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गायत्री नगर की उत्पति की पृष्ठभूमि 

31 मई 2022 का ज्ञानप्रसाद – गायत्री नगर की उत्पति की पृष्ठभूमि 

1980 फरवरी, मार्च और अप्रैल के अखण्ड ज्योति अंकों में परमपूज्य गुरुदेव ने युगतीर्थ शांतिकुंज में गायत्री नगर की उत्पति और स्थापना का विस्तार से वर्णन किया हुआ है। 27 सितम्बर 2021 को हमने एक विस्तृत लेख लिखा था जिसमें जीवनदानियों की चयन प्रक्रिया से लेकर उस वातावरण का वर्णन किया था जिसमें यह उच्चकोटि के जीवनदानी अपना जीवन गुरुदेव को सौंप चुके हैं। कल वाले लेख में हमने गायत्री नगर के वातावरण की बात की थी और आज भी अधिकतर बात उसी विषय पर होगी, लेकिन जिस प्रकार शिक्षा और विद्या का अंतर् है उसी तरह पढ़ाई और ढलाई का भी अंतर् है। गुरुकुलों और आरण्यकों में ढलाई को प्राथमिकता दी जाती थी न कि पाठ्यक्रम को। छोटे बच्चे को KG क्लास में कुछ समय के लिए स्कूल के वातावरण में एडजस्ट होने के लिए ही भेजा जाता है। हमारे कई सहकर्मी शांतिकुंज होकर आये है और आगे भी जाते रहेंगें। रेणु श्रीवास्तव जी आजकल शांतिकुंज में ही हैं। जीवनदानियों की दिनचर्या, घरों के वातावरण इत्यादि के बारे में जानने का भी प्रयास किया जाये तो हो सकता है परमपूज्य गुरुदेव के उद्देश्य की पूर्ति का अनुमान हो सके। इसी वातावरण को दर्शाते हमने 2018 में अपने चैनल पर एक वीडियो अपलोड की थी। आदरणीय डॉक्टर ओ पी शर्मा जी पर फिल्माई गयी यह वीडियो आप देख सकते हैं।

तो प्रस्तुत है आज का ज्ञानप्रसाद 

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देवता स्वर्ग में रहते हैं, इसलिए उनकी गरिमा शाश्वत बनी रहती है। यदि उन्हें नारकीय वातावरण में रहना पड़े तो निश्चय ही उनमें से अनेकों की आदतें बदल जायेगी और साधारण लोगों जैसी बुरी आदतों से वे भी भर जाएंगें । प्राचीनकाल में बालकों का शिक्षण ऋषियों के गुरुकुलों में होता था और वे नर-रत्न बनकर निकलते थे। वयस्कों को तीर्थवास में, अधेड़ों को आरण्यकों (वनों) में चिरकाल तक निवास करना पड़ता था ताकि वे परिवार के वातावरण से अलग होकर कुछ समय प्रेरणाप्रद परिस्थितियों में रह सकें। वानप्रस्थों की शिक्षा साधना आरण्यकों में चलती थी। यों तो गुरुकुलों और आरण्यकों के कोर्स को प्राइवेट पढ़कर गैस पेपरों के सहारे अथवा पत्राचार विद्यालय में भर्ती होकर भी पूरा किया जा सकता है, ट्यूटर निर्धारित पाठ्यक्रम का अभ्यास भी करा सकते है और सरलतापूर्वक उत्तीर्ण भी करवा सकते हैं लेकिन यह सब करने पर भी छात्रों को वह लाभ नहीं मिल सकता जो उन शिक्षण संस्थाओं के साथ जुड़े हुए “विशिष्ट वातावरण” में सन्निहित रहता था। आजकल तो हर विषय के लिए crash courses का प्रचलन बन चुका है जिसमें कुछ घंटे ही पढ़कर एक्सपर्ट घोषित कर दिया जाता है। यह विद्या है न कि शिक्षा। 

परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि अखण्ड ज्योति परिजनों को एकाँगी सौभाग्य मिल सका। अखंड ज्योति द्वारा सत्साहित्य के माध्यम से उपयोगी प्रेरणाएँ तो मिली, किन्तु जो पढ़ा उसे व्यवहार में उतारने के लिए सहयोगी वातावरण न मिल सका। फलतः उस अध्ययन का लाभ “चिन्तन का स्तर” उठाने तक सीमित बनकर रह गया। घर,गाँव,मुहल्ले,सम्बन्धियों और यहाँ तक कि कुटुम्बियों का समुदाय भी ऐसा नहीं मिल सका जिसमें सुसंस्कारिता गहराई तक भरी होती । ऐसी दशा में उपयोगी अध्ययन तो किया गया लेकिन वह अध्ययन केवल चिन्तन को ऊँचाई ही देकर समाप्त हो गया। कभी-कभी कुछ मनस्वी ऐसे भी होते हैं जो बिना दूसरों का सहारा लिये निज के बलबूते ही अपनेआप को उठाने का प्रयास करते हैं। स्वनिर्मित व्याक्तित्वों ( self-made personalities) की भी संसार में कमी नहीं, किन्तु यह अपवाद ( exception) है। 

