संकल्प शक्ति एक अद्भुत शक्ति

शब्द सीमा के कारण आज का ज्ञानप्रसाद बिना किसी opening remarks के और बिना 24 आहुति संकल्प सूची के प्रस्तुत करने में विवश हैं जिसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।बीबी सी की virgin births वाली रिपोर्ट भी स्थगित करने को विवश हैं। 

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परमपूज्य गुरुदेव ने आत्मबल,मनोबल,आत्मविश्वास पर बहुत विशाल साहित्य की रचना की है। इसी साहित्य के आधार पर आजकल हम अपने सहकर्मियों के साथ चर्चा कर रहे हैं कि आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति की कितनी महिमा है। संकल्प शक्ति बिल्कुल साधना शक्ति की तरह हैं। साधना से पूर्व संकल्प लेना, commitment करना बहुत ही आवश्यक है। उससे भी बड़ी बात है वातावरण की, हमारे मन के वातावरण की और हमारी मनोभूमि की। स्वामी अवदेशानंद गिरि जी महाराज ने कई बार अपने उद्बोधनों में मनोभूमि की महत्ता समझाते हुए कहा है कि गर्भाधारण के लिए उपयुक्त वातावरण और भूमि की आवश्यकता होती है। 

हम सभी जानते हैं कि कर्म का बीज-संकल्प की शक्ति है। जैसा हमारे मन में संकल्प उठता है, वैसी ही क्रिया-प्रतिक्रिया (कर्म) स्वत: और तुरन्त होने लगती है। जब कोई स्वादिष्ट व्यंजन खाने का संकल्प उठता है तो स्वतः ही मुँह में पानी आ जाता है जिसे लार टपकना कहते हैं और जब कोई दुःखद घटना सुनाई देती है तो स्वतः ही आंखों से आंसू टपकते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जैसा संकल्प उठता है, उससे सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (glands) सक्रिय होकर वैसा रस-स्राव करती हैं। 

इसी योग-बल की शक्ति से दृष्टि के द्वारा, बिना स्त्री-पुरुष के सैक्स करने से सन्तान उत्पन्न की जा सकती है । जब हम योग-बल की ऊर्जा से परिपूर्ण होते हैं तो सन्तान उत्पत्ति के संकल्प मात्र से एवं दृष्टि के प्रभाव से नारी में ग्रन्थियां सक्रिय हो जाती हैं और उनमें मौजूद X, X क्रोमोसोम्स, कुछ Y में बदल कर आपस में संयुक्त होकर गर्भधारण करते हैं। ये क्रोमोसोम्स आपस में संयुक्त एवं परिवर्तित तभी होंगे जब हमारी सोच शक्तिशाली होगी, जब हमारी सोच व्यर्थ नहीं होकर समर्थ होगी, जब हमारी सोच नकारात्मक न रह कर सकारात्मक बन जायेगी। मानव शरीर के प्रत्येक cell में 23 जोड़े क्रोमोसोम्स होते हैं जो टोटल 46 बनते हैं। इन 23 में से केवल एक ही जोड़ा ऐसा होता है जिसे sex chromosome कहते हैं। महिलाओं में इस एक जोड़े में दोनों X जबकि पुरषों में एक X और एक Y होता है।

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आंतरिक शक्ति ,आत्मिक शक्ति जिसे हमने अपने पूर्व प्रकाशित लेखों में ब्रह्माण्ड शक्ति से compare करते हुए समझने का प्रयास किया था, यह परमपिता परमात्मा का दिया हुआ वरदान है। इस असीम शक्ति को पहचानना हमारा कर्तव्य है, जिसने इस शक्ति को पहचान लिया वह मानव से महामानव और देवमानव बनता जायेगा और कभी भीअपनेआप को under-estimate नहीं करेगा। 

“आइये ज़रा देखें इस असीम शक्ति का एक उदाहरण।”

अखंड ज्योति के मई 1996 के अंक में परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :

