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मनुष्य को  उत्कृष्ट बनाने  की कोई मशीन नहीं बनी है।

 8 जून 2022 का ज्ञानप्रसाद- मनुष्य को  उत्कृष्ट बनाने  की कोई मशीन नहीं बनी है।

गायत्री नगर के विस्तृत विषय का यह सातवां और अंतिम लेख है। यह विषय इतना विस्तृत और interconnected है कि इसे किसी सीमा में बांधना लगभग असंभव ही है। अगर किसी  जीवनदानी का जीवन भर का रिसर्च अनुभव कैमिस्ट्री  है और गुरुदेव ने उसे ब्रह्मवर्चस में Fume-Therapy पर कार्यरत किया तो उसे साधना का एक्सपर्ट भी होना होगा, देव संस्कृति यूनिवर्सिटी में जाकर रिसर्च भी करने होगी आदि आदि। यही कारण है कि हम इस विषय का यहीं पर समापन कर रहे हैं, लेकिन अपने सहकर्मियों से आशा करते हैं कि जब भी शांतिकुंज जाने का अवसर मिले, अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करें, अधिक से अधिक परिजनों से संपर्क स्थापित करें और प्राप्त हुए ज्ञान का प्रचार- प्रसार अवश्य करें। यही है हमारे परमपूज्य गुरुदेव द्वारा बार-बार की गयी अपील। यह अपील हमने कुछ दिन पूर्व ही शुभरात्रि सन्देश में आप सबके समक्ष रखी थी। 

कल (गुरुवार) का  ज्ञानप्रसाद गायत्री जयंती, गंगा दशहरा और परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण को समर्पित होगा। शुक्रवार को इसी विषय पर एक  वीडियो प्रकाशित की जाएगी और शनिवार तो अपने सहकर्मियों का ही  होता है। 

इसी भूमिका के साथ आप करिये आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान और हम करते हैं आगे की तैयारी।

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मनुष्य को  उत्कृष्टता  के ढाँचे में ढालने की कोई मशीन नहीं बनी है। यह  कार्य तो “प्ररेणाप्रद वातावरण और सुसंस्कारी व्यक्तित्वों” के निजी प्रभाव और संपर्क  से ही सम्भव हो सकता है जो गायत्री नगर में निवास करने वालों को स्वयं ही करना पड़ेगा। आख़िरकार नई creation की बात हो रही है।  ठीक उसी प्रकार  जिस प्रकार ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था,उनकी सर्वश्रेष्ठ creation मानव का अवतरण हुआ था। नव सृजन( New creation) के प्रशिक्षण में इसी बात की प्रमुखता रहेगी। इसलिए अध्यापक ऐसे होने चाहिए जो शिक्षार्थियों को केवल विषय  की जानकारी ही न  दे बल्कि  उन्हें विकसित और  परिष्कृत करा कर  प्रखर प्रतिभाशाली बनाने में  भी योगदान दे सकें।

विद्यार्थी भर्ती करने से पूर्व अध्यापकों  की नियुक्ति करनी पड़ती है, ऐसा  न करने से विद्यालय  एक  अनाथालय बनकर रह जायेगा। गायत्री नगर के विद्यालय के अध्यापक  को छात्राध्यापक की दोहरी  भूमिका निभानी पड़ेगी। वे स्वयं भी पढेंगें और साथ ही  दूसरों को  भी पढायेंगें। गायत्री नगर में बसने के लिए परमपूज्य गुरुदेव  ने उन प्रबुद्ध परिजनों  को आमन्त्रित किया गया  जो “आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण” की दोहरी  शिक्षा साधना साथ-साथ करने में रुचि रखतें हों।  यह ऐसे साधक थे जिन्हें सच्चा स्वार्थ साधने और सच्चा परमार्थ करने में उत्साह हो। बड़ी कक्षाओं के छात्रों में से कितने ही ऐसे भी हाते हैं जो छोटी कक्षाओं के छात्रों को  पढ़ाने की व्यवस्था बनाकर अपना काम चलाते हैं। गायत्री नगर में बसने वाले अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठने के लिए अपने स्तर की प्रगति करगें। 

गायत्री नगर को धरती पर स्वर्ग  के अवतरण का एक छोटा नमूना  बनाया जा रहा है। उसके निवासी  मनुष्य मे देवत्व के उदय की सम्भावना को अपने निजी व्यक्तित्व में प्रकट करने का प्रयास करेंगें और  वसुधैव कुटुम्बकम् की  आदर्शवादिता को चरितार्थ करने के लिए भिन्न भिन्न  गतिविधियो को अपनाएंगें । गायत्री नगर में  शिक्षार्थियों  और निवासियों  को लाभान्वित कर सकने वाला प्रेरणाप्रद वातावरण मिलेगा । इन्ही तथ्यों  को उजागर करने के लिए गायत्री नगर को युग चेतना उभारने की एक सशक्त प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। उसे सफल बनाने मे छात्रों से भी अधिक योगदान उनका होगा जो इसमें  तथा उपरोक्त प्रयोजनों के  प्रति सतत  सलग्न रहेंगे।

