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धन से संबंधित दिवंगत महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती जी के विचार

30 अगस्त 2022 का ज्ञानप्रसाद
कल वाले लेख में हमने महात्मा आनंद स्वामी सरस्वती जी का संक्षिप्त सा परिचय देने का साहस किया था, साहस इसलिए कह रहे हैं कि ऐसे विशाल व्यक्तित्व का परिचय देना बहुत ही कठिन होता है। रणबीर जी जिन्होंने स्वामी जी की पुस्तक “यह धन किसका है” का preface लिखा है उनके भी हमारे जैसे ही विचार हैं। मई 1981 में प्रकाशित इस पुस्तक का चतुर्थ एडिशन आज के लेख का आधार बना रहा है। रणबीर जी के शब्दों में सच में यह पुस्तक आध्यात्मिक अमृत का प्याला है इसका पान करना हमारे लिए किसी दुर्लभ सौभाग्य से कम नहीं है।
तो आइये पहले देखें रणबीर जी क्या कह रहे हैं और उसके बाद बहुत ही सरल शब्दों में स्वामी जी की अमृतवाणी का प्रथम भाग।
शब्द सीमा के कारण आज 24 आहुति संकल्प सूची प्रकाशित करना संभव नहीं है जिसके लिए हम अपने सहपाठियों से क्षमा प्रार्थी हैं।


एक बार फिर पूज्य श्री आनन्द स्वामी जी महाराज की एक अन्य कथा आपके सामने है। इसमें उन्होंने बताया है कि धन-वैभव, सम्पत्ति और शक्ति आदि का ठीक उपयोग क्या है । पूज्य स्वामी जी महाराज की यह कथा सन् 1969 के अगस्त महीने में आर्य समाज पटेल नगर,दिल्ली में उन दिनों हई थी जब कांग्रेस दो भागों में बँट रही थी। यह उन दिनों की बात है जब बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने भारत में एक नई लहर-सी जगा दी थी और जब बार-बार सोशलिज्म यानि समाजवाद का नाम लिया जा रहा था। यह तो स्पष्ट ही है कि पूज्य स्वामी जी महाराज राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं, किसी राजनैतिक दल से उनका सम्बन्ध नहीं है; ऐसे सीमित सिद्धान्तों और उनके आधार पर निरूपित राजनैतिक आदर्शों से भी उनका सम्बन्ध नहीं है। उनके लिए सभी मानव एक-समान हैं, सब देश अपने देश हैं, सब जातियां अपनी जातियाँ हैं। उनका संसार आत्मा और परमात्मा का संसार है। इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उन्होंने बताया कि मनुष्य को लगातार ऊपर उठाने वाला और सुख तथा शान्ति की ओर ले जानेवाला “वास्तविक समाजवाद क्या है ?” What is socialism in the real sense ? धन-वैभव, सम्पत्ति आदि का वास्तविक उपयोग क्या है ? जो मनुष्य इस संसार में आया है उसे कैसे रहना है और, उसको करना क्या है,
पूज्य स्वामी जी महाराज की इस कथा को आपके सामने रखते समय मुझे जहाँ प्रसन्नता होती है कि आध्यात्मिक अमृत का एक और छलकता हुआ प्याला आपके सामने रख रहा हूँ, वहाँ मुझे इस बात का खेद भी होता है कि पूज्य स्वामी जी की प्रत्येक कथा मैं आपके सामने रख नहीं सकता क्योंकि वह तो संन्यासी हैं। आज यहाँ, कल किसी दूसरे नगर में, परसों तीसरे में और कुछ दिन बाद किसी दूसरे देश में। मैं तो ठहरा ज़ंजीरों में बँधा एक निर्बल व्यक्ति,मैं उनकी प्रत्येक कथा सुन भी नहीं सकता। वह दिल्ली में कथा करें, तब भी प्रत्येक कथा में प्रतिदिन उपस्थित नहीं हो सकता। कभी-कभी उनकी कोई कथा सुन-लिख पाता हूँ तो उसी को मैं आपके सामने प्रस्तुत कर देता हूँ ऐसे ही जैसे कि अमृत की कोई नदी बहती हो और कोई व्यक्ति उसी से एक अंजलि भरकर कहता हो– “देखो! कितना मीठा अमृत है यह !” हाँ, यह अमृत मीठा है। परन्तु यह पूरी नदी कितनी मीठी है, इसकी लहरों का संगीत कितना मधुर है, इसकी गोद में कितनी शीतलता है, इसकी गहराइयों में कितना आनन्द है, यह तो केवल इन कथाओं से ही कोई जान सकता है।
रणवीर