अखण्ड ज्योति परिजनों को प्रतिपादन, परामर्श की तरह ही यदि तदनुरुप वातावरण भी मिल सका होता तो निक्षित रुप से वे वहाँ नहीं होते जहाँ गतिरोध उन्हें रोके खड़ा है। चिन्तन में उत्कृष्टता का महत्व कम नहीं पर तथ्य यह भी है कि यदि किसी को असामान्य बनना या बनाना हो तो तदनुरूप वातावरण उपलब्ध करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। वातावरण के अभाव का कारण ही है कि इतने बड़े करोड़ों परिजनों के गायत्री परिवार में मात्र कुछ एक में ही नेतृत्व की क्षमता क्यों है ? वैसे यह कहना भी गलत नहीं है कि सृजन शिल्पियों का एक बहुत बड़ा समुदाय भी इसी परिवार में से निकला है लेकिन फिर भी जब गायत्री परिवार के सदस्यों की संख्या और उसमें से उभरी हुई उच्चस्तरीय प्रतिभाओं की संगति मिलाई जाती है जो स्थिति निराशाजनक ही दीखती है। यह केवल वातावरण के अभाव के कारण ही है। 1980 से पहले गुरुदेव की धारणा थी कि यदि प्रेरणाप्रद वातावरण का प्रबन्ध होता और उसमें परिजनों को बसाने का अवसर मिलता तो बात कुछ और ही होती। यदि यह प्रबन्ध किया जा सका होता तो अखण्ड-ज्योति की खदान से इतने नर-रत्न निकले होते जिनकी जगमगाहट सेअनगनित चेहरे दमकते और उनके प्रभाव से असंख्यों व्यक्तित्व उभरते , उछलते और दृष्टिगोचर होते।

भूतकाल में गुरुकुलों और आरण्यकों ने विश्व्यापी नर-रत्नों का अजस्र उपहार दिया है। इतिहास भारतीय गरिमा का ऋणी है। संसार के कोने-कोने में भागीरथ जैसे प्रयास और आदर्श क्रिया-कलाप अपनाने वाले नर-नारायणों की यह जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती थी। जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी का अर्थ है जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है क्योंकि जन्मभूमि, माँ यानि जननी से भी बढ़कर है। मातृभूमि अपनी संतान और संतान को जन्म देने वाली जननी ,दोनों का पोषण करती है। 

इस गरिमा का विशाल रुप जनसाधारण ने जिस भी रुप में देखा हो और परखने वालों ने जो भी निष्कर्ष निकाला हो, पर वास्तविकता इतनी ही है कि धरती पर बिखरे पड़े और मानवी काया में परिलक्षित होने वाले देवत्व का उत्पादन गृरुकुलों और आरण्यकों में ही होता था। गुरुकुल नर्सरी, खदान और फैक्टरी की भूमिका निभाते थे। यह मात्र विधालय ही नहीं थे, उनमें पढ़ाई भर नहीं होती थी। गुरुकुल का प्रमुख प्रयोजन ढलाई था। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सिलेबस को अप्रधान और वातावरण को प्राथमिकता दी जाती थी।

सिखाई और ढलाई में बहुत बड़ा अंतर् है : 

अध्ययन से मनुष्य सीखता है लेकिन वातावरण से ढलता है। पढ़ाई से जानकारी मिलती है और वातावरण से प्रतिभा उभरती है। व्यक्तित्व ढालने का एकमात्र मार्ग है कि सुसंस्कृत वातावरण में रहने का अवसर मिले, एक ऐसा वातावरण जिसमें मनुष्य जो बनना चाहे बन सके। औरों की देखदेखी से,अनुकरण करने से,एक विशेष सिस्टम में पलने से और अनुशासन पालने भर से चिन्तन और चरित्र में परिवर्तन होता चला जाय। प्राचीन काल में यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। बालकों को गुरुकुलों में, प्रौढ़ों को आरण्यकों में अधिक समय रहने और सीखने तथा ढलने का अवसर मिलता था। तीर्थ कल्प के माध्यम से व्यस्त लोग कुछ समय के लिए वातावरण बदलने और देवजीवन को प्रेरणा लेने जाते थे। 

स्वास्थ्य गडबड़ाने पर जलवायु बदलने के लिए लोग किसी उपयुक्त स्थान पर चले जाते हैं और कुछ दिन वहाँ निवास करने का लाभ लेकर लौटते है। प्राचीनकाल में तीर्थसेवन द्वारा मानसिक स्वास्थ्य सुधारने, दृष्टिकोण एवं जीवन क्रम में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया पूर्ण करते थे। शांतिकुंज के उद्बोधनों में बैटरी चार्ज करने की बात अक्सर की गयी है। शांतिकुंज प्रांगण के प्रथम उद्बोधन में इसी बैटरी चार्ज करने वाली पंक्ति ने हमें बहुत प्रभावित किया था। 

