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पंडित लीलापत शर्मा जी के बड़े बेटे की दुःखद मृत्यु पार्ट 1

11 जुलाई 2022 का ज्ञानप्रसाद- पंडित लीलापत शर्मा जी के बड़े बेटे की दुःखद मृत्यु पार्ट 1 

“Gurudev Prophet of the New Era” शीर्षक से 2009 में अंग्रेजी में  प्रकाशित हुई पुस्तक से हम कैसे आजकल की लेख श्रृंखला लिख रहे हैं उसका विवरण हम 7 जुलाई 2022 वाले लेख में दे चुके हैं, इस विषय पर फिर से चर्चा करना अनावश्यक repetition ही होगा। 

आज के ज्ञानप्रसाद को समझने के लिए हमें 7 जुलाई 2022 के लेख की summary  देने  की आवश्यकता है क्योंकि जहाँ हमने वह लेख छोड़ा था उसके आगे ही आज चर्चा कर रहे हैं।  हमने देखा था कि पंडित लीलापत शर्मा जी को बचपन से ही कैसे  संघर्षमय जीवन से गुज़रना पड़ा, डेढ़ वर्ष की आयु में ही माँ का साया सिर  से उठ गया, 10 वर्ष की आयु थी कि पिता का देहांत हो गया, किसी का भी सहयोग न मिलने के कारण इतनी छोटी आयु में नौकरी करनी पड़ी और नौकरी भी ऐसी कि वेतन कम ,घंटे अधिक, भोजन पकाने का समय भी नहीं। Paying guest के तौर पर समय व्यतीत करना पड़ा।  इसी भागदौड़ में पंडित रेवतीशरण जी से संपर्क हुआ तो उन्होंने गायत्री मन्त्र दीक्षा दी और साथ में ही पालन करने के लिए  कई निर्देश भी दे दिए। पंडित जी जहाँ काम करते थे उन्ही के कार्यालय में कार्यरत लेखाकार ने उन्हें पढ़ने को न केवल  प्रेरित ही किया बल्कि पढ़ाया भी। पंडित जी की कर्तव्यपरायणता देखकर उन्हें  उच्च पद भी मिल गया  लेकिन पंडित जी संतुष्ट नहीं थे। आइये उन्ही से जाने, उन्ही के शब्दों में आगे की कथा : 

“मैं  कार्यालय में संभावनाओं से संतुष्ट नहीं था। मैं और भी अधिक प्रगति करना चाहता था और अचानक एक अवसर मिला जिसमें मैंने अपनेआप को  सभी दुकानों को खाद्यान्न के वितरण के प्रभार के रूप में प्रस्तुत किया।  सरकार ने  राशनिंग की  शुरूआत  की  क्योंकि एक तरफ विश्व-युद्ध ने अर्थव्यवस्था को धीमा कर दिया था, गंभीर मुद्रास्फीति (inflation)  थी और साथ ही साथ भारत के कई हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति थी। अराजकता और खाद्य-दंगों को रोकने के लिए, सरकार ने गरीब वर्गों के लिए भोजन सुनिश्चित करने के लिए राशन की शुरुआत की। मैंने पूरी ईमानदारी के साथ इस कार्य का निर्वहन किया और कई व्यापारियों की सद्भावना अर्जित की। राशन अधिकारी के रूप में अर्जित सद्भावना के परिणामस्वरूप, मैं भरतपुर के नदवई में अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने में सक्षम हो गया जो दिन-प्रतिदिन समृद्ध होता गया। लेकिन फिर एक ऐसी स्थिति बनी  हुई जिसके कारण  मुझे व्यवसाय को हवा देनी पड़ी और लेनदारों की  पूरी बकाया राशि का भुगतान करना पड़ा । नदवई से मैं ग्वालियर के पास डबरा नामक शहर आ गया, जहाँ मैंने वस्त्रों के क्षेत्र में प्रवेश करने का निर्णय लिया। मेरे आने से पहले ही डबरा के व्यापारियों के सामने मेरी प्रतिष्ठा चली आयी  थी और यह एक कारण हो सकता है कि उन सभी ने वस्त्र-क्षेत्र में मेरा स्वागत किया। उस समय डबरा में 40 कपड़ा मिलें  थे। मिल मालिकों ने प्रस्ताव दिया कि मुझे एसोसिएशन के प्रमुख का पद संभालना चाहिए। प्रमुख की ज़िम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण थी, सामंजस्य बनाना और दो या अधिक प्रतिष्ठानों के बीच गलतफहमी और कड़वाहट के सृजन को रोकना मेरे काम का हिस्सा था। यदि कभी-कभी कड़वाहट पैदा होती है, तो इसके  समाधान करना भी  मेरी नौकरी का  हिस्सा था। जब कपड़ा समुदाय के इन नेताओं ने मुझे यह कार्य  करने के  लायक समझा तो मुझे यह पद ऑफर कर दिया।  मुझे तो challenge  पहले से ही पसंद थे इसलिए मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 

