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“पत्र पाथेय” दिव्य पुस्तक में से  चुने दो पत्रों पर चर्चा I

6 जुलाई 2022 का ज्ञानप्रसाद – “पत्र पाथेय” दिव्य पुस्तक में से  चुने दो पत्रों पर चर्चा 

आज का ज्ञान प्रसाद परमपूज्य गुरुदेव की अनुकम्पा और मार्गदर्शन में केवल 2 पत्रों पर ही आधारित है। यह दोनों अनमोल पत्र परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने अनुचर पंडित लीलापत शर्मा जी को 9 और 18 अगस्त 1961 को लिखे गए थे। 1998 में प्रकाशित “पत्र पाथेय” नामक अनमोल पुस्तक के पन्ना संख्या 7 से 12 तक यह दोनों पत्र scanned और पीडीएफ फॉर्म में उपलब्ध हैं। हमें कई बार हैरानगी होती है कि लगभग 60 वर्ष  पुराने पत्रों में क्या मिल रहा है, किस दृष्टि से यह पत्र अनमोल हैं ,दो वर्ष पूर्व भी इस पुस्तक का एक-एक  पन्ना छांट दिया था, मन में एक अजीब सी करंट  कौंध गयी थी, कई तरह के प्रश्न उठे थे, समाधान भी मिले थे लेकिन एक बात अवश्य ही सामने आयी थी कि परम पूज्य जैसा  लेखक कहीं और नहीं मिल सकता। एक-एक शब्द हमारे लिए अमृतवाणी है,वेदवाणी है। 

अपने पाठकों का कार्य आसान करने की दृष्टि से हम गुरुदेव द्वारा लिखे scanned पत्रों  के स्क्रीनशॉट शामिल कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि  पाठकों को घर बैठे ही यह  अनमोल ज्ञान भंडार उपलब्ध हो जाये। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि कई बार पुस्तक नहीं मिलती, ऑनलाइन ढूंढने में समस्या आती है ,इंटरनेट डाउन होता है, फ़ोन पर memory ख़त्म हो गयी होती है या फिर किसी और कारण हमारे पाठक इस अमूल्य ज्ञान को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इन दोनों पत्रों के स्क्रीनशॉट का pdf  ही आज का ज्ञानप्रसाद है। जब हम  इतना प्रयास करके आपके लिए  सर्वसुलभ उपलब्ध करवा रहे हैं  तो हमारा  लालच एक और केवल एक ही है।  पढ़ना और पढ़ाना।  आप इस अमृत का स्वयं पान करें और अपने सोशल सर्किल में अधिक से अधिक परिजनों को पढ़ा कर पुण्य के भागीदार बनें। हम कई बार कह चुके हैं कि ज्ञानप्रसार के कुछ भाग  का पुण्य करने वाले को अवश्य ही मिलता है।  हम आपसे केवल 5 -7 मिंट की भीख मांगते हैं।  हमारा अटूट विश्वास है कि ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  बहुत ही  समर्पित पाठकों का जमावड़ा है, एक ऐसा जमावड़ा जहाँ एक-एक परिजन को गुरुदेव ने स्वयं चुना है,तराशा है। यह सभी परिजन अपनेआप को सौभाग्यशाली मान  सकते हैं कि  वह एक महान गुरु की संतान हैं जो हमें अनवरत मार्गदर्शन दिए जा रहे हैं।  इस समय न तो परमपूज्य गुरुदेव और न ही पंडित जी स्थूल रूप में हमारे  पास हैं लेकिन हमारी ओर से किये जा रहे प्रयास आपको उनका अनुभव कराने  की चेष्टा कर रहे हैं। आप एक-एक शब्द पढ़िए,अंतरात्मा में उतारिये और फिर देखिये कि कैसा प्रणय दृश्य ( romantic scene ) उभर कर सामने आता है।     

जो पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध होती  हैं, जब हम उन्हें पढ़ना चाहते हैं  तो हमारे पास दो options होती हैं, scanned copy या text copy , इस पुस्तक की केवल scanned copy ही उपलब्ध है।        

