क्या स्वर्ग इस धरती पर ही था ? -पार्ट 4

21 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद -क्या स्वर्ग इस धरती पर ही था ? -पार्ट 4
आज के ज्ञानप्रसाद में हम उत्तराखंड प्रदेश के ऐसे-ऐसे स्थानों की जानकारी प्राप्त करेंगें जिनमें से कुछ एक के तो हमने नाम सुने ही होंगें लेकिन अधिकतर अनसुने ही हैं । दिव्यता की दृष्टि से तो सभी स्थान एक से बढ़कर एक ही हैं और इन सबके बारे में जानने के लिए कई जन्म चाहिए। इन दिव्य लेखों की शृंखला को लिखते समय हमारा प्रयास तो यही रहा है कि अच्छे से अच्छा कंटेंट प्रकाशित करें। आज के लेख में सबसे महत्वपूर्ण पार्ट त्रियुगी नारायण है। इसकी दिव्यता का आभास तो लेख से हो ही जायेगा लेकिन विवाहों की दृष्टि से इस स्थान की हो रही मार्केटिंग के बारे में भी हमारे परिजनों को ज्ञान होगा। इस दिशा में जो जाग्रति हो रही है उसे शब्दों में वर्णित करना तो असंभव सा लगता है, इसलिए हम कुछ वीडियो लिंक्स दे रहे हैं ताकि हमारे परिजनों को और जानकारी मिल सके। वैसे तो परमपूज्य गुरुदेव के होते हुए हमें मैप की कोई भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए परन्तु फिर भी उत्तराखंड टूरिज्म का मैप लिंक दे रहे हैं जिसे हम सब फॉलो करते हुए गुरुदेव के साथ -साथ चलते चलेंगें। धरती के स्वर्ग की यात्रा पर चलने से पूर्व इस यात्रा के संदर्भ में गुरुदेव के विचार जानना बहुत ही आवश्यक है।
https://www.youtube.com/watch?v=RKJcE… ( Destination wedding)
https://youtu.be/jitUoU5orWM ( Destination wedding)
https://www.youtube.com/watch?v=9GNIn… ( Destination wedding)
https://drive.google.com/file/d/1Z6dR… ( Map)
परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं :
यह पक्तियाँ यात्रा के अनुभव वर्णन करने वाले अन्य लेखों की तरह पाठकों के मनोरंजन के लिए नहीं लिखी जा रही हैं, वरन् इन्हें लिखने का उद्देश्य भारत भूमि के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग की ओर लोगों का, विशेषतया अध्यात्म प्रेमियो का ध्यान आकर्षित करना है जो अपनी भावनाओं और आन्तरिक स्थिति के विकास में इस क्षेत्र का महत्व समझें और यथा सम्भव उपयोग करें। परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि हमारा तो इस दिव्य क्षेत्र में जाने का विशेष उद्देश्य था लेकिन प्रकृति के दिव्य सौंदर्य, वास्तविक कैलाश मानसरोवर के अनुसंधान के प्राचीनतम स्थल, अतीत के भव्य इतिहास, देवताओं के निवास, स्वर्गीय वातावरण की तरफ से भी इस स्थान का महत्व कम नहीं है। यहाँ आध्यात्मिक तत्वों की प्रचण्ड तरंगों को हमने प्रवाहित होते देखा है जो अनुकल स्थिति के अन्तःकरण का तो कायाकल्प ही कर सकती है, पर यदि पात्रत्व उतना न हो तो भी साधारण स्थिति के श्रद्धालु को भी यहां बहुत कुछ मिल सकता है। यदि यहाँ तक पहुँच सकना संभव न हो तो उत्तराखण्ड के उन प्रदेशों में जाकर जो इस क्षेत्र के समीप पड़ते हैं, आत्म-विकाश के लिए महत्वपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है। तो आइये यात्रा आरम्भ करें :


