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गायत्री नगर के जन्म में अखंड ज्योति पत्रिका का योगदान। 

30 मई 2022 का ज्ञानप्रसाद- गायत्री नगर के जन्म में अखंड ज्योति पत्रिका का योगदान। 

आइये आज प्रातः की इस मंगलवेला में अपनी वरिष्ठ एवं अतिसमर्पित सहकर्मी आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी को उनकी 50 वीं (स्वर्ण जयंती) मैरिज एनिवर्सरी के शुभ अवसर पर अपनी शुभकामनायें भेजें। श्रीवास्तव दम्पंती इस शुभ अवसर को परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के चरणों में युगतीर्थ शांतिकुंज में मना रहे हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार उनके  सुखद जीवन की  कामना करता है। 

हम में से अधिकतर परिजन युगतीर्थ शांतिकुंज जा चुके हैं य जाते रहते हैं।  क्या कभी मन में आया है कि हम वहां क्यों जाते हैं ?, क्या वहां सही मानों में शांति मिलती है?, गुरुदेव क्यों बार- बार कहते आए हैं कि “आप यहाँ कुछ दिन रहने का प्रोग्राम बना कर आएं”, गायत्री नगर की स्थापना के पीछे गुरुदेव का क्या उदेश्य था ? आने वाले लेखों में इन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने का प्रयास करेंगें। 

27 सितम्बर 2021 को प्रकाशित हुए लेख में हमने शांतिकुंज में जीवनदानियों के बारे में लिखा था। उसी समय से जिज्ञासा थी कि इस विषय पर और विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। 

तो प्रस्तुत है मंगल वेला में सप्ताह का प्रथम लेख।     

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ज्ञान की सार्थकता कर्म में है। सत्साहित्य का स्वाध्याय और सन्त सज्जनों का सत्संग असाधारण पुण्य फलदायक माना गया है। ऐसा क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि “पठन और श्रवण” के माध्यम से उपलब्ध  प्रेरणा जब सत्प्रवृतियों में परिणित होती है तो उसमें “व्यक्तित्व का स्तर” बदल जाता है। मनःस्थिति बदलने पर परिस्थितियों बदलती है। अन्तरंग सुधारने से बहिरंग में सुखद परिवर्तन होते है। यही मनुष्य को अभीष्ट भी है। प्रत्येक मनुष्य  सुख और सन्तोष चाहता  है। उसी के लिए अपने-अपने ढंग से प्रयत्न भी करता  है किन्तु सफलता बिरलों को ही मिलती है। बाकि तो भटकते ही रहते हैं।  दिशाविहीन श्रम से अभीष्ट की उपलब्धि तो दूर, हाथ लगती है तो मात्र थकान। उपयोगी दिशाधारा प्रदान करना ही  “स्वाध्याय और सत्संग” का उद्देश्य है। यदि इन दोनों प्रयासों से सन्मार्ग पर चल पड़ने का साहस मिल सके तो समझना चाहिए कि उनका जो माहात्म्य बखाना गया है, उसमें कोई अत्युक्ति नहीं है यानि यह कोई बड़ा चढ़ा कर बात नहीं की जा रही है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है यदि  यह स्वाध्याय पढ़ने  तथा सत्संग सुनने तक सीमित रहे और उनका प्रभाव जीवन व्यवहार में न उतारा जाए  तो समझ लेना  चाहिए कि केवल  पढ़ने  और सुनने की व्यसन भर की पूर्ति हुई है, केवल टाइम पास करने का साधन ही मिला है ।  ऐसी दशा में न स्वाध्याय का  कोई पुण्य है और न सत्संग का कोई लाभ।

