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समर्पण से शिष्यत्व की प्राप्ति 

5 सितम्बर 2022 

सप्ताह के प्रथम दिन, सोमवार को, एक दिन के अवकाश के उपरांत हम अपने परिजनों से इस अमृतवेला में आज का ज्ञानप्रसाद लेकर उपस्थित हुए हैं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास करते हैं कि हमारे परिजन पूर्ण समर्पण के साथ आज के ज्ञानप्रसाद की प्रतीक्षा कर रहे होंगें, करें भी क्यों न, गुरुदेव की अमृतवाणी पर आधारित यह सभी लेख हमारे परिजनों की बैटरी जो चार्ज  करते हैं, यह charged बैटरी उन्हें दिनभर ऊर्जावान बनाये रखती है । हम अपनेआप को बहुत ही सौभाग्यशाली मानते हैं कि  गुरुदेव ने हमें इस काबिल समझा और हमारे सहकर्मियों ने इस कार्य को सफल बनाने के लिए पूर्ण सहयोग दिया। 

आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी ने कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया को और सक्रिय बनाने के लिए लिखा है “मेरे  अनुसार आप स्वयं सक्षम है एवं आप से बेहतर कोई नही अपनी राय दे पायेगा।” , धन्यवाद् बहिन जी। हमारे मन में एक सुझाव आया है ,आपके समक्ष रख रहे हैं। “जिन सहकर्मियों को केवल 3-4 कमैंट्स ही मिलते हैं, अगर सभी उन में एक-एक कमेंट ही लिख दें तो बहुत बड़ी बात हो सकती है , आइये केवल जय गुरुदेव से ही आरम्भ करें , हम आपके समय का ह्रदय से सम्मान करते हैं”

इन्ही शब्दों से आज का ज्ञानप्रसाद आरम्भ करते है जिसका आधार पंडित लीलापत शर्मा जी की पुस्तक  “युगऋषि का अध्यात्म,युगऋषि की वाणी में” है। 1 अगस्त 2022  को हमने इस पुस्तक पर आधारित तीन लेख आपके समक्ष प्रस्तुत किये लेकिन गुरुदेव का साहित्य इतना रोचक और शिक्षाप्रद है कि इसे बार बार पढ़ने से भी दिल नहीं भरता। इसी विचार से एक बार फिर इसी पुस्तक पर आधारित प्रथम लेख से एकऔर लेख श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं।  इसमें आप हमारे विचार भी पढ़ पायेंगें। समर्पण को दर्शाता यह लेख अति दिव्य है ,ऐसा हम विश्वास करते हैं। 

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पंडित जी लिखते हैं : पूज्य गुरुदेव जब भी ग्वालियर आते हमारे पास कई-कई दिन ठहरते। हमको समझाया करते कि बेटा  मिशन को तेरी आवश्यकता है। अब तू भौतिकवादी जीवन को छोड़। हम चुप हो जाते, क्योंकि भौतिकवाद हमारी नस-नस में भरा पड़ा था। ऐश आराम का जीवन छोड़ना हमको कष्टदायक मालूम पड़ता था। बहुत बार हमें समझाया। हम कहते-अभी सोचेंगे। गुरुदेव की बताई साधना त्रिपदा गायत्री का जप करते रहे। एक बार गुरुदेव आए। स्वयं लेटे हुए थे, हमें अपने पास बैठाकर बोले-बेटा! तूने विवेकानंद का नाम सुना है ? बड़ा ही विलक्षण व्यक्ति था। रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। जब विदेशी लोग वेदों को गड़रिया के गीत कहते थे, तब उन्होंने विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। जब वे भारत वापस आए तो उनके लिए 12  घोड़ों की बग्घी तैयार की गई लेकिन तमाम सेठ, साहूकार और बड़े-बड़े अफसरों ने कहा स्वामी जी को घोड़ों की बग्घी पर नहीं बिठाया जाएगा। घोड़ों को हटा लिया गया और उस बग्घी को सभी  प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने स्वयं खींचा। जानते हो यह सम्मान स्वामी जी को क्यों मिला? 

स्वामी जी का अपने गुरु के प्रति समर्पण :

जब स्वामी जी का संपर्क अपने गुरु  रामकृष्ण परमहंस जी  से हुआ तो उन्होंने अपनी सारी शक्ति विवेकानंद को ट्रांसफर कर दी थी। उनके गुरु ने स्वामी जी को ही अपनी  शक्ति क्यों दी? इसका कारण यह है कि उन दोनों में एक समझौता हो गया था। समर्पण का समझौता; एक ऐसा समझौता जिसमें स्वामी जी ने सम्पूर्णतया अपनेआप को रामकृष्ण परमहंस जी  को समर्पण कर दिया था। यह एक ऐसा समझौता था जिसमें स्वामी जी ने जीवनभर अपने गुरु का कार्य करने का संकल्प ले  लिए था। स्वामी जी ने श्री रामकृष्ण देव जी से कहा कि मेरा  शरीर, मन, बुद्धि, भावनाएँ  आदि सब आपकी ही है और इनको आपके  ही कार्य में लगाएँगे। ऐसा समर्पण करते ही  विवेकानंद को ऐसी शक्ति मिली, साहस मिला, बुद्धि मिली जिसने साधारण से नरेंद्र नाम के युवक को विश्व गुरु बना दिया।

