क्या स्वर्ग इस धरती पर ही था ?- पार्ट 1

15 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद – क्या स्वर्ग इस धरती पर ही था ?

आज से आरम्भ हो रही लेख श्रृंखला बहुत ही Complex और Controversial है। Complex इस लिए कि ज्ञान इतना विस्तृत है कि उसे छोटे- छोटे लेखों में समेटना असंभव सा ही लगता है। एक एक विषय पर पूरे पूरे ग्रन्थ लिखे हुए हैं। Controversial इसलिए कि

तर्क-कुतर्क और TRP की दौड़ ने इस विषय पर इतना कुछ लिख दिया है कि ठीक-गलत का अनुमान लगाना असंभव प्रतीत होता है। इस परिस्थितिवश बिना किसी claim के अपनी अल्प बुद्धि की सहायता से जो कुछ हमसे बन पायेगा ईमानदारी से अपने स्नेहिल सहकर्मियों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगें। 

यह इस शृंखला का प्रथम भाग है। द्वितीय भाग गुरुवार को प्रस्तुत करेंगें क्योंकि बुधवार का ज्ञानप्रसाद सेंट्रल जेल भोपाल के बंधीजनों पर आधारित एक लघु वीडियो होगी। जयपुर जेल वाली वीडियो को आपने सराहा, आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि इस वीडियो को भी पूरा सहयोग मिलेगा। साथ में निवेदन है कि जब भी समय मिले हमारे बच्चों की ऑडियो बुक्स को भी सहयोग दें, नहीं तो यह ऐसे ही पढ़ी रहेंगीं। 

आइये चलें अमृतपान की ओर:

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अखंड ज्योति दिसंबर 1960 के अंक में परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि बहुत दिन पूर्व किसी मासिक पत्रिका मे एक लेख पढ़ा था जिसका शीर्षक था “स्वर्ग इस पृथ्वी पर ही था।” इस लेख के लेखक ने किसी धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं बल्कि भूगोल और इतिहास को दृष्टि को सामने रखकर लिखा था। लेखक ने अनेकों बातों से यह सिद्ध किया था कि हिमालय का मध्य भाग प्राचीन काल में स्वर्ग कहलाता था। आर्य लोग मध्य एशिया से तिब्बत होकर भारत मे आये थे। उन दिनों हिमालय इतना ठंडा नहीं था। पिछली हिमप्रलय के बाद ही वह हिमाच्छादित हो जाने के कारण मनुष्यो के लिए दुर्गम हुआ है। इससे पूर्व वहाँ का वातावरण मनुष्यों के रहने योग्य ही नही बल्कि अनेक दृष्टियों से अत्यन्त सुविधाजनक व शोभायमान भी था। इसलिए आर्यों के प्रमुख नेतागण-जिन्हे देव कहते थे इसी भूमि में निवास करने लगे। 

यह नेतागण अपने साथियो और अनुयायियों का मार्गदर्शन यहीं पर ही रहकर करते थे। सम्पत्ति, ग्रन्थ तथा अन्य आवश्यक उपकरण यहीं सुरक्षित रखते थे ताकि आवश्यकता के अनुसार तथा समयानुसार उनका उपयोग समतल भूमि पर रहने वाले लोगों के लिए होता रहे और वे वस्तुएं युद्ध के समय दस्युओं, असुरों एवं अन-आर्यों ( Non- aryans) के हाथ न लगने पाएं । देवताओं के राजा की पदवी इन्द्र होती थी । प्रत्येक इन्द्र का सिंहासन इस हिमालय के हृदय प्रदेश स्वर्ग मे ही होता था।

गुरुदेव लिखते हैं कि हालाँकि इस लेख मे अनेकों प्रबल facts थे पर उस समय वह बातें अपने मन मे उतरती नहीं थीं । ऐसा इसलिए था कि जिस स्वर्ग की इतनी महिमा गाई गई हो , जिसे प्राप्त करने के लिए हम इतना त्याग और तप करते हों ; क्या वह इसी पृथ्वी का एक साधारण सा क्षेत्र होगा? फिर स्वर्ग को तो एक लोक “स्वर्गलोक” कहा गया है। लोक का अर्थ होता है पृथ्वी से बहुत दूर, अंतरिक्ष में स्थित कोई ग्रह नक्षत्र जैसा स्थान।

इसके अतिरिक्त मानव को अन्तरात्मा में अनुभव होने वाली सुख शान्ति को भी स्वर्ग माना जाता है। फिर हिमालय के एक विशेष भाग को स्वर्ग कैसे मान लिया जाए ?

