मार्गदर्शक सत्ता ने बालक श्रीराम को कौन से निर्देश दिए -पार्ट 1 

31  अक्टूबर 2022 का ज्ञानप्रसाद-मार्गदर्शक सत्ता ने बालक श्रीराम को कौन से निर्देश दिए -पार्ट 1 

चेतना की शिखर यात्रा पार्ट 1, चैप्टर 6    

एक बार फिर आज सप्ताह का प्रथम दिन  सोमवार है,सच मानिये हमें अपने सहकर्मियों से मिलने की इतनी उत्सुकता रहती है कि शब्दों में वर्णन करना कठिन है। हालाँकि आपका कोई न  कोई आपका मैसेज आता  ही रहता है,फ़ोन भी वीकेंड में होते हैं, अभी कल ही तो अपनी प्रिय बिटिया संजना के साथ 49 मिंट बात हुई लेकिन यह दिल  है कि मानता  ही नहीं। 

तो आइये इस  ब्रह्मवेला के दिव्य समय में  ऊर्जावान ज्ञानप्रसाद का  अमृतपान करें। दादा गुरु ने श्रीराम को तीन जन्मों की विस्तृत 600 वर्षीय श्रीराम-लीला को रिवाइंड करके एक एक पल के दर्शन कराये। अब समय आ गया है उन कठिन साधना  निर्देशों का जो दादा गुरु ने बालक श्रीराम को दिए। निर्देशों का वर्णन तो आने वाले एक दो लेखों में करने का प्रयास करेंगें लेकिन 15 वर्षीय बालक श्रीराम के जिज्ञासा भरे प्रश्न  बहुत ही रोचक हैं,इसलिए निवेदन है कि बहुत ही श्रद्धा और ध्यान से धीरे धीरे, समझकर  पढ़ने का प्रयास किया जाये। 

आज ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक एक सदस्य हार्दिक बधाई का पात्र है। बधाई का कारण लेख के साथ attach किया गया चित्र है जो उस पुस्तक का cover page है जो हमने internet archive वेबसाइट पर अपलोड की है। इस 74 पन्नों की पुस्तक में गुरुदेव के जन्म से पूर्व,जन्म के समय,जन्म  के बाद से लेकर  पिताश्री के शरीर त्यागने तक का वर्णन है।  आप सबने इस वृतांत को 16 detailed लेखों में अभी-अभी न केवल समाप्त किया है, बल्कि कमेंट करके अपनी भागीदारी नोट कराई ,और brainstorming discussion भी की ,सभी का ह्रदय से नमन करते हैं। 

इस पुस्तक के जन्मदाता हमारे अनेकों समर्पित सहकर्मी हैं जिन्हें  हम ह्रदय से नमन करते हैं। 

बहुत सारे सहकर्मियों की इच्छा थी कि इन  लेखों को पुस्तक-फॉर्म में प्रकाशित किया जाये लेकिन हमारे पास प्रकाशन का कोई साधन न होने के कारण, वह हमसे pdf लेते रहे ,अपने स्तर पर प्रिंट करके, वितरित करते रहे। साधन की बात तो एक तरफ, आजकल ऑनलाइन का युग है, हर कोई फ़ोन का गुलाम है तो क्यों न इस “बुद्धू  बक्से” को काम में लाया जाए। इसी  विचार ने इस पुस्तक को जन्म दिया। आज ज्ञानप्रसाद भी उसी तकनीक से भेजा जा रहा है, लिंक को क्लिक करके बताएं अगर कोई समस्या आती है तो हम पुराने तकनीक से ही भेज देंगें। 

अगर सब कुछ ठीक  रहता है तो आने वाले दिनों में इस पुस्तक का pdf लिंक भेज देंगें। 

अंत में पुस्तक के बारे में  चिन्मय भाई साहिब कमेंट नीचे लिख रहे हैं। 

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आदरणीय  भाई साहब

अत्यंत ही अदभुत प्रयास है। इन लेखों से निश्चय रूप से अनेकों को प्रेरणा मिलेगी। पूज्य गुरुदेव और वंदनिया माताजी का आशीर्वाद सदा आपके साथ बना रहे।

प्रणाम 

चिन्मय

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आज के ज्ञानप्रसाद के लिए नीचे दिए गए लिंक को क्लिक करें।               

आशा करते हैं कि यह ज्ञानप्रसाद हमारे समर्पित सहकर्मियों को  रात्रि में आने वाले शुभरात्रि सन्देश तक अनंत  ऊर्जा प्रदान करता रहेगा। 

आज की  24 आहुति संकल्प सूची में 16  सहकर्मियों ने संकल्प पूरा किया है ,अरुण वर्मा जी 106 अंक प्राप्त करके  गोल्ड मैडल विजेता हैं।   