गायत्री नगर में निवास करने वाले तथाकथित सेवानिवृत वैरागी कहे जाने वाले लोग  आलसी,निकम्मों  जैसा जीवन नहीं जिएँगें  वरन् मोहग्रसित  लालचियों से भी अधिक पुरुषार्थ करते दृष्टिगोचर होंगे। सामान्य परिश्रमियों और व्यस्त लोंगों में और गायत्री नगर के  निवासियों में केवल इतनी ही  भिन्नता  होगी कि उनकी गतिविधियाँ उच्चस्तरीय उद्देश्यों के साथ जुड़ी हुई होंगी जबकि मूढ़मति  और स्वार्थी लोग पल पल पिसते और पिघलते  रहते है।

शान्ति का अर्थ यदि कर्महीनता  और निराशा होता है तो समझना चाहिए कि शान्तिकुँज में वैसा कुछ भी नहीं है। वैसी परिस्थितियाँ कहीं  सदावर्त चलने वाले विरक्त निवासों में ही ढूँढनी चाहिए। एकाध घंटा उलटा-पुलटा जप-ध्यान करने के उपरान्त सारा  दिन आलस में पड़े रहने या मटर गश्ती में इधर-उधर घूमते रहने का अवसर ढूँढने वालों को कोई अन्य आश्रम ढूँढना चाहिए। शान्तिकुँज में अशान्ति से जूझ कर शान्ति की विजयश्री धारण  के निमित प्रबल पुरुषार्थ करने की ही योजना बनाई गयी  है। यहाँ हर किसी को आने की तैयारी करनी चाहिए। गुरुदेव ने तो इससे भी आगे कहा है। शांतिकुंज में केवल पर्यटक की भांति आकर, चक्कर लगा कर, फूलों और फव्वारों के आगे सेल्फी शूट करके कुछ नहीं प्राप्त होने वाला। यहाँ के वातावरण को अनुभव करने के लिए, दिव्य vibrations को अपने अंदर धारण करने के लिए यहाँ आकर कुछ दिन रहना चाहिए तभी सही मायनों में तीर्थ-पान हो सकेगा। तीर्थ-पान  शब्द अमृतपान की तरह है। हम कई बार कह चुके हैं कि दैनिक ज्ञानप्रसाद का अमृतपान तभी लाभदायक होगा जब इसका एक-एक शब्द आपकी अंतरात्मा में उतरता जायेगा। यह कोई साधारण साहित्य या पुस्तक नहीं है, हमारे गुरुदेव के करकमलों से रचित युग  साहित्य है। गुरुदेव की ही प्रेरणा और मार्गदर्शन से हम इस साहित्य को अधिक से अधिक सरल करने का प्रयास करते हैं।    

गुरुदेव बताते हैं कि  आत्मोर्कष ( Self-gratification)  के लिए एक प्रयत्न  से काम नहीं चलता।  आत्मोर्कष का थोड़ा सरल शब्द आत्म-संतुष्टि, आत्म संतोष कहा जा सकता है।     उसके लिए चार उपाय अपनाने पड़ते हैं।  1. साधना, 2 स्वाध्याय, 3. संयम और 4. सेवा। इन चार उपायों को चारपाई के चार पाये,  कमरे के चार कोने, धरातल की चार दिशाएँ, किसी  धर्म के चार आश्रम, किसी  संस्कृति के चार वर्ण कहना चाहिए।  इन्हीं चार पुरुषाथों के परिणाम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के रुप में फलित होते है। इन्हीं चारों को मन, बुद्धि, चित्त अहंकार बनाकर  अन्तःकरण  में बोया उगाया जाता है। साधना, स्वाध्याय, समय और सेवा की चतुविधि आत्मोत्कर्ष  प्रक्रिया हर किसी  के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक हैं। मात्र भजन  करना अधूरा है। गायत्री नगर में रहने वाले सभी निवासियों को यही रीति-नीति  अपनानी होगी और इस रीति-नीति से पैदा होने  वाले  वातावरण  तथा उससे प्राप्त होने वाले लाभ को समझना होगा।  

