1973 की प्राण प्रत्यावर्तन साधना- एक विस्तृत जानकारी-2

19 अप्रैल के ज्ञानप्रसाद में हमने लिखा था कि- “इस विस्तृत साहित्य की दिव्यता का भंवर हमें डुबो ही न दे, लेकिन हमें अपने गुरु के मार्गदर्शन और समर्पित सहकर्मियों पर अटूट विश्वास है -वह हमें बचा लेंगें।” आज लगभग ऐसी ही situation आती हुई दिख रही थी। 2022, 1996 ,1990 1974 ,1972 की अखंड ज्योति पत्रिका ,चेतना की शिखर यात्रा आदि के अध्यन ने हमें इस तरह डुबो दिया था कि डर था कि आज का ज्ञानप्रसाद पोस्ट हो भी पायेगा कि नहीं लेकिन कैसे न होता -”जिसके सिर ऊपर तूं स्वामी वोह दुःख कैसा पावे”

तो हम आपके समक्ष हैं -सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ,गुरुदेव के आशीर्वाद के साथ। 

कल वाले लेख में हमने प्राण प्रत्यावर्तन साधना के दौरान आवास और आहार का संक्षिप्त सा वर्णन दिया था। Real -life साधना, साधना के सोपान(steps), टाइम टेबल आदि तो कल वाले ज्ञानप्रसाद में प्रकाशित् करेंगें, लेकिन आज हम इन साधना सत्रों में आने वाले साधकों के चयन (selection process और eligibility) पर कुछ दृष्टि डालेंगें। इस process को जानना इसलिए आवश्यक है कि जब हम Real-Life साधना को देखेंगें तो हमारे मुँह से अवश्य ही निकलेगा – Oh my God, Really unbelievable 

अभी बहुत कुछ बाकी है- जिन्होंने यह साधना की थी उनकी अनुभूतियाँ भी शेयर करनी हैं। तो चलें नज़र डालें Selection Criteria पर। 

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अगस्त 1972 की अखंड ज्योति में परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं जिन्होंने अध्यात्म तत्व ज्ञान का स्वरूप समझ लिया है, उस दिशा में चलना आरम्भ कर दिया है और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सच्चे मन से इच्छुक हैं उन्हें हम अपने प्राणों का एक अंश देकर इस योग्य बनाना चाहते हैं कि वे हमारी जलाई मशाल को भविष्य में भी अखण्ड बनाये रख सकें, अध्यात्म की समर्थता एवं प्रमाणिकता के साक्षी बनकर प्रकाश स्तम्भों की भूमिका सम्पादन कर सकें। प्रत्यावर्तन अनुदान (Transfer of Grants) का यही प्रयोजन है। गुरुदेव लिखते हैं कि हम व्याकुल हैं कि हम अपनी उपार्जित पूँजी जल्दी से जल्दी बाँटकर, वितरण करके अपने भार को हलका कर लें और जिस तरह खाली हाथ आये थे उसी तरह पाप पुण्य की पूँजी समाप्त करके प्रभु के चरणों में हलके-फुलके खाली हाथ जा पहुंचे। हमारे पाठकों को अवश्य ही आभास हो रहा होगा कि गुरुवर बिल्कुल उसी प्रकार चिंतित हैं जैसे माता पिता अपनी जीवन भर की अर्जित सम्पति को लेकर होते हैं। वह भी चाहते हैं कि उनकी श्रम से अर्जित की गयी सम्पति किन्ही योग्य हाथों में ही सौंपी जाये। गुरुदेव इसीलिए पात्रता का निरिक्षण कर रहे थे। 

गुरुदेव आगे बता रहे हैं कि शारीरिक पाप का तो पता नहीं, मानसिक मोह, क्षोभ के कुछ कल्मष हमारे अंदर अवश्य जमे होंगे, उन्हें भी हमने अपनी प्रचंड तप साधना की अग्नि में जलाकर नष्ट कर दिया है। जब अपने कल्मष जल गये तो हमने दूसरों के लिए भी कठोर प्रायश्चित किये और उन्हें दण्ड दुष्परिणामों से बचाया। यह क्रम अभी भी जारी है और आगे भी जारी रहने वाला है।

तप साधना के जो भी पुण्य बचे हैं वोह भी हमें समाप्त करने हैं क्योंकि स्वर्ग और ऐश्वर्य जैसे फल भुगतने के लिए हमें फिर बन्धन में बँधना पड़ सकता है। इसलिए उपार्जित पुण्य और तप की पूँजी भी हम जमा नहीं रखना चाहते। प्रत्यावर्तन उसी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इस अनुदान का थोड़ा सा भी अंश मिल सकेगा वे निश्चित रूप से उसके लिये भाग्य की सराहना जन्म-जन्मांतरों तक करते रहेंगे।

प्रत्यावर्तन अनुदान की सूचना छपने पर बड़ी संख्या में आत्म-विद्या में अभिरुचि रखने वालों के कितने ही पत्र आये। इन सभी को इस प्रतीक्षा में सुरक्षित रख लिया गया है कि उनकी पात्रता का परिचय प्राप्त किया जाय। उपजाऊ भूमि में बीजारोपण से ही श्रम की सार्थकता होती है। विशेष प्रकार की सीप में ही स्वाति बिन्दु मोती बनते हैं। दुर्बल को दूसरे का रक्त देकर शक्तिशाली बनाया जाता है लेकिन उस क्रिया को सम्पन्न करने से पूर्व डॉक्टर यह सुनिश्चित कर लेता है कि रक्त देने और लेने वाले का blood ग्रुप देने लायक है भी कि नहीं। यदि उसमें अन्तर हो तो रक्तदान का प्रयोजन पूर्ण न हो सकेगा। यही बात इस अध्यात्म अनुदान के सम्बन्ध में है। यदि ग्रहण करने वाले का अन्तः स्तर निम्न स्तर का हो तो उसे कुछ भी लाभ न मिल सकेगा उलटा दाता का अनुदान रेत में घी डालने की तरह निरर्थक चला जायेगा।

