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गुरुदेव द्वारा किये गए दो जल उपवास की विस्तृत जानकारी 8

17 मई 2022 का ज्ञानप्रसाद- गुरुदेव द्वारा किये गए दो जल उपवास की विस्तृत जानकारी 8

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा युगतीर्थ शांतिकुंज में 1976 में सम्पन्न किये गए जल उपवास का यह दूसरा और दोनों जल उपवासों का आठवां पार्ट है। जब हम गुरुदेव के साहित्य के एक एक शब्द का ध्यानपूर्वक अध्ययन करते हैं तो उनमें छिपे हुए अनगनित रहस्य सामने आते हैं। इस प्रकार की अनुभूति तभी संभव हो सकती है जब हम इन लेखों का अध्ययन एक परीक्षार्थी की भांति करते हैं क्योंकि सब्जेक्ट कितना समझ आया, परीक्षा के बाद ही पता चलता है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो अध्ययन केवल नाम का ही रह जाता है। इन्ही रहस्यों में से एक बात जिसने हमें आकर्षित किया वह है “स्वर्ण जयंती की विशेष साधना।”

यही होगा कल वाले लेख का विषय। जल उपवास को रोक कर इस विशेष साधना पर चर्चा करना ठीक उसी प्रकार है जैसे हमने मथुरा के जल उपवास को रोककर सहस्रांशु यज्ञ पर चर्चा की थी। ऐसा रोकना भी किसी निश्चित उद्देश्य के परिणाम स्वरूप ही है। हमारे गुरुदेव इतना कठोर जल उपवास कर रहे हैं तो इसका उदेश्य और कारण भी तो जानना चाहिए। कल वाले लेख में इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगें।

आज के लेख में हमें परिजनों की अनुभतियाँ जानने का अवसर तो प्राप्त होगा ही साथ में स्वामी अखंडानंद और उनके पौत्र अनुनय विश्वास के महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी भी होगी। 

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युग निर्माण योजना पाक्षिक (दो सप्ताह के बाद छपने वाला) का 5 अक्टूबर का अंक छप कर लगभग तैयार था। अगले दिन डिस्पैच में जाना था। जल्दी से व्यवस्था की गई और छपे हुए पन्ने रोक कर उनमें उपवास की सूचना जोड़ी गई और यह निर्देश भी शामिल किया गया कि इन दिनों परिजन शांतिकुंज आने के बजाय अपने घरों में ही साधना उपासना के कार्यक्रम चलाएं। नई जोड़ी गई सामग्री में जल उपवास के उद्देश्य भी संक्षेप में लिख दिए गए थे। 

संवाद पहुंचाने के इस प्रयास को destination तक जाने में तीन चार दिन लगे लेकिन ,जैसा हमने पिछले लेख में देखा, कई जगहों पर अपनी मार्गदर्शक सत्ता के साथ कदम मिलाकर चलने वाली सक्रियता पहले ही उभर आ गयी थी। बिना किसी सूचना और संवाद के लोगों को पता चलने वाले अनुभव भी कम अनोखे नहीं थे। आइये देखें कुछ अनुभूतियाँ। 

जाधवनाथ मेहता की अनुभूति:

पाकिस्तान की सीमा से लगे गुजरात के गांव चोपर में सक्रिय कार्यकर्ता जाधवनाथ मेहता ने महसूस किया कि किसी ने झिंझोड़कर जगा दिया था। तड़के सुबह का वक्त था और जाधव भाई उस समय सो रहे थे। गांव में 15 -20 परिवार थे। सीमा पार कर अक्सर घुसपैठिए या तस्कर आया करते थे। जाग कर देखा तो “दाढ़ी वाले एक अधेड़ पुरुष” ने उठने का इशारा किया। जाधव भाई ने सोचा तस्कर ही है, अपना सामान छिपाने के लिए कह रहा होगा। उसकी बात न मानने का मन बनाकर जाधव भाई उठ ही रहे थे कि उस व्यक्ति ने कहा, 

“ऐ उठ। चौकी लगा। उपवास कर, तेरे गुरु का यही आदेश है।”

चौकी लगाने का मतलब गायत्री की विशेष साधना के लिए वेदी सजाना था। बात समझ में नहीं आई। जाधव भाई ने पूछा कि गुरुदेव की बात तुम क्यों कर रहे हो। तुम कौन हो? कहीं ऐसा वैसा मनुष्य तो नहीं। इस पर आगन्तुक ने सिर्फ इतना ही कहा, “तुम्हारी तुम जानो। मेरा फ़र्ज़ संदेश पहुंचाना था सो पहुंचा दिया। तुम्हारा गुरु उपवास पर बैठने वाला है।” सुनकर जाधव भाई सहज हुए ओर आगंतुक ने जैसा बताया था वैसा ही किया।

वाराणसी के चार परिजनों की अनुभूति:

5 अक्टूबर को वाराणसी और आसपास के कुछ कार्यकर्त्ता विंध्येश्वरी देवी गये थे। उन कार्यकर्ताओं में कुछ ने दर्शन के समय अनुभव किया कि मुख्य प्रतिमा ने अपना स्वरूप बदल लिया है और प्रातः सायं गायत्री की जिस छवि की आराधना, उपासना कर रहे हैं उसी के दर्शन हो रहे हैं। उस छवि में गुरुदेव की छाया भी बीच-बीच में दिखाई पड़ती है। पूरी तरह तो नहीं पर ग्रीवा से ऊपर का शिरोभाग साफ दीख रहा है। कोई संदेश दिया जा रहा था, कही हुई बात स्पष्ट नहीं सुनाई देती थी। ध्यान लगाकर सुनने पर आभास होता है कि कहा जा रहा है “जप करो-तप करो।” गुरुदेव के मुंह से तीन बार यह संदेश सुनाई दिया ओर वे परिजन वहीं बैठकर जप करने लगे। चालीस मिनट बाद उठे और निश्चय किया कि आज के दिन से ही उपवास करना है। यहां चार परिजन हैं। चारों परिजन बारी-बारी से उपवास करें और अपने गांव पहुंचकर अखंड जप की व्यवस्था बनाएं।

स्वामी अखंडानंद जी के पौत्र अनुनय विश्वास की गुरुदेव से जिज्ञासा: 

जल उपवास शुरु करने से करीब महीने भर पहले गुरुदेव ने “साधना विज्ञान की शोध और नये निर्धारण” के बारे में कहा था। इस सम्बन्ध में कुछ बिन्दुओं पर पत्रिकाओं और पत्राचार में भी गुरुदेव ने चर्चा की थी।आजकल गुरुदेव कभी कभार ही पत्र लिखते थे। यह काम माताजी के ज़िम्मे था। गुरुदेव किसी अत्यंत आत्मीय और निकटवर्ती संत महात्मा अथवा उच्च कोटि के साधक को ही पत्र लिखते। अक्टूबर महीने में कलकत्ता के गंगाधर घटक के पौत्र अनुनय विश्वास का पत्र आया। अनुनय 1966 में गुरुदेव के संपर्क में आए थे। 

आइये स्वामी अखंडानंद जी (1864-1937) के बारे में संक्षिप्त से जान लें :

गंगाधर घटक, स्वामी अखंडानंद जी का बचपन का नाम था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ भारत में अनेक स्थानों की यात्रा की और तिब्बत भी गये थे। बाद में वे रामकृष्ण संघ के तृतीय अध्यक्ष बने। गुरुदेव के संपर्क में आने के समय अनुनय विश्वास की उम्र 60 वर्ष के आसपास रही होगी। अपनी किशोर और युवावस्था में उन्होंने काफी समय अपने पितामह के साथ बिताया। स्वामी अखंडानंद ने उन्हें विभिन्न प्रसंगों में श्रीकृष्ण की जन्म और लीलाभूमि में होने वाले एक संत के बारे में बताया था। उन संत के बारे में स्वामी जी का कहना था कि वह गायत्री का अनन्य उपासक और सिद्ध संत होगा। उसके उदय के साथ ही गायत्री आराधना का प्रचार भी बढ़ने लगेगा। वह सिद्ध संत एक महान विभूति होने के बावजूद सद्गृहस्थ का जीवन जियेगा, नई साधना का अनुसंधान करेगा और उसका स्वरूप रचेगा। अनुनय को बहुत बाद में बोध हुआ कि उनके पितामह ने जिस संत की ओर संकेत किया था वह वस्तुत: गुरुदेव ही थे। 

