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गायत्री नगर चरम पराक्रम के लिए आधुनिक कुरुक्षेत्र 

2 जून 2022 का ज्ञानप्रसाद -गायत्री नगर चरम पराक्रम के लिए आधुनिक कुरुक्षेत्र 

गायत्री नगर पर आधारित लेखों की श्रृंखला का यह चतुर्थ लेख है।  फरवरी, मार्च, अप्रैल 1980 की अखंड ज्योति के अध्ययन के उपरांत compile की गयी इस लेख श्रृंखला की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गायत्री नगर में जीवनदानियों को आमंत्रण करना, उन्हें बसाना एक अद्भुत कार्य था। आधुनिक युग में  इंटरनेट ने तो information के प्रचार-प्रसार में एक विस्फोट सा कर दिया है लेकिन जिस समय की हम बात कर रहे हैं, अखंड ज्योति ही एकमात्र साधन था। कई बार तो डिस्पैच हो रही प्रतियों को रोककर नई जानकारी शामिल की जाती थी। लेकिन परमपूज्य गुरुदेव  तो ठहरे युगदृष्टा, उनकी कार्यशैली को तो कोई ही समझ सकता था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि अधिक से अधिक लोगों तक जानकारी पहुंचे, अखंड ज्योति के कई अंकों में, कई महीनों  तक प्रसारण होता रहता था।  पढ़ने वाले को लगता था कि यही जानकारी बार- बार प्रसारित हुए जा रही है।  हमारे पाठकों को भी शायद ऐसा ही लगे लेकिन प्रयास किया है कि repetition कम से कम हो। 

कल वाले ज्ञानप्रसाद में आप प्रेरणा बिटिया द्वारा प्रकाशित ऑडियो बुक का अमृतपान करेंगें।  गुरुदेव की प्रथम  हिमालय यात्रा के एक अंश का वर्णन करती यह ऑडियो बुक पूर्णतया दिव्य है। बिटिया के अथक प्रयास को तो नमन है ही ,हम भी प्रयत्न करेंगें कि best ही प्रस्तुत करें।  

तो प्रस्तुत है प्रातः की मंगलवेला में दिव्यता का स्वरूप आज का ज्ञानप्रसाद :       

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अप्रैल 1980 की अखंड ज्योति में परमपूज्य गुरुदेव बता रहे हैं कि हमें  उन कारीगरों की आवश्यकता पड़ रही है जो “ढिलाई का कारखाना” चलाने  की बहुमुखी आवश्यकताएं पूर्ण कर  सकें। गुरुदेव एक ऐसे कारखाने की बात कर रहे हैं जहाँ व्यक्तित्व गढ़े जायेंगें, उच्चस्तरीय प्रतिभाओं को गढ़ा और तराशा जायेगा। गुरुदेव बात कर रहे हैं एक ऐसे विद्यालय की  जिसमे मात्र क्लास चलाने वाले प्रवक्ताओं से काम नहीं  चल सकेगा। यहाँ ऐसा तो है नहीं कि Notes  लेने वाले और रट्टा लगाने  वाले छात्र  इस पाठशाला में पढ़ने के लिए  आने वाले हैं । अगर ऐसी दशा होती तो  थोड़ा सा पैसा खर्च करके मार्किट में से कहीं से भी नियुक्ति की जा सकती थी। बाज़ार  में  हर स्तर की प्रतिभएँ  मौजुद हैं। मर्जी का माल मिलने में कहीं भी, किसी को भी  कोई कठिनाई न होती। लेकिन बात गायत्री नगर की   है जहाँ  व्यक्तित्वों को ढालने एवं परिष्कृत करने का काम है। उसके लिए अध्यापक एवं कारीगर भी स्पेशल skills वाले ही होने चाहिए और उन्हें यहीं का होकर रह जाना  है ,आजीवन बस जाना है, एक देव परिवार की तलाश है।

गायत्री नगर में साधक और साध्य का समान हित :   

गायत्री नगर में देव परिवार बसाने  की बात क्यों  कही गई ? इस आमन्त्रण, आहवान की आवयश्कता किस  लिए पड़ गई ? इसका उत्तर ऊपर की  पंक्तियों से मिल जाना चाहिए। इस आहवान की पूर्ति में “साधक और साध्य दोनों का समान हित है। साधक वे जो इस सृजन सेवा में संलग्न होंगें। साध्य  वह जिसे नव सृजन का पुण्य प्रयोजन कह सकते हैं। जो बसेंगे वे अध्यापक का स्वार्थ और परमार्थ के समन्वय का, ढलने और ढालने का दुहरा लाभ प्राप्त कर सकेंगे। ऐसा लाभ जो आज की परिस्थिति मे अन्यत्र कदाचित ही कहीं, किसी को मिल सके। आत्मोर्कष की ऐसी व्यावहारिक और उच्चस्तरीय व्यवस्था कहीं और जगह ढूंढ  सकना लगभग असंभव ही है। विवेकवानों को ऐसी सर्वागीण उपयुक्तता कदाचित ही कहीं मिल सके। साध्य का हित  भी इसी में है कि भावनात्मक दृष्टि पर वह  ऊँचे स्तर के लिए अध्यापन का काम करें। स्पष्ट है कि यह “अध्यापन वाणी से कम और  व्यवहार से अधिक” होगा। वातावरण किसी स्थान के निवासियों की गतिविधियों से ही बनता है। इस प्रयास में उच्च शिक्षकों  को नहीं बल्कि उच्च चरित्रवानों की आवश्यकता पड़ेगी। इस स्तर के व्यक्ति बाज़ार  में नहीं मिल सकतें। अखण्ड-ज्योति की प्रेरणाओं को जो हृदयंगम करते रहे है, जिनने उसके प्रतिपादनों का गम्भीरता पूर्वक अवगाहन किया है, वे ऐसा अवसर प्राप्त करने के  इच्छुक भी  होंगे जिससे गतिविधियों में, आदतों  में सम्मिलित कर सकना सम्भव हो सके। वस्तुतः इस स्तर के लोग ही प्रस्तुत आहवान को स्वीकार कर सकेंगे और वे ही सफल  सिद्ध भी  होंगे।

