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“सप्ताह का एक दिन पूर्णतया अपने सहकर्मियों का” 26 मार्च,2022

“सप्ताह का एक दिन पूर्णतया अपने सहकर्मियों का” 26 मार्च,2022

कमेंट- काउंटर कमेंट प्रथा जिस उद्देश्य से रचना की गयी थी, वह उद्देश्य पूर्ण होता दिखाई दे रहा है, अद्भुत परिणाम दिखा रहा है। अधिक से अधिक परिजन एक दूसरे से परिचित हो रहे हैं, संपर्क बना रहे हैं, परस्पर सहायता कर रहे हैं। Earth is flat वाला concept इतना सक्रीय हो रहा है कि कुछ उदाहरण देकर ही इसकी पुष्टि की जा सकती है। 

दिल्ली निवासी व्हाट्सप्प सहकर्मी मृदुला श्रीवास्तव ने हमें सूचित किया कि अप्रैल के अंत में वह शांतिकुंज जाने का प्लान कर रही हैं। हमसे कुछ सम्पर्क फ़ोन नंबर इत्यादि की बात की। हमने उन्हें अरुण वर्मा जी के साथ सम्पर्क करने को कहा क्योंकि अरुण जी अभी कुछ समय पूर्व ही शांतिकुंज होकर आये थे। हमने अरुण जी को मैसेज किया और बहिन जी के बारे में बताया। लेकिन बहिन जी के पास अरुण जी का नंबर पहले से ही था। दोनों की बात भी हो गयी। इसी दौरान रजत भाई साहिब ने यूट्यूब पर हरिद्वार जाने का कमेंट किया हुआ था। हमने उन्हें भी मृदुला बहिन जी के बारे में मैसेज कर दिया। उनका भी रिप्लाई आ गया और जानकारी भी आ गयी। यह दोनों संपर्क कमेंट-काउंटर कमेंट और संपर्क साधना से ही संभव हो पाए । उससे भी बड़ी बात है कि मानवीय मूल्यों- शिष्टाचार, आदर, सम्मान, श्रद्धा, समर्पण, सहकारिता, सहानुभूति, सद्भावना, अनुशासन, निष्ठा, विश्वास, आस्था, प्रेम, स्नेह, नियमितता का पूर्णतया सम्मान किया जा रहा है।परस्पर आदर भाव से एकदम रिप्लाई भी आ जाते हैं। रजत भाई जी के रिप्लाई से प्रेरित होकर ही हम भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा के बारे में लिख रहे हैं। 

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भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा:

भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा एक ऐसा निराला प्रयोग है, जिसे हम आज की शिक्षानीति का एक क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला प्रयोग कह सकते हैं। विगत सन् 1994 से भोपाल से यह परीक्षा कुल बारह हजार छात्र छात्राओं से आरंभ होकर अब इस वर्ष सन् 2005 तक सारे देश में प्रतिवर्ष 28 लाख छात्र-छात्राओं तक पहुँच गई है। देश भर के कुल 19 प्रांतों में, आठ भाषाओं में यह परीक्षा हर वर्ष ली जाती है। अपने कार्यकर्ता परिजन विभिन्न जिलों में प्राचार्यों से संपर्क करते हैं एवं उन्हें इसके सत्परिणामों से परिचित कराते हैं। स्थान-स्थान पर उनकी सभाएँ भी होती हैं, जिनमें छात्र-छात्राओं की भागीदारी होती है। यदि हम शुभारंभ से अब तक सम्मिलित हुए सभी छात्र-छात्राओं की गिनती करें तो अब तक इस परीक्षा के संपर्क में आए विद्यार्थियों की संख्या लगभग एक करोड़ से अधिक ही निकलेगी। इस परीक्षा से आचार्य सभा सहित घर-परिवार के भी 5-6 सदस्य प्रभावित अवश्य हुए होंगे अतः यह संख्या दस करोड़ तक पहुँच जाती है।

गायत्री परिवार के प्राणवान कार्यकर्ता बिना किसी स्वार्थ के अपने क्षेत्र के हर स्कूल में पहुँचते हैं व प्रयास करते हैं कि अधिक-से-अधिक छात्र-छात्राओं की भागीदारी हो। एक पाठ्य पुस्तिका, प्रश्न बैंक दिए जाते हैं तथा उसके बाद एक निश्चित, निर्धारित तिथि में परीक्षा आयोजित होती है। परीक्षा का परिणाम घोषित कर प्रथम, द्वितीय, तृतीय पोजीशन प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को शांतिकुंज में तीर्थ सेवन हेतु भेजा जाता है, ताकि वे देव संस्कृति के बारे में जान सकें। साथ ही उन्हें एक स्थानीय, जिलास्तरीय समारोह एवं प्रांतीय समारोह में पुरस्कृत कर राशि तथा उपहार भेंट में दिए जाते हैं। श्रेष्ठ पुस्तकें दी जाती हैं, ताकि वे इस अभियान को आगे भी जारी रख सकें। परीक्षा के बाद संस्कृति मंडल की स्थापना की जाती है, जिसमें छात्रों एवं अध्यापकों की भागीदारी होती है। नियमितता से चलने पर यही विद्यार्थीगण भविष्य के अग्रदूत बनते हैं। इन्हें देव संस्कृति विश्वविद्यालय से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। आगामी पाँच वर्षों में देव संस्कति विश्वविद्यालय के अगणित घटक महाविद्यालय होंगे, दूरस्थ शिक्षाकेंद्र होंगे, उससे जुड़कर वे अपनी विद्या से समन्वित शिक्षा को आगे बढ़ा सकते हैं। 