गुरुदेव का जल उपवास शुरु होने से करीब दो सप्ताह पहले अनुनय जी ने स्वामी अखंडानंद का एक संस्मरण लिख भेजा था। उस संस्मरण में स्वामी जी ने अपनी घोर साधना के बारे में बताया था। स्वामी जी स्वभाव से बहुत कट्टरपंथी थे और शास्त्रीय मर्यादा का यथेष्ट पालन किया करते थे। शरीर में बिना तेल लगाये दिन भर में चार बार गंगा स्नान करते, बिना तला, बिना मसाले वाला भोजन करते। अपना भोजन स्वयं पकाते थे। भोजन के बाद हल्दी चूसते और सिर्फ गंगाजल का ही सेवन करते। जमीन पर सोते और अपना काम अपने ही हाथों से करते। स्वामी अखंडानंद तब रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में नहीं आए थे। संपर्क में आने के बाद प्रात:-सायं गायत्री का सेवन और डेढ़ दो घंटे तक प्राणायाम का अभ्यास करते। धीरे-धीरे अखंडानंद जी ने प्राणायाम की मात्रा इतनी बढ़ा दी की शरीर पसीने पसीने हो उठता था और कंपकंपी छूटने लगती। गंगा स्नान के समय उन्होंने प्राणायाम के और प्रयोग भी किए। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने एक बार उनके साधना विधान के बारे में पूछा तो उनके प्राणायाम अभ्यास के बारे में सुनकर आश्चर्य जताते हुए अपने मुंह पर हाथ रख लिया। बोले ज्यादा प्राणायाम मत किया करो। इस तरह करने से कोई प्राणलेवा व्याधि हो जायेगी। तुम तो जितना हो सके गायत्री मंत्र का जप किया करो, इसी से कल्याण होगा। अखंडानंद जी ने रामकृष्ण परमहंस से पूछा कि प्राणायाम का अभ्यास जरूरी नहीं है क्या ? इस पर स्वामी परमहंस जी ने कहा कि किसने कहा वह जरूरी नहीं है, पर उतना ही जितने से प्राणों का रक्षण और पोषण हो। गायत्री का जप जितना चाहो कर सकते हो। स्वामी अखंडानंद के हावभाव से लगा कि रामकृष्ण देव जी की कही बात उनके गले नहीं उतरी है। रामकृष्ण देव ने पूछा कि ऐसे क्या देखते हो? अगले जन्म में देखोगे कि गायत्री और संध्या का विधि विधान ही बदल गया है। तुम्हे इस जन्म की याद रहेगी तो पाओगे कि मैं तुम्हें उसी पद्धति की ओर ठेल रहा हूँ। अभी इतना ही काफी हैं कि प्रतिदिन यथाशक्ति गायत्री का जप करो। पौत्र अनुनय ने इस घटना का वृतान्त लिखते हुए गुरुदेव से पूछा था कि 

“आज से करीब 100 वर्ष पहले स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने जिस साधना विधान की बात कही थी, कहीं उसी के अनुसंधान निर्धारण का समय तो नहीं आ गया। आप उसी विधान का शोध तो नहीं कर रहे।”

गुरुदेव ने अनुनय के पत्र का उत्तर देते लिखा था कि जब कभी यहां आओगे, तभी विस्तार से इस बारे में बातचीत होगी। अभी इतना जानना पर्याप्त है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने आपके पितामह से जिस विधान की बात कही थी वह निर्धारित हो चुका है। उनके वचनों में तलाशोगे तो पाओगे कि अखंडानंद जी से परमहंस देव ने जिस समय नया साधन विधान रचे जाने की बात कही थी, वह समय यही है। 

पाप तापों की शांति:

गुरुदेव ने जिस दिन जल उपवास आरम्भ किया उस दिन कई परिजन व्यथित थे। 5 अक्टूबर की सुबह कार्यकर्ता और परिजन उन्हें प्रणाम करने पहुंचे तो वे अपने कक्ष में एक तख़्त पर पद्मासन लगाये बैठे थे। इस मुद्रा में देख कुछ परिजनों का हृदय और भी घबरा गया था। गुरुदेव उनकी घबराहट समझ गए थे और सांत्वना देने के लिए दाहिना हाथ आश्वस्त करती हुई मुद्रा में उठाया। चिंतित और परेशान साधकों को संदेश मिलता, अनुभव होता कि इस उपवास से उत्पन्न ऊर्जा साधकों के पाप तापों की शांति करेगी। उपवास करने से पहले गुरुदेव ने जो कारण बताए थे, प्रणाम करने आये परिजनों को प्रतीत होता कि उन्हीं की गूंज अंतर्मन में प्रतिध्वनित हो रही है। जल उपवास का एक उद्देश्य यह बताया गया था कि “स्वर्ण जयंती की विशेष साधना” प्रारम्भ हुए आठ महीने हो रहे थे। एक लाख साधक गुरुदेव के शब्दों में युग की कुण्डलिनी जगाने का पुरुषार्थ कर रहे थे। इस साधना का संरक्षण हिमालय के गुह्य क्षेत्र में बैठी, तप रही दिव्य आध्यात्मिक सत्ताएं कर रही थीं। संरक्षण दोष परिमार्जन की प्रक्रिया परमपूज्य गुरुदेव के जल उपवास में प्रतक्ष्य हो रही थी।

आज का लेख यहीं पर समाप्त करने की आज्ञा लेते हैं। कामना करते हैं कि सुबह की मंगल वेला में आँख खुलते ही इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान आपके रोम-रोम में नवीन ऊर्जा का संचार कर दे और यह ऊर्जा आपके दिन को सुखमय बना दे। हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। धन्यवाद् जय गुरुदेव।

To be continued: क्रमशः जारी 

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16 मई 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची: 

(1 )सरविन्द कुमार -24 , (2) संध्या कुमार-25 

इस सूची के अनुसार दोनों ही competitor गोल्ड मैडल विजेता हैं, दोनों को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनको हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। धन्यवाद्


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