विवेक जागरूकता की कुंजी है

शनिवार को हमने अपने  सहकर्मियों  को बताया था कि हम परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य पुस्तक “विवेक की कसौटी” पर आधारित लेखों की एक श्रृंखला आरम्भ  कर रहे हैं। 24 पन्नों की इस दिव्य पुस्तक में हमारे सहकर्मियों को बहुत कुछ मिलने वाला है। पूज्यवर के साहित्य  की यही तो विशेषता है  कि  छोटी-छोटी पुस्तिकाओं में वह दिव्य ज्ञान छुपा हुआ है जिसकी तुलना किसी और के साथ करना असंभव ही लगता है। संध्या बहिन जी, हम क्षमाप्रार्थी हैं कि आपने इतने परिश्रम से इस पुस्तक का अध्यन किया, चिंतन- मनन किया और फिर प्रकाशित करने से पहले हमारे साथ बात की, लेकिन प्रकाशन को एक माह के लिए postpone करना पड़ा। कारण आप सभी को विदित है-हम हिमालय पर आधारित  लेखों के प्रकाशन का मन बना  चुके थे। संध्या जी से  हमारी बात 5 मार्च को हुई थी और आज 4 अप्रैल है ( 1 माह ) 

जब भी हम कोई शृंखला आरम्भ करते हैं तो पहला ज्ञानप्रसाद इस श्रृंखला के लिए भूमिका बनाने के लिए होता है, जो हम इस समय कर रहे हैं। बुद्धि और विवेक इतने overlapping शब्द हैं कि जब तक इनका पूरी तरह से विश्लेषण/ analysis न कर लें, “विवेक की कसौटी” एक शीर्षक ही रह जायेगा। हम पुस्तक तो पढ़ लेंगें लेकिन इसको अपने ह्रदय में उतारने तक शायद ही पहॅंच पाएं। यह  तभी संभव हो पायेगा जब इस विषय पर चर्चा होगी, कमैंट्स आयेंगें,परिजन अपने विचार रखेंगें और सभी एक दुसरे के विचारों का /कमैंट्स का  विश्लेषण करेंगें। हम अपना कर्तव्य निभाते हुए ,उदाहरणों से लेखों का सरलीकरण करते रहेंगें।   हमें इस बात में तनिक भी शंका नहीं है कि हमारे सहकर्मी,सहयोगी,पाठक बहुत ही  सूझवान और प्रतिभाशाली  हैं, कमैंट्स के द्वारा वह अपनी input अवश्य ही पोस्ट करेंगें क्योंकि यह 2-way traffic है जिससे बहुतों को प्रेरणा और मार्गदर्शन मिल रहा है और आगे भी मिलेगा। अधिक से अधिक परिजन प्रोत्साहित हो रहे हैं। शनिवार  को  कमोदिनी बहिन जी द्वारा पोस्ट किया गया  कमेंट इस तथ्य पर मोहर लगा रहा हैं :  

“प्रतिभा को प्रोत्साहित करने वाले भी तो होना चाहिए भाई साहब क्योंकि प्रोत्साहन से हौसला बढ़ता है हौसला बढ़ने से आगे बढ़ने , अधिक से अधिक काम करने की उमंग जागृत होती है जय गुरुदेव सदैव मुझे सन्मार्ग पर चलाते रहना”

तो चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद की ओर – लेकिन एक बात करने के बाद।

हमारे जितने भी परिजन युगतीर्थ शांतिकुंज जा रहे हैं, सभी को हम निवेदन कर रहे  हैं कि अपना दाइत्व समझते हुए  ऑनलाइन ज्ञानरथ के साथ   अपने अनुभव अवश्य शेयर करें ताकि औरों को भी मार्गदर्शन मिले। ऑनलाइन तो सब कुछ उपलब्ध है ही लेकिन हम भी अपने अनुभव से कुछ बता दें तो कोई हर्ज़ नहीं है।सुमन लता बहिन जी  और रजत भाई साहिब दोनों सहकर्मियों  ने अपने अनुभव शेयर किये, हम दोनों के आभारी हैं।  इसी कड़ी में हमारे छोटे भाई राजीव त्रिखा  का परिवार आंवलखेड़ा के प्रवास पर था। उनके  अनुभव आने  वाले किसी “सप्ताह का एक दिन पूर्णतया अपने सहकर्मियों का” सेक्शन  में प्रकाशित करने की योजना है। आज हमने फ़ोन पर उनके साथ इस विषय पर बात की है। बेटी  Hritambhra Trikha ने  हमारी एक वीडियो पर संक्षिप्त  कमेंट कर ही दिया है।  भाभी राधा त्रिखा  के कमेंट तो आप  नियमितता से देख ही रहे हैं। 

