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यह पृथ्वी  कभी किसी के साथ नहीं गई। 

31 अगस्त 2022 का ज्ञानप्रसाद

अगस्त माह का अंतिम दिन,बुधवार की मंगल-अमृत वेला और ज्ञानप्रसाद का अमृतपान, कितना अद्भुत सौभाग्य है कि परम पूज्य गुरुदेव, वंदनीय माता जी एवं महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती के सूक्ष्म संरक्षण,मार्गदर्शन में हम सबको यह सौभाग्य प्राप्त  हो रहा है। हम सभी सूक्ष्म रूप में स्नेह की एक अटूट डोर से बंधे हुए हैं। आप सभी के कमैंट्स और काउंटर कमैंट्स एक प्रकार से सूक्ष्म  वार्तालाप ही हैं जिससे एक दूसरे  के बारे में जानकारी मिलती रहती है। सभी का बहुत बहुत धन्यवाद् करते हैं। 

आज का  ज्ञानप्रसाद में  महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती द्वारा लिखित पुस्तक “ यह धन किसका है?” का अध्यन करके, minor सी एडिटिंग करके,अपने विचार शामिल करके तैयार किया गया है। ज्ञानप्रसाद का आधार निम्नलिखित  दोहा है: 

“राम गयो, रावण गयो, जाको बहु परिवार। कह नानक थिर कुछ नहीं, सपने-ज्यों संसार।”  जिसका अर्थ है सब यहीं छूट जाता है, किसी के साथ कुछ नहीं जाता, जाते हैं तो केवल हमारे कर्म। 

लेख में वर्णित दो कथाएं बहुत कुछ कह रही हैं। समझने वालों के लिए यह बहुत बड़ा मार्गदर्शन हैं। 

तो आइये आरम्भ करें आज का अमृतपान 

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पहली कथा:

श्री गुरु नानक देव जी महाराज का एक भक्त था जिसका नाम दुनीचन्द था। वह लाहौर में रहता था। जब भी उसके पास एक लाख  रुपया जमा होता तो वह अपने घर पर एक नया झण्डा लगा देता। कितने ही नये झण्डे उसके घर लहराते थे। 

जब हम यह पंक्तियाँ लिख रहे हैं तो हमें यहाँ कनाडा का एक प्रचलन याद आ रहा है, सोचा इसे भी अपने साथियों के साथ शेयर किया जाये। हर रोज़ शाम को हम दोनों जब सैर के लिए निकलते थे तो मार्ग में एक घर को देखते जिसके  driveway पर  दाएं, बाएं दो सीमेंट की शेरों की प्रतिमाएं लगी थीं।  हमें तो कभी कोई जिज्ञासा न हुई लेकिन  एक दिन हमारी पत्नी जी ने जानना चाहा कि यह दो शेर क्या सन्देश दे रहे हैं। हम दोनों में से किसी के पास इसका उत्तर नहीं था क्योंकि हमारी रूचि बड़े-बड़े घरों और महलों में कभी भी नहीं रही है। यह घर भी कोई बड़ा नहीं था,हमारे जैसा ही था।  घर आकर बच्चों के साथ जिज्ञासा व्यक्त की तो हमारी बहुरानी को शेर लगाने का कारण पता था।  उसने बताया कि जिस घर के बाहिर शेर लगे हों इसका अर्थ है कि  यह घर paid off है, यानि सारा लोन चुकता हो गया है। इसी तरह जो घर Half paid off हो वहां एक शेर की प्रतिमा होती है।

आइये चलें गुरु नानक जी की कथा की ओर –      

गुरु महाराज उसके घर पर गए तो आश्चर्य से बोले, “दुनीचन्द, तूने  ये झण्डे क्यों लगा रक्खे हैं ?”

दुनीचन्द बोला, “महाराज ! जब भी नया एक लाख  रुपया जमा हो जाता है  तो मैं अपने घर पर एक नया झण्डा लगा देता हूँ।”  गुरु महाराज ने झण्डों को देखा और धीरे-से मुस्कराये। गुरु महाराज ने खाना खाया और  वापस जाने लगे तो दुनीचन्द को एक ओर ले जाकर बोले-“दुनीचन्द, मेरा एक काम करेगा?” दुनीचन्द ने सिर झुकाकर कहा, “मैं तो आपका दास हूँ गुरु जी आप आज्ञा कीजिये। गुरु महाराज ने अपने चोले से एक सूई निकालकर दुनीचंद को देते हए कहा, ” दुनीचंद मेरी यह सुई अपने पास रख ले, मैं अगले जन्म में आकर ले  लूंगा। इसे सँभालकर रखना ! गुम नहीं करना !”

दुनीचन्द ने वह सुई लेकर सँभाल ली। गुरु महाराज उसको आशीर्वाद देकर चले गए। उनके जाने के बाद दुनीचन्द की पत्नी ने पूछा, “गुरु जी आपको अलग में क्या कह रहे थे ?”

