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गायत्री नगर प्रयोगशाला की कार्यशैली

7  जून 2022 का ज्ञानप्रसाद- गायत्री नगर प्रयोगशाला की कार्यशैली

गायत्री नगर शांतिकुंज हरिद्वार पर आधारित लेख श्रृंखला का यह छटा लेख है। सभी लेखों में यही प्रयास किया गया है कि इस युगतीर्थ में आने वाले प्रत्येक साधक को इसका वास्तविक रूप और उदेश्य से जानकार करवाया जाये। शांतिकुंज में लाखों-करोड़ों की संख्या में साधक जा चुके होंगें, आज भी जा रहे हैं और भविष्य में भी जाते रहेंगें। पिछले कुछ दिनों में ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के भी कुछ साधक शांतिकुंज गए और उन्होंने अपने संस्मरण हमें भेजे जो जल्दी ही आपके समक्ष प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इस प्रस्तुति का उदेश्य भी यही है कि युगशिल्पी गढ़ने की इस टकसाल को कोई साधारण कारखाना न समझा जाए और साधक एक पर्यटक की भांति भर्मण का उदेश्य लेकर ही इस टकसाल में आये। केवल हरिद्वार में ही हज़ारों तीर्थ स्थल और आश्रम होंगें, सभी बहुत ही आदरणीय और सम्मानीय हैं लेकिन गायत्री नगर में ऐसी कौन सी uniqueness है जिसके कारण हम सब आकर्षित हुए जाते हैं और हमारे परमपूज्य गुरुदेव आग्रह करते हैं यहाँ आकर कुछ दिन आवास किया जाये। सभी लेखों का आधार इतना विशाल और विस्तृत होता है कि compilation और सरलीकरण करना बहुत जटिल होता है।

आज की संकल्प सूची से देखा जा सकता है कि आदरणीय रेणु बहिन जी की अपील का प्रभाव हुआ है। हमने भी काउंटर कमेंट करते लिखा था कि इस प्रक्रिया को ऐसा वैसा न समझा जाये ,यह बहुत ही शक्तिशाली tool है। 

गायत्री जयंती ,गंगा दशहरा और परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण तीनों पावन पर्व एक ही दिन शुक्रवार को आ रहे हैं। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी हमारी प्रस्तुति (लेख, वीडियो) स्पेशल ही होने वाली है लेकिन सहकर्मियों से इस दिशा में भी योगदान की आशा की जाती है। तो आइए अब मंगलवेला में ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें ताकि आप सारा दिन ऊर्जावन रहें। 

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अपने पिछले लेख में हमने वातावरण की बात करते हुए परिवार बसाने को उद्यान लगाने की प्रक्रिया जैसा कहा था। परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री नगर की स्थापना कर दी, वहां जागृत आत्माएं बसा दीं, उन्हें दैनिक प्रक्रिया, कार्यशैली भी प्रदान करा दी लेकिन क्या इसी से काम चल जायेगा, क्या यह इतना सरल है ,कदापि नहीं। समय समय पर मूल्यांकन करना बहुत ही आवश्यक है। यही है युगतीर्थ शांतिकुंज में चल रहे सत्रों, उद्बोधनों, अन्य अनेकों कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि जिसकी तुलना उद्यान में से झाड़-झंखाड़ उखाड़ने की प्रक्रिया से की जा सकती है। 

गुरुदेव हम सबको सावधान करते हुए कहते हैं 

“वसुधैव कुटुम्बकम्” का उद्घोष बनाये रहने से काम नहीं चलेगा। इस उद्घोष को कब तक मधुर कल्पना तक सीमित रखे रहा जायगा। स्वप्नों के कल्पना चित्र भी छाप छोड़ते और संवेदना उभारते देखे जाते हैं, परन्तु वे प्रत्यक्ष में न उतरने के कारण अविश्वस्त और निरर्थक समझे जाते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् के महान् आदर्श में ही उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं सन्निहित हैं। एकता और ममता के

ईंट-गारे से ही नवयुग के भवन की चिनाई की जाएगी, इसलिए उस प्रतिपादन को प्रत्यक्ष करना होगा। योजनाएँ स्वप्न की भांति ही होती हैं। दोनों में अंतर् इतना ही रहता है कि योजनाओं की उपलब्धि के लिए साधन जुटाने की संभावनाओं को ढूँढ़ते रहते हैं जबकि स्वप्नों में वैसा कुछ नहीं होता। 

वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वप्न चिरकाल से देखे जाते रहे हैं और उनकी पूर्ति में उज्ज्वल भविष्य का रगींन चित्र दर्शाया जाता रहा हैं। अब एक कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। रात्रि स्वप्नों और दिन के स्वप्नों में जो अन्तर होता है उसे समझने की आवश्यकता है । रात्रि स्वप्न कल्पना क्षेत्र में अविज्ञात से आते और अनन्त की ओर उड़ते चले जाते हैं । उनके कोई सिर पर नहीं होते, किन्तु दिन स्वप्नों के पीछे कार्य करने की संगति होती है। उनके पीछे क्रमबद्ध योजना बनती है और साधन जुटाने की तत्परता रहती है। वसुधैव कुटुम्बकम की आदर्शवादिता को अब स्वप्न लोक से नीचे लाने और व्यवहार में उतारने का समय आ गया है। 

गुरुकुलों, आरण्यकों और तीर्थ कल्पों की गरिमा गाथा का बखान यदि सच्चे मन से होता है तो उसमें एक कड़ी और जुड़नी चाहिए,त्रिवेणी के पुनर्जागरण की, पुनर्जीवन की। गंगा का आस्तित्व तो पहले भी था लेकिन वह स्वर्ग लोक में था। उसे प्रयत्नपूर्वक भागीरथ ने धरती पर उतारा। 

मानवी काया में शैतान भा रहता है और भगवान भी। परिस्थितियां उसे हैवान बनाये रहती है किन्तु अनुकुलता मिलने पर उसका इन्सान भी प्रकट एवं प्रबल हो सकता है। युग सृजन में इसी प्रयास की आवश्यकता है।

इसी दूरदर्शी चिन्तन ने, समय के इसी दबाव ने गायत्री नगर बनाने को प्रेरणा दी और इस इमारत का काम चलाऊ अशं बनकर तैयार भी हो गया हैं। अब उसमें इतनी जगह हो गई है कि मन मसोस कर न बैठा जाय। जो करना है उसके लिए कुछ कर सकने के लिए कदम बढ़ाया जाय। देवालय, धर्मशाला बनाने की बात न कभी सोची गई और न सोची जा रही है। धनी लोग यश लिप्सा या पुण्य लूटने की दृष्टि से बड़े बड़े भवन बनाते रहते हैं। जितनी तेजी से, जितनी संख्या में और जिस विशालता के साथ ऐसे भवन बन रहे हैं, उन्हे देखते हुए कई बार तो यहाँ तक सोचना पड़ता हैं कि वस्तुतः इनकी आवश्यकता है भी या नहीं। कहीं निर्माण सामग्री और भूमि का अपव्यय तो नहीं हो रहा है। 

गायत्री नगर बनाते समय इस प्रकार का अन्धानुकरण कभी कल्पना में भी नहीं आया। इसके निर्माण के पीछे एक सुनिश्चित योजना रही है। इसी प्रेरणा से इसके साधन जुटाने में ऐड़ी-चोटी श्रम किया गया है। गायत्री नगर एक प्रयोगशाला है जहाँ व्यक्तित्व ढालने का प्रयोग निरंतर चल रहा है। यह पंक्तियाँ उन परिजनों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य कर सकती है जिन्होंने शांतिकुंज को एक धर्मशाला, आश्रम या उनसे मिलता जुलता रूप समझा होगा। आदर्श व्यक्तित्वों को दिशाधारा दे सकने योग्य वातावरण बनाने की दृष्टि से ही इस निर्माण को हाथ में लिया गया। पहला कार्य था ढांचा खड़ा करने का जो थोड़ा बहुत खड़ा हो गया है, अब दूसरा कदम- देव परिवार बसाने का उठाना है। युग मन्च से एक गीत आरम्भ से ही गाया जाता रहा है :

“नया संसार बनायेंगे, नया इन्सान बनायेंगे। नया भगवान बनायेंगे, नया परिवार बसायेंगे”

युग सृजन ( Era creation) के पीछे इसी फिलॉसोफी को क्रियान्वित करने की आकाक्षएँ उफनती और छोटी-बड़ी योजनाएँ बनती आई हैं। अब वह समय आ गया कि इन योजनाओं को साकार और गतिशील बनाया जाय।