गायत्री नगर में बसने वालों को अपनी दिनचर्या में साधना, स्वाध्याय संयम और सेवा के चारों तत्व समन्वित रखने होंगें। आत्मोर्कष की सच्ची साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समुत्रत करने का उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधनाक्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है, न ही  सुनिश्चित क्रम चलता है। जिन लोगों को उचित “श्रम साधना” करने में कोई आपत्ति न हो,वह  अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर में निवास करके समुचित संतोष पा सकेंगे। अगर पूर्णतया की दृष्टि से देखा जाये  तो वह  केवल  भगवान ही  हैं। अपूर्णता के कुछ अंश तो हर व्यक्ति और हर स्थान में कुछ न कुछ पाये ही जायेंगे।

जिस प्रशिक्षण के लिए गायत्री नगर बनाया गया है  उसमें सबसे अधिक प्रभावी तत्व एक ही होगा और वह है  “प्रेरणाप्रद वातावरण”। यह वातावरण जलवायु पर, निवासियों की मान्यताओं, भावनाओं  और गतिविधियों पर निर्भर है। वातावरण प्राकृतिक दृश्यों की  सुविधा एवं आकर्षक कार्यक्रमों को नहीं कहते। वह द्रश्य नहीं अद्रश्य होता है। किसी स्थान के  निवासियों के  चिन्तन एवं व्यवहार में जितनी उतकृष्टा घुली  रहेगी उसी अनुपात में वहाँ का वातावरण  बनेगा और उसी से  प्रेरणाएँ भी उभरेंगीं। उत्कृष्ता  की दिशा में चलना, धकेलना एवं उछलना इसी  आधार पर सम्भव होता है। अवांछनीयताओं के परिशोधन का नाम ही उत्कृष्टता  है। वह कहीं भंडार की तरह जमा नहीं होती वरन् अस्वच्छता से, अव्यवस्थता से, अहर्निश जूझने के फलस्वरुप पुण्यफल की तरह उपलब्ध होती है। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व ही रीति-नीति अपनाते हैं  और वातावरण बनाते हैं, इसी ऊर्जा के सहारे अविकसितों को विकसित होने का अवसर मिलता है। प्ररेणा इसी प्रवाह से मिलती है। प्रमुखता परोक्ष की रहती है। प्रत्यक्ष प्रशिक्षण तो दिनचर्या को सही रखने और आवश्यक जानकारी देने भर का प्रयोजन पूरा करता है। गायत्री नगर में बसने वाले उपरोक्त दोनों प्रयोजन पूरे करेंगे। उनकी साधना आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों पहियों के प्रगति पथ पर सवार होगी और वेगवान  गति से आगे बढ़ेगी। अध्ययन और अध्यापन के अनेक प्रकार हैं । लेखन, पत्र व्यवहार, प्रचार, जनसंपर्क, प्रवचन आदि क्रिया-कलापों को इस अध्यापन कार्य के अंतर्गत  ही गिना गया है। शारीरिक श्रम के रुप में की गई अन्यों को प्ररेणा देने वाली गतिविधियां  भी इस समग्र अध्यापन के अर्न्तगत ही आती है। इन बहुमुखी प्रयोजनों को गायत्री नगर में बसने वाले अपनी सुनियोजित दिनचर्या के आधार पर संतुलित  रुप से सम्पन्न करते रहेंगे। फलतः आश्रमवासी तथा शिक्षार्थी दोनों ही एक दूसरे से समुचित लाभ उठाते रहेंगे। आश्रम वासी शिक्षार्थियों के सहारे अपने कौशल को अपडेट करते रहेंगें। 

गायत्री नगर में बसने के लिए उन्हें बुलाया जा रहा है। जो केवल  सीखने की स्थिति में ही न हों  बल्कि कुछ  सिखा भी सकें। जो केवल  पाने के ही इच्छुक न हो, कुछ देने में भी समर्थ हों । ऐसे लोगों को आमंत्रण दिया जा रहा है जिनमें नव सृजन की पात्रता बढ़ाने और योगदान देने की उत्कृष्टता  भी जीवन्त हो। गायत्री नगर असफल जीवन से छुटकारे का आश्रय स्थल न होकर,चरम पराक्रम के लिए एक आधुनिक कुरुक्षेत्र  है। एक ऐसा कुरुक्षेत्र जहाँ  अर्जुन भी चाहिए, और अभिमन्यु भी। आप सब अपनेआप  को टटोल कर देख लें, जिनमें जीवन-शक्ति  हो वे ही गायत्री नगर में आकर बसने की बात सोचें। मृतकों का बोझा यहाँ कोन ढोयेगा ?