दुनीचन्द ने कहा, “उन्होंने एक सूई संभालने को दी और  कहा-अगले  जन्म में तुझसे ले लेंगे।

“अगले जन्म में ?” पत्नी ने आश्चर्य प्रकट किया। दुनीचन्द ने कहा-“यही तो कहा उन्होंने।”

पत्नी कहने लगी,“परन्तु अगले जन्म तक तुम इस सुई को कैसे ले जाओगे ? मृत्यु के समय तो कोई कुछ भी साथ नहीं ले जाता । गुरु महाराज का अभिप्राय कुछ और होगा। आपने उनसे पूछा क्यों नहीं?” दुनीचन्द बोला, “यह पूछना तो मैं भूल ही गया।” पत्नी ने कहा, “तो चलो, दौड़ो, पूछो उनसे कि उनका अभिप्राय क्या है ?”

दोनों गुरु महाराज के पीछे-पीछे दौडे और थोड़ी देर के पश्चात्  उनके पास पहुंच गए। उनके चरणों में सिर झकाकर दुनीचन्द ने कहा, “महाराज ! आपकी बात मेरी समझ में नहीं बैठी । आपने कहा कि यह सुई आप अगले जन्म में मुझसे ले लेंगे, परन्तु अगले जन्म में मैं इस सुई को साथ कैसे ले जाऊँगा?” गुरु महाराज ने हँसते हुए कहा, “ऐसे ही ले जाना दुनीचन्द, जैसे अपने लाखों  रुपये ले जाओगे।” पत्नी बोली, “परन्तु महाराज, ये लाखों  रुपये भी तो साथ नहीं जाएँगे?” गुरु महाराज ने मुस्कराते हुए कहा, “नहीं जाएंगे तो फिर इन्हें जमा क्यों कर रहे हो?  इन रुपयों को उनमें  बाँट दो जिन्हें आवश्यकता है। तुम्हारा यह शुभ कर्म ही तुम्हारे साथ जाएगा। यह वैभव कभी किसी के साथ नहीं गया है, तुम्हारे साथ भी नहीं जाएगा।

दूसरी कथा:

इसी तरह की एक और कथा राजा मालवा क्षेत्र के राजाभोज भोज की है। जब राजा भोज के  पिता का देहान्त हुआ तो  बहुत छोटा था। भोज के पिता ने अपने छोटे भाई यानि भोज के चाचा  मुंज को बुलाकर कहा, “देखो भाई, भोज अभी बच्चा है। जब तक वह बड़ा नहीं होता, तब तक तुम इस राज्य  को  सँभालो। जब भोज वयस्क हो जाय, तब यह सारा राज्य इसको सौंप देना। यह इसका है।” मुंज ने कहा, “ऐसा ही करूँगा, भाई !” भाई का देहान्त हो गया, मुंज  राजा बने। भोज का पालन-पोषण करने लगे। भोज बड़ा होने लगा। सुप्रसिद्ध कहावत  “होनहार बिरवान के होत चीकने पात” भोज पर पूरी तरह फिट बैठती थी। वह  छुटपन में ही बहुत सयाना, समझदार और विद्वान् बन गया। जब सोलह वर्ष का हुआ तो मुंज के मन में चिन्ता जाग उठी। मन-ही-मन उसने सोचा, ‘भोज अभी से इतना सयाना है तो आगे चलकर क्या होगा। मुझे तो यह राजपाट, यह गद्दी छोड़नी पड़ी तो मैं करूँगा क्या?’ स्वामी जी बता रहे हैं कि मिली हुई गद्दी कोई भी छोड़ना नहीं चाहता। गद्दी का नशा ऐसा नशा है कि जिसे यह एक बार मिल जाय वह इससे चिपटकर बैठ ही जाता है। परन्तु कोई छोड़ना चाहे या न चाहे, अन्त में तो यह छोड़नी ही पड़ती है। निम्नलिखित दोहा इस तथ्य का साक्षी है: 

“राम गयो, रावण गयो, जाको बहु परिवार। कह नानक थिर कुछ नहीं, सपने-ज्यों संसार।” 

गद्दी की बात कहें तो भगवान को भी छोड़नी पड़ती है।भगवान  राम को छोड़नी पड़ी, रावण को छोड़नी पड़ी, कौरवों को छोड़नी पड़ी,पाण्डवों को छोड़नी पड़ी। औरंगज़ेब को छोड़नी पड़ी, हिटलर को छोड़नी पड़ी, हिटलर के बारे में तो सभी जानते हैं कि इतना जुल्म करने के बाद गद्दी तो हासिल करना दूर की बात खोपड़ी में गोली मार कर आत्महत्या करनी पड़ी। 

