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सत्साहित्य संजीवनी बूटी है,पारस है, कल्प वृक्ष है I

15 जून 2022 का ज्ञानप्रसाद- सत्साहित्य संजीवनी बूटी है,पारस है, कल्प वृक्ष है 

आजकल चल रही ज्ञानप्रसाद की श्रृंखला में आज परमपूज्य गुरुदेव हमें ज्ञानदान और सत्साहित्य के अध्ययन का  विचार क्रांति में योगदान बता रहे हैं। तो चलते हैं बिना किसी भूमिका के आज के ज्ञानप्रसाद की ओर।

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संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण धर्मकार्य सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा देना है।इस धर्मकार्य में लगे हुए  व्यक्तियों को सम्मान का शीर्ष स्थान भी मिलना ही चाहिए। ब्रह्मदान को दानों में सर्वोत्तम दान  कहा जाता है। ब्रह्मदान का अर्थ है- ज्ञानदान । ज्ञान का अर्थ है वह भावना और निष्ठा जो मनुष्य के नैतिक स्तर को सुस्थिर बनाए रखती  है। 

“युग निर्माण संकल्प में जिन सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार की प्रेरणा दी गई है, यही है वह  ब्रह्मदान। ब्रह्मदान के  अमृतजल से सींचा जाने पर मुरझाया हुआ युग मानस पुनः हरा-भरा, पुष्प-पल्लवों से परिपूर्ण बन सकता है। इसी महान कार्य को वह परमार्थ कहा जा सकता है, जिसको पूरा करने के लिए ही  परमात्मा ने मनुष्य को विशेष क्षमता, सत्ता और महत्ता प्रदान की है।”

ज्ञानदान ही ब्रह्मदान कैसे है ? 

राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए अनेक माध्यम, साधनों और उपकरणों की आवश्यकता है, उसके प्रकार और कार्यक्रम भी कितने ही हैं, लेकिन  वह सब कुछ जिस आधार पर निर्भर है वह है “भावना”। भावना के अभाव में प्रगति की सारी प्रक्रियाएँ निर्जीव और प्रदर्शन मात्र बनी रहती हैं। हमें जनमानस में कर्तव्यपालन की, नीति, धर्म और सदाचार की, आस्तिकता और परमार्थ की प्रचंड भावनाएँ उत्पन्न करनी चाहिए। 

ज्ञान से कर्म और कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है। जैसे विचार मन में उठेंगे, शरीर वैसे ही कर्म करेगा और जैसे कर्म होंगे, वैसा ही प्रतिफल मिलेगा । इसलिए हमें ज्ञान का, भावना का महत्त्व समझना चाहिए और उसके विकास का समुचित प्रयत्न करना चाहिए।

पुरातन काल में  ब्रह्मदान (ज्ञानदान) केवल ब्राह्मण ही दे सकते थे। गुरुदेव जब ब्राह्मण की बात कर रहे हैं तो इसे किसी जाति विशेष न समझकर उस व्यक्तित्व समझा जाये हो सुशिक्षित एवं ज्ञानवान हो।  ब्राह्मण को इसलिए पृथ्वी का देवता मानते हैं कि उनके द्वारा जन-साधारण को सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। विचारों की शक्ति प्रचंड है। यदि उत्तम विचारों को मनःक्षेत्र में समुचित स्थान मिल जाए तो साधारण स्थिति का मनुष्य, महापुरुष, ऋषि, देवता और अवतार बन सकता है। 

