1973 की प्राण प्रत्यावर्तन साधना एक विस्तृत जानकारी-4 

परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्राण प्रत्यावर्तन साधना पर चल रही इस अद्भुत श्रृंखला का चौथा भाग आज हम आपके चरणों में प्रस्तुत कर रहे हैं। हर लेख की तरह इसमें भी अपने सहकर्मियों को बहुत कुछ जानने को मिलेगा। कुछ ऐसे प्रश्न जो हमारे पाठक हमसे फ़ोन करके अक्सर पूछते रहते हैं, हो सकता है उनके उत्तर आपको इस लेख में मिल जाएँ और वह भी पूज्यवर के शब्दों में। प्राण प्रत्यावर्तन साधना में साधकों को गुरुदेव से अकेले में बात करने का अवसर दिया जाता था जिसमें उनकी समस्याओं का निवारण किया जाता था। आज के लेख में ऐसे ही कुछ साधकों की व्यक्तिगत समस्याओं से हमें बहुत guidance मिल सकती है। 

आज का लेख आरम्भ करने से पूर्व एक discrepancy शेयर करना चाहते हैं और वह है प्राण प्रत्यावर्तन साधना की अवधि। इस साधना की अवधि कहीं 4 दिन और कहीं 5 दिन अंक्ति की गयी है तो हमारा इसके बारे में कुछ भी कहना उचित न होगा। आजकल चल रहे 5 दिवसीय अन्तः ऊर्जा जागरण शिविर उस स्तर के हैं कि नहीं उसके बारे में हम तब तक कुछ नहीं कहेंगें जब तक पूरी रिसर्च न कर लें। 

तो आइये करें आज की दिव्य पाठशाला का शुभारम्भ संग संग :

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अवधेश प्रताप, नरेन भाई और राधावल्लभ साधकों की समस्याओं का निवारण :

चारों ओर नील अगाध जलराशि लहरा रही है। प्रलय का जैसा वर्णन शास्त्रों या साहित्यकारों ने किया है, उसी तरह का दृश्य है। उस जलराशि में एक कोमल कमल-पत्र तैर रहा है। उस पत्ते पर सांवले सलोने रंग के बालमुकुंद हैं, उनके पांवों में पैंजनिया बंधी हुई हैं। शिशु भगवान दाएं पांव का एक अंगूठा मुंह में लेकर चूस रहे हैं। जैसे उसमें रस का प्रवाह आ रहा हो। उस दृश्य को देखते देखते साधक अवधेश प्रताप की अपनी चेतना लुप्त होने लगी। प्रतीत होने लगा कि भीतर से कोई ज्योति निकली और कमलपत्र पर लेटे बालमुकुंद के कलेवर में जा समाई। फिर धीरे धीरे चित्त हलका होने लगा। इतना हलका हो गया कि अपना आपा ही जैसे गिर गया। अवधेश को प्रतीत होने लगा कि वह स्वयं बालमुकुंद हो गया है। या शिशु भगवान ही उसके अपने रूप में व्यक्त हो रहे हैं। लीला कर रहे हैं।

प्राण प्रत्यावर्तन साधना का यह पहला दिन था। समय रहा होगा सुबह 5:15 और 5:30 के बीच का। सुबह 4:00 बजे ही नींद खुल गई थी। घर पर सामान्य जीवन में सुबह 6 :00-7:00 बजे से पहले बिस्तर छोड़ने का मन नहीं होता। यहां बिना जगाए ही नींद टूट गई। सुविधा के लिए सामने मेज़ पर अलार्म घड़ी रखी थी, लेकिन उसकी जरूरत नहीं हुई। उठते ही स्नानादि से निवृत्त हुआ गया।

शांतिकुञ्ज के मुख्य भवन में ही इसकी उपयुक्त व्यवस्था कर दी गई थी। आरंभ में बने आठ कमरों के बीच दीवारें खिंचवा कर चौबीस कक्ष बना दिए गए थे। कार्यालय के लिए एक बड़ा कक्ष उससे अलग था। चौबीस कक्षों में ही एक कक्ष में अवधेश प्रताप भी ठहरे थे। बाकी अन्य कक्षों में 23 साधक थे। इन चौबीस साधकों को पांच दिन की अवधि में बाहर निकलने की मनाही थी। स्नान आदि के बाद दीपदर्शन, ऊष:पान और दर्शन प्रणाम के अलावा पूरे समय साधना कक्ष में ही रहना था। आश्रम परिसर से बाहर तो दूर, कक्ष के बाहर निकलने या आपस में बातचीत करने पर भी प्रतिबंध था। 