गद्दी कभी किसी के साथ गई नहीं । गद्दीवाले जाते हैं और अवश्य जाते हैं। मुंज भी गद्दी छोड़ना नहीं चाहता था। उसने सिपाहियों को बुलाया और काँपती आवाज़ में उन्हें कहा, “भोज को पकड़कर किसी  जंगल में ले जाओ और वहाँ उसका वध कर दो। वध करने के उपरांत उसकी कटी हुई अँगुली ले आना।” महाराज का आदेश को  कौन टाले।  सिपाहियों ने भोज को पकड़ लिया लेकिन जब  उसकी गर्दन काटने लगे तो उस छोटे-से सुन्दर बालक पर दया आ गई और  बोले, “भोज ! हम तुम्हें मारना तो नहीं चाहते, परन्तु क्या करें ! यह उस व्यक्ति का आदेश है जो राजा बना बैठा है। तुम यदि अपने इस अन्तिम समय में कोई बात कहना चाहते हो तो कहो। हम उसको पूरा करेंगे।” भोज ने कहा, ” मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम्हारे पर कोई  भी विपत्ति आए,तुम मेरा एक काम करो। मैं एक सन्देश लिख कर देता हूँ, तुम उसे महाराज मुंज के पास ले जाओ। इसके बाद भी यदि वे कहें कि भोज का वध होना चाहिये तो लौटकर मेरा वध कर देना।”

सिपाहियों ने उसकी बात मान ली। भोज ने पीपल का एक पत्ता लिया; अपनी अँगुली से लहू निकाला। लहू से पत्ते पर एक श्लोक लिखा जिसका सारांश  यह था :

“सतयुग में मान्धाता इस पृथ्वी  के चक्रवर्ती राजा थे। उनके साथ यह पृथ्वी  नहीं गई। त्रेता युग में भगवान राम थे, उनके साथ यह पृथ्वी  नहीं गई। द्वापर में कौरवों और पाण्डवों के साथ नहीं गई। अब कलियुग में तू  इसे साथ ले जायेगा, इसकी मझे प्रसन्नता है।”

सिपाहियों ने वह पत्ता लिया और महाराज मुंज के पास पहुँचे और  बोले, “सरकार ! आपका काम पूरा हो गया। मरने से पहले भोज ने आपके लिए यह सन्देश दिया था जिसे  हम साथ लाए हैं।”

मुंज ने उस सन्देश को पढ़ा तो उसका मस्तिष्क चक्कर खा गया। वह चिल्ला उठा, “कहाँ है मेरा भोज ? वह रो पड़ा और  चीखकर बोला, “कहाँ है भोज ? मैंने बहत बड़ा पाप कर डाला। पृथ्वी तो कभी भी किसी के साथ गई नहीं। मुझे दुःख है कि इसी के लिए मैंने भोज का वध कराना चाहा ! कहाँ है वह ? उसको बचाने की कोशिश करनी होगी, बचाने का यत्न  करना होगा।” सिपाहियों ने कहा, “आपने ही तो कहा कि उसका वध कर दिया जाए।  मुंज चीख उठा और  बोला, “नहीं-नहीं, उसे वापस लाओ, उसे फिर से जीवित कर दो।  मैं अब समझा कि मैं मूर्ख था। यह पृथ्वी  कभी किसी के साथ नहीं गई। मेरे भोज को वापस लाओ” सिपाहियों ने कहा, “बहुत अच्छा महाराज” और वे भोज को वापस ले आए। मुंज  ने उसी समय सारा राजपाट भोज को सौंप दिया।

यह धन-वैभव, ये राज गद्दियाँ बहुत बुरी वस्तु हैं,इन्ही के  लिए मनुष्य प्रत्येक पाप करता है। वह भूल जाता है कि धन-वैभव, शक्ति और अधिकार कभी किसी के साथ नहीं गए। परन्तु धन-वैभव भले ही बुरी वस्तु हो,परन्तु इसके बिना संसार का गुज़ारा भी संभव नहीं है। गृहस्थियों को इसकी आवश्यकता है, सन्यासिओं को इसकी आवश्यकता है, साधुओं को इसकी आवश्यकता होती है,किसी का भी इसके बिना गुज़ारा नहीं है। 

लेकिन ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक ही सन्देश है “ साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब  समाय, मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय।”

आज के  ज्ञानप्रसाद का समापन हम कबीर जी के इस दोहे के साथ करने की आज्ञा तो लेते हैं लेकिन कल वाला ज्ञानप्रसाद इसी की extension होने की सम्भावना है। आधुनिक जीवन की कई समस्याओं का समाधान उपनिषद की  निम्नलिखित  ऋचा में समाया हुआ है :

 “ओम ईशावास्यमिदं सर्वं यत्ंिकच जगत्यां जगत्। तेन त्येक्तेन भुञजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।” महात्मा आनंद स्वामी जी की पुस्तक का सहारा लेकर हम सब इस विषय पर चर्चा करेंगें। 

कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम  क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

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आज की 24 आहुति संकल्प सूची:

आज की संकल्प सूची में उत्तीर्ण हो रहे सभी सहकर्मी हमारी व्यक्तिगत  बधाई के पात्र है। (1 )अरुण कुमार वर्मा -25  ,(2 )सरविन्द कुमार- 33   ,(3) संध्या कुमार-26  ने संकल्प पूर्ण किया है। सरविन्द कुमार जी  गोल्ड मेडलिस्ट हैं। उनको हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक बधाई।  सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय  के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। जय गुरुदेव,  धन्यवाद।


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