मनुष्य के अन्दर इतना कुछ असाधारण छिपा-दबा पड़ा है कि उसे ढूँढ़ने-उभारने में संलग्न होने वाला मनुष्य ऐसी असाधारण विभूतियाँ करतलगत कर लेता है जिन्हे बाहरी उपार्जन से किसी भी प्रकार संभव नहीं किया जा सकता। सिद्धियों की चर्चा जहाँ-तहाँ होती रहती है और ऐसे विवरण सामने आते रहते हैं, जिनसे प्रकट होता है कि बाहरी दौड़-धूप तक सीमित रहने की अपेक्षा अधिक सुखी समुन्नत बनने के लिए अपने अंतरंग में छिपी शक्तियों को ढूँढ़ना और जगाना कम लाभदायक नहीं है।

बौद्ध धर्म की योग-साधनाओं में एक साधना है जो “जेन साधना” के नाम से प्रसिद्ध है। जिसके प्रमाण जापान आदि देशों में भी पिछले दिनों तक पाए जाते रहे हैं। क्या है यह साधना, इसका विस्तृत विवरण तो हम अगले लेख में ही पढ़ पायेंगें, आज देखेंगें कि इस साधना से ‘मास’ नामक पहलवान ने कुश्ती के क्षेत्र में क्या विश्व्यापी कीर्तिमान स्थापित किए। 

तो प्रस्तुत है कोरियाई पहलवान की शक्ति : 

एक बार ‘मास’ नामक एक कोरियाई नाटा (ठिगना) पहलवान अमेरिका गया और उसने वहाँ के नामी-गिरामी पहलवानों को चुनौतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः एक दंगल का आयोजन किया गया जिसमें अमेरिका के तत्कालीन चैम्पियन पहलवान डिकरियल से भिड़न्त की व्यवस्था की गई। दोनों जब विशाल जन-समूह के बीच अखाड़े में उतरे, तो जनता खिलखिला कर हँस पड़ी। हँसी का मुख्य कारण ‘मास’ का कद था। अपने छोटे कद और साधारण शरीर गठन से उसने डिकरियल को जिस प्रकार की चुनौती दी थी, उससे बरबस ही दर्शकों की हँसी फूट पड़ी। ‘मास’ देखने में डिकरियल से दो फुट छोटा ही न था वरन् आकार में भी उसके आगे वह बच्चे जैसा लगता था। कहाँ 6 फुट 7 इंच का डिकरियल और कहाँ 4 फुट 1 इंच का बौना ‘मास’। दर्शकों का उत्साह ठंडा हो गया और वे इस बेजोड़-बेतुकी कुश्ती का सहज परिणाम समझ कर समय से पहले ही उठ कर जाने लगे किन्तु तब चमत्कार ही हो गया, जब कुछ ही दाँव-पेंचों के बाद ‘मास’ ने डिकरियल को चित्त कर दिया और एक हजार डालर का इनाम जीत लिया। 

अमेरिकी जनता इस पराजय को अपना राष्ट्रीय अपमान समझने लगी और ‘मास’ पर धोखाधड़ी की लड़ाई-लड़ने का आरोप लगाया गया। अखबारों में इस संबंध में कटु आलोचनाएँ छपी। खिन्न ‘मास’ ने इन आरोपों का उत्तर एक नई चुनौती के रूप में दिया। उसने विज्ञापन छपवाया कि कोई भी अमेरिकी यदि उसे हरा दे, तो वह मिली हुई उपहार की रकम एक हजार डालर उसी को खुशी-खुशी वापिस लौटा देगा। एक बार फिर दंगल का आयोजन हुआ। इसमें एक पुलिस अफसर से कुश्ती निर्धारित की गई। यह अफसर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पहलवान था। वह बहुत ही आवेश में लड़ने आया था, किन्तु हुआ इस बार भी अचरज कि ‘मास’ ने उसे ऐसी पटक दी कि बेचारे की दो हड्डियाँ ही टूट गईं। इस पर अमेरिकी और भी खीजे और मारने पर उतारू हो गये। किसी प्रकार भाग कर वह अपने होटल पहुँचा और जान बचायी।