अर्जुन का भगवान कृष्ण को समर्पण :  

इसी  प्रकार अर्जुन ने जब भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख समर्पण किया और कहा कि हम आपके ही आदेश का पालन करेंगे, तो उसे इतनी  शक्ति मिली,इतना  ज्ञान मिला जिसका वर्णन करना भी अस्मभव है। 

गुरुदेव पंडित जी के कहते हैं: बेटा! शक्ति प्राप्त करने की एक विधि तो जप, तप, ध्यान, व्रत, उपवास की है जिसमें  तीनों शरीरों की साधना करनी पड़ती है। इस विधि में तो बहुत ही कष्ट सहन करना पड़ता है लेकिन दूसरी आसान विधि है “समर्पण की विधि।” बेटे! तुम्हारे लिए जप-तप तो हम कर लेंगे और हमारी शक्ति तुम्हे मिलेगी,तुम केवल समर्पण के बारे में सोचो।  

पंडित जी के ही  शब्दों में: पूज्यवर के कहने से, बहुत दिन बाद हमने समर्पण कर दिया और कह दिया कि अब हम आपके ही आदेश का पालन करेंगे। शीघ्र ही मिलों का झंझट छोड़ रहे हैं। मिलों से छुटकारा पाने पर हमने गुरुदेव को पत्र भी लिख दिया कि हम मथुरा आ रहे हैं। गुरुदेव का पत्र आया कि तुम अकेले मत आना, हम तुम्हें अपने साथ लेकर आएँगे। इस घटना का वर्णन अपने परिजनों के सम्मुख इसलिए किया है कि परिजन यह समझ लें कि “समर्पण का महत्त्व” क्या होता है। 

तपोभूमि मथुरा  में प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के अवसर पर हज़ारों  परिजनों ने शपथ पत्र भरकर गुरुदेव के साथ एक समझौता किया। साथ ही समर्पण किया कि पूज्य गुरुदेव के सपनों को साकार करेंगे और उनके द्वारा दी गई आंदोलनों की योजना को अपने-अपने क्षेत्र में चलाकर युग परिवर्तन के संकल्प को पूरा करने में सहयोग देंगे। जिन परिजनों ने सच्चे हृदय से समर्पण किया था , उनको निश्चय ही शक्ति मिली  और इतिहास में उनका नाम हुआ ।

वंदनीया माताजी ने एक दिन कहा कि अब हम यहाँ शिविर लगाना प्रारंभ करेंगे। इसकी व्यवस्था तुम सँभालोगे। भोजन व्यवस्था माताजी ने सँभाल ली। शिविर में 20-25  भाई बहिन  आते थे। माता जी उनकी देखभाल माँ की तरह ही करती थीं। कोई भाई बीमार हो जाता तो उसके कपड़े धोतीं, सफाई करती, खाना खिलातीं। सब परिजनों  को ऐसा ही अनुभव होता कि हमने इसी माँ के पेट से जन्म लिया है। शायद माता जी सूर्योदय से पहले ही उठ कर  भजन आदि  कर लेती थीं  क्योंकि हमने उन्हें  हमेशा काम में ही व्यस्त देखा। माता जी  हमसे हमेशा कहती थीं  कि “नि:स्वार्थ सेवा ही असली धर्म है।” माला घुमाना तो आसान है लेकिन समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने और अपनी दुष्प्रवृत्तियों को दूर करने में जो अपना मूल्यवान समय, श्रम और धन का सदुपयोग करते हैं वे ही असली धार्मिक व्यक्ति हैं। हम लोग भजन, पूजन, आरती, कथा, तीर्थ यात्रा तो कर लेते हैं लेकिन जब सेवा का समय आता है, तब बहानेबाज़ी करते आनाकानी करने लगते हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार (OGGP) के सभी भाई बहिनों को माता जी के इन वाक्यों को गांठ बांधते हुए शिक्षा लेनी चाहिए एवं इस छोटे लेकिन समर्पित परिवार को आगे बढ़ाने में योगदान का संकल्प लेना चाहिए। माता जी ने तो  दो घंटे प्रतिदिन के  समयदान का संकल्प लेने के लिए कहा है लेकिन हम कहेंगें कि जितना भी समय मिले, हम सबको एक जुट होकर नियमित तौर से दान करना चाहिए । हम “नियमितता” पर अधिक बल इसलिए देना चाहते हैं कि punctuality मानवीय मूल्यों की आधारशिला है। नियमितता,अनुशासन,श्रद्धा,समर्पण,निष्ठां आदि सब एक दूसरे  के साथ इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि किसी एक को  भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।      