बाल्यावस्था की कठिनाइओं की summary जिसका वर्णन हमने इस लेख के शुरू में दिया, उसके  विस्तृत वर्णन   के लिए  हमारे पाठक 7 जुलाई 2022 वाला ज्ञानप्रसाद पढ़ सकते हैं। हम तो कहेंगें कि  बाल्यावस्था के बाद वाला समय भी कोई कम संघर्षमय नहीं था।

“पत्र पाथेय” नामक पुस्तक में परमपूज्य गुरुदेव और पंडित जी के बीच लिखे 89  पत्रों को बहुत ही अच्छे ढंग से क्रमबार संगृहीत किया हुआ है। एक -एक पत्र को पढ़ने से पता चलता है कि गुरुदेव ने पंडित जी को अपनी गृहस्थ की ज़िम्मेवारियों को निभाते हुए किस प्रकार पग-पग पर तराशा। गुरुदेव सदैव यही कहते रहे कि अपनी  ज़िम्मेवारियों को निपटाने के बाद ही सदा के लिए मथुरा आने का विचार बनाना। 1967 में पंडित जी तपोभूमि मथुरा आ गए।

दादा गुरु तो गुरुदेव की कोठरी में आकर निर्देश देकर चले गए थे और पूरा आश्वासन दिया था यह विशाल कार्य तुम्हे करना है,लेकिन तुम्हारे सिर पर इस कार्य को  सफल बनाने में हिमालय की दिव्य सत्ताओं का हाथ सदैव रहेगा। दादा गुरु ने इसी कारण गुरुदेव को हिमालय की यात्रायें भी करवायीं। लेकिन पंडित जी के लिए तो यहीं पर, इसी भूमि पर ही संघर्ष का वातावरण था। इसी संघर्षपूर्ण वातावरण का उदाहरण है उनके बेटे राम की मृत्यु। 

पंडित जी के बड़े बेटे की दुःखद  कथा उन्ही के शब्दों में :

मथुरा आने के बाद, इच्छा थी कि मैं अपने बेटों के विवाह की व्यवस्था करूँ। कम से कम बड़े बेटे राम की अभी शादी होनी चाहिए। छोटे बेटे सतीश की मुझे कम चिंता थी। इसलिए मैंने गुरुदेव को इसके बारे में बताया। भगवान जानते हैं कि गुरुदेव ने क्या सोचा था । उन्होंने मुझे राम के विवाह के बारे में न सोचने के लिए कहा और सतीश की शादी करने के लिए कहा। भारतीय समाज में यह अजीब प्रतीत होता है यदि छोटे बेटे की शादी बड़े से पहले हो जाती है और लोग इसके बारे में कई प्रकार की बातें करना शुरू कर देते हैं। मैं उलझन में था क्योंकि मैं गुरुदेव के सोचने के तरीके को समझ नहीं पाया, और उन्हें बताया। “लोग क्या कहेंगे?” तीन चार बार मैंने गुरुदेव से उपरोक्त वाक्य दोहराया उन्होंने यही सलाह दोहराई कि मुझे छोटे बेटे की शादी कर देनी चाहिए।

1971 में गुरुदेव को मथुरा से विदाई देने की तैयारी चल रही थी। एक कार्यक्रम में आदर्श विवाह में अर्थात बिना दहेज के और कम से कम खर्च के साथ विवाह सम्पन्न किया जाना था। मैंने एक बार फिर गुरुदेव के साथ राम के विवाह की व्यवस्था करने के लिए कहा । माताजी भी उपस्थित थीं। उन्होंने कहा, “ठीक है, मुझे एक लड़की के बारे में पता है। मृत्युंजय की पत्नी की बहन (मृत्युंजय गुरुदेव का बेटे हैं जो तपोभूमि मथुरा  का कार्य सँभालते हैं ) के साथ राम के विवाह पर विचार करें।” इस प्रकार जून 1971 में राम की शादी हुई थी। मैं और मेरी पत्नी बहुत खुश थे कि गुरुदेव और माता जी ने इस विवाह को आशीर्वाद दिया था।