यह तो हुई अमेरिका की बात, इससे पूर्व ‘मास’ ने जापान में भी अपने पराक्रम की धूम मचा दी थी। यों तो वह जन्म से कोरियाई था, पर वहाँ से बचपन में ही अपने बाप के साथ जापान आ गया था और वहाँ का नागरिक बन गया था। उसने एक विशेष प्रकार की योग-साधना “जेन साधना” सीखी और उसी के बल पर वह चमत्कारी योद्धा बन गया।

अक्सर चुनौती भरे प्रदर्शनों में उसके सामने अत्यन्त मजबूत पत्थर जैसी कठोर पकी हुई दो ईटें दी जातीं। ईंटों की मजबूती को विशेषज्ञ परखते। इसके बाद दोनों हथेलियों के बीच वह इन ईंटों को रखता और उंगलियों के खाँचे भिड़ाकर इस तरह दबाता कि ईंटों का चूरा हो जाता दर्शक अवाक् रह जाते।

एक बार जापान में उसे विचित्र प्रकार की कुश्ती का सामना करना पड़ा:

हारे हुए पहलवानों ने मिल-जुलकर उसे चुनौती दी कि वह साँड़ से कुश्ती लड़ने को तैयार हो। पहले तो वह आनाकानी करता रहा, पर पीछे जब चिढ़ाया जाने लगा, तो वह तैयार हो गया। इसके लिए एक अत्यन्त क्रोधी और 13 मन भारी साँड़ विशेष रूप से तैयार किया गया और नशा पिलाकर प्राणघातक आक्रमण करने में प्रवीण बनाया गया। इस दंगल को देखने के लिए जापान के कोने-कोने से लोग आये। डॉक्टरों और पुलिस वालों का एक विशेष कैम्प लगाया गया कि यदि ‘मास’ साँड़ की चपेट में आ जाय तो कम से कम उसकी मरणासन्न स्थिति में लाश को यथास्थान पहुँचाया जा सके, तब कुद्ध साँड़ को काबू करने का भी सवाल था। यह काम पुलिस ही सँभाल सकती थी सो सभी आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही नियोजित कर लिये गये। ‘मास’ पूरी तरह निहत्था था। मुट्ठियाँ ही उसकी एक मात्र ढाल तलवार थीं। लड़ाई आरंभ हुई, आक्रमण करने के लिए पहला अवसर साँड़ को दिया गया। ‘मास’ अपनी जगह चट्टान की तरह खड़ा रहा। टक्कर खाकर वह उखड़ा नहीं, वरन् घूसे से प्रत्याक्रमण किया। घूसा ऐसा करारा बैठा कि वह एक में ही चक्कर खाकर गिर पड़ा और वहीं ढेर हो गया। 13 मन भारी उस महादैत्य साँड़ को एक ठिगना सा दो मन से भी कम वजन का मनुष्य इस तरह गिर सकता है, यह दृश्य लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था। कई तो इसे “भूत-प्रेत की सिद्धि एवं जादू मंत्र” का चमत्कार तक कहने लगे।

साँड़-‘मास’ युद्ध की प्रसिद्धि सम्पूर्ण जापान में फैल गई। यत्र-तत्र उसकी ही चर्चा होती सुनी जाती। ढेर सारे प्रशंसा पत्र उसके पास आने लगे। कितने ही लोग व्यक्तिगत रूप से भी उससे मिलने भी आते। घर पर प्रशंसकों को ताँता लगा रहता। इन सबसे चिढ़कर पराजित पहलवानों ने उसके विरुद्ध कुचक्र रचना आरम्भ किया। वे सभी कोई ऐसा उपाय सोचने ले, जिससे ‘मास’ को नीचा दिखाया जाए और उसके गर्व को चूरचूर किया जा सके।

‘मास’ को नीचा दिखाने की युक्ति : 