सारे का सारा उत्तराखंड ही दिव्यता का प्रतीक है। हरिद्वार से ही लीजिये। यहाँ ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था। दक्ष प्रजापति ने कनखल में यज्ञ किया था और उनकी पुत्री सती अपने पति शिव का अपमान सहन न करके इसी यज्ञ में कूद पड़ी थी। देवप्रयाग में बारह भगवान का निवास हुआ है। सूर्य तीर्थ यहाँ है, रघुनाथ जी तथा काली भैरव की भी स्थापना है। आगे ढूँढप्रयाग तीर्थ में गणेशजी ने तप किया था। श्रीनगर में भैरवी पीठ है। चामुण्डा, भैरवी कंसमर्दिनी, गौरी, महषिमर्दिनी, राजेश्वरी देवियों का यहाँ निवास है। चण्ड-मुण्ड, शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि असुरों का उन्होंने यहीं वध किया था। सोडी चटी से 5 मील ऊपर स्वमि कार्तिक का स्थान है। इससे पूर्व मठचट्टी के सामने सूर्य प्रयाग में सूर्यपीठ है और वहाँ से दो मील भणगा गाँव में छिन्नमस्ता देवी तथा वहाँ से दो मील आगे जैली में कूर्मासना देवी विराजमान हैं। गुप्त काशी में अन्नपूर्णा देवी का निवास है। नारायण कोटी में लक्ष्मी सहित नारायण की प्रतिष्ठा है। 1 मील पश्चिम के पहाड़ पर यक्ष देवता का मेला लगता है। रामपुर से दो मील आगे शाकम्बरी देवी हैं जहाँ एक मास शाक खाकर तप करने का बड़ा महत्व मान जाता है।
त्रियुगी नारायण में नारायण मन्दिर के अतिरिक्त लक्ष्मी, अन्नपूर्णा और सरस्वती की स्थापना है। शिव पार्वती विवाह भी यहीं हुआ था उस विवाह की अग्नि एक चतुष्कोण कुंड में आज तक जल रही है। नारायण मन्दिर में अखण्ड दीपक भी जलता है। सोनप्रयाग में मन्दाकिन और वासुकी गंगा है। वासुकी नाग का निवास इन गंगा के तट पर था। पास ही कालिका देवी का स्थान है। सोनप्रयाग से आध मील आगे व स्थान है जहाँ शिव ने गणेशजी का सिर काटा था और फिर हाथी का सिर लगाया था। यहाँ बिना सिर गणेशजी की प्रतिमा है।
केदारनाथ तीर्थ में वह स्थान है जहाँ पाण्डव अपने कुलघात के दोष का निवारण करने के लिए शंकर भगवान के दर्शनों के लिए गये थे। पर उन पाप को देखते हुए शिवजी वहाँ से भैसें का खल बनाकर भागे। भागते हुए भैंसे को पीछे से पांडवों ने पकड़ लिया। जितना अंग पकड़ में आया उतना वहाँ रह गया शेष अंग को छुड़ा कर शिवजी आगे भाग गये। हिमालय में पाँच केदार हैं- केदारनाथ, मध्यमेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर। रुद्रनाथ के समीप वैतरणी नदी बहती है। पुराणों में वर्णन आता है कि यमलोक में जाते समय जीव को रास्ते में वैतरणी नदी मिलती है। गोपेश्वर में एक वृक्ष पर लिपटी हुई बहुत पुरानी कल्पलता है जो प्रत्येक ऋतु में फूल देती है। स्वर्ग में कल्पवृक्ष या कल्पलता होने की बात की संगति इस कल्पलता से बिठाई जाती है। पास ही अग्नि तीर्थ है। यहीं कामदेव का निवास था। शंकरजी से छेड़छाड़ करने के अपराध में उसे यहीं भस्म होना पड़ा था। काम की पत्नी रति ने यहाँ तप किया था इसलिए वहाँ रतिकुण्ड भी है।
पीपल कोटि से 3 मील आगे गरु गंगा है यहाँ विष्णु के वाहन गरुड़ का निवास माना जाता है। जोशीमठ में नृसिंह भगवान विराजते हैं। विष्णु प्रयाग में विष्णु भगवान का निवास है। यहाँ ब्रह्म कुँड, शिवकुँड, गणेशकुँड, टिंगी कुंड, ऋषि कुंड, सूर्यकुंड, दुर्गाकुंड, कुबेर कुँड, प्रहलाद कुँड अपने अधिपतियों के नाम से विख्यात हैं। पाण्डुकेश्वर से एक मील आगे शेष धारा है जहाँ शेष जी का निवास माना जाता है। बद्रीनाथ में नर, नारायण, गरुड़, गणेश, कुबेर, उद्धव तथा लक्ष्मी जी की प्रतिमाएं हैं। सरस्वती, गंगा और अलकनन्दा के संगम पर केशव प्रयाग है, पास ही सम्याप्रास तीर्थ है। यहाँ गणेश गुफा तथा व्यास गुफा है। व्यास जी ने गणेश जी द्वारा महाभारत यहीं पर लिखवाया था।