कथा प्रारम्भ करने से पूर्व पूज्य स्वामी जी महाराज ने उच्च ध्वनि, मधुर स्वर तथा लम्बी लय में ॐ का उच्चारण इस प्रकार किया कि श्रोताओं की मानो समाधि ही लग गई। इस समाधि को तोड़ते हुए उन्होंने कहा:
मेरी प्यारी माताओ और सज्जनो, मैं इस गर्मी और उमस में अपने को देखता हूँ तो मुझे अपनेआप पर खेद होता है कि मैंने इस ऋतु में यहाँ कथा करना क्यों स्वीकार कर लिया। गर्मी की यह ऋतु और बरसात की यह रात ! इस समय तो यह चाहिए कि मनुष्य एक धोती और बनियान पहनकर मकान की छत पर पंखे की हवा में लेटा जाय। मैंने पटेल नगर आर्यसमाज के प्रबन्धकों से कहा था कि कथा के लिए यह दिन ठीक नहीं हैं। कथा तो ऐसी ऋतु में होनी उचित होती है जिसमें सब लोग सुख-चैन से बैठे हुए आत्मा और परमात्मा की बात सुन सकें। अगर सबको पसीना आ रहा हो, कथा करने वाला भी पसीने में बिलकुल भीगा जाता हो तो कथा से वह लाभ नहीं होता जो होना चाहिए। यह बात मैंने इन प्रवन्धकों से कही और साथ में यह भी कहा कि मैं विदेश जाने की तैयारी कर रहा हूँ, परन्तु ये सज्जन माने ही नहीं। इसी कारण आप भी पसीने में भीगे हए हैं और मैं भी। परन्तु इस गर्मी में आप यहाँ आए, इससे मुझे प्रसन्नता भी हुई है, यह समझकर कि आप आध्यात्मिकता की बात सुनना चाहते हैं। परन्तु इस बात को कहने से पहले मैं एक दूसरी बात निवेदन करना चाहता हूँ। अभी एक भाई ने मेरे सम्बन्ध में कहा, “आनन्द स्वामी केवल आर्यसमाज का ही नहीं, हिन्दुओं के भी नेता हैं।”
मैं समझता हूँ कि इस भाई ने मुझे दो बार गाली दी। नेता शब्द मुझे गाली-सा प्रतीत होता है। आजकल के सभी नेता, भले ही वे कांग्रेस के हों, जनसघ के हों , कम्युनिस्ट पार्टी के हों या किसी दूसरी पाटी के हों, वे जो कुछ कर रहे हैं वह तो पेट-सेवार्थ है। अपने स्वार्थ के लिए ये सज्जन देश और समाज के लिए संकट उत्पन्न किये देते हैं। इसलिए मेरे सम्बन्ध में जब कोई कहता है कि मैं नेता हैं तो मुझे यह गाली जैसी प्रतीत होती है । मैं किसी का नेता नहीं हूँ; केवल एक सेवक हूँ और सबकी सेवा करता हूँ और सेवा भी इस प्रयोजन से नहीं कि मैं किसी पर उपकार करता हूँ अपितु इस प्रयोजन से कि मन में एक आग है, दिल में एक दर्द है जो कहता है कि लोगों को सुख तथा शान्ति का मार्ग दिखाओ। अपने मन की इस पुकार के कारण मैं स्थान-स्थान पर फिरता हूँ। गर्मी, सर्दी, वर्षा की चिन्ता किए बिना एक सन्देश सुनाने की कोशिश करता हूँ। यह किसी पर कृपा नहीं है, किसी की नेतागीरी नहीं है, यह तो अपने मन की विवशता है। मुझे ऐसा करके ही प्रसन्नता मिलती है। परन्तु जो नेताजन स्वार्थ-सिद्धि का यत्न करते हैं, उनकी भी मैं निन्दा नहीं करता। यह केवल उनका ही नहीं, इस युग का “धर्म” बनता जा रहा है। आजकल प्रत्येक मनुष्य एक ही बात सोचता है। प्रत्येक मनुष्य ने इस एक ही बात को जीवन की सफलता का साधन समझ लिया है और वह बात है “धन-वैभव-सम्पत्ति और शक्ति की अभिलाषा।” मैं इस अभिलाषा की निन्दा नहीं करता, परन्तु जब यह सीमा से बढ़ जाती है तो बुरी हो जाती है। कबीर जी के निम्नलिखित दोहे का भावार्थ है कि न तो ज्यादा बोलना अच्छा है और न ही ज्यादा चुप रहना अच्छा है। जैसे ज्यादा बारिश अच्छी नहीं होती वैसे ही बहुत ज्यादा धूप भी अच्छी नहीं होती है।
“अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप ।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धुप॥”