(1 )अरुण वर्मा-106 ,(2)संध्या कुमार-34  ,(3)वंदना कुमार-75  ,(4)सरविन्द कुमार-61  ,(5) रेणु श्रीवास्तव-27 ,(6 ) नीरा त्रिखा-38 ,(7 )सुजाता उपाध्याय-37 ,(8  )विदुषी बंता-27,27 (9  ) प्रेरणा कुमारी-28,(10)प्रशांत सिंह-32 (11)मंजू मिश्रा-29,(12) राधा त्रिखा-31,(13)संजना कुमारी-27, (14)सुमन लता-25,(15 )पूनम कुमारी-24 ,(16) पुष्पा  सिंह-33       

सभी को  हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय  के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हें हम हृदय से नमन करते हैं।  जय गुरुदेव

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मार्गदर्शक सत्ता ने बालक श्रीराम को कौन से निर्देश दिए -पार्ट 1 

चेतना की शिखर यात्रा पार्ट 1, चैप्टर 6 

“हम तो आपको खोजने के लिए नहीं गए थे। आपने  हमें क्यों ढूँढा और फिर यह  साधना के निर्देश क्यों दे रहे हैं।”

यह कहते कहते बालक श्रीराम के होंठों पर मुस्कान खिल उठी। मार्गदर्शक सत्ता भी मुसकराई। घनी और लंबी मूछों के पीछे छुपे ओठों पर वह मुसकान साफ दिखाई दे रही  थी। उन्होंने कहा,

 “गुरु ही शिष्य को खोजता है, शिष्य गुरु को नहीं। पिछले कई जन्मों की यात्रा तुमने इस शरीर के साथ सम्पन्न की है। इसके साथ अंगुली पकड़ कर चले हो। अब होश संभाला और यात्रा करने की स्थिति में आए तो हमने तुम्हें पकड़ लिया। उस दिव्य आभा मंडल से जब यह शरीर संबोधन सुनाई देता था तो संकेत उस आभामंडल की ओर ही होता था। यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। इस जन्म में भी हम तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे, सहायक रहेंगे। तुमसे वह सब कराएँगे जो युग धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है।”

उस दिव्य आत्मा ने श्रीराम के इस जीवन का क्रम निर्धारण जैसे पहले ही कर रखा था,कहने लगे:

“ईश्वर को जिनसे जो काम लेना होता है,उसके लिए आवश्यक बल और साधन भी पहले से ही तैयार रहते हैं लेकिन वे अनायास ही नहीं मिल जाते। उनके लिए साधना का पुरुषार्थ करना ही पड़ता है। आज से ही, बल्कि अभी से ही अपनेआप को विशिष्ट साधना में कस कर बाँध लो। साधना का एक चरण चौबीस वर्ष तक “महापुरश्चरण” की श्रृंखला चलाने के रूप में है। एक वर्ष में गायत्री महामंत्र के 24 लाख ( 24,00,000) जप का एक महापुरश्चरण संपन्न करना है। केवल आहार विहार में संयम ही पर्याप्त नहीं है,उसके लिए तपश्चर्या का अनुशासन भी अपनाया जाना चाहिए। वह अनुशासन नियत कर दिया गया है। जौ के आटे से बनी हुई रोटी और गाय के दूध से बना मठा। शरीर चल जाए इतना ही आहार लेना है। सौंपे गये कार्यों के लिए जितना स्वास्थ्य और शक्ति चाहिए, उसकी पूर्ति दिव्य शक्तियाँ करती रहेंगी।”

पुरश्चरण की परिभाषा :

लेखक के ह्रदय में पुरश्चरण की परिभाषा जानने की जिज्ञासा उठी कि हम रोज़मर्रा जीवन में  महापुरश्चरण, अनुष्ठान इत्यादि शब्द प्रयोग करते रहते हैं, आखिर इनका अर्थ क्या है। गायत्री महाविज्ञान के द्वितीय भाग के पृष्ठ 248 पर  परमपूज्य गुरुदेव ने बहुत ही साधारण शब्दों में उदाहरण देकर लेखक की जिज्ञासा का समाधान किया है जिसे आपके समक्ष रखा जा रहा  है: 