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जयन्त काना कौआ :

प्रेरणा बिटिया की वीडियो पर कुमुदनी गौरहा जी ने कमेंट किया जिसने हमें बहुत ही प्रभावित किया। वह कमेंट आपके समक्ष है: 

प्रेरणा बिटिया बहुत बहुत आशीर्वाद। ज़िन्दगी में खूब तरक्की करो बेटा। वास्तव में कर्म का फल गाय के बछड़े की तरह है। जिस प्रकार बछड़ा हजारों गायों के बीच में अपनी मॉ को पहचान लेता हैं उसी प्रकार हम कही भी,किसी भी जन्म में हो हमारा कर्म हमें खोज ही लेता हैं। कर्म फल से कोई भी बच नहीं सकता। रामायण में एक कथा आती है। 

इन्द्र का बेटा जयन्त अपने पिता से कहता है -पिताजी राम को भगवान मानते हैं परन्तु मुझे तो उनके भगवान होने पर शक है यदि भगवान होते तों जंगल में इधर उधर क्यों भटकते। इन्द्र ने कहा बेटा जयन्त राम साक्षात विष्णु का अवतार है, तुम कोई छेड़छाड़ मत करना। पर जयन्त ने पिता का कहना नहीं माना और कौआ रुप धारण करके माता सीता के पैर में चोंच मार दिया। माता सीता के पैर से ख़ून बहने लगा। तब भगवान राम ने अपना सुदर्शन चक्र कौआ के पीछे छोड़ दिया। अब क्या था, आगे-आगे जयन्त रुपी कौआ भाग रहा था पीछे पीछे सुदर्शन चक्र। भागते भागते जयन्त पहले अपने पिता के पास गया, पिता जी मुझे बचा लिजिए। पिता ने कहा तुम कौन हो मैं तुम्हें नहीं जानता , यहां से चलें जाओ। फिर वह ब्रह्मा जी के पास गया भगवन मुझे बचा लिजिए, रोया गिड़गिड़ाया ब्रह्मा ने कहा यह सुदर्शन चक्र नहीं है तुम्हारे कर्मों का फ़ल है। जहां से आये हों वहीं वापस जाओ। जयन्त पुन‌‌: भगवान राम की शरण में गया भगवान बोले तुम्हें तुम्हारे कर्मों का फ़ल तों अवश्य मिलेगा, पर जो मेरी शरण में आता है मैं उसे जीवनदान भी देता हूं इसलिए जयन्त की एकआंख फोड़ देते हैं। तब से जयन्त काना कौआ कहलाता है। ये है कर्म फल का सिद्धान्त जय गुरुदेव

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21 मार्च के ज्ञानप्रसाद पर कमेंट करते हुए ध्रुव दर्शन चैनल के चंद्रेश बहादुर सिंह ध्रुव, आदि प्रधान संपादक, मासिक पत्रिका सुमन अपनी केदारनाथ यात्रा के बारे में लिखते हैं : 

परम पूज्य गुरुदेव एवं माता जी की सूक्ष्म सत्ता को अनन्त अविरल नमन करते हुए मैं अपनी गत दिनों हुई केदारनाथ यात्रा का अति संक्षिप्त एवं प्रेरक विवरण प्रस्तुत करने के लिए विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। 17 अक्टूबर,2021को मैं 6सदस्यों की टोली के साथ हरिद्वार से केदार नाथ के लिए Ertiga गाड़ी से रवाना हुआ। यह सोचकर कि यह समय भूस्खलन के लिए सबसे सुरक्षित रहता है।लेकिन रास्ते में ज्ञात हुआ कि अचानक मौसम खराब हो गया है। गौरीकुंड के पहले ही एक होटल में रुका। वहां पता चला कि लगभग 20000 हजार यात्रियों को वापस भेजा जा रहा है। गौरीकुंड तक पैदल यात्रा करनी पड़ी। उसके बाद केदारनाथ की चढा ई शुरू हुई। केदारनाथ से 5 किमी पहले रात्रि के 9 बज रहे थे। चाय की दुकान के पास 10×10 फुट का एक टेंट लगा था। इस टेंट में 12 लोगों ने किसी तरह रात बिताई। रात भर बरसात होती रही । दूसरे दिन टेंट के आधे लोग वापस हो गए। केदारनाथ पहुंचते पहुंचते इतनी थकान और ठंड लग रही थी कि चाय हाथ में गिरती जाती थी। धाम पहुंचने पर सभी के सारे कपड़े भीग गए थे। सभी को ऊनी कपड़े खरीदने पड़े। दर्शन करने के बाद हर कदम पर गुरु जी द्वारा हमारी वसीयत और विरासत की स्मृतियां ताज़ी हो रही थी। वापस पुन: Ertiga मिली। उसके ड्राईवर ने कहा कि यहां किसी होटल में रुकना खतरे से खाली नहीं है। रात में ही लगभग 150 किमी ऋषि केश से दूर पहुंच गए। रास्ते में भूस्खलन का दृश्य देख कर रूह कांप जाती। प्रतापगढ़ पहुंचने पर हिन्दुस्तान नामक दैनिक अखबार में मेरी यात्रा का वृतांत प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। इस मौसम में 107 वर्षों में इतनी बरसात नहीं हुई थी। परम पूज्य गुरुदेव के आशीष से ही मै अपनी व्यथा सुना सका। आप सभी आत्मीय का हृदय से अनन्त अविरल आभार। 