आज के ज्ञानप्रसाद में दिए जा रहे पत्रों को  पढ़ कर आप  अवश्य ही प्रेरित और समर्पित तो होंगें ही, परमपूज्य गुरुदेव के प्रति आपकी श्रद्धा अवश्य बढ़ेगी – ऐसा हमारा अटूट विश्वास है। हमारे पाठक नोटिस करेंगें कि 9 अगस्त वाले पत्र में परम पूज्य गुरुदेव श्रद्धा और मिट्टी के गणेश का reference दे रहे हैं। दोनों में क्या connection है , अधिकतर पाठक जानते ही  होंगें फिर भी आइये इस पौराणिक तथ्य से जानने का प्रयास करें  कि गणेश जी और मिट्टी का क्या सम्बन्ध है। 

मिट्टी का ढेला और गणेश :

गणेश, गणपति के रूप में गणों के अधिपति हैं। उन्हें जल का अधिपति भी माना गया है। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख है। उनके दूसरे हाथ में सौंदर्य का प्रतीक कमल है। तीसरे हाथ में संगीत की प्रतीक वीणा है। चौथे हाथ में शक्ति का प्रतीक परशु या फरसा है। गणेश के नाम में प्रकृति से  एकात्म होने का रहस्य छिपा है। काव्य के छंद की उत्पत्ति प्रकृति में मौजूद विविध ध्वनियों से हुई थी। गणेश छंद शास्त्र के आठों गणों के अधिष्ठाता देवता हैं। यह भी एक कारण है कि उन्हें ‘गणेश’ नाम दिया गया। प्रकृति में हर तरफ बहुतायत से उपलब्ध हरी-भरी दूब गणेश को सर्वाधिक प्रिय है। जब तक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित न की जाए, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है।

शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तोंवाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। गणेश के मिट्टी से जुड़ाव  का एक प्रमाण यह भी है कि अगर कुछ नहीं है तो भी अधिकतर  मिट्टी के गणेश बनाकर ही पूजे जाते हैं। गोबर गणेश तो बहुत लोकप्रिय हैं। गणेश के प्रति सम्मान का अर्थ है कि प्रकृति में मौजूद सभी जीव-जंतुओं, जल, हवा, जंगल और पर्वत का सम्मान। हिंदू धर्म और संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य की शरुआत में उन्हें पूजने की परंपरा है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए की गई है कि प्रकृति को सम्मान देकर और उसकी शक्तियों से सामंजस्य बैठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख, लौकिक सिद्धि, दिव्यता और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि सम्पति, समृद्धि तथा सौंदर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला तथा संगीत की देवी सरस्वती की पूजा भी गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती। 

गणेश जी  को भुलाने का असर प्रकृति के साथ-साथ हमारे रिश्तों पर भी पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है और इस संकट में हम उसके साथ नहीं, खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरूप को समझना है तो उसके लिए असंख्य मंदिरों और मूर्तियों  की स्थापना, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हमारे भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान तथा संरक्षण देकर ही हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं।

तो मित्रो यही  है श्रद्धा, समर्पण और विश्वास की बात जिसने पंडित जी को गुरुदेव के हृदय में स्थापित कर दिया।  इसी पत्र में गुरुदेव अखंड ज्योति के पाठकों और सदस्यों को बढ़ाने की बात कर रहे हैं।  आर्थिक स्थिति को एक तरफ रखते हुए गुरुदेव कहते हैं कि अखंड ज्योति के माध्यम से हम अपने परिजनों से भावनात्मक  बातचीत करते हैं और जनहित में भी योगदान होता है। इस वाक्य को पढ़कर हमें ऐसा अनुभव हुआ कि यह वाक्य ऑनलाइन ज्ञानरथ पर भी पूरी तरह apply होता है।  कमेंट-काउंटर कमेंट आरम्भ करते समय  ऐसी ही भावना हमारे ह्रदय में उठी थी और प्रतिदिन के ज्ञानप्रसाद जनहित में योगदान तो अवश्य ही दे रहे हैं। 

18 अगस्त वाले पत्र में गुरुदेव आत्मा और अंतरात्मा के स्तर पर बात कर रहे हैं, ऐसे स्तर की बात कर रहे हैं जहाँ से उन्हें पंडित जी का भविष्य दर्शन साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

पंडित जी को  आत्मस्वरूप कहकर सम्बोधित करना भी आत्मिक स्तर की ही बात है।  

तो ऐसा है इन पत्रों में छिपा ज्ञान। यही कारण है कि  परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी के बारे में  कुछ भी कहने के लिए हमारे पास शब्दों की कमी पड़ जाती है।