अखण्ड-ज्योति पिछले 43  वर्षों (1980 के अनुसार) से इस प्रयास में संलग्न है कि स्वाध्याय के लिए श्रेष्ठतम  पाठ्यसामग्री परिजनों को उपलब्ध कराने में कोई भी  कसर बाकी न रहने दी जाए । उसी उदेश्य से ऑनलाइन ज्ञानरथ के लेख अपने सहकर्मियों के लिए प्रयासरत हैं।  कमल पुष्पों का मधु सर्वोत्तम माना जाता है। मधु मक्खी के श्रम को सराहा जाता है, वह एक- एक फूल से अच्छे से अच्छे मधु की खोज  करके हमारे लिए संचय करती है। अखण्ड ज्योति के परिश्रम  और प्रस्तुतीकरण का यदि मूल्याँकन हो सके तो यही कहा जायेगा कि मानवी तत्परता के अंतर्गत  जो सम्भव था उसमें कुछ भी छोड़ा नहीं  गया है।

गुरुदेव बताते हैं कि इन दिनों “सत्संग असम्भव नहीं तो कष्टसाध्य आवश्यक” है। जो सत्संग के  योग्य हैं  उन्हें अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न रहने  के कारण फुरसत नहीं। जिन्हें  फुरसत है वे इस योग्य नहीं कि उनकी बात सुनी जाये। सत् परामर्श देने की क्षमता वाले व्यक्ति दूसरों से कुछ कहने से पूर्व उसे अपने अंतःकरण  में उतारते है और ज्ञान को कर्म में उतारने के लिए बिना एक क्षण गंवाये तत्पर रहते है। वे हर जगह, हर समय उपलब्ध भी नहीं रहते। ऐसी दशा में इन दिनों सत्संग का प्रयोजन भी स्वाध्याय से ही पूरा करना पड़ता है।

परिस्थितियों बदलती रहती है। समस्याओं  का स्वरुप सदा एक सा नहीं रहता। इसलिए सामयिक समस्याओं के समाधान एवं प्रस्तुत उलझनों के हल प्रस्तुत करने के लिए ऐसे मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है जो जन साधारण की मनःस्थिति और सामयिक परिस्थितियों के साथ ताल-मेल खाता  हो। इस दृष्टि से सृजा गया साहित्य ही “युग साहित्य” कहलाता है। उपयोगिता उसी की होती है। हर युग में ऋषि उत्पन्न होते हैं  और वे समयानुकूल  चिन्तन एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता पूरी करते है। इस  प्रस्तुतीकरण को  ही “युगबोध” कहते हैं । इसी स्तर के प्रतिपादन का स्वाध्याय सार्थक होता है।

अखण्ड-ज्योति के जीवनकाल की लगभग आधी शताब्दी (1980 ) होने को आई है। इस दिव्य पत्रिका ने  युगऋष्टि की भूमिका निभाई  है और स्वाध्याय की दृष्टि से उपयोगी  पाठ्यसामग्री प्रस्तुत करने में यथासम्भव कहीं कोई चूक नहीं रहने दी है। यह आहार लोगों ने अपनाया भी है और सराहा भी। यही कारण है कि उसके पाठकों की संख्या इतनी है, जिसे हिन्दी धार्मिक पत्रिकाओं में अद्वितीय ही कह सकते है। यही है इसकी लोकप्रियता का मापदंड ।