अपनी गुरुसत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर परमपूज्य गुरुदेव ने ऋषि परम्परा का बीजारोपण किया। जून 1972 में देवनमानवों को विनर्मित करने के लिए अपना प्रचंड तपोबल संचित कर पूज्यवर वापिस लौट आये। इस एक वर्ष की अवधि में गुरुसत्ता द्वारा क्या-क्या निर्देश दिए गए,गुरुदेव ने इनका खुलासा स्वयं किया है। गुरुदेव बताते हैं कि दादा गुरु ने निर्देश दिया कि तुम्हें तीर्थ के रूप में एक संस्थान विकसित करना होगा और उन प्रवृत्तियों का आरंभ करना होगा जिन्हें पूर्व काल में ऋषि करते रहे हैं। वह परम्पराएँ लुप्त प्रायः हो जाने से उन्हें अब पुनर्जीवन प्रदान करने की आवश्यकता होगी। 

मूल कार्य यह था कि शांतिकुंज में, जो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली रही है, ऋषियों द्वारा संचालित समस्त गतिविधियों को चलाया जाय। इसके लिए उन्होंने “महत्वपूर्ण परामर्श व प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र” सबसे पहले आयोजित किए। वस्तुतः गुरुदेव अपने तप की एक प्रखर चिंगारी सुसंस्कारी आत्माओं को देकर उन्हें ज्योतिर्मय बनाना चाहते थे ताकि नवसृजन के लिए यह आत्माएं एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा सके। केवल ऐसे ही व्यक्तियों को स्वीकृति दी गयी जिनमें ग्रहण करने की पात्रता हो। स्थान तो पहले से ही सिद्धपीठ था, उर्वर अंतःकरण में प्राण अनुदान का खाद-पानी देकर उस बीज को अंकुरित, पल्लवित करना था जो असंख्यों परिजनों में से कुछ सौ में ही विद्यमान पाया गया। 

यह एक महज संयोग नहीं है कि इन दिनों कार्यकर्ताओं की जो सशक्त टीम पूज्य गुरुदेव के बाद गुरुतर दायित्वों को सँभाल रही है, वंदनीया माताजी के मार्गदर्शन में रहते भी उनके उन सब निर्धारणों को क्रिया रूप देती रही, आज भी पूज्य गुरुदेव जो दायित्व अदृश्य जगत से सौंप रहे हैं, वह टीम प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों की अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी है। गुरुदेव लिखते हैं कि प्रत्यावर्तन की क्रिया से तप द्वारा अर्जित की गयी पूँजी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इसका थोड़ा सा भी अंश मिल सका, वे निश्चित रूप से उसके लिए अपने भाग्य की सराहना जन्म-जन्मान्तरों तक करते रहेंगे।

प्रत्यावर्तन सत्र फरवरी 1973 से आरंभ किये गये एवं फरवरी 1974 तक चले। ये विशुद्धतः साधना सत्र थे। विभिन्न मुद्राओं, त्राटक योग, सोऽहम्, नादयोग, आत्मब्रह्म की दर्पण साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा। 

उपासना पद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदु योग, आत्माराधना, तत्वबोध, नाद योग के दस साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने, प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक परमपूज्य गुरुदेव से मिलने जाते, तो गुरुदेव उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते । उनके वात्सल्य का स्पर्श पाकर सभी अपनी-अपनी गलतियों को कह सुनाते । साथ ही व्यक्तिगत समस्याओं पर भी उसी दिन आदान-प्रदान, परामर्श कर लिया जाता । ये दोनों कार्य प्रथम दिन ही पूरे हो जाते ताकि चार दिन बिना इस स्तर का परामर्श किए हुए आवश्यक साधनाक्रम पर मन एकाग्र रखा जा सकें।

साधनाक्रम को सामान्य शौच,स्नान, भोजन, विराम के अतिरिक्त छह घण्टे रखा गया था । शारीरिक श्रम आठ घण्टा, मानसिक श्रम सात घण्टा और आध्यात्मिक श्रम छह घण्टे की सन्तुलित मर्यादा निर्धारित है; उसीके अनुरूप इस अवधि का निर्धारण किया गया था। यों मध्याह्नकालीन एक घण्टे का प्रवचन और सायंकाल एक घण्टे का संगीत भी जोड़ लिया जाय तो यह अवधि आठ घण्टे भी गिनी जा सकती है। हर साधक को प्रतिदिन 15 मिनट व्यक्तिगत परामर्श के लिए एकान्त अवसर मिलता इसलिए उसे सवा आठ घण्टे भी गिना जा सकता है । शेष समय स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के लिए था।

To be continued:

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। 

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24 आहुति संकल्प 

18 अप्रैल के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत 3 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) संध्या कुमार-27 , (2 ) अरुण वर्मा -27 (3) रेणु श्रीवास्तव-28 

तीनों ही सहकर्मी गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं, उनको हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्

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