19 अक्टूबर 2022 का ज्ञानप्रसाद
चेतना की शिखर यात्रा पार्ट 1, चैप्टर 6
सप्ताह का तीसरा दिन बुधवार, ब्रह्मवेला के दिव्य समय में आपके इनबॉक्स में आज का ऊर्जावान ज्ञानप्रसाद आ चुका है। परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में लिखा गया यह ज्ञानप्रसाद हमारे समर्पित सहकर्मियों को रात्रि में आने वाले शुभरात्रि सन्देश तक अनंत ऊर्जा प्रदान करता रहेगा,ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।
कल वाले लेख में हमने “बलिहारी गुरु आपनो” को विस्तार में समझने का प्रयास किया था और हमारे समर्पित सहकर्मियों ने भी कमेंट देकर सहायता की, सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। इस छोटे से समर्पित परिवार को गायत्री परिवार के घरों में प्रचलित “प्रज्ञा मंडल” की संज्ञा दें तो शायद गलत न हो। हम तो कहेंगें कि गलत क्या, उससे बढ़कर ही है क्योंकि प्रज्ञा मंडलों का आयोजन तो सप्ताह में एक बार या माह में एक बार होता है लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रज्ञा मंडल तो “दैनिक प्रज्ञा मंडल” है। कमैंट्स द्वारा विचारों का आदान-प्रदान इस स्तर का है कि हर कोई आगे निकलने का प्रयास कर रहा है -नमन करते हैं इस अद्भुत श्रद्धा को।
चैप्टर 6 का शीर्षक “बलिहारी गुरु आपुनो” है यानि गुरु के ऊपर अपना सब कुछ बलिदान कर दूँ ,न्योछावर कर दूँ। आज के लेख में दादा गुरु के दिव्य अवतरण को शब्दों में पिरोने का प्रयास करेंगें। जैसे कल भी लिखा था आज फिर लिख रहे हैं : हम तो अपने गुरुदेव को express करने में असमर्थ हैं तो उनके गुरु, दादा गुरु को कैसे बयान कर पायेंगें। यह गूंगे के गुड़ वाली बात है : केवल अनुभव करने की ,न कि शब्दों में बांधने की। वसंत पंचमी की ब्रह्मवेला में जब दादा गुरु का अवतरण हुआ था तो समय बंध गया था, स्थान अपनी सीमा भूल गया था।
आज का लेख बहुत ही संक्षिप्त है, इसका कारण है कि हम इसे केवल दादा गुरु के अवतरण को ही समर्पित कर रहे हैं। हम नहीं चाहते कि जल्दबाज़ी में किसी भी दिव्यता को नज़रअंदाज़ कर दें। अक्सर हम लेखों के कंटेंट को सरलीकरण करते समय उदाहरण देने का प्रयास करते हैं जिसके कारण स्पीड काम अवश्य होती है लेकिन समझना और अन्तःकरण में उतारना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
दादा गुरु द्वारा गुरुदेव के पिछले तीन जन्मों का दिव्य वृतांत भी बहुत ही रोचक है, हम चाहेंगें कि एक लेख में केवल एक ही जन्म की चर्चा करें।
शुक्रवार को रिलीज़ होने वाली 108 कुंडीय यज्ञ की वीडियो में हम आपको लखनऊ ले चलेंगें।
तो आइये शुरू करें आज का ज्ञानप्रसाद
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प्रकाश शरीर का अवतरण :
श्रीराम अपने आसन पर बैठे मनोमय समाधि की भूमिका में हैं। उस भूमिका से गुजरते हुए जप के अंतिम चरण तक पहुँचते हैं। जप पूरा होता है, सविता देवता के चरणों में जप निवेदन करते हुए हाथ जोड़कर बैठे ही थे कि अचानक बिजली-सी कौंधी और कोठरी चकाचौंध करने वाले प्रकाश से भर गयी। हम सबने कभी न कभी बिजली चमकने एवं बादल गरज़ने का दृश्यअवश्य ही देखा होगा लेकिन कोठरी के क्षण और साधारण क्षण में एक बड़ा अंतर् था। साधारण क्षण में प्रकाश चमकने के साथ उसी क्षण लुप्त हो जाता है लेकिन कोठरी में यह प्रकाश लुप्त न होकर स्थिर रहा। प्रकाश चमकता हुआ था लेकिन उसकी intensity थोड़ी शांत और शीतल हो गई। यह शीतलता सूर्य की स्वर्णिम लालिमा और चंद्रमा की चाँदनी जैसी थी।
जिस समय प्रकाशीय चमक हुई थी, ऐसा लगता था जैसे कोठरी में एक साथ हज़ार सूर्य चमक उठे हों । कुछ क्षण बाद जब प्रकाश धीरे-धीरे स्थिर हुआ तो कोठरी में एक सौम्य (gentle) आकृति प्रकट हुई। लम्बी जटाएँ, शरीर अत्यंत पतला लेकिन लेकिन चमकदार । वह कमज़ोर ज़रूर दिखाई देता था लेकिन स्वरूप में तेजस्विता और बल का पूर्ण समावेश था । ऐसा लगता था जैसे कि यह पतली सी काया फौलाद से बनी हो। आकृति दिगंबर (नग्न) थी लेकिन आसपास आभा मंडल इस प्रकार छाया हुआ था कि शरीर बर्फ की चादर से ढंका हुआ सा लगता था।
