Life can be difficult with bad health. Learn how to stay healthy today

आवश्यकताएँ तो सबकी पूरी हो जाती हैं लेकिन  इच्छाएँ किसी की भी समाप्त नहीं होती।

15 सितम्बर 2022 का ज्ञानप्रसाद -“आवश्यकताएँ तो सबकी पूरी हो जाती हैं लेकिन  इच्छाएँ किसी की भी समाप्त नहीं होती।”

आज गुरुवार है, सप्ताह का चौथा दिन और हमारे लेखों के अमृतपान का अंतिम दिन। कल शुक्रवार  वीडियो का दिन  होता है और शनिवार के  दिन सप्ताह का सबसे लोकप्रिय सेगमेंट प्रस्तुत किया जाता है। 

आज का लेख आरम्भ करने  से पूर्व आपसे  दो बातें करनी  हैं जिनमें से पहली है आपका समर्पण और दूसरी है आपसे समयदान की याचना यानि समययाचना। 

समर्पण की बात करें तो आप सभी हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक धन्यवाद् के दावेदार हैं।  सभी ने आदरणीय ज्योति गाँधी जी की बेटी सयानी के एक्सीडेंट में अपना मूल्यवान समय और श्रद्धा  का दान देकर एक उदाहरण साबित किया है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार गर्व से कहने के काबिल है कि हम सब उस गुरु की संतान हैं जिसने संवेदना और प्यार का प्रचार करते हुए इस विशाल परिवार की रचना की जिसका नाम है अखिल विश्व गायत्री परिवार। चिन्मय जी बार-बार अपने उद्बोधनों में समर्पण, प्यार और संवेदना का प्रचार करते हुए एक उदाहरण देते  आये हैं “हम किसी दुखिया के आंसू पोंछ सकें, एम्बुलेंस बन सकें इत्यादि इत्यादि” आप सभी ने लगातार 8 घण्टे हमारे साथ, ज्योति जी के साथ संपर्क बनाये रखा और इस दुःख की घड़ी में उन्हें सांत्वना देने में कोई कसर  नहीं छोड़ी।  सभी को नार्मल से लगभग तीन गुना कार्य करना पड़ा लेकिन किसी ने भी उफ़ तक न की , हम उस बच्ची य उसकी मम्मी  तक तो पहुँच नहीं पाए लेकिन सभी ने अपनेआप को समर्पित कर दिया। परम पूज्य गुरुदेव की वह वीडियो बार- बार कानों में गूँज रही थी “ भगवान् न करें आपका एक्सीडेंट हो जाए , हम अपना खाना छोड़ कर, आपको कंधे पर उठाकर हस्पताल पहुंचाएंगें” इस वीडियो को हमने बार- बार देखा है। उस दिव्य सत्ता ने उस नन्ही सी  जान को दुःख से बाहिर निकाल लिया है, एक कंधे की हड्डी के दो हिस्से हो गए थे, मैटल प्लेट लगा कर सर्जरी कर दी गयी है और दुसरे कंधे में hairline fracture है जिसकी 15 तक assessment करनी है। ज्योति बहिन जी का धन्यवाद् आप सबसे शेयर कर दिया था। एक बार फिर बहुत सारा धन्यवाद्। 

कल अपलोड होने वाली वीडियो के लिए हम समयदान की याचना कर रहे हैं। आप में से बहुतों ने रविवार को प्रसारित हुए आदरणीय चिन्मय पंड्या जी के उद्बोधन की  यह वीडियो अवश्य ही देख ली होगी, मुंबई अश्वमेध संकल्प  समारोह वाली वीडियो।  यही वीडियो कल  शनिवार का ज्ञानप्रसाद होगा। हमने इस 40 मिंट की वीडियो दो बार देखा  है और कई पॉइंट्स नोट किये हैं। गडकरी ऑडिटोरियम में आयोजित इस  समारोह में  आप स्वयं देख सकते हैं कि  कितनी बार तालियों को गूँज हमें बता रही हैं कि यह है हमारे गुरु की शिक्षा और उस शिक्षा की शक्ति। वीडियो के अंतिम क्षणों में जब चिन्मय जी ने बोला “गुरुदेव ने कहा गायत्री ने मुझे मुर्गा बना दिया है, कुकड़ू कूं” तो हमारी आंखों में बहती अश्रुधारा को रोकना कठिन हो गया। हम सबको भी  मुर्गा बन कर  “कुकड़ू कूं” करते हुए अमृतवेला में सभी सोए हुओं को जगाना है। यह तभी संभव हो पाएगा जब हम समयदान करके इसको देखेंगें और संकल्प को पूर्ण करेंगें। जिस प्रकार हम लेखों को पढ़ना सुनिश्चित कराते हैं, उसी तरह वीडियो के लिए भी सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि अधिक से अधिक सहकर्मी देखेंगें और इस दिव्य ज्ञान की धारा अपनेआप का कायाकल्प कर लें। सुनिश्चित करने का हमारा मापदंड एक ही है “आपके कमैंट्स”  क्योंकि लेख की  भांति वीडियो का कंटेंट भी कमैंट्स में  ही देखना संभव हो पायेगा।  

