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गुरुदेव द्वारा किये गए दो जल उपवास की विस्तृत जानकारी 2

परमपूज्य गुरुदेव की दो सुप्रसिद्ध पुस्तकों “चेतना की शिखर यात्रा 2,3” एवं अखंड ज्योति के अंकों पर आधारित श्रृंखला  का यह दूसरा लेख है। प्रथम लेख आप सबने बहुत पसंद किया, शेयर किया और जी भर कर कमेंट किये, ह्रदय की गहराईओं से आभार व्यक्त करते हैं। 

मई-जून की भारी  ग्रीष्म ऋतू, तापमान लगभग 40 डिग्री सेल्सियस (1952 की ऑनलाइन सर्च अनुसार) में कम्बल लेकर कठिन जल उपवास साधना करना और इस साधना से अर्जित ऊर्जा का हम सबके कल्याण के लिए प्रयोग करना, अवश्य ही परमपूज्य गुरुदेव जैसी दिव्य आत्मा के बस की ही बात है। हम सब नमन करते हैं ऐसे गुरु को। 

आज के ज्ञानप्रसाद में सबसे पहले तो गुरुदेव  पटना के केदार नाथ सिंह जी के प्रश्नों का निवारण करेंगें, उसके उपरांत गुरुदेव दो महान विभूतिओं  1) स्वामी गम्भीरनन्द जी और 2 ) आदरणीय जय दयाल गोयन्दका जी से  वार्तालाप करेंगें। गोयन्दका जी का वार्तालाप लम्बा होने के कारण आज सारा प्रस्तुत करना संभव नहीं है, कुछ भाग कल वाले ज्ञानप्रसाद में शिफ्ट करना पड़ेगा।       

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पटना  के केदार नाथ सिंह जी  ने इस पाबन्दी के बारे में पूछा भी कि क्या कारण  है? आचार्यश्री ने टालने की कोशिश की। केदार नाथ सिंह अपने प्रश्र पर अड़े रहे और  घुमा-फिरा कर पूछते ही रहे। आचार्यश्री को कहना ही पड़ा कि जल उपवास के समय उनके शरीर में और शरीर के आसपास दिव्य ऊर्जा संचरित होने लगेगी। उस ऊर्जा को ग्रहण करने की सामर्थ्य हर किसी में नहीं होती। अपरिपक्व स्थिति में उससे हानि भी हो सकती है। इसलिए स्पर्श की पाबन्दी  है। लकड़ी का तख्त, उस पर दरी और ज्येष्ठ मास की गर्मी में भी ओढ़ने के लिए कम्बल जैसी व्यवस्था। इस व्यवस्था का उद्देश्य भी ऊर्जा के विकिरण (radiations) को रोकना ही रहा होगा। केदार नाथ सिंह जी  ने फिर पूछा कि लोगों को आस-पास जमा न होने देने का भी क्या उद्देश्य है। लोग तो हैं ही नहीं? आचार्यश्री ने कहा: 

“स्थापना के समय बड़ी संख्या में लोग आयेंगे।”

इसके बाद संवाद समाप्त  हो गया और  जल उपवास चलता रहा। बीच-बीच में कभी-कभार लोग आते जाते रहे। आने वाले विशिष्ट लोगों में साधु-संतों की संख्या ज्यादा होती थी। थोड़ी बहुत देर बैठते। शास्त्रीय विषयों पर चर्चा करते। सामान्य विषयों पर भी चर्चा हो जाती थी। कुछ लोग तो ऐसे भी आते जिनके लिए तपोभूमि एक नया निशुल्क  लंगर था, एक ऐसा मन्दिर जहाँ सुबह-शाम खाना बंटता था। इन लोगों की बात पर आचार्यश्री ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

स्वामी गंभीरानंद जी से भेंट:

ऋषिकेश के एक संत स्वामी गंभीरानंद एक दिन आचार्यश्री के पास आये। स्वामी गम्भीरानंद अलमोड़ा अद्वैत आश्रम मायावती के 1953 से 1963 तक अध्यक्ष  थे। इस आश्रम की स्थापना स्वामी विवेकानन्द जी के कहने पर अंग्रेज शिष्य कैप्टन जे एच सेवियर और उनकी पत्नी श्रीमती सी ई सेवियर ने मिलकर 1899 में की थी। स्वामी गम्भीरानन्द जी  वृंदावन की यात्रा पर थे। राह चलते उन्होंने तपोभूमि को देखा, अन्दर आये और  आचार्यश्री के पास बैठे। भीतर आते तक उन्हें किसी साधक ने गायत्री  संस्था और संस्थापक के बारे में बता दिया था। स्वामी जी ने आते ही आचार्यश्री से विनोद के भाव से पूछा:

“इतना बड़ा तप क्यों किया रे बाबा।”

उनके स्वर में विनोद के साथ गरिमा और अधिकार का भाव भी था। आचार्यश्री ने कहा: 

