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धर्म की परिभाषा क्या है ?

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार  धार्मिक, निष्ठावान सदस्यों का एक बहुत छोटा सा समूह है जिसका  धर्म में अटूट विश्वास है। आज जब धर्म में आस्था रखने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है और ऐसे लोग जो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखते उनकी संख्या में बढ़ोतरी देखी  जा रही है तो धर्म को समझना, इसकी परिभाषा का analysis करना, धर्म के अर्थ को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जहाँ विश्व भौतिकता की भागदौड़ और मृगतृष्णा में अपना अस्तित्व खो रहा है, हम सबका कर्तव्य बनता है कि  हम  धर्म के विषय पर गंभीरता से चिंतन करें, इसे समझें, चर्चा करें और अगर हमें समझ आ जाये तो फिर औरों को भी समझाने का प्रयास करें। अपनी रिसर्च के दौरान हमें एक आर्टिकल मिला जिसका शीर्षक है : “The World’s Newest Major Religion: No Religion.”  जिज्ञासा हुई कि  देखा तो जाये यह “No religion”  क्या है। वह सभी लोग जो किसी भी  धर्म में विश्वास नहीं रखते इस श्रेणी में आते हैं। जनगणना के प्रश्नों की लिस्ट  में एक प्रश्न अपना धर्म बताना भी  होता है।  इस प्रश्न के उत्तर में लोग “None” लिखते हैं।

हम सभी इस बात से सहमत होंगें कि धर्म के विषय पर चर्चा करना बहुत ही संवेदनशील होता है क्योंकि सबकी अपनी अपनी राय,आस्था, वर्षों पुराने अटूट सम्बन्ध को ठेस पहुँचने के डर से यह विषय controversial हो जाता है। लेकिन हम अपने इस साधारण से प्लेटफॉर्म से केवल ज्ञान प्रचार-प्रसार का प्रयास करते हुए आज से आरम्भ हो रही लेख श्रृंखला में धर्म से सम्बंधित कुछ बेसिक प्रश्नों को  समझने का प्रयास करेंगें।  हमारे सभी सहकर्मी बहुत ही सूझवान, शिक्षित एवं अनुभवी हैं और इस ज्ञानअमृत को समझने और प्राप्त करने में सामूहिक प्रयास करेंगें-कई बार देखने में आया  है कि जो बात लेखों में नहीं लिखी जा सकती है, कमैंट्स के द्वारा communicate हो जाती है। इसीलिए हम करबद्ध निवेदन करते रहते हैं कि कमैंट्स के सदृढ़ माध्यम को और  गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।    

आने वाले लेखों का आधार परमपूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित दिव्य पुस्तिका “धर्म की सुदृढ़ धारणा” है। आदरणीय संध्या कुमार जी अपनी उत्तम लेखनी से इन लेखों को हम सबके समक्ष लाएँगीं और हम  अपने अल्पज्ञान से जो कुछ  भी बन पायेगा, अनवरत प्रयासरत रहेंगें ।  

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धर्म का अर्थ:

धर्म का अर्थ मुख्यत: ईश्वरीय, नैतिक व प्राकृतिक नियमों  से है  पर साथ ही इसमें अन्य सामाजिक मान्यता प्राप्त नियम भी सम्मिलित है। अत: धर्म का अर्थ हुआ: किसी कार्य, स्थान या परिस्थिति विशेष के लिए बनाए गए कायदे-कानून, रुल्स, प्रोटोकॉल, नियम आदि का पालन करना यानि भगवान “को” मानने  के साथ ही भगवान “की” मानना धर्म है। 

उपरोक्त वाक्य में हम देख रहे हैं कि (को) और (की) दोनों को हमने inverted commas में लिखा है। आइये देखें, ऐसा क्यों है ?  

