिंग देखि है ? हमने कहा नहीं, तब वह आदमी बोला कि गुरुदेव ने वहीं 24 वर्ष तक 24 महापुरूश्चरण संपन्न किये हैं। इतना सुनते ही हमारा रोम-रोम कांप उठा, सोचने लगे उस स्थान पर कैसे जाएं। वहीँ से किसी को अखंड ज्योति हास्पिटल जो भूत बंगला वाली बिल्डिंग के ठीक सामने था, से दवा लेनी थी और उन्हें भी आंवलखेड़ा जाना था, इसलिए हम उनके साथ चल दिए। अखंड ज्योति संस्थान में पत्रिका में चंदा जमा कराने गए तो वहाँ के अधिकारी ने कहा कि पहले गुरुदेव के कक्ष को देख लीजिए फिर चंदा जमा कराएं। गुरुदेव के कक्ष में प्रवेश करते ही मेरे शरीर का रोंवा-रोवाँ खड़ा हो गया, अजीब सी अनुभूति होने लगी,करीब 5 मिनट वहाँ बैठकर गायत्री मंत्र का जप किया तब नीचे आ गए । हमारा तो अटल विश्वास है कि यह सब जो घटित हुआ इसके पीछे गुरु सत्ता की ही मुख्य भूमिका है,अन्यथा हम वहाँ नहीं पहूंच पाते। गुरुदेव के विश्वास से कभी भी, कहीं भी, किसी भी समय, रात हो या दिन, किसी तरह का कोई भय नहीं रहता क्योंकि गुरुदेव हर पल, हर परिस्थिति में हमारे साथ रहते हैं। हम तो केवल यही कहेंगें : अगर नि: संकोच गुरुदेव के कार्यों को करते रहेंगें तो सदैव गुरुदेव का संरक्षण मिलता रहेगा। परम आदरणीय अरुण भैया जी को तहेदिल से हार्दिक नमन करते हैं जिन्होंने एक ऐसा प्लेटफार्म प्रदान किया है जहाँ हर कोई अपने भाव व्यक्त कर सकता है, गुरुदेव के प्रति प्रेरणा जागृत कर सकता है। औनलाइन ज्ञान रथ गायत्री परिवार के सभी सहकर्मियों को सहृदय कोटि कोटि नमन।

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