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उपासना का अर्थ है पास बैठना और साधना का अर्थ है सीधा करना

19 जुलाई 2022 का ज्ञानप्रसाद – उपासना का अर्थ है पास बैठना और साधना का अर्थ है सीधा करना

आज के ज्ञानप्रसाद को आरम्भ करने से पहले हम उन सभी सहकर्मियों का धन्यवाद् करते हैं जिन्होंने टेक्निकल प्रॉब्लम के कारण यूट्यूब से लेख गायब होने की सूचना को एक दम respond  किया।  यही है मानवी मूल्यों की पालना, लेकिन इसने सुंदर कमैंट्स का गायब हो जाना भी एक दुःखद घटना थी।  हमने सारे (171) कमेंट देख लिए थे 

आज के ज्ञानप्रसाद में अधिक से अधिक सरल भाषा में, उदाहरणों सहित  “उपासना और साधना” को परिभाषित करेंगें। कल वाला लेख शायद बहुत ही छोटा केवल “आराधना” पर ही हो। 

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पात्रता के बारे में हम बता रहे थे कि योग्यता,क्षमता, संपन्नता, सुघड़ता, कार्यनिर्वाह-क्षमता आदि को नज़रअंदाज़ करके कोई मैनेजर की चापलूसी,आवश्यकता से अधिक अभिवादन या पुष्प- अक्षत भेंट करके कुछ भी  प्राप्त नहीं कर सकता। इस विशाल विश्व व्यवस्था का कण-कण नियम मर्यादाओं में बँधा है। ईश्वर से भी कोई नाक रगड़ कर, गिड़गिड़ा कर कुछ ऐसा प्राप्त नहीं कर सकता, जो वह चाहता हो  और उसकी इच्छाओं के अनुरूप हो। ईश्वर से बहुत कुछ पाया जा सकता है, किन्तु नियत मर्यादाओं में ही रहकर। 

जिन आध्यात्मिक अनुदानों की पात्रता के अनुसार  हमें उच्चस्तरीय ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं, उन्हें व्यक्तिगत जीवन की पात्रता एवं प्रखरता कहा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में उसे चिन्तन और चरित्र की प्रामाणिकता भी कहा जा सकता है। सर्वप्रथम साधक को इसी के लिए प्रयत्न करना होता है। अगली उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाला पक्ष अति सरल है। रंगाई से पहले धुलाई आवश्यक है। बोने से पहले खेत जोतना पड़ता है। ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए भी यही करना पड़ता है। जुताई, बुवाई, सिंचाई का प्रबन्ध बन पड़ने पर ही फसल लहलहाती है और कोठा भरने जितनी  उपज देती है। अध्यात्म क्षेत्र में इन्हीं तीन प्रयासों को “उपासना, साधना और आराधना” कहते हैं। 

उपासना का अर्थ है भगवान् के पास बैठना:

उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, जमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है, और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृत-कृत्य बनता है। उपासना कहते हैं भगवान के समीप बैठने को। महान तत्वों की समीपता भी असाधारण लाभ प्रस्तुत करती है। शीत ऋतू में केवल आग के पास बैठने से ही गर्मी का अहसास हो जाता है। चन्दन के निकट उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी महकने लगते हैं। फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खियाँ ढेरों शहद एकत्रित कर लेती हैं। राजा के दरबार में काम करने वाले  चपरासी की भी इज्जत होती है।

ईश्वर के पास बैठना अर्थात् उपासना कैसे संभव हो? उसका उपाय  तो केवल एक ही है। अपनेआप को ईश्वर के साथ जोड़ देना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हमें अपनी हस्ती,अपनी इच्छा मिटा कर ईश्वर को समर्पित करना पड़ता  है। नाली नदी में मिलती है,नदी सागर में मिलती है, बेल पेड़ पर चढ़ती है, ईंधन आग से लिपट जाता है और आग जैसा ही हो जाता है। पत्नी अपने  व्यक्तित्व को अलग न रख कर पति में घुला देती है। फलस्वरूप विवाह होते ही उसे पति की सम्पदा में साझीदारी प्राप्त हो जाती है और उत्तराधिकार की दावेदार बनती है, जहाँ तक कि उसे अपने पति  का टाइटल भी प्राप्त  हो जाता है।  पति ने तो दिन रात परिश्रम करके, कठिन परीक्षाएं पास करके, लाइसेंस लेकर डॉक्टर की डिग्री प्राप्त की लेकिन पत्नी तो विवाह होते ही डॉक्टरनी बन जाती है चाहे उसने कभी स्कूल का द्वार भी न क्रॉस किया हो। इसीलिए परम पूज्य गुरुदेव हमारा विवाह भगवान् से करवाना चाहते हैं। गुरुदेव कहते हैं कि भगवान् से विवाह करके हम भगवान् के रिश्तेदार बन जायेंगें, भगवान् के घर आना- जाना आरम्भ हो जायेगा और आहिस्ता- आहिस्ता हमारे अंदर भगवान् के गुण ( आदतें ) भी आ जायेंगीं।    