संसार में जब कभी भी भले या बुरे परिवर्तन हुए हैं, उनमें  विचार परिवर्तन की प्रक्रिया का ही प्रधान श्रेय रहा है। कार्लमार्क्स की साम्यवादी विचारधारा ने आज लगभग आधी दुनिया को उस विचारधारा से प्रभावित कर दिया है। “टाम काका की कुटिया’ पुस्तक की लेखिका जिसका नाम Harriet Beecher Stowe अमेरिका में दास-प्रथा के प्रश्न को लेकर गृहयुद्ध करा दिया और अंत में उस घृणित प्रथा का अंत  होकर ही  रहा। बुद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद, गांधी, दयानंद की प्रखर विचारधाराओं का जब विस्तार हुआ तो उससे कितने ही लोग प्रभावित हुए? विचारधाराएँ तूफान की तरह होती हैं, यही क्रांतियां लाती हैं। अगर गुरुदेव हमें विचारों  की क्रांति के लिए प्रेरित कर रहे हैं और युगपरिवर्तन को देख रहे हैं तो हम सोच क्यों रहे हैं ? हम किस विस्फोट की प्रतीक्षा कर रहे हैं ? गुरुदेव हमारे लिए सब कुछ बना कर तो  दे गए  हैं, हमें तो केवल ग्रहण ही करना है।  ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार का प्रत्येक सदस्य ,छोटा-बड़ा, बच्चा-वरिष्ठ, स्त्री- पुरुष इस कार्य में यथासंभव योगदान दे रहा है परंन्तु इतने भर से कार्य पूर्ण होने वाला नहीं है। कार्य विश्व्यापी है, तो  संकल्प और परिश्रम भी तो विश्व्यापी ही होना चाहिए। 

जब भी किसी क्रांति के बादल आते दिखते  हैं तो  मनुष्य क्रांति के  प्रवाह में सूखे पत्तों की तरह इधर-उधर उड़ते रहते हैं।  परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि  हमें मनुष्य को मनुष्य बनाने की विचारधारा को जनमानस में गहराई तक प्रवेश करने का कार्य अपने हाथ में लेकर युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया को सफल बनाना चाहिए। जहाँ तक सूखे पत्तों की तरह  उड़ने की बात है हम सब प्रतिदिन देख रहे हैं कि आज के युग में हम में से कितने ही “भटके हुए देवता” की भांति अस्थिरता की बाढ़ में उड़े जा रहे हैं, कभी एक गुरु के पास तो कभी दूसरे  के पास , कभी एक ज्ञानरथ को हांकते हैं तो कभी दूसरे  को। सब कोई गुरुदेव का भांति तो होते नहीं हैं कि दादा गुरु ने आदेश दे दिया तो 24 वर्ष तो क्या अनेकों जन्म ही उनको  समर्पित कर  दिए।     

स्वाध्याय ही सर्वोत्तम सत्संग:

ज्ञान और  सद्ज्ञान में उसी प्रकार का  अंतर् है जो बुद्धि और सद्बुद्धि में है। बुद्धि तो सबके  पास है लेकिन सविता देवता से हम सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। गुरुदेव बताते हैं कि जीवनोत्कर्ष के लिए जिस सद्ज्ञान की आवश्यकता होती है, वह सत्संग से प्राप्त होता है और उपयुक्त सत्संग के लिए आज के समय में  सबसे सरल और  प्रभावशाली उपाय यह है कि स्वाध्याय के माध्यम से सत्पुरुषों का सान्निध्य निरंतर प्राप्त करते रहा जाए। यह कार्य श्रेष्ठ साहित्य द्वारा ही संभव हो सकता है। सद्ग्रन्थों में महापुरुषों के जीवन चरित्र खुले पृष्ठों की तरह सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध हैं। बहुत पूछताछ करने पर जो बातें जानी जा सकती हैं, वे उन जीवन-चरित्रों में सहज ही लिखी मिल जाती हैं। फिर जिन महापुरुषों के प्रवचन जिस विषय पर सुनने हों, जिस शंका का समाधान उनसे प्राप्त करना हो, उसके लिए उनका साहित्य पढ़ लेना चाहिए। इस रीति से हर घड़ी, हर विषय पर हर महापुरुष का सत्संग लाभ घर बैठे ही  हो सकता है। आज के युग में तो यह इस हद तक सरल हो चुका  है  कि  आपको पुस्तक खरीदने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ता, कोई पैसा भी नहीं खर्च करना पड़ता, सब कुछ ऑनलाइन  फ़ोन पर ही उपलब्ध है,आवश्यकता है तो केवल अच्छे इंटरनेट कनेक्शन की। लेकिन इस प्रकार के व्यक्तिगत सत्संग में एक खतरा सदैव  ही रहता है कि उसकी अनुपयुक्त विचारधारा एवं कार्यपद्धति  प्रभावित करके दिग्भ्रांत भी कर सकती है। सत्साहित्य के माध्यम में व्यक्तित्व का दबाव न रहने से उस पर अधिक विचार कर सकने और जो अपने उपयुक्त हो उसे ही स्वीकार करने की सुविधा रहती है। अपने आदर्श एवं लक्ष्य के अनुरूप ऐसे अनेक महापुरुष सत्साहित्य के माध्यम से ढूँढे जा सकते हैं, जिन्होंने  उसी मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त की हो। समीपवर्ती क्षेत्र में तो जो भी विकसित व्यक्तित्व मिलेगा उसकी समीपता ही संभव होगी और यदि उसका चरित्र एवं व्यक्तित्व उत्तम होते हुए भी, मार्ग अनुपयुक्त है तो उससे अवांछनीय गतिविधियों की प्रेरणा भी  मिल सकती है। इस दृष्टि से व्यक्तिगत सत्संग की अपेक्षा, कई बार तो सत्साहित्य के द्वारा प्राप्त किया गया सत्संग अधिक निर्दोष एवं अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है।

कई साधु बाबा त्याग, वैराग्य, तितिक्षा, उच्च शिक्षा आदि की दृष्टि से प्रशंसनीय होते हैं, पर उनमें आलस्य, प्रमाद, कटुवचन, नशेबाजी, भाग्यवाद, कर्त्तव्य-त्याग, अंधविश्वास आदि अनेक दोष भी होते हैं। ऐसे लोग अपने गुणों से लोगों को आकर्षित करके उन्हें अपने दोषों का भी शिकार बना लेते हैं। व्यक्तिगत संपर्क सत्संग में इस तथ्य का बहुत अधिक ध्यान रखा जाता है कि प्रत्येक सज्जन में कुछ दोष भी रहते हैं, उसके विचारों में कहीं-न-कहीं भ्रांति भी रहती है। इसलिए विवेक को प्रधानता देते हुए जिसके पास जितना उपयोगी हो, उससे उतना ही ग्रहण करना चाहिए। इसी प्रकार श्रेष्ठ समझे जाने वाले व्यक्तियों से केवल उतना ही सीखा जाए, जो जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त हो। ऐसा सत्साहित्य मानव जीवन के विकास का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हो सकता है, जो उसे जिंदगी जीने की कला सिखा सके। 

गुण-कर्म-स्वभाव का परिष्कार करते हुए सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रेरणा को “संजीवनी बूटी” कह सकते हैं। यही अमरता प्रदान करने वाला अमृत है, उसी को कायाकल्प करने वाला “पारस” कह सकते हैं और उसी में सच्ची तृप्ति  तथा शाश्वत शांति प्राप्त होने के कारण, उसे “कल्पवृक्ष” भी कहा जा सकता है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि  जिस मनुष्य की  सत्साहित्य में अभिरुचि उत्पन्न हो गई और जो जीवन-निर्माण के सद्ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा, उसका , कल्याण अति निकट है।

पुस्तकें जाग्रत देवता हैं:

हमारे पाठकों ने कई बार नोटिस किया होगा कि शांतिकुंज में या किसी भी आयोजन में साहित्य स्टाल का  कितना महत्व है। इससे भी बढ़कर एक बात यह नोटिस की होगी कि   इन साहित्य स्टॉलों पर आपको साहित्य खरीदने के लिए प्रेरित भी किया जाता है। गुरुदेव ने तो बार-बार कहा है कि किसी भी आयोजन में प्रसाद के रूप में पुस्तकें ही दीं जाएँ। क्योंकि पुस्तकें जीते-जागते ज्ञान के देवता हैं     