पंडित जी बताते हैं: तपोभूमि मथुरा में शिविर चल रहे थे। एक दिन प्रवचन के बाद पूज्य गुरुदेव गायत्री मंदिर के सामने बैठे थे, तभी एक सेठ आया, उसने कहा-गुरुदेव! आप अखण्ड ज्योति संस्थान पैदल आते जाते हैं, गरमी का समय है, हम आपको एक कार देंगे। गुरुदेव ने कहा: नहीं बेटा ! पैदल आने जाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। सेठ चला गया तो हमने कहा: गुरुदेव! कार दे रहा था तो ले लेते। आनेजाने में परेशानी तो होती ही है। गुरुदेव ने कहा-बेटा! तुम नहीं समझोगे, अगर हम कार में बैठेंगे तो तुम लोग हवाई जहाज़  में बैठोगे।

गुरुदेव की सादगी से हम सब भलीभांति परिचित हैं। पंडित जी की ही लिखित पुस्तक  “गुरुदेव के मार्मिक संस्मरण” में वर्णन आता है कि उन्होंने गुरुदेव के लिए रेलयात्रा के लिए फर्स्ट क्लास का टिकट बुक करा दिया था तो गुरुदेव कितने नाराज़ हुए थे।  इसी  तरह गुरुदेव ने ईस्ट अफ्रीका की यात्रा हवाई जहाज़ से न करके समुद्री जहाज़ से की थी। समुद्र की यात्रा कठिन होने के साथ लम्बी भी बहुत होती है। प्रवास में गुरुदेव होटल आदि में रहने के बजाये परिजनों के घरों में ही रहते थे, इससे आत्मीयता बढ़ती थी   

यह थी पूज्यवर की सादगी और विलासिता से अलगाव। पूज्य गुरुदेव जब पंडित जी के  साथ जलपाईगुड़ी गए तो रेलयात्रा में अपने खाने के लिए चना चिड़वे ले गए और उसी से तीन दिन की यात्रा पूरी कर दी। मिशन के कामों में लाखों रुपया खरच करने में तनिक भी देर नहीं लगाते थे और अपने ऊपर चार आने खरच करने से पहले बहुत सोचते थे। इन सब विशेषताओं के कारण ही आज इतना बड़ा मिशन खड़ा करके रख दिया। इसी समर्पण और विशेषताओं के कारण ही गुरुदेव को विश्व भर में आदर सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। बड़ा कार्य करने वालों को त्याग और तपस्या का जीवन जीना पड़ता है। महात्मा गांधी ने त्याग और  तपस्या का जीवन जिया, देश को आज़ाद  करा दिया। देश तो आज़ाद हो ही गया लेकिन राजनीति दिन ब  दिन ज़ोर पकड़ती गयी। स्वतंत्रता के 75  वर्ष बाद भी उस साधारण से पुरुष जिसे हम “महात्मा” ( महा-आत्मा ) के नाम से जानते हैं, की लोकप्रियता को बेचकर राजनेता अपनी राजनीति चला रहे हैं।कैसी है यह विडंबना ! लोगों ने गाँधी जी के  सिद्धांतों को छोड़ दिया। गांधीवादी यदि गांधी जी के आदर्शों पर चलते, उन्हीं की भाँति त्याग-तपस्या का जीवन जीते तो उनकी लोकप्रियता बनी रहती। 

पंडित जी एक और बात बताते हैं : परम पूज्य गुरुदेव फकीर  थे और संग्रह न करना  उनके स्वभाव का अंग बन गया था। शिविर चल रहे थे। एक सेठ जी आए, उन्होंने गुरुदेव के हाथों में नोटों की गड्डी थमा दी। गुरुदेव बोले-हम इसका क्या करेंगे? लेकिन वह सेठ पीछे ही  पड़ गया, कहने लगा मुझे तो ये रुपये आपको देने ही हैं। हमारे सामने की बात है। गुरुदेव हमें और सेठ जी को बाज़ार ले गए। उन पैसों से कंबल खरीदे। सर्दी  का मौसम था।आग के सहारे जो गरीब लोग सड़क के किनारे समय व्यतीत करते थे, उनको एक-एक कंबल देते गए और सब कंबल बाँट दिए। पूज्य गुरुदेव दान के एक-एक पैसे को समाज का पैसा समझते थे और समाज के ही काम में लगा देते थे। सबसे यही कहते थे कि समाज के पैसे को व्यक्तिगत खरचों में नहीं लगाना चाहिए। दान के पैसों को जो अपने व्यक्तिगत खरचों में, अनापशनाप विलासिता की वस्तुओं में खरच कर देता है, वह आध्यात्मवादी नहीं है।

कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम  क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची :

आज की संकल्प सूची में तीन  सहकर्मी उत्तीर्ण हुए हैं। (1 )अरुण वर्मा -30,(2 ) संध्या कुमार-24 , (3) सरविन्द  कुमार -24,अरुण वर्मा जी फिर से गोल्ड मेडलिस्ट हैं। उनको हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय  के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। जय गुरुदेव,  धन्यवाद।

इस सूची में बार-बार उत्तीर्ण हो रहे सहकर्मी  अमावस की काली रात में टिमटिमाते सितारों की भांति अंधकार में भटके हुए पथिक को राह दिखा रहे हैं। हमारा व्यक्तिगत आभार।


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