देखना यह होगा कि यह अखंड ज्योति  मात्र रुचिकर ही थी  या इसे  पढा भी गया। यह बात तो सत्य है कि रूचि होगी तभी तो पढ़ी जाएगी क्योंकि रूचि  के अभाव में बहुमूल्य भोजन  भी अपच का कारण बनता  है। उससे शरीर को पोषण तो मिलता नहीं उलटा पेट पर भार ही बढता है। स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने बहुत ही सुन्दर तरीके से अपने उद्बोधनों में बार-बार कहा है कि भोजन को सबसे पहले हमारी आँखें और नासिका खाती  हैं, बाद में पेट खाता है। खाना किस प्रकार परोसा जाता हैं ,यानि परोसने का भी बहुत बड़ा महत्व है। कुछ ही वर्षों में  अखंड ज्योति प्रकाशन को लगभग एक शताब्दी हो जायेंगें, जो कंटेंट इस दिव्य पुस्तक ने हमें प्रदान किया हम सब उससे भली भांति परिचित हैं।  लेकिन एक बात बिल्कुल सत्य है कि यह साहित्य केवल उसी की अंतरात्मा में ही उतर पाता है जिसमें पात्रता है ,जो इसे ग्रहण करने में समर्थ है। यह कोई मैगज़ीन  नहीं है जिसमें flashy फोटो देकर विज्ञापन से पाठकों को आकर्षित किया जाता है। उत्पादन खर्चों  से भी कम मूल्य पर प्रस्तुत की जाने वाली यह पत्रिका एक दिव्य पत्रिका है। इसी दिव्यता के साथ पात्रता का सम्बन्ध है।   धन, बुद्धि, पद, प्रभाव आदि का सही लाभ उन्हीं को मिलता है जो उन्हें पचा पाते है।अन्यथा अपच से वमन  विरोचन (vomiting) जैसी बीमारियां  उठ खड़ी होती हैं । सम्पदाएँ शत्रुता  उत्पन्न करती है। उपलब्धियों का महत्व तभी है जब वे पच सके।

ज्ञान की सार्थकता कर्म से मानी गई है। स्वाध्याय तभी सराहा जायेगा जब वह व्यक्तित्व में चमके और आचरण में उतरे। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादन, और पाठकों के अध्ययन की सार्थकता इसी कसोटी पर ऑकी जायेगी कि परिजनों के जीवनक्रम में उसका क्या प्रभाव पड़ा? क्या परिवर्तन हुआ? यदि ऐसा कुछ  भी न हुआ हो तो समझ लेना  चाहिए कि मनोरंजन बेचने और  खरीदने वालों में एक और  प्रकाशन सम्मिलित हो गया । यदि ऐसा हुआ हो तो समझ लेना  चाहिए कि 

“एक महान प्रयास चट्टान से टकराने वाली नाव की तरह दुर्घटना ग्रसित हो गया। ऐसी दशा में इस असफलता को अपने समय का एक दुःखदायी दुर्भाग्य ही माना जायेगा।”

अनुमान है कि ऐसा हुआ नहीं है। कहीं कुछ अधुरापन रह गया है जिसके कारण कहा जा सकता है कि जो  प्रेरणा इसके पढ़ने से मिली वह  चिन्तन क्षेत्र तक घुमड़ कर रह गई, उसे कर्म के रुप में परिणित होने का अवसर मिला ही नहीं। पूर्ण असफलता इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती है कि अखण्ड ज्योति परिजनों की आस्था, रुचि एवं आकाँक्षा जनसाधारण की तुलना में कहीं अधिक उत्कृष्ट पाई जाती है। यदि कोई प्रभाव न पड़ा होता तो मनःस्थिति में इतना असाधारण अन्तर कैसे आया ? परिणिति को सफलता भी नहीं कह सकते क्योंकि इस विशाल समुदाय में से ऐसी  सम्पन्न प्रतिभाएँ क्यों नहीं उभरी जिनकी माँग विश्व के कोने-कोने में है। सर्वविदित है कि प्रतिभाएँ ही जनमानस को प्रशिक्षित एवं परिवर्तित करती है। अवांछनीय प्रवाहों को मोड़ने-मरोड़ने और उसे उपयेगी बना देने का कार्य व्यक्तित्वान प्रतिभाएँ ही करती रही है। आज इसी की माँग और आवश्यकता है किन्तु उसकी पूर्ति हो नहीं रही। यदि अखण्ड-ज्योति इतनी  प्रखर होती  तो उस समुदाय में से युग की मांग पूरी कर सकने वाली प्रतिभाएँ उभर कर आगे आई होती। यदि इस समुदाय में जीवन रहा होता, तो वे मात्र सज्जन भर बन कर न रह जाते, समाज का  मार्गदर्शन करते भी दिखते।