प्राण प्रत्यावर्तन साधना सत्रों की रूपरेखा निजी प्रयासों से ज्यादा “अनुदान और दैवी अनुग्रह” को ग्रहण करने की दृष्टि से निर्धारित की गई थी। पूर्वी अफ्रीका प्रवास से लौटते ही गुरुदेव ने घोषित किया था कि इन सत्रों में भाग लेने वाले साधक अपने आपको ऊर्जा से भरा पाएंगे। दिव्य अनुदानों की वर्षा अनवरत होती रहती है। उसे ग्रहण करने के लिए पात्रता चाहिए। इस पात्रता के लिए साधना का अनुशासन पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए। प्राण प्रत्यावर्तन साधना में उसी अनुशासन का अभ्यास होगा। 

पांच दिन के सत्र में पहला ध्यान अपने आपको बाल भगवान के रूप में अनुभव करना था। उस अनुभूति से गुज़रते हुए कई साधकों ने अनुभव किया कि बाद की ध्यान धारणा में वे अपने चित्र को पहले से ज्यादा निर्मल और पवित्र बना कर गए थे। 

गंदगी से सने शिशु को दूर ही रखते हुए मां जैसे धो पोंछकर, नहा धोकर साफ करती है और फिर गोद में उठाती है, वैसी अनुभूति साधकों को हुई। भाव-प्रवण साधकों ने बालमुकुंद का ध्यान करने के बाद अपनेआप को कमलपत्र से उठकर गायत्री माता की गोदी में भी हंसते-खेलते हुए अनुभव किया। प्रतीति हुई कि मां उन्हें स्नेह से दुलार रही है, लाड़ लड़ा रही है।

इस ध्यान के बाद खेचरी मुद्रा का अभ्यास था। जिह्वा को उलटकर तालू से लगाने और ब्रह्मरंध्र से अमृत की बूंदे टपकने का अनुभव। यह अनुभूति भाव जगत में ही होती थी। इसके साथ दिव्य लोकों से उच्चस्तरीय अनुदान बरसने की कल्पना भी की जाती। भाव और कामना को कुछ साधकों ने सपने की तरह भी देखा। जागते हुए देखा गया सपना जिसे अंग्रेजी में Day dream या Reverie कहते हैं 

परिवार में मौजूद विघ्न

शिविर में आए साधकों को प्रतिदिन गुरुदेव से भेंट के लिए अलग समय मिलता था। उस समय साधक अकेला ही होता था । गुरुदेव से साधना उपासना के बारे में चर्चा की खुली छूट थी। वे अपनी व्यक्तिगत बातें भी कह लेते। उनकी लौकिक और आत्मिक समस्याओं को गुरुदेव बराबर महत्त्व देते हुए सुनते थे। गुजरात से आए एक साधक नरेन भाई ने परामर्श के समय एक विचित्र समस्या रखी। उन्होंने कहा कि आप बताते हैं कि गायत्री मंत्र की उपासना से तुरंत कल्याण होता है। लेकिन मैं तो जब भी जप करने बैठता हूँ मन में क्लेश होता है? नवरात्रि में साधना का संकल्प लेता हूं लेकिन कोई न कोई बाधा आ ही जाती है। 

गुरुदेव ने नरेन भाई के पारिवारिक और व्यावसायिक जीवन के बारे में पूछा। वह मुंह जबानी बताने लगे। गुरुदेव ने उनके पारिवारिक जीवन में ही साधना का विघ्न पाया। वह समाधान करते हुए उन्होंने कहा कि तुम पत्नी के साथ सम्मान से पेश आया करो। उसके प्रति क्रूर व्यवहार करने के कारण ही बाधा आती है। नरेन भाई ने बताया कि वह तो पत्नी को कभी हाथ भी नहीं लगाते। शिक्षा दीक्षा की दृष्टि से वह काफी पिछड़ी हुई है और कई बार नुक्सान भी कर देती है। शिक्षित और संस्कारी न होने से घर आने जाने वाले लोग भी परेशान होते हैं। इसलिए कभी-कभार डांट जरूर देता हूं।

गुरुदेव ने कहा, “मत डांटा करो। अगर वह शिक्षित और संस्कारी नहीं हो पाई तो इसके लिए तुम भी बराबर के ज़िम्मेदार हो।” अभिभावक की तरह यह सीख देने के बाद गुरुदेव ने कहा, “पत्नी को पीड़ित करने के बाद तुम्हारी अपनी चेतना में बैठी शक्ति ( प्राणशक्ति) चिंतित होती है। गायत्री साधना में प्राणशक्ति ही तो मूल है। वह क्षुब्ध होती है तो उपासना में मन कैसे लगेगा? बाधाएँ आएंगी ही आएंगी।”