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तो कैसे है विवेक जागरूकता की कुंजी ?  आइये देखें। 

संसार के समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्य के मानस की बड़ी शक्ति विवेक है, जिसके पीछे मन और बुद्धि की भूमिका शामिल है। मन को विचारों का पुंज कहा गया है। यह अपनी सोच से बाहरी दुनिया का अनुभव करता रहता है। मन बड़ी मुश्किल से  टिकता है। जब मन सोच- विचारों को स्वीकार करता है तो इसका execution  बुद्धि करती है  क्योंकि  बुद्धि मन से जुड़ी हुई है। यही बुद्धि सुमति ( अच्छी मति ) और कुमति (बुरी मति)  दो रूपों वाली है जो हमें उसी तरह के कर्म करने की प्रेरणा देती है।  बुद्धिमान व्यक्ति  सुमति से ही अपने कार्यों  का सफल execution  कर लेता है। सुमति सद्बुद्धि से विवेक (Judgement) और कुमति अविवेक देती है। विवेक का अति नज़दीक अनुवाद  judgement ही दिखाई देता है।  

मनुष्य विवेक के प्रकाश  में रहे तो बुद्धि सही निर्णय लेने में सफल हुआ करती है। लौकिक जगत की सांसारिक-भौतिक जरूरतें और आविष्कार जो मानवीय बुद्धि से लोगों तक पहुंचकर उपयोगी साबित हुए हैं जैसे टीवी, उपग्रह यान, दूरसंचार प्रणाली आदि का होना आदि इसी बुद्धि कौशल के कारण संभव हुए हैं। सुमति या सद्बुद्धि सात्विक प्रवृत्ति की है। इसके विपरीत यही  बुद्धि कुप्रेरणा और कुसंग के कारण दूषित हो जाती है । इसी संसार में अनेक अच्छाइयों और बुराइयों के उदाहरण शामिल हैं। मनुष्य अपनी ग्रहणशीलता से कितनी अच्छाइयों को आत्मसात करता हुआ विवेकशील हो, यह उस पर निर्भर है। मनुष्य की श्रेष्ठता व सार्थकता विवेकपूर्ण जीवन जीने में है। विवेकशीलता के अभाव में मनुष्य सच्चे  सुख और शांति से दूर होता जा रहा है। सत्कर्म का कारण बुद्धि की प्रेरक शक्ति विवेक ही है जो सत्प्रेरणा के साथ उचित निर्णय करने में सहायक है। इसीलिए विवेकपूर्ण कृत्य के दोषरहित होने की संभावना बलवती बनी रहती है। वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर सकना, कर्म के प्रतिफल का गंभीरतापूर्वक निष्कर्ष निकालकर श्रेयस्कर दिशा देने की क्षमता केवल विवेक में ही संभव  है। उचित-अनुचित के सम्मिश्रण में से श्रेयस्कर को अपना लेना विवेक  का कार्य है। विवेक के अभाव में सही दिशा का चयन नहीं हो सकता। मनुष्य विवेक द्वारा ही भावनाओं के प्रवाह और अतिश्रद्धा या अंधश्रद्धा से बच सकता है। यह अंधानुकरण जिस दिशा में हमें लेकर जाकर है ,हम प्रतिदिन देख रहे हैं। आज के  भौतिकवादी संसार में आप जो भी कोई क्षेत्र ले लीजिये अंधनानुकरण (भेड़चाल) इस स्तर का प्रचलित है कि दांतों  तले ऊँगली दबाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं सूझता। लेकिन ऐसा करने के हम अपने दाइत्व से भाग रहे हैं।हमारे गुरु, परमपूज्य गुरुदेव ने कैसे अपने विरोधियों  से विवेकशील होकर लोहा लिया, हमें भी कुछ न कुछ तो प्रेरणा लेनी ही चाहिए। नहीं तो हम भी औरों की तरह,  एक नपुन्सक  की तरह, सब ठीक है -चलता है इत्यादि कहते हुए , अपनी आत्मा का suicide करते हुए अंधानुकरण करते-करते जीवन का अंत कर देंगें। सही और गलत  का प्रयोग अपने से कहां तक और कितना किया जाता है, इसका चयन  विवेक ही कराती है। विवेक जागरूकता की कुंजी है। विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का साधन कहा जा सकता है।