सज्जन होना अच्छा तो है, पर पर्याप्त नहीं। प्रखर व्यक्तित्व दूसरों पर अपनी छाप छोड़ते तो  हैं  और पग-पग पर अनुयायी भी  उत्पन्न करते हैं। निराशा को आशा में बदलना  भी उन्हीं का काम है। वे पतन को रोकते ही नहीं वरन् उसे गलाते, ढालते और उत्थान में परिवर्तित भी करते हैं। Low level   की प्रतिभाओं ने अपने षड्यंत्रों से हर क्षेत्र में अवॉछनीयता बोई और उगाई। यदि श्रेष्ठता के क्षेत्र में भी प्रखरता विद्यमान रहती तो कोई कारण नहीं कि लोक प्रचलन में सत्परम्पराओं के उद्यान लहलहाते दृष्टिगोचर न होते।

यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या  उत्कृष्ट चिन्तन उपलब्ध होने से जीवन क्रम बदलने और प्रतिभा उभारने  का लाभ नहीं मिलता? 

इसके उत्तर में 1)बीज, 2)फसल, 3)खाद और  4)पानी का उदाहरण देना होगा। उत्कृष्ट चिन्तन बीज है। उसकी आवश्यकता अनिवार्य  है। वह न हो तो अंकुर उगने से लेकर फल लगने तक का आधार ही नहीं बनता। बीज के  अभाव में तो पूर्ण अवरोध ही बना रहेगा। इतने पर भी यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि बोया हुआ बीज केवल अंकुर  भर ही  बन सकता है। परिपुष्ट पौधे  की स्थिति में नहीं पहुँच सकता। पौधे की स्थिति में  पहुँचने के लिए “उचित वातावरण” की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। ठीक उसी प्रकार व्यक्तित्व के विकास के लिए भी  प्रेरणाप्रद वातावरण की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। अगर उचित वातावरण का  प्रबन्ध न हो सके तो दोष चाहे बोने वाले को दिया जाये या काटने वाले को,आवश्यक फसल काटने का अवसर तो  मिलेगा ही नहीं । विचारणा चाहे भली हो या बुरी अनुकूल वातावरण में ही पलती और फलती है। वातावरण के अभाव में हर प्रयत्न मुरझाता और सूखता दृष्टिगोचर होगा। सत्संग और कुसंग की जो  महिमा बताई जाती है उसे मात्र व्यक्ति विशेष के सम्पर्क  तक सीमित न माना जाये। वातावरण में ही प्रभावित करने की वास्तविक क्षमता रहती है।वातावरण के  प्रभाव से ही  आतंकवादी उत्पन्न  होते हैं और वातावरण से ही महामानवों का जन्म होता है।  

अखण्ड-ज्योति परिजनों को यदि  उपयोगी ज्ञान की भांति  ही प्रेरणाप्रद वातावरण भी  मिला होता तो निश्चय ही चमत्कार हो गए होते। अमीर  लोग अपने  बच्चों को पाँच सौ रूपए  मासिक फीस  वाले प्राइवेट  स्कूलों में पढ़ने के लिए  भेजते हैं  जबकि वहाँ भी पाठ्यक्रम वहां पर भी  ग्रामीण स्कूलों की  प्राथमिक शिक्षा का ही  रहता है। जब अभिभावकों से इतने महंगें स्कूलों में भेजने का कारण पुछा जाये तो  एक ही बात कहेंगे कि उन मंहगे स्कूलों का वातावरण ऐसा होता है जिसमें बालकों में सभ्य व्यवहार की आदत  पड़ सके। वातावरण की प्रभावी शक्ति को निर्विवाद  रुप से स्वीकार करना पड़ता है।

जय गुरुदेव 

To be continued 

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28 मई 2022  के लेख के  अमृतपान  उपरांत संध्या कुमार-24 और  सरविन्द कुमार-29 जी ने 24 आहुति संकल्प  पूर्ण किया है और सरविन्द भाई साहिब  गोल्ड मैडल विजेता हैं, उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। 


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