नाहरगढ़ राजस्थान से एक साधक राधावल्लभ ने कहा कि उन्हें उपासना के बाद रोष बहुत आता है। वे पंचलक्षी अनुष्ठान करते थे अर्थात वर्ष भर में पांच लाख गायत्री मंत्र का जप और ध्यान। सहस्रांशु अर्थात एक हजार गायत्री मंत्र का प्रतिदिन जप। नवरात्रियों, पूर्णिमा, एकादशी और रविवार के दिनों में तो अधिक जप करना होता था। इन दिनों वे इतने कुपित हो जाते थे कि परिवार और पास पड़ोस के बच्चे भी उनके पास नहीं फटकते थे। गुरुदेव ने राधावल्लभ को अपने बारे में और अधिक बारीकी से बताने को कहा । सब सुनने और साधक के चेहरे को गौर से देखने के बाद वे बोले, “तुम्हे ब्रह्मचर्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यौन शुचिता और संयम के क्षेत्र में ढील छोड़ने के कारण ही स्वभाव में बदलाव आ गया है। उपासना से जो आत्मबल मिलता है, प्राणशक्ति का संचय होता है वह सब भोगवासना में खर्च हो जाता है।

गुरुदेव का परामर्श था कि गायत्री साधक को अधिक से अधिक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। पूरी तरह संयम से रहा जा सके तो सबसे अच्छा है। नहीं रहा जाए तो यथासंभव तो रहना ही चाहिए।

सिद्ध साधक माधवाचार्य का किस्सा:

एक साधक की समस्या थी कि वह संयमी था, सहृदय भी था और समर्पित भी। उसे लग रहा था कि साधना फिर भी सफल नहीं हो रही है। 

गुरुदेव ने उसे गायत्री के सिद्ध साधक माधवाचार्य का किस्सा सुनाया। माधवाचार्य ने बारह वर्ष तक निरंतर साधना की थी। फिर भी उन्हें कोई प्रगति होती नहीं दिखाई दे रही थी। निराश होकर उन्होंने गायत्री साधना छोड़ दी और किसी तांत्रिक के कहने पर भैरव की उपासना करने लगे। भैरव की साधना एक वर्ष में ही सफल होने लगी। साधक को भैरव की पुकार सुनाई दी। पुकार सुन कर जब सामने देखा तो कोई नहीं था। फिर आगे पीछे देखा वहां भी किसी दैवीशक्ति के दर्शन नहीं हो रहे थे। पूछा कि आप कौन हैं ? उत्तर आया “तुम्हारा आराध्य भैरव” पूछा कि सामने क्यों नहीं आते तो जवाब था 

“सभी उग्र साधनाएं गायत्री उपासना के सामने हलकी पड़ती हैं। साधक में इतना तेज आ जाता है कि नई साधनाओं के इष्ट सामने नहीं आ पाते।” ऐसी है गायत्री साधना की शक्ति। अब माधवाचार्य के चौंकने की बारी थी। उन्होंने पूछा कि गायत्री साधना की सफलता के प्रमाण अभी तक क्यों नहीं मिल रहे तो भैरव का उत्तर था कि उससे “कषाय कल्मष” धुले हैं। अब कोई अवरोध नहीं है। गुरुदेव ने संक्षेप में यह घटना सुनाई। इसके बाद उन साधक का संशय मिट गया था। वंदनीय माताजी का गया हुआ प्रज्ञा गीत आप सबने सुना होगा। इस सन्दर्भ में प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ : 

हमने आँगन नहीं बुहारा, कैसे आयेंगे भगवान्।

मन का मैल नहीं धोया तो, कैसे आयेंगे भगवान्॥

हर कोने कल्मष-कषाय की, लगी हुई है ढेरी।

नहीं ज्ञान की किरण कहीं है, हर कोठरी अँधेरी।

आँगन चौबारा अँधियारा, कैसे आयेंगे भगवान्॥

हृदय हमारा पिघल न पाया, जब देखा दुखियारा।

किसी पन्थ भूले ने हमसे, पाया नहीं सहारा।

सूखी है करुणा की धारा, कैसे आयेंगे भगवान्॥

अन्तर के पट खोल देख लो, ईश्वर पास मिलेगा।

हर प्राणी में ही परमेश्वर, का आभास मिलेगा।

सच्चे मन से नहीं पुकारा, कैसे आयेंगे भगवान्॥

निर्मल मन हो तो रघुनायक, शबरी के घर जाते।

श्याम सूर की बाँह पकड़ते, शाग विदुर घर खाते।

इस पर हमने नहीं विचारा, कैसे आयेंगे भगवान्॥

 To be continued:

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। 

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24 आहुति संकल्प 

25 अप्रैल,2022 के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत 5 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) संध्या कुमार-28 , (2 ) अरुण वर्मा -32,(3) सरविन्द कुमार-33,(4 )रेणु श्रीवास्तव-24, (5) प्रेरणा कुमारी -27 

सरविन्द कुमार जी गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं, उनको हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी-अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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