“हमें कारण तो नहीं मालूम लेकिन मार्गदर्शक सत्ता ने इस साधना में नियोजित किया था और हमारे लिए उनकी आज्ञा ही पर्याप्त थी।”

स्वामी गम्भीरानन्द ने आचार्यश्री की आंखों में झाँका, गुरुदेव ने  पलकें झुका लीं। स्वामी जी ने कहा:

“आंखों में बड़ा तेज है। हर कोई इसे सहन नहीं कर सकता। इसीलिए आप किसी से नजरें नहीं मिलाते। यहाँ की योजनाओं के बारे में बतायें।”

आचार्यश्री ने गायत्री तपोभूमि के उद्देश्य और योजनाओं के बारे में बताया। 

“यहाँ पर 2400  तीर्थों का जल रज संग्रह किया जाना है। सामने बन रही यज्ञशाला में हिमालय के तपस्वियों की दी हुई अग्नि का आधान किया जायेगा। यह अग्नि हिमालयी  तपस्वियों की धूनी से लाई गई होगी।”

स्वामी जी ने कहा कि आप गायत्री उपासना का प्रचार करेंगे। वह तो सन्ध्या वंदन के रूप में घर-घर में पहले से  ही प्रचलित है। पौराणिक देवी देवताओं जैसे लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, शिव,  पार्वती, कृष्ण राम आदि की तरह उसका स्वरूप विख्यात नहीं है। आप गायत्री के इस रूप को स्थापित करेंगे।

आचार्यश्री ने बताया, “हमने पहले से कुछ भी तय नहीं किया है। यथा अवसर जैसी प्रेरणा उठेगी वैसे ही निर्णय लेंगे।”

स्वामीजी ने पूछा, “उस प्रेरणा की कसौटी क्या होगी।”

आचार्यश्री ने उत्तर दिया, “अपनी अन्तरात्मा भगवती की आराधना करते-करते यह विश्वास सुदृढ़ हुआ है कि अंतरात्मा में जो भी प्रेरणायें उभरेंगी वे सही ही होंगी।”

देर तक बात होती रहीं। स्वामीजी ने उठते हुए प्रणाम किया। आचार्यश्री तख्त  पर अधलेटे से थे। स्वामी जी के प्रणाम करते ही वह तनकर उठे और खड़े हो गये। पांव खड़ाऊं पर रख लिये और तपाक से बोले प्रणाम तो मुझे करना चाहिए। आप संन्यासी हैं। आश्रम धर्म के अनुसार और विद्या के क्षेत्र में भी आप मुझसे बहुत आगे हैं। मेरा  प्रणाम स्वीकार करें। 

जय दयाल गोयंदका जी से भेंट:

उपवास के दिनों में ही भागवत भवन से सन्देश आया कि जय दयाल गोयंदका जी  मिलना चाहते हैं। जय दयाल गोयंदका जी   गोरखपुर उत्तरप्रदेश स्थित  गीताप्रेस के संस्थापक  थे। लगभग एक शताब्दी पुरानी गीताप्रेस संस्था का नाम विश्व भर में सनातन धर्म को जागृत करने के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। यहाँ से प्रकाशित होने वाली मैगज़ीन “कल्याण” का संपादन  हनुमान प्रसाद पोद्दार जी अपने अंतिम समय तक करते रहे। 

श्रीकृष्ण जन्म भूमि स्थित  भागवत भवन के निर्माण में गोयंदका जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। गीताप्रेस जिन दो महानुभावों के कारण धार्मिक साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में शिखर पर पहुँच सका उनमें गोयंदका जी एक थे। दूसरे महानुभाव हनुमान प्रसाद पोद्दार जी  के बारे में विशेष कुछ कहने की जरूरत नहीं है, दोनों के विशाल व्यक्तित्व के लिए हमारे पाठकों से  आवाहन है कि विकिपीडिया से और अधिक जानकारी का अध्ययन अवश्य करें। 

गोयंदका जी का संदेशवाहक आया तो आचार्यश्री ने कहा उनका यहाँ हमेशा स्वागत है। उचित तो यह है कि उन जैसे ऋषिकर्म करने वाले महापुरुष से मिलने मैं स्वयं ही जाऊं लेकिन मैं इस समय एक विशेष व्रत में दीक्षित हूँ। वह जब भी चाहें यहाँ आयें।।

दो या तीन दिन बाद गोयंदका जी का तपोभूमि आना हुआ। आचार्यश्री ने आसन से खड़े होकर उनका स्वागत किया। कुशलक्षेम के बाद गोयंदका जी ने कहा कि हम भी गायत्री का प्रचार करते हैं। इस नाते आप और हम सभी सनातन धर्म की सेवा कर रहे हैं। हमें एक दूसरे का सहयोग करना चाहिये।

आचार्यश्री ने कहा: 