प्रस्तुत हैं  यह दिव्य  पत्र :

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दिनांक-9 -8 -1961

हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला | माताजी और हमने उसे कई बार पढ़ा । पढ़कर आँखों में आँसू छलक आये । हम तुच्छ हैं पर हमारे प्रति आपकी जो श्रद्धा है वह महान है । आपकी यह महानता यदि स्थिर रही तो आप उसी के बल पर पूर्णता प्राप्त कर लेंगे । श्रद्धा अपने आप में एक स्वतन्त्र तत्व है और इतना शक्तिशाली है कि उसके द्वारा मिट्टी का ढेला सचमुच के गणेश का काम कर सकता है | आपकी यही चिर संचित आध्यात्मिक सम्पत्ति आपके लिए सब प्रकार श्रेयस्कर हो ऐसी हमारी आन्तरिक कामना है ।

अखण्ड ज्योति हमारी वाणी है । लोगों तक अपने विचार पहुंचाने का एक मात्र माध्यम यही है । नियमित रूप से हमारा किसी के साथ सम्पर्क रखना भी इसी आधार पर संभव होता है । पत्रिका में हर साल कुछ घाटा ही रहता है इसलिए आर्थिक दृष्टि से किसी के ग्राहक रहने, न रहने में कोई आकर्षण नहीं है पर चूंकि हमें लोगों तक अपनी भावना पहुंचाने में सुविधा होती है और इससे जन हित भी बहुत कुछ होता है इस दृष्टि से अखण्ड ज्योति की सदस्यता बढ़ने का महत्व बहुत है।

गुरुपूर्णिमा के पुनीत पर्व पर आपने कुछ सदस्य बढ़ाये यह प्रसन्नता की बात है । डबरा के सब सदस्यों की पत्रिकायें आपके पास ही रजिस्ट्री से हर महीने भेज दी जाया करेंगी।

अपनी धर्मपत्नी तथा बच्चों को हमारा आशीर्वाद कहें । माता जी आप सबको स्नेह लिखाती हैं।

श्रीराम शर्मा


दिनांक-18 -8 -1961

हमारे आत्मस्वरूप,

आपका पत्र मिला, पढ़कर बढ़ा संतोष हुआ । आपकी ऋषि आत्मा इसी जीवन में पूर्णता का लक्ष प्राप्त करे इसके लिए हमारी आन्तरिक अभिलाषा है । हमारे प्रयत्न भी इसी दिशा में चल रहे हैं। आपकी आत्मा इस थोड़ी सी अवधि में कितनी ऊँची चढ़ चुकी यह हमें प्रत्यक्ष दीखता है और यह विश्वास दिन-दिन पक्का होता जाता है कि आप अब जीवन के परम लक्ष्य को निश्चित रूप से प्राप्त करके रहेंगे । आपकी प्रगति आगे और भी तीव्र गति से बढ़ेगी ।

ट्रैक्टों के अनुवाद में कोई भूल चूक होगी तो उसे कोई उर्दू जानने वाला ही निकाल सकेगा । हमें दिखाना व्यर्थ है । कोई उर्दू जानकार उधर हो तो उसे दिखा लें । आपका यह प्रयत्न सब प्रकार सराहनीय है।

हम किसी से कुछ कहना चाहते हैं तो वह अखण्ड ज्योति के माध्यम से ही कहते हैं । इसलिए पत्रिका हमारी वाणी है । आप उसके सदस्य बढ़ाकर हमारे ज्ञान यज्ञ का ही विस्तार कर रहे हैं । यह उत्तम है । आर्थिक दृष्टि से ग्राहक बनाने का कोई महत्व नहीं पर अपने मिशन के विस्तार की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ी बात है।

रविवार की विशेष साधना चालू रखें, उससे आपको अधिक आत्मबल प्राप्त होगा।माता जी आपको स्नेह लिखाती हैं।

श्रीराम शर्मा

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हम अपनी लेखनी को यहीं विराम देने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

To be continued : क्रमशः जारी

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 5  जुलाई   2022  की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1 ) संध्या कुमार-24 , (2 ) अरुण वर्मा-27  , (3 ) रेणु श्रीवास्तव -27,(4) प्रेरणा कुमारी -26     

चारों  सहकर्मी जो ज्ञानरथ की लाल मशाल हाथ में थामें अग्रसर हुए जा रहे हैं,गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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