इन्ही शब्दों के साथ आज का लेख वहीँ से आरम्भ करते हैं जहाँ हमने कल छोड़ा था। 

वर्तमान  ज्ञानप्रसाद श्रृंखला का आधार पंडित लीलापत शर्मा जी की पुस्तक  “युगऋषि का अध्यात्म,युगऋषि की वाणी में” है। इस पुस्तक पर आधारित आज तक  जितने भी  लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये हैं इतने  रोचक और शिक्षाप्रद है कि इन्हें   बार-बार पढ़ने से भी दिल नहीं भरता।

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कल हम Rights and Responsibilities  की बात कर रहे थे। वहीँ से आगे चलते हुए हम जानते हैं कि माता पिता की सम्पति पर बच्चों का अधिकार (Right)  automatic है लेकिन क्या उस सम्पति को संभालने के लिए जिस मर्यादा और गरिमा (Responsibility ) की आवश्यकता होती है,  हम उसकी पालना कर पाते हैं। जिन परिवारों में यह  पालना की जाती है, वह परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी सफलता के शिखर को छूते जाते हैं लेकिन  जहाँ इस responsibilty की अवहेलना की जाती है तहस नहस की स्थिति देखि गयी है। 

हमें भी ईश्वर  के युवराज होने के कारण अपनी Responsibility समझते हुए अपनी सारी प्रतिभा और योग्यता प्रभु कार्य में लगा देनी चाहिए। ईश्वर को कोसने से कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि किसी को कुछ भी  देने से पहले ईश्वर यह देखते हैं  कि इसने मेरे लिए क्या किया है, इसने मुझे क्या दिया है। जिसने ईश्वर  के लिए कुछ नहीं दिया,ईश्वर भी  उसे कुछ भी नहीं दे सकते, चाहे वह उनके  मित्र, सखा, पिता अथवा माता ही क्यों न हो। इसे ही हम Give and Take policy कहते हैं। बचपन में एक फिल्म देखि थी,नाम था “दस लाख”, इसका बहुचर्चित गीत “तुम एक पैसा दोगे वोह दस लाख देगा,गरीबों की सुनों।” यह गीत इसी Give and Take की बात कर रहा था। यह बात हम सब पर पूरी तरह से लागू होती है । 

भगवान् कृष्ण के मित्र थे सुदामा। जब सुदामा भगवान्  से सहायता मांगने के लिए द्वारका पहुँचे तो भगवान् ने सबसे  पहले उससे चावल की पोटली ले ली उसके बाद ही  उसे तमाम संपदा का स्वामी बनाया। पहले भगवान को देना होता है उसके बाद ही उनसे कुछ प्राप्त होता है। कौरवों की सभा में द्रौपदी का  चीरहरण हो रहा था तो द्रोपदी ने अपनी लाज  की रक्षा हेतु दुःखित  स्वर में भगवान को पुकारा। भगवान ने पहले उसके कर्मों का खाता खोला, देखा कि क्या इसने कभी भी मर्यादा की रक्षा के लिए कपड़ा दिया है तो उन्हें एक वृतांत मिल गया। वृतांत इस प्रकार था: एक बार एक संत नदी में स्नान कर रहे थे। उनका एकमात्र वस्त्र नदी में बह गया। लज्जावश वे पानी से बाहर नहीं आ रहे थे। द्रौपदी वहाँ पहुँची तो उसने देखा कि संत बहुत देर से नदी में खड़े हैं, बाहर नहीं निकल रहे हैं। उसने पूछा तो उन्होंने कारण बता दिया। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक भाग फाड़कर दे  दिया था। इस प्रकार द्रोपदी ने  मर्यादा की रक्षा की थी। इसी तरह का एक वृतांत भगवान कृष्ण के बारे में भी है। एक बार भगवान  की अंगुली में चोट आने पर भी द्रौपदी ने साड़ी को  फाड़कर अँगुली पर लपेट दी थी। उसके दिए हुए यह थोड़े से वस्त्र भगवान के बैंक में द्रौपदी के खाते में जमा रहे, जो ब्याज सहित इतने हो गए कि दुःशासन खींचते-खींचते हार गया लेकिन साड़ी समाप्त नहीं हुई। द्रौपदी ने संत की मर्यादा की रक्षा की तो उसकी भी मर्यादा की रक्षा हुई। द्रौपदी ने अंगुली की पीड़ा को समझा तो भगवान ने उसकी भी पीड़ा का हरण किया।