हमारे पाठक इस बात से भी अवगत हैं कि इंटरनेट पर आये दिन स्वर्ग की परिभाषा की परिधि में विस्तार होता जा रहा है। जब हम छोटे बच्चे होते थे तो टीचर हमें अक्सर निबंध लिखने को देते थे, “ कश्मीर को धरती का स्वर्ग क्यों कहते हैं ?” तो हमने कई बार अपने मम्मी पापा से यह प्रश्न पूछा होगा -आप तो कहते हैं कि अच्छे कर्म करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और किसी का दिल दुखाने से, चोरी करने से ,धोखा देने से नर्क को जाते हैं। जब और बड़े हुए तो स्विट्ज़रलैंड को भी स्वर्ग मानने लगे। हिमाचल प्रदेश स्थित खज्जियार को भी मिनी स्विट्ज़रलैंड माना जाता है। ज्यों ज्यों आयु बढ़ती गयी तो अंतरात्मा में अनुभव होने वाली सुख शांति को भी स्वर्ग की दृष्टि से देखना संभव होता गया। अधिकतर विश्व के मानवों में जो बड़ा बनने की भागदौड़ लगी हुई है, किसी भी कीमत पर अमीर होने की जो दौड़ लगी है, पदार्थवाद ने जीवन नर्क सा बना दिया है, कोहलू के बैल की तरह दिन रात काम- काम और केवल काम ने जीवन स्तर को इतना गिरा दिया है कि साधन- सम्पन्नता की दृष्टि से देखा जाये तो आज का मानव क्या कुछ प्राप्त नहीं कर सकता, Sky’s the limit, आज का मानव आकाश के तारे तोड़कर लाने में भी सक्षम है। इतना Comparison देखने के बाद ही किसी मानव को स्वर्ग नर्क के अंतर् का ज्ञान हो सकता है, आंतरिक स्वर्ग- नर्क, अंतरात्मा के स्वर्ग-नर्क का ज्ञान हो सकता है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार के अधिकतर सहकर्मी “जो प्राप्त है वही पर्याप्त है” के सिद्धांत को भलीभांति अपने अन्तःकरण में उतार चुके हैं और प्रगति की ओर हर पल प्रयासरत हैं। इसलिए ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि भले ही वह पर्यटन स्थलों के स्वर्ग से वंचित रहे हों परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से, अंतरात्मा में होने वाली सुख शांति के स्वर्ग से भली भांति परिचित हैं। यह निष्कर्ष हमारे व्यक्तिगत हैं जो हमने अलग-अलग परिजनों के साथ, समय- समय पर सम्पर्क से प्राप्त किये हैं। 

अब तक की चर्चा से दो बातें समझ आती हैं – एक तो अंतरात्मा का स्वर्ग, जिसे हम आंतरिक स्वर्गलोक कह सकते हैं और दूसरा धरती पर किसी स्थान विशेष का स्वर्ग। पृथ्वी पर कोई स्थान अवश्य ही हो सकता है जो स्वर्ग होने की सम्भावना को प्रकट करता हो। 

इस विषय पर परमपूज्य गुरुदेव ने अखंड ज्योति के दिसंबर 1960 के अंक में संक्षिप्त वर्णन तो दिया ही है लेकिन गुरुदेव के करकमलों से ही 2001 में प्रकाशित हुई पुस्तक “अध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र देवात्मा हिमालय” भी एक masterpiece है। केवल 64 पन्नों की यह पुस्तक किसी ज्ञानकोष से कम नहीं है। 

आइये गुरुदेव की अमृतवाणी से इस दिव्य विषय का अमृतपान करें : 