गायत्री नगर में क्या किया जाना है। इसकी योजना और, घोषणा पिछले दिनों संक्षिप्त रुप से बताई जाती रही है। उसे युग शिल्पियों का प्रशिक्षण संस्थान बनाना है, बौद्ध विहारों और संधारामों जैसा। बौद्ध विहार और संघाराम,यह दोनों नाम बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए प्रयोग किये जाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किलोमीटर दूरी पर स्थित सिरपुर में विश्व के सबसे बड़े बौद्ध स्थल के प्रमाण मिले हैं जिसमें 10 बौद्ध विहार हैं। चीनी यात्री ह्यूनसांग ने अपने लेखों में इन बौद्ध विहारों में लगभग 10000 बुद्ध भिक्षुओं के अध्ययन के प्रमाण दर्ज़ कराए हैं। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि हमें उतने विशाल निर्माणों का अवसर तो नहीं मिला परन्तु गायत्री तपोभूमि मथुरा को संधाराम एवं गायत्री नगर, शांतिकुंज हरिद्वार को बुद्ध विहार के अनुकरण कर सकने योग्य बनाया गया है। हम चाहते हैं कि जीवनदानियों के इलावा युग शिल्पी बार- बार यहाँ आते रहें और आत्मनिर्माण तथा लोकनिर्माण की दो-पक्षीय प्रक्रिया का क्रियान्वित करने का अभ्यास करते रहें। हमने ऐसा सिलेबस बनाया है कि एक-एक महीने के साधना एवं शिक्षण के बहुमुखी प्रशिक्षण सत्र यहाँ चलते रहें। जो साधक अधिक समय ठहरना चाहेंगे उनके लिए वैसी सुविधा भी रहेगी। 

युग सृजन बहुत बड़ा काम है, आखिर एक नया युग जो create करना है, उसकी जटिलताओं को देखते हुऐ उसी के अनुरूप प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक हैं। डाक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, कलाकार आदि को अपने विषय में trained और expert कहलाने के लिए कई-कई वर्ष का प्रशिक्षण एवं अनुभव प्राप्त करना पड़ता है तो कोई कारण नहीं कि युग सृजन के समुद्र मन्थन जैसे महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक अनुभव एवं अभ्यास की आवश्यकता न पड़े। 

गायत्री शक्ति पीठों का चलाना रेलगाड़ी चलाने से भी अधिक पेचीदा है। संचालकों में स्तरीय प्रवीणता न हो तो वह बहुमूल्य प्रयास निरर्थक बनकर रह जायगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए और आवश्यकता को समझते हुए, सृजन शिल्पियों की बहुमुखी शिक्षा व्यवस्था का कार्यक्रम बनाया गया है। यह तो हुई प्रत्यक्ष क्रिया-प्रक्रिया। इससे भी पहले सोचने की बात यह है कि यहाँ आने वाले छात्रों को पढ़ायेगा कोन? यह प्रश्न सरल भी है और कठिन भी। सरल इस अर्थ में कि अन्य विद्यालयों की तरह निर्धारित पाठ्यक्रम को पूरा करा देने वाले अध्यापक आसानी से मिल सकते हैं। अगर पेचीदा मशीनों को चलाने, बनाने, सुधारने की कला कुछ ही समय में दिखाई जा सकती है, सिखाई जा सकती है तो युग सृजन जैसी सीधी-सादी पाठ्यविधि को पूरा कराने में क्या कठिनाई हो सकती है। किसी भी अध्यापन स्तर के व्यक्ति को निर्धारित विषयों का अभ्यास कराकर, पढ़ने में एक्सपर्ट किया जा सकता है। इस दृष्टि से यह कार्य नितान्त सरल है लेकिन दूसरी दृष्टि में यह कठिन है क्योंकि इस शिक्षण प्रक्रिया में छात्रों के व्यक्तित्व को “ढालना” भी सम्मिलित है। छात्रों के निजी चिन्तन, स्वभाव एवं क्रिया-कलाप में ऐसा परिवर्तन लाना है कि वे सम्पर्क क्षेत्रों में दूसरों को ढाल सकने वाले साँचे की भूमिका भी निभा सकें। सही ढलाई के लिए कुशल कारीगरों के अभ्यस्त हाथ तथा अनुभवी मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। जो शिक्षार्थी गायत्री नगर में आयेगे उन्हें प्रवक्ता अध्यापक बनाना होता तो निश्चय ही यह बहुत सरल था। कला सीखना और सिखाना कठिन नहीं है, पर व्यक्तित्वों को ढालने और बदलने का कार्य, हीरा तराशने और खरादने जैसा कठिन कार्य है। शिक्षार्थी (learner) साँचा और डाई बन सके तो ही उनके शिक्षण की सार्थकता है नहीं तो आवश्यक जानकारी पत्रिकाओं में छपते रहने वाले लेख ही करा देते हैं। उतने भर के लिए किसी को समय और धन खर्च की आवश्यकता क्यों पड़े। 

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को कल तक के लिए विराम देते हैं। 

क्रमशः जारी:

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6 जून 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1 )सरविन्द कुमार-25, (2) संध्या कुमार-25, (3)अरुण वर्मा-38, (4 ) रेणु श्रीवास्तव-27, (5) प्रेरणा कुमारी-24 

इस सूची के अनुसार अरुण वर्मा जी गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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