बुद्धि  और  विवेक का अंतर् समझने के लिए आइये  दादी और नई नवेली दुल्हन वीरो की कहानी का सहारा लें।

घर में वीरो नामक एक नई नवेली  दुल्हन आई।  बात 7-8 दशक पुरानी  होगी।  उन दिनों चतुर और बातूनी दुल्हनों का चलन नहीं था। अधिकतर दुल्हनें  शर्मीली  होती थीं।  शादी के एक हफ्ते बाद  वीरो  दादी के पास आई और बड़े अपनेपन और बेफिक्र अंदाज़ में बोली: मां जी, मुझे बताओ न खीर कैसे बनाते हैं। दादी ने बड़े ही प्यार से पास बैठाया और बोली : हां हां क्यों नहीं, बैठ न मेरे पास। वीरो दादी के पास चारपाई पर बैठ गई। दादी ने कहा: हां, तो सबसे पहले एक गिलास चावल ले कर पानी में भिगो दे।  वीरो ने आंखें मटकाते हुए जवाब दिया: इतना तो मुझे पता है। दादी ने कहा : फिर एक पतीले में तीन गिलास दूध गर्म करने को रख दे। वीरो ने फिर कहा: ये भी मुझे मालूम है।  दादी ने कहा : उसके बाद दो कटोरी शक्कर दूध में मिला कर धीमी आंच पर गर्म करने रख दे। वीरो  फिर बोली: यह मुझे पता है। वीरो की चतुराई देखकर दादी का पारा भी धीमी आंच की तरह गर्म होने लगा। दूध को पकाने से लेकर सूखे मेवे डालने तक, खीर की रेसिपी पूरी होने तक वीरो  लगातार  हर वाक्य के बाद  दोहराती रही – इतना तो मुझे पता है। आख़िर में जब  वीरो जैसे ही उठ के खड़ी हुई, दादी मां ने इशारे से अपने पास बुलाया और उसके कान में  बोली : अंत  में जब खीर बन जाये तो  अंगीठी के नीचे से एक चम्मच राख निकाल कर खीर में डाल देना। वीरो ने फिर कहा: यह  तो मुझे पता था।  लेकिन वीरो को पता न था कि राख डालनी है कि नहीं।  

तो यह है बुद्धि और विवेक का अंतर्। 

बुद्धि और परिश्रम से कुछ एक सवाल रट कर   हम ड्राइविंग टेस्ट तो पास कर लेते हैं लेकिन एक्सीडेंट  से बचना तो विवेक से ही जांचा जाता है। परीक्षा पास करना बुद्धि का काम है और एक्सीडेंट से बचना विवेक का। विश्वभर के वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में अपनी बुद्धि  और योग्यता के आधार पर यूरेनियम,प्लूटोनियम पर रिसर्च करते हैं लेकिन उस रिसर्च को हिरोशिमा नागासाकी की तरह प्रयोग करना हैं य कैंसर  को ठीक करने के  लिए करना है। यह विवेक का कार्य है।

आशा करते हैं की बुद्धि और विवेक को समझने में हमारा प्रयास कुछ हद कर सफल रहा  होगा

 To be continued : 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। 

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2 अप्रैल के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत केवल रेनू श्रीवास्तव बहिन जी ही 24 आहुति संकल्प पूर्ण कर सकीं  और गोल्ड मैडल मैडल विजेता बन सकीं।  हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। जिन्होंने ने भी कमैंट्स की आहुतियां प्रदान की हैं उनके प्रति हमारा ह्रदय से नमन।   

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