राजा दशरथ अपनी पत्नी समेत इन्द्र की सहायता के लिए अपने रथ पर सवार होकर स्वर्ग गये थे। जब रथ का पहिया धुरी में से निकलने लगा तब साथ में बैठी हुई कैकयी ने अपनी ऊँगली धुरी के छेद में डालकर रथ को टूटने से बचाया था। एक बार अर्जुन भी इन्द्र की सहायता के लिए स्वर्ग गये थे। तब इन्द्र ने उर्वशी अप्सरा को उनके पास भेजकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया था। एक बार इन्द्र का इन्द्रासन खाली होने पर नीचे से राजा नहुष को वहाँ ले जाया गया था और उन्हे वहाँ बिठाया गया था। त्रिशुंक भी सशरीर वहाँ पहुंचे थे । राजा ययाति सशरीर स्वर्ग गये थे। पर जब उन्होंने वहाँ अपने पुण्यों की बहुत प्रशसा करनी आरम्भ की तो उनके पुण्य क्षीण हो गये और उन्हे स्वर्ग से नीचे धकेल दिया गया। देवर्षि नारद बहुधा देवसभा मे आया जाया करते थे। इस प्रकार के अनेकों उदाहरण ऐसे हैं जिनसे स्वर्ग मे मनुष्यों का सशरीर आना-जाना सिद्ध होता है। देवता तो प्रायः नीचे आया ही करते थे। रामायण और भागवत मे पचासों जगह देवताओं के पृथ्वी पर आने और मनुष्यों से संपर्क स्थापित करने के वर्णन आते हैं । अप्सराएं स्वर्ग से ऋषियों के आश्रमों मे आती थीं और कइयों को मोहित करके उनके साथ रहती तथा संतान उत्पन्न करती थीं । श्रृंगी ऋषि को उन्होंने मोहित किया था। विश्वमित्र के साथ रहकर मेनका ने शकुन्तला को जन्म दिया था। यह सूक्ष्म शक्ति वाले सूक्ष्म रूप वाले देवी-देवताओं का वर्णन नहीं है वरन् उनका है जो मनुष्यों की तरह ही शरीर धारण किये थे। चन्द्रमा और इन्द्र ने ऋषि पत्नियों से व्यभिचार (Adultery) किया और फलस्वरूप उन्हे शाप का भागी भी होना पड़ा था।

इन घटनाओं पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि यदि स्वर्ग नामक कोई स्थान पथ्वी पर भी रहा है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यदि ऐसा न होता तो देवताओं का पृथ्वी पर और भूलोक वासियों का स्वर्ग में पहुंचना कैसे सम्भव रहा होता?

पुराणों मे सुमेरु पर्वत का विस्तृत वर्णन आता है जिसमें कहा गया है कि देवता सुमेरु पर्वत पर रहते थे पतंजलि योग प्रदीप मे इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है : मध्य मे सुवर्णमय पर्वतराज सुमेरु विराजमान है। उस सुमेरु पर्वतराज के चारों दिशाओं में चार चोटियां हैं । उनमें जो पूर्व दिशा में चोटी है वह रजतमय है। दक्षिण दिशा मे जो है वह बैद्रर्यमणिमय है, जो पश्चिम दिशा में है वह स्फटिकमय (प्रतिविम्ब ग्रहण करने वाला) है और जो उत्तर दिशा में है वह सुवर्णमय तथा सुवर्ण के रंग वाले पुष्प विशेष के वर्ण वाली है। सुमेरु पर्वत देवताओं की उद्यान भूमि है जहाँ मिश्रवन, नन्दनवन, चैत्ररथवन और सुमानसवन चार वन हैं । सुमेरु के ऊपर सुधर्म नामक देक्सभा है और वैयरुनत नामक प्रसाद देवमहल है। इसके ऊपर स्वर्गलोक है जिसको महेन्द्रलोक कहते है। सुमेरु अर्थात् हिमालय पर्वत उस समय की उच्च कोटि के योगियों के तप का स्थान था।

परमपूज्य गुरुदेव की सुमेरु पर्वत क्षेत्र यात्रा के बारे में हमारे सहकर्मी अगस्त 2021 के लेख पढ़ सकते हैं। इन लेखों में हमने कुछ HD वीडियोस भी अपलोड भी की थीं जिनसे इस क्षेत्र को जानने में सुविधा हो सकती है। इसके लिए हमारे सहकर्मियों को हमारी वेबसाइट को विजिट करना होगा

To be continued : 

 हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प 

14 मार्च 2022 के ज्ञानप्रसाद अमृतपान के उपरांत 3 सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1)संध्या कुमार -25 , (2 ) सरविन्द कुमार -32 ,(3 ) अरुण वर्मा-32 

आज फिर दोनों समर्पित भाई अरुण वर्मा जी और सरविन्द कुमार जी गोल्ड मैडल थामते हुए ऑनलाइन ज्ञानरथ को उच्त्तर शिखर पर पहुँचाने में कार्यरत हैं । दोनों को हमारी व्यक्तिगत और परिवार की सामूहिक बधाई। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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