मथुरा के लोगों ने भारी मन से गुरुदेव और माताजी को विदाई दी। समारोह में गुरुदेव ने घोषणा की कि वे पंडित लीलापत शर्मा को सफल होने के लिए आयोजन अधिकारी नियुक्त कर रहे हैं। सभी व्यक्तियों को उन्हें अपना बड़ा भाई मानना ​​चाहिए। उन्होंने अपने पत्रों और व्यक्तिगत चर्चाओं में ऐसा बार-बार कहा था। 1971 में गायत्री जयंती के दिन गुरुदेव ने शांतिकुंज हरिद्वार के लिए मथुरा छोड़ दिया। उस दिन के बाद से मुझे एक भी घटना याद नहीं है कि मिशन के भक्तों ने गुरुदेव के उपरोक्त निर्देश को अनदेखा कर दिया हो। साथ ही मुझे कोई भी क्षण याद नहीं है जब मैं अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करने में आलसी हो गया होगा ।

अब मुझे अपने बेटों की चिंता नहीं करनी थी। राम का कारोबार चल रहा था। छोटा बेटा सतीश भी शादीशुदा था। दोनों डॉक्टर थे और अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते थे। दोनों बेटे ठीक से बस गए और 20 साल तक जीवन सुचारू रूप से चला, लेकिन एक दिन मुझे संदेश मिला कि राम गंभीर रूप से बीमार है । मैं ग्वालियर शहर में उसके पास गया और पाया कि उसकी हालत गंभीर है। उसे सांस लेने में बहुत मुश्किल हो रही है । वह अपने पेट में कुछ भी नहीं रख पा रहा था, दवाइयों भी नहीं। ग्वालियर के सर्वश्रेष्ठ डॉक्टरों से सलाह ली गई और उन्होंने कहा कि राम की हालत गंभीर है और उसे  तुरंत बहुत अच्छी गहन देखभाल दी जानी चाहिए। उसे ग्वालियर से मथुरा, वहाँ से आगरा और फिर दिल्ली ले जाया गया। केवल एक चमत्कार ने उसे बचाया लेकिन राम को ठीक होने में चार महीने लगे। मैंने उस समय राम को मथुरा में अपने साथ रखा। उस समय राम लगभग ठीक हो गया था तब एक दिन उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उसके स्वास्थ्य के पिछले इतिहास को जानने के बाद, हम तुरंत उसे इलाज के लिए दिल्ली ले गए। डॉक्टरों ने बताया कि अब चिंता का कोई कारण नहीं है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। हमने सोचा कि जब वह गंभीर रूप से बीमार था तो बच गया था, तो अब कुछ भी गलत क्यों होना चाहिए? लेकिन सबसे बुरा हुआ तब हुआ जब समाचार मिला कि राम नहीं रहा। राम के अचानक देहांत के समय मैं और राम की पत्नी इंदिरा ही मौजूद थे। गुरुदेव के पुत्र मृत्युंजय दवा खरीदने निकले थे । इंदिरा ने इस गंभीर आघात को कैसे झेला, इसकी कल्पना करना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन उसकी सहनशक्ति हमें भी हिम्मत देती रही । उसने कहा, “पिता जी , अब मै ही आपकी राम हूं।” उस समय तक मृत्युंजय वापस आ गए और इंदिरा ने कहा कि वह उसे घर ले जाएगी। मैंने पहले कभी इंदिरा को इतना शांत और दृढ़ नहीं देखा था। पुत्र की असामयिक मृत्यु पर कोई भी पिता टूट जाएगा और एक युवा पत्नी के लिए, उसके पति का अचानक निधन सरासर यातना है लेकिन हम जानते हैं कि इंदिरा ने कैसे स्थिति को संभाला और सांत्वना दी और हमारी देखभाल की।

शब्द सीमा के कारण हम अपनी लेखनी को यहीं विराम देने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

कल वाले ज्ञानप्रसाद में इस दुःखद स्थिति का आगे वाला पार्ट प्रस्तुत करेंगें 

To be continued : क्रमशः जारी

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8 जुलाई 2022 को प्रकाशित वीडियो  की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1 )संध्या कुमार-26 , (2 )अरुण वर्मा-30, (3 )प्रेरणा कुमारी -25,(4 ) सरविन्द कुमार-32,(5 )सुमन लता -24,(6 )रेनू श्रीवास्तव -28     

आज की सूची के अनुसार सरविन्द कुमार जी गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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