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दुर्बुद्धि की महामारी हमें पूरी तरह से घेर चुकी है।

26 जुलाई 2022 का ज्ञानप्रसाद-  दुर्बुद्धि की महामारी हमें पूरी तरह से घेर चुकी है। 

आज के  ज्ञानप्रसाद में एक बार फिर से पात्रता को विकसित करने के विषय पर बहुत ही सरल चर्चा की गयी है। किस प्रकार इसका विकास होगा और कौन से सरल मार्ग अपनाने होंगें। हम  वही सारे मार्ग अपना सकते हैं जो परम पूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ में रहते हुए, सामान्य जीवन जीते हुए, उच्च आदर्शों का पालन करते हुए, सामान्य भौतिक लालसाओं के साथ  अपनाए और उत्कृष्टता की ऊंचाइयां प्राप्त कीं। 

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पात्रता की परिभाषा में इतना कुछ कहा गया है उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा समझा और मनन किया जाना चाहिए, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और अपनाया जाना  चाहिए। शब्दाडम्बर के रूप में नहीं बल्कि  सच्चाई  के साथ गहरी आस्था के रूप में यह सब कुछ  आसानी से किया जा सकता है। इसमें न तो कोई कठिनाई है,न अड़चन। यह आशंका भी व्यर्थ है कि आदर्शवादी जीवन कठिनाइयों से भरा है। सादगी को अपनाने भर से सारा काम सहज ही चल जाता है। दृष्टिकोण में अन्तर आते ही सामान्य भौतिक गतिविधियों का काम  सरलता पूर्वक सादे पथ पर चलते हुए, आत्मिक प्रगति का क्रम भली प्रकार चलता रह सकता है। गुरुदेव इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने साधारण गृहस्थ का सामान्य जीवन जिया लेकिन  उच्च आदर्श अपनाये रखे। इन्ही आदर्शों की पालना  करते हुए  उच्चस्तरीय “आत्मिक प्रगति” का लक्ष्य भी पूरा कर लिया। यह रास्ता उन सब परिजनों  लिए भी खुला पड़ा है जिनमें आत्मिक प्रगति की ज़रा सी भी आकाँक्षा जग पड़ी हो।

युग-निर्माण अभियान यों एक आन्दोलन जैसा  दिखता  है लेकिन सही मानों में  वह “युग साधना” है। यदि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो उसे विशुद्ध  योग साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। अगर और भी अधिक गंभीरता से देखा जाय तो उसे सामान्य उपासना-साधना की अपेक्षा बहुत ही  उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग प्राप्ति, मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए बड़े बड़े कठोर कष्ट सहे जाते हैं ।

युग साधना में अपनेआप को  भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। युग साधना की  सबसे बड़ी  विशेषता यह है कि इसमें  केवल साधक के परमार्थ के बारे में ही नहीं सोचा जाता और यह साधना केवल उसी के लिए कल्याणकारी न होकर   समस्त विश्व के कल्याण के लिए होती है।  विश्व्यापी होने के कारण इस साधना का स्तर भी ऊँचा ही  होना चाहिए।

कोई समय था जब सभी लोग उत्कृष्ट स्तर के होते थे। किसी की सेवा सहायता करने की न तो आवश्यकता पड़ती थी और न गुंजाइश रहती थी। ऐसे समय में लोग व्यक्तिगत स्तर बढ़ाने के लिए साधनाएं करते थे, लेकिन  आज की स्थिति बिल्कुल  ही अलग  है। यह आपत्तिकाल (emergency period)  है। अनाचार और अज्ञान ने तूफान और  भूकम्प जैसी स्थिति पैदा कर रखी है। कहने को तो आजकल  का मानव बहुत ही शिक्षित और बुद्धिमान माना जाता है लेकिन  हमारे सबके इर्द-गिर्द दुर्बुद्धि एक महामारी की तरह फैल चुकी  है। भौतिक प्रगति, चाँद पर छलांग लगाने में समर्थ होना कोई प्रगति नहीं कही जा सकती। आत्मिक प्रगति की दृष्टि में आज का मानव इतना पिछड़ा हुआ दिखता है कि क्या कहा जाए। ऐसे विषम समय में व्यक्तिवादी साधनाएं घृणायुक्त  ही ठहराई जायेंगी। परम पूज्य गुरुदेव वर्तमान परिस्थितिओं को देखते हुए  ऐसी साधना के लिए कह रहे हैं जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो। 

“युग निर्माण योजना की गतिविधियों को दूसरे शब्दों में आत्म-कल्याण और विश्वकल्याण की संमिश्रित युग साधना कह सकते हैं, इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्चस्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”