गुरुदेव बताते हैं कि पुरः कहते हैं पूर्व को (अर्थात् आगे की ओर) और चरण कहते हैं चलने को। चलने से पूर्व की जो स्थिति है, तैयारी है, उसे पुरश्चरण कहा जाता है, चलने के तीन भाग हैं (1) गति, (2) आगति,(3) स्थिति। गति कहते हैं बढ़ने को, आगति कहते हैं लौटने को और स्थिति कहते हैं- ठहरने को । पुरश्चरण में यह तीनों ही क्रियायें होती हैं। जब किसी विशेष उद्देश्य  को प्राप्त करने के लिये जो साधना की जाती है तो उसके साथ-साथ उन दोषों को लौटाया भी जाता है जो प्रगति के मार्ग में विशेष रूप से बाधक होते हैं। इस गति-आगति से पहले  शक्ति को प्रस्फुटित (explosion) करने  के लिये जिस स्थिति को अपनाना होता है, वही पुरश्चरण है। सिंह जब शिकारी  पर आक्रमण करता है, तो एक क्षण ठहरकर हमला करता है । धनुष पर बाण को चढ़ा कर जब छोड़ा जाता है, तो थोड़ा  रुककर बाण छोड़ा जाता है । बन्दूक का घोड़ा दबाने से पहले जरा-सी देर करके  शरीर को साधकर स्थिर कर लिया जाता है ताकि निशाना ठीक बैठे। इसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पर्याप्त मात्रा में आत्मिक बल एकत्रित करने के लिये कुछ समय के लिए आन्तरिक शक्तियों को फुलाया और विकसित किया जाता है, इसी प्रक्रिया का नाम पुरश्चरण है।

दादा गुरु द्वारा उपासना का जो क्रम निर्धारित हुआ, वह कम से कम 6 घंटे चलने वाला था। मार्गदर्शक सत्ता ने जिस दिन साधना में नियोजित किया उस दिन वसंत पंचमी थी। निर्धारित उपासना संपन्न हो चुकी थी। जप निवेदन के बाद विसर्जन और समर्पण का विधान ही शेष रह गया था। 15 वर्षीय श्रीराम ने उस उपचार को स्थगित किया और निर्दिष्ट क्रम के अनुसार आगे का जप आरंभ किया। एक वर्ष में 24  लाख जप का अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिए 66  मालाओं का जप (लगभग 7000  बार गायत्री मंत्र का उच्चारण) आवश्यक है। साधारण गणित के अनुसार 

66(मालाएं) x 108(मनके,beads) x 365(वर्ष के दिन) = 26,01,720 (लगभग 26 लाख)  

उस दिन श्रीराम सूर्योदय के बाद करीब 5  घण्टे तक और बैठे रहे, साधना करते रहे। जप कब पूरा हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। जप और सविता देवता के ध्यान के समय साधना के संबंध में तरह-तरह की जिज्ञासाएँ उठीं। उन्हें पूछने के लिए शब्द नहीं तलाशने पड़े। बिना पूछे ही प्रश्न संप्रेषित हो गए और उस दिव्य आत्मा के सान्निध्य में समाधान भी अपने आप होते गये। 

एक जिज्ञासा थी गुरुदेव कहाँ रहते हैं? उत्तर आया :

“हिमालय के हृदय देश में। इस प्रदेश में  सामान्य शरीर से किसी मनुष्य का भी पहुँच पाना संभव नहीं है क्योंकि स्थूल शरीर की कुछ सीमा होती  है। वह तो सामान्य दुर्गम प्रदेशों में भी नहीं जा सकता। ‘हिमालय का हृदय प्रदेश’ कहे जाने वाले  क्षेत्र में तो असम्भव ही है। सामान्य सूक्ष्म शरीर से पहुँचना भी मुश्किल है। उस क्षेत्र मे व्याप्त तेजस् और वर्चस् का प्रभाव साधारण स्थिति के अस्तित्वों को दूर से ही ठेल देता है। कारण यह है कि उस क्षेत्र में आत्म चेतना के प्रयोग परीक्षण चलते रहते हैं।”

समाधान के अगले चरण में यह भी स्पष्ट हुआ कि गुरुदेव का स्थूल स्वरूप सैंकड़ों वर्ष पुराना है। उसका परिचय और इतिहास लगभग अविज्ञात है। उस शरीर से किए गये काम ही आज उनका परिचय बने हुए हैं। इतिहास की खोजबीन की जा रही है लेकिन अभी  भी अधूरी है। कुछ प्रमाणों के अनुसार उनका दैहिक स्वरूप 650  या 700  वर्ष पुराना है। कुछ के अनुसार 2500 वर्ष  से भी अधिक पुरातन  है। 

अनुष्ठान के पहले दिन, प्रारंभ में ही उत्कंठा जगी कि उस स्वरूप का परिचय प्राप्त किया जाए लेकिन उत्तर में एक सन्नाटा ही सुनाई दिया। उस सन्नाटे में सिर्फ एक ही  बोध तैर रहा था कि सर्व के अधिपति ईश्वर की सत्ता का जो निर्विकार आनंद है, वही मार्गदर्शक  के परिचय का प्रतीक है। हृदय प्रदेश के जिन साधकों या सिद्धों ने अपनी सूक्ष्म उपस्थिति के प्रमाण दिये थे, उन्होंने मार्गदर्शक, दादा गुरु का नाम स्वामी सर्वेश्वरानंद बताया था।

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