इसी Give and Take का  बहुचर्चित आधुनिक सिस्टम  है “Time Credit system.” अगर देखा जाये तो यह सिस्टम परम पूज्य गुरुदेव का समयदान का ही आधुनिक रूप है। इस सिस्टम में आप अपनी प्रतिभा का दान करते हो और बदले में जब आपको किसी की प्रतिभा की आवश्यकता पड़ती है, आप अपनी दान की हुई प्रतिभा के बदले में उसकी प्रतिभा का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर आपकी प्रतिभा कंप्यूटर है तो आप कंपनी के ऑफिस में जाकर अपनी सुविधा के अनुसार कुछ घंटे उनके कंप्यूटर पर उनका काम कर सकते हैं। काम समाप्त होने के बाद जितने घंटे आपने काम किया,आप उनके  रजिस्टर में दर्ज कर देते हैं। इसी तरह एक महीने में आप कितने ही घंटों का फ्री काम कर देते हैं। अब एक स्थिति आती है कि आप की गाड़ी ख़राब हो गयी है लेकिन आप फ्री में ठीक करवाना चाहते हैं, आप उसी ऑफिस से संपर्क करेंगें, अगर आपके Time Credits हुए तो उनके पास ऐसा ही कोई मैकेनिक होगा जिससे आप फ्री में काम करवा सकते हैं। इस तरह की बहुत सारी संस्थाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हैं। आज का युग तो इंटरनेट युग है, कहीं भी जाये बिना आप घर से ही ऐसी सुविधा प्राप्त  कर सकते, शर्त केवल एक ही है “क्या आप करना चाहते हैं?”    

पूज्य गुरुदेव की ये बातें सुनकर हमें याद आया कि एक बार गुरुदेव ने कहा था कि गायत्री माता ने प्रसन्न होकर हमसे कहा था कि बेटा! मैं तेरी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ, माँग क्या माँगता है ? हमने कहा कि माँ हमें  तो आपने बिन मांगे  ही सब कुछ दे रखा है, आप हमें आज्ञा करिए कि हम आपको क्या दें?  आप हमें कुछ  देने का सौभाग्य प्रदान करेंगी तो हम अपनेआप को धन्य समझेंगे। निश्चय ही माँ का प्यार और उसके अनुदान-वरदान उसी को मिलते हैं जो माँ को देना जानता है। जो माँ से सदा मांगता ही रहे, उसे माँ निखटू कपूत समझती है।

हमने उसी दिन समझ लिया था कि यदि माँ से कुछ माँगना है तो बस यही कि “हे माँ! हमें सद्बुद्धि देना ताकि हम सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते रहें।” हमने गुरुदेव से पूछा: गुरुदेव! क्या हम गायत्री माता से भोजन,धन, मकान, संपत्ति नहीं मांगें? पूज्यवर बोले: जो माँ तुम्हें प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति, सहृदयता के रूप में  अनेकों  दैवीय गुणों की संपदा का भंडार प्रदान कर सकती है, उससे भोजन, वस्त्र, धन जैसी तुच्छ वस्तुएँ माँगकर निकृष्ट भिखारी क्यों बनता है? श्रम, पुरुषार्थ, योग्यता और लगन के गुण जिस व्यक्ति में होंगे, वह स्वयं ही यह सब कमा सकता है। इसके लिए भगवान से याचना करना मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध है और फिर यह सब मनुष्य की मूल आवश्यकताएँ इतनी कम हैं कि इन योग्यताओं के होते आठ घंटे काम करने वाला मनुष्य इनकी पूर्ति आसानी से कर सकता है। 

“आवश्यकताएँ तो सबकी पूरी हो जाती हैं लेकिन  इच्छाएँ किसी की भी समाप्त नहीं होती।”

यही सबसे महत्वपूर्ण है जिसे गांठ बांध लेना ही समझदारी है। वित्तेषणा ,पुत्रेष्णा और लोकेषणा की चर्चा अभी कुछ दिन पहले ही की है – इसी मृगतृष्णा की दौड़  में मानव अपना हीरे जैसा जीवन दाव पर लगाए हुए है।

आशा  करते हैं कि हमारे अन्य लेखों की भांति इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान भी आपको ऊर्जावान बनाएगा।

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची :

आज की संकल्प सूची में 10    सहकर्मियों ने संकल्प पूरा किया है। अरुण  जी 39   पॉइंट्स प्राप्त कर गोल्ड मैडल से सम्मानित किये जाते  हैं। 

(1 )अरुण वर्मा- 39 ,(2) संध्या कुमार-25 ,(3 )सुजाता उपाध्याय-24 , (4  )रेणु श्रीवास्तव-25 ,(5 ) विदुषी बंता-26,(6  )प्रेरणा कुमारी-30,(7 ) प्रेमशीला मिश्रा-26,(8 )राधा त्रिखा-27,(9)अशोक तिवारी -25,(10) पूनम कुमारी -28 

सभी को  हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय  के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हें हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। जय गुरुदेव,  धन्यवाद।


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