गुरुदेव कहते हैं कि समय की माँग है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के देव परिजनों को मात्र उत्कृष्ट स्वाध्याय का ही अवसर न मिले वरन उस वातावरण में रहने की भी सुविधा हो जो मनुष्य के व्यक्तित्व को आदर्शवादी-अध्यात्मवादी ढाँचे में ढालने के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक है। समय को माँग को देखते हुए,नवसृजन की पूर्ति के लिए ऐसे मनुष्यों के उत्पादन करने की आवश्यकता है जो आदर्श मानव कहलाने के हकदार हों। इसी उदेश्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर का ढाँचा खड़ा किया गया है। गायत्री नगर में गुरुकुल, आरण्यक और तीर्थ कल्प की तीनों ही दिव्यधारीओं का समन्वय किया गया है। इस त्रिवेणी में अवगाहन करने के लिए जागरुक प्राणवानों को, अखण्ड-ज्योति के प्रखर परिजनों को,आग्रहपूर्वक आमन्त्रण किया गया है।

गुरुदेव की आकाँक्षा रही है कि एक ऐसा देवलोक स्थापित किया जाये जिसमें परिजन देव-परिवार के सदस्य बनकर देव-जीवन जियें, देव-कर्तव्यों में निरत रहें और इसी शरीर में रहते देव-गति से मिलने वाले आनन्द का उपभोग करें। इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिये ही गुरुदेव ने गायत्री नगर की स्थापना की जिसमें उपयुक्त साधन विद्यमान हैं। 

गुरुदेव बहुत ही दूरदर्शी थे,उन्होंने बहुत पहले गायत्री नगर बनाने की बात सोच ली थी। अप्रैल 1980 की अखंड ज्योति में पूज्यवर कहते हैं कि अब गायत्री नगर का इतना भाग बन गया है जिसमें देव वातावरण बनाना, देव-परिवार बसाना और तदनुरुप कार्यक्रम चलाना सम्भव हो सके। पिछले कई वर्षों से स्थान न होने के कारण जिनके आग्रह को अनसुना किया या टाला जाता रहा है, अब उन्हें प्रथम बार यह हर्ष समाचार देना सम्भव हुआ है कि वे गायत्री नगर में, ब्रह्मवर्चस् में, बसने की बात पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर सकते हैं। तालमेल न बैठे,दृष्टिकोणों में, स्वभाव में सामंजस्य न बने, तो बात दूसरी है, अन्यथा स्थान न होने के कारण जो असुविधा थी उसे एक सीमा तक हल हुआ समझा जा सकता है ।

युग-सन्धि की इस पुण्यवेला में प्राणवान आत्माओं का अन्तःकरण नवसृजन में प्रज्ञावतार के सहगामी बनने के लिए मचलता है । यह स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी है । ऐसी विषम बेला में भी जो मूर्छित ही पड़े रहे उन्हें “मृतक जीवितों” में ही गिना जायेगा।

प्रश्न उठता है कि क्या किया जाय ? कहाँ किया जाय ? इन प्रश्नों का उत्तर एकाकी कर्तृत्व का ताना-बाना बुनने से नहीं मिल सकता । एक व्यक्ति कितना भी समर्थ क्यों न हो अपने बलबूते कुछ करने लायक काम नहीं कर सकता । महान प्रयोजन “सामूहिक” रुप से ही हो सकते हैं । युग निर्माण अभियान एक गढ्डा है जिसमें छोटी-बड़ी जल धाराएँ मिलती चली जायेंगी और अपनी संयुक्त शक्ति के बलबूते ही कुछ बड़ा काम करेंगी। इस दृष्टि से गायत्री नगर की ओर चल पड़ने और संयुक्त प्रयास से गोवर्धन उठाने और ग्वाल-बालों को श्रेय मिलने वाला उदाहरण ही हम प्रत्येक दूरदर्शी के लिए मार्गदर्शक हो सकता है। इसी सामूहिकता और सहकारिता की बात हम ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में अक्सर करते रहते हैं। 

गुरुदेव बता रहे हैं कि इस सुविधा का उद्घाटन विक्रमी संवत् 2037 के प्रथम दिन से किया जा रहा है। 1980 की चैत्र नवरात्रि (17 से 25 मार्च) इसके लिए शुभ मुहूर्त समझा गया है । सन् 1980 से 2000 तक की युग-संधि का यह प्रथम वर्ष है । इस बीस वर्ष की अवधि में नव-निर्माण की चार पंचवर्षीय योजनाएँ बनी हैं । इस कार्यक्रम के अर्न्तगत जागृत आत्माओं में से कुछ चुने हुए लोगों का एक परिवार बसाने को भी सम्मिलित रखा गया है । “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संरचना का एक छोटा नमूना गायत्री नगर में देव परिवार बसाकर किया जा रहा है।

अभी बहुत कुछ बाकि है : stay tuned

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इन्ही शब्दों के साथ कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे । हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

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30 मई 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची के अनुसार संध्या कुमार जी और सुमन लता जी 24-24 अंक प्राप्त करके गोल्ड मैडल विजेता हैं। दोनों को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद


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