जीवित रहने के लिए अन्न, जल, साँस एवं निद्रा की आवश्यकता पड़ती है, कृषि के क्षेत्र  में भूमि, बीज, सिंचाई और  रखवाली अभीष्ट है। इमारत खड़ी करने में ईंट, चूना, लकड़ी और  लोहा चाहिए। व्यवसाय में सफलता के लिए पूँजी, श्रम, अनुभव और  खपत के चार साधन जुटाने पड़ते है। आत्मकल्याण मात्र भजन से नहीं हो सकता। बीज की तरह वह प्रमुख तो है लेकिन पर्याप्त नहीं। जीवन को परिष्कृत करने की साधना पर जिन्होंने  ध्यान नहीं दिया और केवल  भजन ही  करते रहे, उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा है। साधना overall  होनी चाहिए, एकाँगी साधना  से उसकी सफलता  संभव  न हो सकेगी। गायत्री नगर के निवासियों को यह तथ्य भली प्रकार समझना होगा और यह मान कर ही यहाँ आने का निर्णय करना होगा कि यहाँ उन्हें अपनी शारीरिक और  मानसिक स्थिति के अनुरुप प्रत्यक्ष एवं परोक्ष पुरुषार्थ में निरन्तर कार्यरत  रहना होगा।

गायत्री उपासना गौ-दुग्ध की तरह परिपूर्ण आहार है। परिपूर्ण आहार होने के बावजूद सभी को (बच्चों और वृद्धों) एक जैसा तो नहीं दिया जा सकता। किसी को पानी डाल कर देना पड़ता है तो किसी को घना करके।  गायत्री उपासना सभी के लिए एक जैसी तो नहीं है न।  किसे किस स्तर की, किस प्रकार की  गायत्री उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी तो सोच समझ कर, परीक्षण के बाद ही  दी जाती है। उसकी मात्रा तथा सेवन विधि में  भी अन्तर रहता है। सामान्य क्रम तो सभी के लिए एक ही है परन्तु  अगली सीढ़ियों  पर चढते ही आवश्यकता  अनुसार  अन्तर होने लगता है। इस तथ्य को समझने के लिए एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण दिया जा सकता है जो इस प्रकार है। प्राथमिक पाठशालाओं में हर जगह  एक ही तरह  की पढ़ाई  करवाई जाती  है लेकिन  जैसे-जैसे विद्यार्थी ऊँची कक्षाओं में पहुँचता है, उन्हीं विषयों को  गहराई में जानने की आवश्यकता महसूस होती। अधिक विस्तृत जानने के लिए अधिक, परिश्रम और अभ्यास करना पड़ता है। मैट्रिक तक तो कितने ही विषय पढ़ाये जाते हैं, कॉलेज में विषय कम रह जाते है, यूनिवर्सिटी में केवल एक ही विषय रह जाता है और रिसर्च डिग्री प्राप्त करने के लिए उसी एक विषय का एक टॉपिक रह जाता है। ऐसा विधान इसलिए बना हुआ है कि  किसी एक ही टॉपिक पर  प्रवीणता यानि स्पेशलाइजेशन  प्राप्त करनी होती है उसी में  पारंगत होना पड़ता है। यही बात साधना के सम्बन्ध में भी कही जाती है। आरम्भ में जप, ध्यान की सामान्य उपचार प्रक्रिया बाल कक्षा की तरह सभी कर सकते है लेकिन  इसके बाद छात्रों की रुचि एवं स्थिति के अनुरुप अध्ययन क्रम  बदला जाता है।

गायत्री नगर में उपासना पद्धति सामान्य भी होगी और विशिष्ट भी। आश्रम की सामान्य साधना पद्धति एक होते हुए भी हर साधक को अपने स्तर का विशिष्ट साधनाक्रम अलग से बताया और कराया जायेगा। अल्पकाल में सामान्य दिनचर्या, नियम, मर्यादा, विधि-व्यवस्था एक रहते हुए भी हर रोगी का उपचार एवं निर्धारण अलग-अलग रहता है। यही नीति उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्मदर्शी  मार्गदर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त रहेगा। कहते हैं  कि सही निदान (diagnosis ) हो जाने से चिकित्सा का उद्देश्य पूरा हो जाता है इसीलिए डॉक्टर कोई भी इलाज करने से पहले X-ray, ultrasound, blood test करने की सलाह देते हैं। गायत्री नगर में अगर साधकों का परीक्षण न हो तो  सभी साधकों को एक ही लाठी से हांकने जैसा कहा जा सकता  है। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।  गायत्री नगर में बसने वाले साधकों को अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरुप साधना का मार्ग दर्शन ही नहीं बल्कि अवसर भी मिलेगा।

समापन इति श्री

हम अपनी लेखनी को यहीं विराम देने की आज्ञा लेते हैं और कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव। 

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7 जून 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1) संध्या कुमार-25  , (2 ) अरुण वर्मा -24     

इस सूची के अनुसार दोनों ही  गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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