कल वाले लेख में गायत्री नगर में बसने की चयन प्रक्रिया के बारे में लिखा था, आज  उसे  संक्षेप में summarize करके लिख रहे हैं।  

1.आरम्भिक दिनों में उन्हें प्राथमिकता दी जायेगी जिनके पास निर्वाह की अपनी आर्थिक सुविधा विद्यमान है और जो  संचित पूँजी से  अपना गुज़ारा  कर सकें। इसमें मिशन की दुर्बल  स्थिति पर बोझ भी नहीं बढ़ेगा  और साथ ही साधकों की निस्वार्थ परमार्थ परायणता का प्रभाव भी दिखेगा । 

दूसरा  उनका नम्बर आता है, जिनके पास अपनी व्यवस्था में थोड़ी बहुत ही कमी पड़ती है। उसकी पूर्ति मिशन द्वारा हो भी  सकती  है। 

तीसरा  उनका नम्बर है जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जिन्हें अपना ब्राह्मणोचित निर्वाह ही उपलब्ध करना है। 

प्राचीन काल में ब्रह्मचारी और वानप्रस्य ही अध्यात्म क्षेत्र में उतरते थे और जन कल्याण के  मार्ग पर चलते थे। गृहस्थ लोग  परिवार पालते  थे और उसी में से यथासम्भव लोकमंगल के लिए समय तथा साधनों का अशंदान करते थे। अंशदान  करने वाले आर्थिक दृष्टि से जितने हल्के  होंगे उतना ही उनके लिए तैरना और दौड़ना सरल पड़ेगा।

ऐसे पति जिनकी  पत्नियां  भी कधे से कंधा  मिला कर अपनी योग्यतानुसार श्रम करने में तत्पर हैं इस कार्य मैं बहुत योगदान दे सकते  हैं।  गुड़िया बन कर बैठी रहने वाली पत्नियों का भार स्वयं ही  अखरने लगेगा। जिन परिवारों के ऊपर  बच्चों का उत्तदायित्व है, जिनकी प्रजनन प्रक्रिया अभी जारी है,जो शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से जरा-जीर्ण अस्त-व्यस्त हो चुके हैं ,वे सृजन सैनिकों की घुड़दौड़ में सम्मिलित होने और साथ दौड़ने में असमर्थ सिद्ध होगें।

जिन्हें प्रशिक्षण का, जन संपर्क  का, व्यवस्था का अभ्यास है, जो अनुशासन के अभ्यस्त  हैं, जिन्हें चिन्तन और स्वाध्याय में रस आता  है, जिनके स्वभाव में कटुता नहीं, जो निन्दा करने के स्थान पर सुझाव या सुधार के आधार प्रस्तुत कर सकते हैं, ऐसी रचनात्मक प्रवृति ही यहाँ उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हे  निन्दा भर्त्सना में ही रस आता है, ऐसे नेगेटिव  प्रकुति के व्यक्ति यहाँ खप नहीं सकेंगे। हमारा  लक्ष्य सृजन ( creation)  है न कि युद्ध और तोड़ फोड़ ।

गायत्री नगर में बसने के लिए आरम्भ में प्रयोगात्मक रुप से ही आना चाहिए। न्यूनतम चार महीने  की बात सोच कर आया जाय। इतनी अवधि गुजर जाने के बाद ही यह निश्चय किया जाय कि स्थायी रुप से रहना है या नहीं। अनुकुलता और उपयुक्त्ता के आधार पर ही स्थायी नियर्ण लेना ठीक होगा। जिन्हे देव परिवार में सम्मिलित होने और गायत्री नगर में बसने का उत्साह है उनके विस्तृत परिचय समेत आवेदन पत्र माँगे गये है। उन सभी को गायत्री जयन्ती सत्र में “प्रत्यक्ष विचार विनिमय” के लिए बुलाया गया है। जुलाई से देव परिवार में प्रवेश पाने वाले परिजनों की व्यवस्थित कार्य पद्धति आरम्भ हो जायगी।

अभी बहुत कुछ बाकि है : Stay tuned

कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव। 

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1 जून 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1) संध्या कुमार-24 , (2 ) अरुण वर्मा -31,(3 )  सरविन्द कुमार-32, (4)  पूनम कुमारी-25 

इस सूची के अरुण वर्मा जी  और सरविन्द कुमार जी दोनों  गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद 


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