“सप्ताह का एक दिन पूर्णतया अपने सहकर्मियों का” 16 अप्रैल ,2022

“सप्ताह का एक दिन पूर्णतया अपने सहकर्मियों का” 16  अप्रैल ,2022

शनिवार की  सम्पूर्ण प्रस्तुति  अपने सहकर्मिओं का होती  है तो हमारा कुछ भी कहना  मुनासिब  नहीं  होता। हम केवल सहकर्मियों द्वारा भेजी गयी contributions को एडिट और compile करके आपके समक्ष प्रस्तुत करते  हैं।  

आज के इस स्पेशल सेगमेंट में 3  सहकर्मियों की contributions  हैं। सबसे पहले आप हमारी सहकर्मी आदरणीय राधा त्रिखा द्वारा compile की गयी आंवलखेड़ा यात्रा का संक्षिप्त विवरण पढेंगें। यह संक्षिप्त विवरण  हमारे सहकर्मियों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। ऐसे  विवरणों से  और परिजन भी प्रेरित हो रहे हैं ,हम समय समय पर सबकी प्रस्तुति आपके समक्ष लाते रहेंगें।  कुछ समय पूर्व हमने अपने   आंवलखेड़ा प्रवास की कुछ वीडियोस अपलोड की थीं,आप उन्हें भी देख सकते हैं ; अवशय ही परमपूज्य गुरुदेव के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा।  आप केवल सर्च बार में आंवलखेड़ा ही लिखिए आपको सब कुछ मिल जायेगा। उसके बाद आप प्रेमशीला मिश्रा जी द्वारा भेजा हुआ महिला प्रज्ञा मंडल मानस इन्क्लेव इन्द्रानगर लखनऊ  का अपडेट पढेंगें। प्रतिदिन पोस्ट होने वाले  कमैंट्स में से आज हमने एक कमेंट सेलेक्ट किया है जिसने हमें बहुत ही प्रभावित किया। आदरणीय विदुषी बहिन जी का यह कमेंट आपने अवश्य ही पढ़ा होगा  लेकिन हो सकता कइयों ने मिस कर दिया हो ,उनके पढ़ने के लिए यह एक स्वर्ण  अवसर है।  अवश्य ही इसी तरह के और भी अनगनित कमैंट्स होंगें जिन्होंने  आपके ह्रदय के तारों को छुआ होगा, हमारे लिए तो बहुत हैं। यही है ज्ञान प्रसार और हमारे गुरुदेव का विचार क्रांति अभियान। 

अंत में 24 आहुति संकल्प सूची तो है ही।    

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ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवारजनों के लिए आंवलखेड़ा यात्रा का संक्षिप्त वर्णन :

प्रस्तुतकर्ता आदरणीय राधा त्रिखा :

बात 24,मार्च 2022 की है जब मैं अपनी बेटी ऋतम्भरा व पति राजीव  के साथ बेटे आलोक को मिलने के लिए अपने घर जम्मू से नोएडा उत्तरप्रदेश जाने के लिए दिल्ली रवाना हुई। नोएडा  पहुँच कर हमारा मन हुआ कि  सेकटर-12  स्तिथ गायत्री शक्ति पीठ जाकर परमपूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म आशीर्वाद प्राप्त किया जाए।  अगले ही दिन वहाँ पहुँचकर  सूक्ष्म सत्ता रुपी प्रखर प्रज्ञा व सजल श्रद्धा स्थल पर प्रणाम कर गुरु जी व माता जी का सूक्ष्म आशीर्वाद  प्राप्त किया। हम वहां पर थोड़ी देर ही रुके।  वापिस आ रहे थे तो मैंने दोनों बच्चों  से कहा कि आप  शैक्षिक विद्या तो  ग्रहण कर ही चुके हो, अब तुम्हारा अध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने का बहुत ही उत्तम अवसर है। इसलिए तुम दोनों को  अपने जीवन के संस्कारों के संदर्भ में परम पूज्य  गुरुदेव के सूक्ष्म सानिध्य में  “गुरुदीक्षा संस्कार” प्राप्त करना चाहिए  ताकि शेष जीवन को अध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से  अपना व समाज का सुधार कर सको। दोनों बच्चों ने हर्षपूर्वक यह सुझाव  स्वीकार कर लिया और बेटे  आलोक ने  सुझाव दिया कि  दीक्षा संस्कार परम पूज्य  गुरुदेव की जन्मभूमि आवलखेड़ा स्थित शक्तिपीठ में  क्यों न सम्पन्न   करवाई जाए।  आलोक 2021  में  आंवलखेड़ा  होकर आया था और  बचपन से ही  गुरुदेव व माता जी की ओर आकर्षित होता आया था। यही कारण था कि  दीक्षा के लिए पूज्यवर की जन्मभूमि आंवलखेड़ा का चयन करना चाहता  था। इस सुझाव से हम सबका  मन श्रद्धा और हर्ष से भर  गया एवं हमने अपनेआप को बहुत ही सौभाग्यशाली माना।  मेरा तो पहले से  ही आंवलखेड़ा जाने का मन था और इसका भी एक अति महत्वपूर्ण कारण था।  