भगवान “को” मानने पर हम  भगवान का अस्तित्व स्वीकारते है, जबकि भगवान “की” मानने से तात्पर्य है कि हम  भगवान की  बताई  नियमावली, भगवान द्वारा दिए गए  दिशा-निर्देश और आदेश  मानते हैं व उनका पालन करते हैं। 

हम लोग  अर्जुन जैसे पुण्यात्मा, बुद्धिमान व योग्य तो हैं  नही कि  हमें भगवान के साथ सीधा सम्पर्क और साक्षात्कार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हमें समझाने के लिए भगवान स्वयं नही आने वाले हैं । हमें भगवान के बारे में  अपने  बुज़ुर्गों से, माता-पिता से, धर्मगुरुओं से, धार्मिक ग्रंथों से स्वयं ही  समझना होगा। यहां सबसे महत्वपूर्ण  है ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया लगभग  1.5 किलो का हमारा  मस्तिष्क। ईश्वर के नियमों को  समझने के लिए  हमें ईश्वर द्वारा उपहार के रुप में मिला दिव्य मस्तिष्क (बुद्धि, विवेक, ज्ञान, विद्या आदि) सबसे प्रमुख हैं। इस दिव्य मस्तिष्क की प्रामाणिकता किसी भी धार्मिक ग्रंथ से अधिक है। यह  दिव्य उपकरण पूर्णतया  शुद्ध रुप में  सीधे ईश्वर से हमें प्राप्त हुआ है। शुद्ध रूप में कहने का हमारा अभिप्राय है कि जन्म के समय तो यह पूर्णरूप में शुद्ध होता है परन्तु ज्यों ज्यों आयु बढ़ती जाती है, वातावरण और अन्य कई factors इसे अशुद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।  शुद्ध और अशुद्ध की इस दौड़ में कौन कितना जीत पाता है, यह एक अलग ही विषय है जिस पर  चर्चा करना किसी और समय ही उचित होगा।  तो हम चलते हैं धर्म के नियमों को पालन करने  की ओर। आइये ज़रा इस विषय को  कुछ  उदाहरणों द्वारा समझने का प्रयास करें।

1)  धर्म में नैतिकता पर बहुत बल दिया गया है।  चोरी न करना नैतिकता (Ethics -Moral values ) की निशानी है। पाप-पुण्य  के सन्दर्भ में देखें तो चोरी करना पाप है।  जब बच्चे थे तो माता पिता यही कहकर समझाते थे कि चोरी करना पाप है।  उस समय तो स्थिति यह थी कि हमने कभी बहस ही  नहीं  की  कि अगर चोरी करना पाप होता है तो क्या  चोरी न करने से पुण्य मिलता है  ? तब तो यही कह कर चुप करा दिया जाता था कि चोरी करना पाप है, इसलिए चोरी नही करना चाहिए। चोरी का अर्थ होता है किसी के अधिकार की कोई चीज़  उससे जबरदस्ती या उसकी अनुमति के बिना लेना। यदि किसी व्यक्ति ने चोरी नही की है, चोरी न करने के नियम को माना है,अनुपालन किया है, तब भी अगर उसे दंड मिलना तय हुआ है तो  दंड से उसकी रक्षा अपनेआप हो जाएगी। वह कैसे ? यदि किसी निर्दोष को फंसाया जाता है, तो भी उसकी कानुनी दंड से रक्षा की संभावना बहुत अधिक होती है क्योंकि  ईश्वर कृत  कर्म-फल सिद्धांत के अनुसार तो उसको चोरी   का दंड मिलेगा ही नही चाहिए।

2) ट्रेफिक रुल्स :

यदि हम  सड़क पर यातायात नियमों का पालन करते हुए चलते हैं, नियमों की रक्षा करते हैं, तो वे  नियम भी हमें  सुरक्षित रखते हैं  ठीक उसी तरह जैसे यदि हम धर्म का पालन करते हैं तो धर्म हमारी रक्षा करता है।  