आज इस अभिलाषा के विषय में अति होती जा रही है । वेद भगवान् ने अर्थ अर्थात् धन-वैभव-सम्पत्ति और शक्ति की निन्दा नहीं की, सबकी प्रशंसा की है। परन्तु, प्रत्येक बात की कोई सीमा होती है और आज इस सीमा को भुला देने का यत्न हो रहा है। जिधर देखो, सभी जगह पैसा,पैसा हो रहा है और इस बात के होते हुए भी हो रहा है कि पैसा दिन-प्रतिदिन छोटा हुआ जाता है। कभी एक रुपये में 64 पैसे होते थे, अब एक सौ हो गए। शायद आगे चलकर पैसे का मूल्य और भी आधा हो जायेगा और फिर और आधा और फिर शायद कुछ भी न रहे। इस बात को जानते हुए भी सबके दिमाग में यह पैसा ही घूम रहा है। पैसा सबका देवता सा ही बन गया है। पैसे के लिए कहीं भी जाना पड़े, लोग तत्काल तैयार हो जाते हैं; कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, जापान या किसी भी दूसरे देश में जाना पड़े, लोग इसीलिए वहाँ जाते हैं कि अधिक पैसे मिलते हैं।
नैरोबी में एक भारतीय नवयुवक मुझे मिले। वह कई डिग्रियाँ प्राप्त कर चुके थे। मैंने कहा, “इतनी डिग्रियाँ ले लीं,अब तो भारत वापिस आकर अपने देश की सेवा करो। वह बोले, “भारत में क्या रखा है जी, वहाँ अध्यापक का वेतन ढाई सौ रुपये मासिक है और कनाडा में ढाई हजार रुपये मासिक । मैं तो कनाडा जा रहा हूँ।
रुपया पैसा ही सब कुछ हो गया, देश के सम्बन्ध में कोई कर्त्तव्य रहा ही नहीं है। मैं भी दूसरे देशों में जाता हूँ। पिछली बार आर्यसमाज पटेल नगर में कथा की तो नैरोबी,युगांडा, मॉरिशस जाने से पहले की थी। अब यहाँ कथा करने आया है तो जर्मनी, ब्रिटेन.अमेरिका,दक्षिण-अमेरिका जाने से कुछ देर पहले है । परन्तु मैं रुपये-पैसे के लिए तो जाता नहीं हूँ। एक दूसरे ही काम के लिए जाता हूँ। किसी से कुछ लेना तो है नहीं, कुछ देने के लिए ही जाता हूँ । परन्तु, आज तो प्रत्येक आदमी को लेने की चिन्ता है, प्रत्येक आदमी को अपने स्वार्थ की अभिलाषा है।
एक व्यापारी सज्जन थे, मृत्यु के बाद जब धर्मराज के सम्मुख उपस्थित होना था। परमात्मा ने धर्मराज से कहा, “इसका हिसाब-किताब देखो।” धर्मराज ने हिसाब देखकर बताया कि महाराज इनके आधे पुण्य हैं और आधे पाप इसलिए यह भाई साहिब जितने दिन स्वर्ग में रहेंगें उतने ही दिन नरक में रहेंगें। उस समय परमात्मा शायद मौज मस्ती में थे। उन्होंने व्यापारी से पूछा, “क्यों भई, पहले तुझे स्वर्ग में भेजें या नरक में?” व्यापारी ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज! यदि आप प्रसन्न ही हैं तो मुझे वहाँ भेजिये जहाँ दो पैसे का अधिक लाभ हो !”
अर्थात् दो पैसे का अधिक लाभ हो तो वह साहब नरक में भी जाने को तैयार हैं। ऐसा होता है पैसे का मोह। यह कैसा मोह ? धन-वैभव-सम्पत्ति के लिए मनुष्य क्या-कुछ करने को तैयार नहीं हो जाता!
परन्तु यजुर्वेद के अन्तिम अध्याय के पहले मंत्र में भगवान् कहते हैं:
किसी धनवाले से यह प्रश्न पूछिये तो वह कहेगा: यह धन मेरा है और फिर उससे पूछिये कि तू कब तक है तो उसे इसका पता नहीं है । कौन जाने एक वर्ष, दस वर्ष, बीस या पचास वर्ष। कौन जाने केवल दस सैकंड, बीस या पचास सैकंड। कौन जाने अभी जो साँस आया, उसके बाद आए या न आए। लोग खड़े-खड़े मर जाते हैं, दुकान या दफ्तर जाते-जाते मर जाते हैं, वहाँ से आते जाते मर जाते हैं। प्लान बनाते हैं बड़े-बड़े, महीनों और वर्षों के, मालूम यह भी नहीं कि कुछ महीनों के बाद स्वयं होंगे भी या नहीं। “सामान सौ बरस का, खबर पल की भी नहीं।” और पल —- यह अन्तिम पल कब आयेगा, इसका भी पता नहीं। यह आता है और लोग सब-कुछ छोड़कर चले जाते हैं।
“लो चला गया बंजारा, छोड़ के घर यह सारा। महल यहाँ पर, माड़ी यहाँ पर, बेटे यहाँ पर, नारी यहाँ पर।”
इसी प्रकार चले जाते हैं लोग। धन-वैभव-सम्पत्ति, हीरे और मोती, कभी किसी के साथ नहीं गए।
कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।


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