हमारी बेटी ऋतम्भरा का जन्म अक्टूबर  1995  को हुआ था।  युगसंधि महापुरुषचरण की वेला में प्रथम पूर्णहुति के उपलक्ष्य में गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा पूरे विश्व में अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला आयोजित की गयी  थी जिसका सबसे पहला आयोजन  पावन भूमि आंवलखेड़ा में ही हुआ था।  बेटी ऋतम्भरा के  जन्म के मात्र 25  दिन के भीतर ही नवम्बर 2 -7, 1995 को यहाँ यज्ञ का आयोजन हुआ जिसमें  पिता राजीव, ऋतम्भरा की बुआजी व फूफा जी के साथ शामिल हुए थे परन्तु  मैं जाने  की स्थिति में नहीं थी। तब से मैं बच्चों के साथ इस दिव्य भूमि जाने की महत्ता अनुभव कर रही थी लेकिन जैसे हम अक्सर कहते हैं कि जब तक गुरुदेव का निर्देश न हो कुछ भी संभव नहीं है 

जब बच्चों से आंवलखेड़ा शक्तिपीठ में दीक्षा संस्कार का सुझाव आया तो हमें ऐसा लगा जैसे  परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय  माता जी  हमें अपने बच्चों की तरह अपने ही  घर बुलाने का  संयोग सृजित कर रहे हैं। ऐसे हैं हमारे गुरुदेव !

अगले ही दिन हमने आंवलखेड़ा  पहुँच कर उस पवित्र भूमि, जहाँ कभी गुरुदेव के दिव्य चरण पड़े होंगें, की रज को अपने मस्तक  पर धारण किया। मेन रोड स्थित  शक्तिपीठ में  प्रवेश करते ही  बच्चों के भविष्य को लेकर मन में चल रही  जो भी  तनाव की स्थिति थी निवारण होता अनुभव किया। यही है इस पावन भूमि की दिव्यता। दिव्य वातावरण का प्रभाव अटल है, इसीलिए परम पूज्य गुरुदेव  ने बार-बार कहा है कि  शांतिकुंज में पर्यटक की भांति  न आया जाये बल्कि  3 -4 दिन रहने का प्रोग्राम बना कर आया  जाये। यहाँ पर रह कर ही  आपको युगतीर्थ की दिव्यता का अनुभव होगा, बिलकुल उसी प्रकार जैसे TB जैसे रोगों का उपचार  सैनिटोरियम के प्राकृतिक वातावरण में रह कर ही संभव होता  है।  