विवाह के बाद पत्नी को मिलने वाले जिस लाभ की बात हम कर रहे हैं, वह लाभ  वेश्या को नहीं मिल सकता, यद्यपि वह पत्नी से भी बढ़कर रिझाने वाले उत्तेजनाभरे  उपचार करती है। इसका कारण केवल एक ही है “महत्त्व क्रियाओं का नहीं भावनाओं का है।”  किसकी उपासना सच्ची है, किसकी झूठी है, इसकी  केवल एक  ही परख है कि अपनी मर्जी के अनुरूप स्वयं चलकर अपनी स्वामी भक्ति एवं वफादारी का परिचय देना। कठपुतली की तरह जब हम अपने धागे बाजीगर की उँगलियों में बाँध देते  हैं और उसके इशारों पर नाचना आरंभ करते हैं, तो तमाशा इतना रोचक हो जाता है कि   दर्शकों की तालियाँ बजने लगती हैं। कठपुतली द्वारा बाजीगर को अपनी मर्जी पर नचाना तो संभव ही नहीं है, तो फिर हम क्यों ईश्वर के दरबार में जाकर उसे अपने अनुरूप कार्य करने को कहते हैं।  हम क्यों कहते हैं कि मुझे, BMW दे दो ,मुझे कमिशनर, बना दो ,मेरे बदचलन,आवारा बेटे  की शादी करवा दो, मेरी बेटी को डॉक्टर बना दो आदि आदि।  हम तो ईश्वर के पास unending लम्बी सी लिस्ट ले कर जाते हैं। हम तो  ईश्वर के दरबार में भिखारी बन कर, कामनाग्रस्त होकर जाते हैं। हमने यह तो कभी भी नहीं सोचा कि ईश्वर हमसे क्या आशा रखते हैं। शुभरात्रि सन्देश में हम उस बच्चे की कथा कितनी ही बार पोस्ट कर चुके हैं जिसमें वह ईश्वर से पूछ रहा होता है “ईश्वर आपको कोई दुःख नहीं है, सारे अपना पुलंदा खोल कर बैठ जाते हैं, किसी को आपकी चिंता है ?”

मनुष्य जीवन का अनुपम उपहार देकर सृष्टि के रचियता, ईश्वर ने हमसे यह आशा की है कि उसकी सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक समुन्नत बनाने का प्रयत्न करें। इसके लिए जितने भी प्रयास किये जाते हैं, वे सभी ईश्वर उपासना के अंग माने जाते हैं। जप, तप, भजन-पूजन का मतलब ईश्वर को रिझाना नहीं, वरन् यह है कि “मानवी गरिमा का, मानवी मूल्यों का”  निर्वाह सतर्कता पूर्वक करेंगे और उसे कलंकित न होने देंगे। यह स्लोगन,उद्घोष  हम बार- बार रटते हैं जिसका अर्थ है कि हम अपनेआप को रामनाम के साबुन से, माँ गायत्री के शैम्पू से और भोलेनाथ के कंडीशनर से रगड़ कर शुद्ध, स्वच्छ बनाते हैं ताकि उस वातावरण के अनुरूप हमारी conditioning हो जाए।  

इन उदाहरणों की चर्चा करने का अर्थ जप, तप, भजन-पूजन के सिद्धांत को समझना है।  यह सिद्धांत समझ लेने के उपरान्त पूजा उपासना का कर्मकाण्ड सरल प्रतीत होने लगता  है। उसे अपनी पूर्व मान्यताओं के अनुरूप बहुत या थोड़ी देर अपनी रुचि एवं सुविधा के अनुरूप किया जाता रहता है। परम पूज्य गुरुदेव के निजी जीवन में गायत्री उपासना पर असाधारण विश्वास रहा है। गुरुदेव केहते हैं: “शास्त्रों और ऋषियों ने गायत्री को वेदमाता और विश्वमाता कहा है, उसे आद्यशक्ति और उपासना विज्ञान का सार तत्व बताया है। हम उसी का जप और प्रकाशपुँज सविता का ध्यान करते रहे हैं और  इसका सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष देखा है। इसलिए अपने सम्पर्क क्षेत्र में इसी को अपनाने का परामर्श देते हैं।” 

उपासना भले ही थोड़ी हो लेकिन  नियत समय पर, नियम पूर्वक और भावभरी होनी चाहिए। यही एक प्रक्रिया है जो  हमारी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने में बहुत हद तक सफल रहेगी। बिजली के ट्रांसफार्मर के साथ तार जोड़ लेने पर पंखे, बल्ब, हीटर, कूलर आदि यंत्र गतिशील हो उठते हैं। पानी की टंकी या लाइन के साथ जुड़े हुए नल यथेष्ट पानी देते रहते हैं। छोटे बैंक बड़े बैंकों के साथ जुड़कर सम्पन्न हो जाते हैं। हम भी ईश्वर के साथ जुड़कर उनकी शक्तियों का उद्भव अपने भीतर करने लगते हैं। बूँद समुद्र में गिरकर अपना अस्तित्व खोती नहीं वरन् अपना आकार विस्तृत कर लेती है। ईश्वर की, आत्म समर्पण की उपासना करके हम मात्र अहंता खोते हैं और उतने ही सुविस्तृत, उतने ही समर्थ हो जाते हैं, जितना कि ईश्वर स्वयं हैं।