साधक श्रीराम उस सौम्य आकृति को देखकर हर्षित हुए और मन में तसल्ली का भाव आया। क्षण भर पहले जो भय व्याप्त हो रहा था, वह गायब हो गया और उस आकृति को देखकर मन में उल्लास उमगने लगा। भय तो स्वाभाविक ही था क्योंकि 15 वर्षीय बालक के लिए यह एक अनुपम दृश्य था। इच्छा हुई कि उठकर प्रणाम कर लें। संध्याकर्म में “प्रदक्षिणा कर्म” अभी बाकी था। दिव्य आकृति तो अन्तर्यामी थी,उसे तो सब कुछ पता था। उसने श्रीराम के भावों को पढ़ लिया और बैठे रहने का संकेत किया। श्रीराम बैठे ही उस आकृति को निहारते रहे, जैसे भगवान् सविता देवऋषि के रूप में प्रकट हुए हों। आकृति श्रीराम के करीब आई। ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वे कुछ कदम आगे बढ़ कर आए हों। यह प्रतीत हो रहा था कि जैसे दूरी स्वयं ही घट गई हो। समीपता इतनी बनी कि बैठे-बैठे ही हाथ आगे बढ़ा कर चरण छू लें। चरण स्पर्श की आवश्यकता ही नहीं पड़ी क्योंकि शीश स्वयं ही चरणों में झुक गया। दिव्य आकृति ने अपना हाथ श्रीराम के शीश पर रख दिया। हाथ रखते ही उस दिव्य स्पर्श ने बालक श्रीराम के व्यक्तित्व में जो झंकार जगाई उसे शब्दों में व्यक्त करना लगभग असंभव ही है।
मनीषियों ने उस तरह की अनुभूतियों को हज़ार तरह से कहने की कोशिश की है और कोशिश कर चुकने के बाद थक कर चुप हो गये हैं। उपनिषदों ने उस अनुभूति को निम्नलिखित भावों में व्यक्त किया है:
कान केवल सुनते हैं,बोलते नहीं और मुंह केवल बोलता है,सुनता नहीं। कबीर जी ने इस स्थिति को “गूंगे केरी सरकरा” कह कर गाया है। स्वाद तो आता है लेकिन उस स्वाद को express करना कठिन है।
“अकथ कहानी प्रेम की,कहत कहि न जाय,गूंगे केरी सरकरा, खाय और मुसकाय।”
कबीर जी कहते हैं कि परमात्मा के प्रेम की कथा वर्णन से परे है। प्रेम की अनुभूति गूंगे के गुड़ जैसी है। गूंगा शक्कर को खाकर आनंदित तो होता है लेकिन खुद ही मुस्काता है क्योंकि जुबां न होने के कारण मीठे स्वाद को express नहीं कर सकता। जो मनुष्य परमात्म-भक्ति यानि ईश्वर-प्रेम का स्वाद चख लेता है उसके बाद उसे कोई भी सांसारिक पदार्थ आकर्षित नहीं करता ।उसके अंतःकरण में प्रेम के लड्डू फूटते रहतें हैं। वह मुस्काता रहता है लेकिन गूंगे की भांति उस अवर्णीय ( जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता) आनंद को बयान नहीं कर सकता। व्यक्ति गूंगा हो जाता है। यह प्रेम उत्कर्ष की चरम सीमा होती है जिसमें केवल परमानंद ही रह जाता है।
बालक श्रीराम को लगा जैसे समय ठहर गया हो। दिव्य स्पर्श ने श्रीराम के सामने एक अलग ही संसार खोल दिया। उस संसार में वाणी की आवश्यकता नहीं हुई, समय भी ठहर गया और स्थान तो जैसे अपनी सीमाएँ ही भूल गया। देशकाल से परे उस अनुभूति में मार्गदर्शक सत्ता ने पिछले कई जन्मों की यात्रा करा दी। यह यात्रा स्मृतियों में उतरकर नहीं, शुद्ध चेतना के जगत् में प्रवेश करके ही संपन्न हुई थी।
आज के लेख का समापन यहीं पर करते हैं, कल दादा गुरु द्वारा गुरुदेव के प्रथम जन्म “संत कबीर” का आँखों देखा हाल देखेंगें।
हर लेख की भांति यह लेख भी बहुत ही ध्यानपूर्वक कई बार पढ़ने के उपरांत ही आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है, अगर फिर भी अनजाने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो हम करबद्ध क्षमाप्रार्थी हैं। पाठकों से निवेदन है कि कोई भी त्रुटि दिखाई दे तो सूचित करें ताकि हम ठीक कर सकें। धन्यवाद्
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आज की 24 आहुति संकल्प सूची में 8 सहकर्मियों ने संकल्प पूरा किया है और अरुण जी सबसे अधिक 50 अंक प्राप्त करते हुए गोल्ड मैडल विजेता हैं।
(1 )अरुण वर्मा-50 ,(2)संध्या कुमार-35 ,(3 )सुजाता उपाध्याय-24,(4 )वंदना कुमार-29 ,(5 )प्रेरणा कुमारी-26 ,(6 ) पूनम कुमारी-28 ,(7 ) सरविन्द कुमार( अंकित कुमार)-30,(8) रेणु श्रीवास्तव-24
सभी को हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हें हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। जय गुरुदेव, धन्यवाद।