अगर हम  अपने जीवन पर दृष्टि डालें तो देखेंगें कि जीवन में कितना कुछ ही खरीदने के लिए तैयार रहते हैं, यहाँ तक कि जिनकी आवश्यकता भी नहीं है उन्हें भी खरीदने में बड़ी शान समझते हैं क्योंकि शॉपिंग करने का आनंद कुछ और ही होता है। परमपूज्य गुरुदेव हमें सावधान करते हुए बताते हैं कि अन्य सामग्री की तरह हमें उत्तम पुस्तकों का संग्रह भी करना चाहिए। जीवन के विभिन्न पहलुओं  पर प्रकाश डालने वाले, विविध विषयों के उत्तम ग्रंथ खरीदने के लिए, खरच के बजट में सुविधानुसार आवश्यक राशि रखनी चाहिए। कपड़े, भोजन, मकान की तरह ही हमें पुस्तकों के लिए भी आवश्यक खरचे की तरह ध्यान रखना चाहिए। स्मरण रखिए उत्तम पुस्तकों के लिए खरच किया जाने वाला पैसा उसी प्रकार व्यर्थ नहीं जाता, जिस तरह अँधेरे बियावान जंगल में प्रकाश के लिए खरच किए जाने वाला धन। एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए;  वह यह कि पुस्तकें कमरे को सजाने के लिए अथवा प्रदर्शिनी लगाने के लिए न खरीदी जाएँ, वरन उनका नियमित अध्ययन जीवन के अन्य कार्यक्रमों की तरह ही आवश्यक अंग बना लेना चाहिए। उनसे अधिकाधिक लोगों को ज्ञान मिले, इसके लिए अध्ययन की प्रेरणा, सुविधा जुटाते रहना चाहिए। पुस्तकों की उपयोगिता अध्ययन से ही है,नहीं तो  वे कीड़ों का भोजन बनने के सिवाय और कोई कार्य नहीं करतीं।  नई पुस्तकें खरीदना, उनका अध्ययन करना, उनको अधिकाधिक उपयोग में लाना ही पुस्तकों की सच्ची कद्र करना है।

पुस्तकों को  जाग्रत देवता इसलिए कहा जाता है कि  उनके अध्ययन, मनन, चिंतन के द्वारा (पूजा) करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है। कई बार तो पुस्तकों के अध्ययन से वही मानसिक शांति मिलती है जो पूजा गृह में पूजा अर्चना से प्राप्त होती है; तो हुई न जागृत देवता।

कई बार अपने सहकर्मियों को पुस्तकों के  पीडीऍफ़ लिंक भेजने से पता चला है कि अभी भी अधिकतर लोग ऑनलाइन के बजाय पुस्तक खरीद कर ही पढ़ना बेहतर समझते हैं। खैर यह तो हर किसी की व्यक्तिगत पसंद है लेकिन गुरुदेव  अच्छे साहित्य के स्वाध्याय पर बहुत ही बल देते हैं।

इन्ही शब्दों के साथ हम अपनी लेखनी को यहीं अल्पविराम देते हैं और कल फिर इसके आगे चलेंगें। 

To be continued:

14 जून 2022, की 24 आहुति संकल्प प्रयास  में अरुण वर्मा जी अपने संकल्प को पूर्ण करते हुए, अकेले ही ज्ञानमशाल को थामे, गुरूसैनिक की भूमिका में आगे ही आगे बढ़ते ही जा रहे हैं।  हम सब भाई साहिब के संकल्प को नमन करते हुए गुरुदेव के चरणों में नतमस्तक होकर  प्रण  लेते हैं कि हम इस प्रकार का शिष्यत्व प्राप्त करके ही दम लेंगें। जय गुरुदेव 

सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद 


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