परम पूज्य गुरुदेव ने अपने  परिजनों में से प्रत्येक से यह आशा की है कि उसे समय, श्रम और साधनों में से एक अंश अनिवार्य रूप से लोकमानस के भावनात्मक नवनिर्माण में अत्यंत श्रद्धा और भावना से लगाना चाहिए। यह कार्य आरम्भ में  भले ही छोटे स्तर से और स्वल्प साधनों  से किया जाय लेकिन लक्ष्य अधिकाधिक उत्कर्ष  का रहना चाहिए। अगर निष्ठा सच्ची होगी तो परिस्थितियाँ स्वयं ही  बन जाएंगीं। आजकल हमारे समाज में एक बहुत ही प्रचलित सन्देश दिया जाता है जिसका खंडन करना हम सबका परम  कर्तव्य होना चाहिए।  यह सन्देश है “समय का अभाव।” हर   कोई यही कहता सुना जा रहा है कि  मैं बहुत ही व्यस्त हूँ और मुझे ज़रा भी फुरसत नहीं है। यह केवल बहानेबाज़ी है ,इससे अधिक और कुछ  भी नहीं है। हर किसी व्यक्ति ने अपनी priorities निश्चित की हुई हैं और उसी  भंवर में, मृगतृष्णा में पिस्ता हुआ अपने अमूल्य जीवन का नाश किये जा रहा है। लेकिन परम पूज्य गुरुदेव हमें बता रहे हैं कि दैनिक भौतिक कार्यक्रमों के करते हुए  ही युग परिवर्तन का कार्यक्रम सरलतापूर्वक चलाया जा सकता है। इस में केवल एक ही बात का ध्यान  रखना पड़ेगा कि  व्यक्तिगत स्वार्थों पर थोड़ा नियन्त्रण जरूर करें। शरीर को ही सब कुछ मान लेना  और भौतिक आवश्यकताओं को ही सर्वोपरि महत्व देना, इस प्रवृत्ति पर अंकुश रखना पड़ेगा। यहीं से आत्म-निग्रह शुरू हो जाता है। विवेक के जागरण की कसौटी यह है कि तथाकथित (so called ) प्रियजनों की इच्छा पर कठपुतली बनकर नाचते रहा जाए  या स्वतन्त्र चिन्तन द्वारा आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के महान उत्तरदायित्व को भी अपनी गतिविधियों में सम्मिलित किया जाए । हमारे सहकर्मियों  को याद होगा कि दिसंबर 2021 में हमने  मनोनिग्रह पर 30 लेखों की एक अद्भुत श्रृंखला प्रकाशित की थी जिसमं विवेक, संयम, स्वार्थ इत्यादि पर बहुत ही सरल शब्दों में चर्चा की गयी थी। अवश्य ही बहुतों को जिज्ञासा होगी कि जो लेख हम इस समय पढ़ रहे हैं, इसे और भी सरल बनाने के लिए इस लेख श्रृंखला का सहयोग लिया जा सकता है। अगर आप चाहें तो हम आपको यह लेख श्रृंखला भेज सकते हैं    

जिन परिजनों के  दृष्टिकोण में उपरोक्त स्तर का परिवर्तन आया हो, उन्हें  समझना चाहिए कि वे गुरुदेव के साथी सहचरों में गिने जाने योग्य बन गये हैं, प्रत्यावर्तन अनुदान के लिए उनकी पात्रता विकसित हो चली है। उन्हें जो कुछ भी  पाना है भौतिक स्वार्थ के लिए नहीं परन्तु  परमार्थ प्रयोजन में खर्च करने के लिए ही है।  ऐसी मनः स्थिति से ही दाता और ग्रहीता (ग्रहण करने वाला) कृतकृत्य होता है और दैवी अनुग्रह का सदुपयोग बन पड़ता है। प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया के लिए अनेकों लोगों ने अपने नाम लिखवाये,गुरुदेव  ने अखंड ज्योति पत्रिका  के माध्यम से कहा कि समय आने पर उन्हें शांतिकुंज बुलाया जायगा लेकिन पात्रता  विकसित करने वाली साधना अभी से विकसित करनी आरम्भ कर देनी चाहिये। 

हमारे सहकर्मी जानते हैं कि अखंड ज्योति पत्रिका  परम पूज्य गुरुदेव और परिजनों के बीच सम्पर्क का सबसे प्रभावशाली साधन रहा है। जब कभी भी कोई भी बात कहने की आवश्यकता  हुई तो गुरुदेव ने इस दिव्य पत्रिका को एक messenger के तौर पर प्रयोग किया। इसी भावना और चिंतन से मार्गदर्शन प्राप्त करके हमने ऑनलाइन ज्ञानरथ के यूट्यूब चैनल और व्हाट्सप्प ग्रुप का सृजन किया था। इस छोटे से परन्तु समर्पित परिवार का संपर्क इन माध्यमों से हो रहा है जिन्हे कमेंट और काउंटर कमेंट की प्रक्रिया गति देते हुए अनवरत अग्रसर हुए जा रही है। वैसे तो इस प्रक्रिया का मुख्य  उद्देश्य केवल ज्ञानप्रसार का ही रहा है लेकिन कई व्यक्तिगत समस्याएं निवारण करने में सफलता प्राप्त हुई है।        