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सुमन लता बहिन जी का कमेंट -शिवलिंग का आकार छोटा होता जा रहा है

सभी परिजनों का अभिनंदन।आज के लेख और वीडियो लिंक द्वारा उत्तराखंड के सुरम्य और प्राकृतिक सौंदर्य का भरपूर आनंद प्राप्त हुआ। त्रियुगीनारायण के संबंध में विशेष जानकारी मिली और उसका महत्व भी ज्ञात हुआ। उत्तराखंड का हरिद्वार क्षेत्र ,जो पहले उत्तरप्रदेश में था, 2001 में उत्तर प्रदेश से अलग हो कर स्वतंत्र राज्य के रूप में जाना जाने लगा, यह हमारी जन्म भूमि है। कनखल में दक्ष प्रजापति का एक मंदिर है, जिसमें शिवलिंग स्थापित है जिस पर श्रद्धालु अभिषेक कर सौभाग्य प्राप्त करते हैं। किंतु बहुत आश्चर्यजनक बात यह है कि उस शिवलिंग का आकार छोटा होता जा रहा है। हमने जब 1984 में दर्शन किए थे तब तक उसके आकार में कोई परिवर्तन नहीं था किंतु 2016 के बाद दर्शन करने गए तो वो शिवलिंग एक बालिश्त लगभग 6 इंच के आकार में ही दिखा। यह स्वतः ही हो रहा है, इसीलिये श्रद्धालु अब उस पर सीधे जल अर्पण नहीं करते। हरिद्वार का नाम पढ़ते, सुनते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं, सब आंखों के आगे घूमने लगता है। जहां गुरुदेव ने शान्तिकुंज युगतीर्थ की स्थापना की है, वहां सप्तर्षि मंदिर हुआ करता था, शान्तिकुंज की स्थापना के बाद गुरुदेव ने उन सातों ऋषियों को सम्मान पूर्वक स्थापित कराया । उत्तराखंड क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य तो है ही उसके साथ वातावरण भी एकदम शान्त है। शायद इसीलिए अधिक देवस्थल वहीं पर हैं और उसे देवभूमि उत्तराखंड का नाम दिया गया है।अद्भुत, अलौकिक ज्ञान का भंडार, जो हमें धरा पर स्वर्ग का भ्रमण करा रहा है ऑनलाइन ज्ञानरथ को और इसके सारथि को हमारा हार्दिक आभार और नमन। जय गुरुदेव।

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प्रेमशीला मिश्रा जी व्हाट्सप्प पर हमारे बहुत ही सक्रिय और समर्पित सहकर्मी हैं। पूर्ण श्रद्धा से महिंला मंडल में गुरुदेव के विचारों का प्रचार कर रही हैं। बहिन जी की छोटी बेटी पूजा मिश्रा का गर्भोत्सव संस्कार पूनम शर्मा जी द्वारा ऑनलाइन सम्पन्न करवाया गया। उन्होंने हमें अपनी बेटी और दामाद अतुल की पिक्चर भेजी है जो हम अपने सहकर्मियों के साथ शेयर कर रहे हैं। ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की ओर से पूजा बेटी को शुभकामना एवं बधाई 

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24 आहुति संकल्प 

25 मार्च 2022 के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करने के उपरांत 7  समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1) सरविन्द कुमार -30, (2) संध्या कुमार -24, (3) अरुण वर्मा -30, (4 ) रेणु श्रीवास्तव -24   (5  ) पूनम कुमारी -24, (6) विदुषी बंता -28,(7) रेणुका गंजीर-24 

इस सूची के अनुसार सरविन्द कुमार और अरुण वर्मा जी दोनों ही  गोल्ड मैडल विजेता हैं। दोनों  को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद् 

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