केदार खंड में वर्णन है कि कलियुग में मलेच्छ शासन आ जाने और पाप बढ़ जाने से शंकरजी काशी छोड़कर उत्तरकाशी चले गये, अब यहीं उनका प्रमुख स्थान है। विश्वनाथ का मन्दिर यहाँ प्रसिद्ध है। देवासुर संग्राम के समय आकाश से गिरी हुई शक्ति की स्थापना भी दर्शनीय है। आगे ढोढी तालाब है, जहाँ गणेश जी का जन्म हुआ था।
गंगोत्री के समीप रुद्रगेरु नामक स्थान है यहाँ से रुद्र गंगा निकलती है, यहाँ एकादश रुद्रों का निवास स्थान है। जाँगला चट्टी के पास गुगुम नाला पर वीरभद्र का निवास है।
इस प्रकार हिमालय के हृदय स्थल पर खड़े होकर जिधर भी दृष्टि घुमाई जाए उधर तीर्थों का वन ही दिखाई देता है। गंगोत्री आदि ठंडे स्थानों के निवासी जाड़े के दिनों में ऋषिकेश उत्तरकाशी आदि कम ठंडे स्थानों में उतर आते हैं। उसी प्रकार लगता है कि देवता भी सुमेरु पर्वत से नीचे उतर उत्तराखण्ड में अपने सामुदायिक निवास स्थल बना लेते होंगे। इन देव स्थलों में आज भी जन कोलाहल वाले बड़े नगरों की अपेक्षा कहीं अधिक सात्विकता एवं आध्यात्मिकता दृष्टिगोचर होती है। देवतत्वों की प्रचुरता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण कोई व्यक्ति अब भी देख सकता है।
तपस्वी लोग तपस्या द्वारा देवतत्वों को ही प्राप्त करते हैं। जहाँ देवतत्व अधिक हो वहीं उनका प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए प्राचीन इतिहास, पुराणों पर दृष्टि डालने से यही प्रतीत होता है कि प्रायः प्रत्येक ऋषि ने उत्तराखण्ड में आकर तप किया है। उनके आश्रम तथा कार्यक्षेत्र भारत के विभिन्न प्रदेशों में रहे हैं पर वे समय-समय पर तप साधना करने के लिए इसी प्रदेश में आते रहे हैं। विविध कामनाओं के लिए विभिन्न व्यक्तियों ने भी तपस्याएं इधर ही की हैं। अनेक असुरों ने भी अपने उपासना क्षेत्र इधर ही बनाये थे। देवताओं ने भी यहीं तप किया था। करते भी क्यों न? धरती का स्वर्ग और हिमालय का हृदय तो यहीं से समीप पड़ता है।
बद्रीनाथ में विष्णु भगवान ने तपस्वी का रूप धारण कर स्वयं घोर तप किया था। उस तीर्थ में जाने का प्रधान द्वार होने के कारण हरिद्वार नाम पड़ा। राजा वेन ने यहीं तप किया था। कुशावर्त पर्वत पर दत्तात्रेय जी ने तप किया था। हरिद्वार से तीन मील आगे सप्त सरोवर नामक स्थान पर गंगा के बीच में बैठ कर सप्त ऋषियों ने तप किया था। गंगाजी ने उनकी सुविधा के लिए उनका स्थान छोड़ दिया और सात धाराएं बन कर बहने लगीं। बीच में सातों ऋषियों के तप करने की भूमि अलग-अलग छूटी हुई है। इसी स्थान पर जन्हुमुनि तप करते थे। जब भागीरथ गंगा को लाये और भगवती बड़े वेग से गर्जन-तर्जन करती आ रही थी तो मुनि को यह कौतुहल बुरा लगा। उन्होंने गंगा को अंजली में भरकर पी लिया। भागरथी आगे-आगे चल रहे थे उन्होंने गंगा को लुप्त हुआ देखा तो आश्चर्य में पड़े। कारण मालूम होने पर उन्होंने जन्हुमुनि की बड़ी अनुनय-विनय की तब उन्होंने गंगा को उगल दिया। इसी से सप्त सरोवर के बाद की गंगा को जन्हुपुत्री या जाह्वी कहते हैं। इससे ऊपर की गंगा भागरथी कहलाती है। जन्हु के उदर में रहने के कारण वे जन्हुतनया कही गई।
To be continued :
हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।


24 आहुति संकल्प
20 मार्च 2022 वाली प्रस्तुति के अमृतपान उपरांत 4 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :
(1) सरविन्द कुमार -29 ,(2 ) संध्या कुमार -24, (3) रेणु श्रीवास्तव-25,(4 ) अरुण वर्मा -27
इस सूची के अनुसार सरविन्द जी गोल्ड मैडल विजेता हैं। भाई साहिब को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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