सारे परिवार में से एक सदस्य के लिये जितना समय, मनोयोग, स्नेह, चिन्तन, धन खर्च किया जाता है कम से कम उतना तो युग साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये लेकिन काम से कम इतना तो होना ही चाहिए। गुरुदेव कहते हैं कि ऐसे   आग्रह यों तो  हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं लेकिन  अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय। गुरुदेव ने हम सबको कहा है कि  बिना आगा-पीछा सोचे, बिना बहानेबाजी किये, अपने युग साधना के  संकेतों पर चलना आरम्भ कर देना चाहिए । प्रत्यावर्तन की पृष्ठभूमि यही है। केवल प्राप्त करने की लालसा उग्र रहे और देने में कंजूसी  बनी रहे तो उससे कुछ काम चलने वाला नहीं है।

युग साधना के  स्वरूप की एक झाँकी अखंड ज्योति के  मई 1972  अंक में प्रस्तुत की गयी थी। इस अंक में  उन्हीं आधारों की चर्चा की गयी थी जिन्हें अपना कर गुरुदेव इस स्थान तक पहुँचे। प्रसन्नता की बात है कि  बहुत से परिजनों ने इन आधारों को  ध्यानपूर्वक पढ़ा और गम्भीरता पूर्वक अपनाया भी। युग साधना का सुव्यवस्थित रूप तीन पुस्तकों में विद्यमान है जो  “युग-निर्माण योजना” के नाम से तीन खण्डों में उपलब्ध है । व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के त्रिविध प्रयोजनों को कैसे पूरा किया जाय उसे इस पुस्तक में अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से सजा दिया गया है। विभिन्न समयों पर बिखरे रूप में नवनिर्माण प्रयोजन के लिये जो कुछ कहा जाता रहा है उसे क्रमबद्ध रूप से इस एक ग्रन्थ में पाया जा सकता है। 

गुरुदेव जून 1972 की अखंड ज्योति में लिखते हैं कि  बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी के बड़प्पन के सपने देखना बेकार है। उस दिशा में जो जितना सिर  खपायेगा उसे उतना ही पछताना पड़ेगा। अब समय महानता की गौरव गरिमा बढ़ाने  का आ गया है । विचारशील लोगों के कदम उसी दिशा में बढ़ने चाहिये। इसे कार्य रूप में परिणत कैसे किया जाय इसी का मार्गदर्शन युग साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है। चिन्तन और जीवन क्रम का स्वरूप जिस आधार पर बदला जा सके वही युग साधना हो सकती है। जिस कर्मकाण्ड में पूजापत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे,आत्म-परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे, उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर, उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा। गुरुदेव इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और अपनी अनुभूतियों का ही सार निष्कर्ष परिजनों को बताते रहे। प्रत्यावर्तन और कुछ नहीं उसी मार्ग पर दूसरों को चलाने की पुनरावृत्ति है जिस पर वे स्वयं चले हैं।  जो परिजन इस दिशा में चलने जितना साहस कर सकें, उन्हें उतनी ही प्रगति एवं उपलब्धि की आशा करनी चाहिये। गुरुदेव परिजनों को बताते हैं  कि आपको  समझ में भले ही न आवे लेकिन  यह अनुपम और अभूतपूर्व अवसर है। जो लोग  यह समय ऐसे ही आलस एवं  अनदेखी  में निकाल देंगे उन्हें  बाद में पश्चाताप करते रहने के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ   न लगेगा। 

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को आज के लिए विराम देते हैं और आप देखिये 24 आहुति संकल्प सूची। हर बार की तरह आज का लेख भी बहुत ध्यान से तैयार किया गया है, फिर भी अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिए क्षमा प्रार्थी है। सूर्य की प्रथम किरण आपके जीवन को ऊर्जावान बनाये जिससे आप गुरुकार्य में और भी शक्ति उढ़ेल सकें।

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24 आहुति संकल्प सूची में संध्या कुमार (24 ), संजना कुमारी (26) और प्रेरणा कुमारी (32) अंक प्राप्त कर रही हैं और प्रेरणा बिटिया प्रथम स्थान पाकर गोल्ड मैडल विजेता हैं। बिटिया को हमारी बधाई,, नारी शक्ति और युवा शक्ति को नमन। जय गुरुदेव  


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