आवास और दीक्षा संस्कार की रूपरेखा समझने के उपरांत  हम पूज्यवर की जन्मस्थली और पैतृक हवेली के दर्शन करने गए जहाँ गुरुदेव ने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष व्यतीत किये थे। गुरुदेव की जीवन यात्रा जो कभी हमने वीडियो य लेखों के माध्यम से जानी थी  आज एक साक्षात चलचित्र की भाँति प्रकट होती   दिखी ।  ऐसा लग रहा था गुरुदेव व माता जी प्रतक्ष्य  हमें देख रहे हैं। गुरुदेव की कोठरी  जहाँ  1926 में हिमालयवासी  दादागुरु ने मात्र 15 वर्ष की आयु में  गुरुदेव को प्रकाश पुंज द्वारा दर्शन देकर कृतार्थ किया, हमारा केद्र बिंदु बना रहा। आत्मा इस प्रकार तृप्त हो रही थी कि  शब्दों में वर्णन करना असंभव सा लग रहा है। 

तदुपरांत हमें  पूज्यवर के माता जी ( जिन्हे गुरुदेव ताई कहकर पुकारते थे)  के नाम पर स्थापित दानकुंवरि महाविद्यालय के दर्शन का सौभाग्य भी  प्राप्त हुआ।

मेरे पति राजीव  1995 में सम्पन्न हुई  यात्रा व उस समय के अश्वमेध यज्ञ के महत्वपूर्ण संस्मरणों का साथ साथ में वर्णन करते   रहे। अगले दिन सम्पन्न  होने वाले दीक्षा संस्कार की मधुर  यादों में खोने के साथ ही दिन भर की थकान व समय बचाने के कारण हम नींद में खो गए।

पावन जन्मस्थली  से  सूर्यदेव ने ठीक समय पर सभी कार्य निपटा दिए और हम निर्धारित समय पर शक्तिपीठ की  यज्ञशाला पहुँच गए। पूर्व नियोजित रूपरेखा के अनुसार सम्पूर्ण  वैदिक रीति से दोनों बच्चों  का दीक्षा संस्कार संपन्न हुआ। समस्त संस्कार  पूर्णतया निशुल्क, निविघ्न तथा हर लिहाज से उत्कृष्ट  एवं प्रशसनीय रहे । 

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवारजनों को हम बताना चाहेंगें की  आंवलखेड़ा क्षेत्र  में हमारा कोई भी खर्चा नहीं हुआ क्योंकि सब कुछ निशुल्क था।  दिव्य  वातावरण आवास, पौष्टिक भोजन, गौमाता का शुद्ध दूध व छाछ,  माँ गायत्री का दुलार और अपने आराध्य परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी  का आशीर्वाद पाकर हम सब अपने आप को  धन्य महसूस कर रहे थे। 

अखिल विश्व गायत्री परिवार के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए और ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  का धन्यवाद् करते हुए, जिसके माध्यम से हमें यह वृतांत लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ,अपनी बात यहीं समाप्त करती हूं। इस अद्भुत प्लेटफॉर्म को नमन है जहाँ हर कोई अपने गुरु के प्रति अपने विचार व्यक्त करने को  उत्सुक है। 

जय गुरुदेव 

समर्पित सहकर्मी राधा त्रिखा 

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 प्रेमशीला मिश्रा जी द्वारा भेजा गया अपडेट

दिनांक 9-4-2022 तिथि चैत्र अष्टमी नवरात्रि माँ महागौरी का पूजन महिला प्रज्ञा मंडल मानस इन्क्लेव इन्द्रानगर लखनऊ के  प्रांगण में  आदरणीय पूनम दीदी एवं डॉक्टर केसी शर्मा जी द्वारा संपन्न कराया गया।  पूजन, हवन  के उपरांत माता महागौरी का पूजन श्रंगार अर्पण कर किया गया।  बहनों ने देवी गीत गाकर वातावरण भव्य कर दिया, साथ ही “कुमारी राम्या” का जन्मोत्सव भी मनाया गया, आरती हुई। तत्पश्चात डॉक्टर साहब ने गुरुदेव के युग निर्माण के सत संकल्प के पंद्रहवें सूत्र: सज्जनों को संगठित करने,अनीति  से लोहा लेने, नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेने एवं  सोलहवें सूत्र: राष्ट्रीय एकता, समता के प्रति निष्ठावान रहना , जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, संप्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव नहीं रखना  की व्याख्या कर सभी उपस्थित परिजनों को  जागरूक किया। कामना करते हैं कि परमपूज्य  गुरुदेव की कृपादृष्टि हम सब पर यूं ही बनी रहे। 