साधना  का अर्थ है सीधा करना : 

उपासना के उपरान्त दूसरा चरण साधना का है। साधना अर्थात् अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र, प्रखर एवं प्रामाणिक बना लेना। मनुष्य वस्तुतः एक प्रकार का पशु है।जन्म-जन्मान्तरों से उसके संचित कुसंस्कार इस जन्म में भी चिपके रहते हैं और हमारे अधिकांश आचरण नर पशुओं जैसे होते हैं। इतना विकास होने के बावजूद, विकासशीलता की डींगें मरने वाला यह मानव, चाँद पर कदम टिकाने वाला यह मानव हम सबने कई बार इसका पशु जैसा रूप अवश्य ही देखा होगा, कभी शॉपिंग मॉल्स में ,कभी चौराहों में तो कभी आतंकवादियों में। ऐसे पशु-रुपी मानवों को सुधारने और  और सुसंस्कृत बनाने के  संकल्प पूर्वक कठोर प्रयास करने को ही “साधना ( सीधा करना)” कहते हैं।   है। बिखराव को, चंचलता को, उद्दण्डता को centralise  करना और मर्यादाओं के बन्धनों से अपनेआप  को बाँध लेने को ही साधना कहते हैं। 

अनगढ़ साँप, रीछ, बन्दर को सधाकर ग्रामीण मदारी अपनी आजीविका चलाते हैं। सरकस के रिंग मास्टर शेरों, हाथियों, घोड़ों को साधकर ऐसे करतब कराते हैं, जिन्हें देखकर दर्शक दंग रह जाते हैं  और संयोजक मालामाल हो जाते हैं । माली पौधों को काँट-छाँट कर, कलमें लगाकर इतना सुन्दर बनाता और फल-फूल की अनेकानेक प्रजातियाँ उत्पन्न करता है। ऐसे माली ही  प्रशंसा प्राप्त करते हैं। हमें भी ऐसा ही कलाकार बनना चाहिए कि जीव के अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी हुई अनेकानेक विभूतियों को सजग और सक्षम बना सकें और सन्त, सज्जन, ऋषि और देवता कहलाने योग्य बन सकें । ऐसा कहलाने के लिए संयम अपनाना होता है। इन्द्रियों का संयम, समय का संयम, धन का संयम और विचारों का संयम। इसी नियमितता को अध्यात्म की भाषा में तप साधना कहते हैं। तप का अर्थ है तपाना, गरम करना। संचित कुसंस्कारों और आदतों से लड़ पड़ना और उन्हें अनगढ़ धातु की भांति गलाकर उपयोगी उपकरण के रूप में ढाल लेना। कोयला ही बार-बार refinement के बाद  हीरा बनता है। कच्ची मिट्टी के बर्तन आवे में पकाने के बाद प्रयोग के योग्य बनते हैं। स्टीम इंजन में पानी उबाल कर बन रही स्टीम इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वह पूरी रेलगाड़ी को खींच लेती है।  अनुपयुक्त चिन्तन, चरित्र, रुझान एवं आदतों को बदलने और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय प्रवृत्तियों से अपनेआप का कायाकल्प कर लेना, दूसरा जन्म होने के बराबर समझा जाता है। उपवास, ब्रह्मचर्य आदि में इसी  भीतरी महाभारत से युद्ध करना  पड़ता है। जो जितना निर्मल, पवित्र बन सका, चिन्तन और चरित्र को मर्यादाओं के शिकंजे में कस सका, कुम्हार के आँवे की तरह पक सका, समझना चाहिए कि वह घर में रहने वाला तपस्वी है। अच्छा हो हम तपोवन में घर बनाने की अपेक्षा, घर में तपोवन बनायें और अपने सज्जनता पूर्ण सद्व्यवहार से सृजन कार्यक्रम में न केवल अपने को वरन् समूचे परिवार को इसी सुसंस्कारिता के, तप साधना के ढाँचे में ढालें।

गुरुदेव कहते हैं कि पात्रता के विकास के लिए हमें  साधना करनी चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनानी चाहिए। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करना  चाहिए और जो समय, धन, श्रम, चिन्तन आदि की बचत हो सके उस कटौती को विश्व कल्याण के, लोक मंगल के कार्यों में लगाना चाहिए। इसी को पुण्य, इसी को परमार्थ, इसी को आराधना कहते हैं।

धन्यवाद् ,जय गुरुदेव 

अगला लेख “आराधना” के साथ जारी रहेगा।  


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