यहां यह उल्लेखनीय है कि नियम-समुह रुपी धर्म हमें बंधक नहीं बनाता हैं, बल्कि अनुशासित करता है। धर्म हमारी  स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए हमें दीर्घकालिन अनुशासित बनाता है। धर्म स्वयं की स्वतंत्रता  एवं दूसरे मानवों की स्वतंत्रता  के बीच तालमेल बनाता है। यातायात नियमों को  मानकर हम  अपनी स्वतंत्रता और दूसरों की  स्वतंत्रता, दोनों की रक्षा करते हैं  जब हम दूसरों की बात कर रहे हैं तो उसमें केवल गाड़ी चलाने वाले ही नहीं आते; उसमें पैदल चलने वाले, साइकिल चलाने वाले, Pets को सैर करवाने वाले इत्यादि बहुत सारे और लोग भी आते हैं। यदि हम  यातायात नियमों को  न मानें तो  हमसे  परेशान होकर दूसरे मानव हमारी  आने-जाने की स्वतंत्रता को देर-सबेर बंधक बना ही लेंगें। इसीलिए Right of Way य Yield signs का अविष्कार हुआ था जो हमें बताते हैं कि सड़क पर/चौराहे चारों दिशाओं से आ रहे वाहनों/पैदल यात्रियों  में से प्रथम अधिकार किसका है।  

3) भूकंप के समय के नियम :

अगर हम धर्म की रक्षा करते हैं तो धर्म स्वयं हमारी रक्षा करता है- इस तथ्य को भूंचाल के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। भूंचाल आने से पहले चेतावनी तो दी ही जाती है लेकिन फिर भी अगर हम भूंचाल  के समय  बचने के  नियमों का पालन करते हैं जैसे टेबल के नीचे बैठना, खुले मैदान में आ जाना  आदि, तो यही  नियम हमारे  रक्षक बन जाते हैं।

4) कोविड प्रोटोकॉल/नियमावली :

कोविड से बचने के भी कुछ नियम हैं, जिनमें 3 नियम प्रमुख हैं  – मास्क पहनना, दूरी बनाए रखना, बार-बार हाथ धोना। पिछले  कुछ  समय से हम देख रहे हैं सम्पूर्ण विश्व में  कोविड से बचने के लिए इन  3 नियमों का  पालन करने पर सबसे अधिक बल दिया गया है। जिन लोगों ने इन नियमों का पालन किया उनके लिए यह नियम रक्षक बन गए। जहाँ पर इन नियमों का पालन करने में विरोध हुआ वहां इन्हें  Law (कानून ) भी बनाना पड़ा। 

धर्म की एक प्रमुख परिभाषा : “जिसे धारण किया जाए, वह  धर्म है।”

क्या हम इन चार points के  आधार  पर किसी को धार्मिक कह सकते हैं ? यह एक विचार करने योग्य प्रश्न  है।   

हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार में अधिकतर सदस्य हिन्दू हैं तो हम उनके परिपेक्ष्य में ही बात कर सकते हैं। जब हम धारण करने की बात कर रहे हैं तो  पूजा-पाठ, मंदिर-दर्शन, हवन आदि धार्मिक क्रियाओं का पालन करते हुए काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि को नियंत्रित करने को  भी धर्म कहा जा सकता है। जब हम एक तरफ मंदिर, पूजा पाठ की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ दुष्प्रवृतिओं की बात कर रहे हैं तो इन दोनों के मिलन  से धर्म की परिभाषा निर्मित होती है।  इसको आध्यात्मिक श्रम कहा जाता है। अपने भगवतियों-भगवानों के प्रति आस्था को भी धर्म कहा जाता है। इसके अलावा धर्म की एक सरल परिभाषा है-जो अधर्म न हो, वही धर्म है।

अंतत: सबसे उचित यही है कि अपने ज्ञान, अनुभव, बुद्धि व विवेक के अनुसार हमें धर्म की जो परिभाषा सबसे ठीक और logical  लगे उसे मानकर धर्म का पालन करने का प्रयास करना चाहिए न कि अन्धविश्वास और अंधानुकरण की दौड़ में हम अंधे हो जाएँ -आखिर हम विवेकशील हैं -भगवान द्वारा प्रदान उत्तम उपहार -मस्तिष्क- का सही प्रयोग करना कोई गलत नहीं है। 

To be continued:

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प 

9 अप्रैल 2022 की  प्रस्तुति  के अमृतपान उपरांत 4 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1)अरुण त्रिखा  -27, (2 ) संध्या कुमार -26, (3)रेणु श्रीवास्तव -27,(4)पूनम कुमारी-25  

सभी सहकर्मी गोल्ड मेडल विजेता होने के कारण हमारे बधाई के पात्र हैं। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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