“हम केवल  गायत्री उपासना पर ही केन्द्रित हैं। आप सनातन धर्म के आराध्य सभी रूपों की भक्ति का प्रचार करते हैं। इस नाते आपका दायित्व और काम बड़ा है।”

गोयंदका जी इस विनय से अभिभूत हुए और उन्होंने कहा कि हमारे लायक कोई सेवा हो तो बतायें। 

आचार्यश्री ने कहा:

“आपके पास एक व्यवस्थित तंत्र है। वेद. शास्त्र, उपनिषद, दर्शन आदि ग्रन्थ लुप्त  हो रहे  हैं । उस तंत्र का उपयोग करते हुए वेदों और उपनिषदों के सस्ते सरल संस्करण प्रकाशित करें। स्वाध्याय करने वालों को इससे आसानी होगी।”

गोयंदकाजी ने कहा:

“इस मामले में हमारी मान्यता आपसे थोड़ी  अलग है। आर्य समाज ने वेद-शास्त्रों को सबके लिए सुलभ करा दिया है। लेकिन हम लोग मानते हैं कि यह द्विजों को ही उपलब्ध होना चाहिए। वेद शास्त्रों का अध्ययन करना  हर किसी का अधिकार नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों वर्ण,जातियां  ही गुरुमुख से गायत्री मंत्र की दीक्षा लेकर श्रुति शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं।” 

वर्ण धर्म की चिंता:

आचार्यश्री ने पूछा कि दूसरे वर्गों के लिए क्या कोई उपाय नहीं है?  यदि वे  अध्यात्म विद्या पढ़ना चाहें तो क्या करें? गोयंदकाजी ने कहा कि उनके लिए पुराण ग्रंथ हैं। रामायण महाभारत का अवगाहन कर वे अपना कल्याण कर सकते हैं। वेदशास्त्र सीधे ब्रह्मा के मुख से निकले हैं। उन्हें सुनने  और पढ़ने  के लिए एक विशिष्ट स्तर (level) चाहिए। उस स्तर पर सिर्फ द्विजों की आत्मा ही पहुँच सकती है। वैदिक ग्रंथों का गूढ़ ज्ञान सूत्र-रूपों में है। वैसे भी उसे समझना हर किसी के वश की बात नहीं है। कथा कहानियों के माध्यम से रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों ने उसी सत्य का विस्तार किया है। 

आगे चलने से पूर्व हमें  द्विज का अर्थ समझ लेना  चाहिए  

द्विज शब्द ‘द्वि’ और ‘ज’ से बना है। द्वि का अर्थ होता है दो और ज (जायते) का अर्थ होता है जन्म होना अर्थात् जिसका दो बार जन्म हो उसे द्विज कहते हैं। द्विज शब्द का प्रयोग हर उस मानव के लिये किया जाता है जो एक बार पशु के रुप में  माता के गर्भ से जन्म लेता है  और फिर बड़ा होने के बाद अच्छे संस्कारों से मानव कल्याण हेतु कार्य करने का संकल्प लेता है। द्विज शब्द का प्रयोग किसी एक प्रजाति  या जाति  विशेष के लिये नहीं  किया जाता हैं। मानव जब पैदा होता है तो वह  केवल पशु समान होता है परन्तु जब वह संस्कारवान और ज्ञानी होता है तभी  उसका जन्म दोबारा अर्थात  असली रुप में  होता है।

अपनी बात कहकर गोयंदकाजी चुप हो गये तो आचार्यश्री ने कहा: 

“आप ठीक कहते होंगे। स्थितियों को देखने का अपना-अपना  ढंग है। हमारी मान्यता है कि वेद शास्त्र सहज उपलब्ध नहीं हुए तो आगे चलकर वह लुप्त हो सकते हैं । वेदों का तत्त्वज्ञान हो सकता है हर किसी को समझ न आये लेकिन उपनिषदों का संदेश हर कोई ग्रहण कर सकता है। उसे सुलभ कराने के बारे आपकी क्या राय है? उपनिषदों के लिए तो यह पाबन्दी भी नहीं है कि अमुक व्यक्ति छू सकता है और अमुक नहीं।”

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आज का लेख यही पर समाप्त करने की आज्ञा चाहते हैं  और आप प्रतीक्षा कीजिये आगे आने वाले  बहुत ही रोचक संस्मरण जय गुरुदेव।   

To be continued: 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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2 मई 2022, की 24 आहुति संकल्प सूची:

(1) संध्या कुमार-25, (2 ) अरुण वर्मा -33, (3) सरविन्द कुमार-28, (4) प्रेरणा कुमारी-24   

इस सूची के अनुसार अरुण वर्मा जी गोल्ड मैडल विजेता हैं उन्हें हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई।

सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिनका  हम हृदय से नमन करते हैं, आभार व्यक्त करते हैं और  जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें।  धन्यवाद्


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