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विदुषी बंता जी का selected comment :

सभी को प्रणाम आज का विषय मन के अंदर जो भी कूडा कर्कट है अर्थात जो भी कई तरह की भ्रान्तियाँ जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है तथा जिनका आज के परिवेश में कोई औचित्य नहीं है उसे भी लोग अपनी संकिर्ण मानसिकता के कारण अपनाए हुए हैं।धार्मिक संकीर्णता आज भी खूब फल फूल रही है कैसे धर्म के नाम पर दूसरे देशों व गलत व्यक्तियों के सम्पर्क में आने के कारण जिस थाली में खा रहें हैं उसी में छेद कर रहें हैं पढ़े लिखें व्यक्तियों का भी brain wash किया जा रहा है। आम गरीब व अनपढ़ व्यक्तियों की तो बात ही छोड़ दो आपने पौधे का बहुत अच्छा उदाहरण दिया है परन्तु यदि मन भी स्वाधीन है शिक्षा भी है विवेक नहीं है तो उस शिक्षा का भी कोई महत्व नहीं है संकिर्ण मानसिकता ही धार्मिक कट्टर वाद को जन्म देती है। इसके लिए चाहिए अनुकूल संगति सकरात्मक विचारकि जैसे कल के लेख में हम स्वतंत्र विचारों के ऊपर चर्चा कररहे थे कि किसी के कहने मात्र से उसके पीछे पीछे नहीं चलना चाहिए। धार्मिक उन्माद कोई भी हों उसका शालीनता से पालन होना चाहिए न कि दंगे फ़साद के द्वारा। संकिर्ण मानसिकता के लिए मानसिक व्यायाम का होना बहुत जरूरी है जैसे मन को शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की जरूरत होती है उसी प्रकार मस्तिष्क को आत्मा परिपुष्ट करने के लिए प्राणायाम, एकाग्रता स्वस्थ चिंतन मनन, अच्छा साहित्य व सुसंगति की महती आवश्यकता होती है। गलत राह पर जाने से पहले अपने अंतर्मन में झांको  टटोलो विवेक से काम लो तथा उसके दुशपरिणामो का ध्यान रखा जाए तो व्यक्ति अपनी जिंदगी को संवार सकता है।कई बार ऐसा देखा जाता है किसी ने कुछ कह दिया वह बात दूसरे व्यक्ति के दिमाग़ में ऐसे घर कर जाती है कि वह उससे बाहर ही नहीं निकल पाता और मानसिक रोग का शिकार होजाता है। इसलिए स्वस्थ चिंतन मनन ही स्वस्थ शरीर को परिपुष्ट बनाता है। आज के परिवेश में देखा जाए तो इस लेख की महती आवश्यकता है जिसे संध्या बहनजी व आ. डॉ. सा. के कर कमलों के द्वारा सभी को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ व जिनके भी उन्मादी दिमाग़ है सोचने पर मजबूर होंगे। इस लेख के लिए आ. डॉ. का व संध्या जी का हार्दिक धन्यवाद व आभार नमन जय माँ गायत्री शुभदिन के साथ शुभ प्रभात

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24 आहुति संकल्प 

आदरणीय BK शिवानी वर्मा जी की वीडियो  के अमृतपान उपरांत 5    समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) संध्या कुमार-24, (2 ) अरुण वर्मा -40, (3) रेणू श्रीवास्तव-26 ,(4) सरविन्द कुमार -25 , (5 ) प्रेरणा कुमारी-25 , 

सरविन्द कुमार जी 40   अंक प्राप्त करके गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं, उनको  हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्

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