अचानक उन्हें एक युक्ति सूझी। कुछ ही दिन पूर्व कुंग फू क्षेत्र से एक नरभक्षी शेर पकड़ा गया था। शेर बड़ा ही खूंखार और आकार प्रकार में बहुत बड़ा था। उन्होंने ‘मास’ के समक्ष शेर से भिड़ने का प्रस्ताव रखा। ‘मास’ पहले तो हिचका, पर बाद में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। तिथि निक्षित कर दी गई। मुकाबले की तैयारी होने लगी। आयोजनकर्ताओं ने इसके लिए एक विशाल पिंजरा बनवाया। नियत तिथि को एक मैदान में शेर को लाया गया और इस पिंजरे में बन्द कर दिया गया। भीड़ बुरी तरह इस अद्भुत भिड़न्त को देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। सभी के मन में कौतूहल और उत्सुकता थी। ‘मास’ भी वहाँ पहुँच चुका था। शर्त के अनुसार ‘मास’ को शेर के गले में एक जंजीर बाँधनी थी। जब सम्पूर्ण तैयारी हो गई, तो ‘मास’ दरवाजा खोल कर पिंजरे के अन्दर गया और पुनः उसे बन्द कर लिया। मनुष्य को अपने समीप देखते ही शेर गुर्राया और आक्रमण कर दिया। ‘मास’ इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं था। शेर उसके बायें कंधे का दो इंच मांस नोंच ले गया। अब ‘मास’ सतर्क हो चुका था। नरभक्षी दोबारा उसकी और झपटा। इस बार उसने अपने को फुर्ती से एक तरफ हटा लिया और शेर के वार को निष्फल कर दिया। दूसरे ही पल उसने चीते की सी फुर्ती दिखायी और जब तक शेर सम्भल पाता, इसके पूर्व ही एक भरपूर घूंसा उसके नथुनों में जड़ दिया और एक तरफ हट गया। शेर के नथुनों से खून की धारा फूट पड़ी। पीड़ा से वह बिलबिला उठा।ज़ोर की दहाड़ लगायी और ‘मास’ के ऊपर टूट पड़ा। इस बार पुनः उसने अपने को चतुराई पूर्वक बचा लिया और अगले आक्रमण से पूर्व ही ताबड़तोड़ घूंसे बरसाने लगा। इस बार प्रहार करारा था और सिर के ऊपर पड़ा। शेर वहीं निढाल सा पड़ गया। अब उसने जंजीर उठायी। और आसानी से शेर के गले में बाँध कर बाहर आ गया। सभी ने उसकी हिम्मत और बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की और करतल ध्वनि से उसका स्वागत किया। इस बार षड्यंत्रकारी पहलवानों को भी उसकी शक्ति स्वीकारनी पड़ी।

क्रमशः जारी -To be continued 

11 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद – संकल्प शक्ति एक अद्भुत शक्ति

शब्द सीमा के कारण आज का ज्ञानप्रसाद बिना किसी opening remarks के और बिना 24 आहुति संकल्प सूची के प्रस्तुत करने में विवश हैं जिसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं।बीबी सी की virgin births वाली रिपोर्ट भी स्थगित करने को विवश हैं। 

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परमपूज्य गुरुदेव ने आत्मबल,मनोबल,आत्मविश्वास पर बहुत विशाल साहित्य की रचना की है। इसी साहित्य के आधार पर आजकल हम अपने सहकर्मियों के साथ चर्चा कर रहे हैं कि आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति की कितनी महिमा है। संकल्प शक्ति बिल्कुल साधना शक्ति की तरह हैं। साधना से पूर्व संकल्प लेना, commitment करना बहुत ही आवश्यक है। उससे भी बड़ी बात है वातावरण की, हमारे मन के वातावरण की और हमारी मनोभूमि की। स्वामी अवदेशानंद गिरि जी महाराज ने कई बार अपने उद्बोधनों में मनोभूमि की महत्ता समझाते हुए कहा है कि गर्भाधारण के लिए उपयुक्त वातावरण और भूमि की आवश्यकता होती है। 

हम सभी जानते हैं कि कर्म का बीज-संकल्प की शक्ति है। जैसा हमारे मन में संकल्प उठता है, वैसी ही क्रिया-प्रतिक्रिया (कर्म) स्वत: और तुरन्त होने लगती है। जब कोई स्वादिष्ट व्यंजन खाने का संकल्प उठता है तो स्वतः ही मुँह में पानी आ जाता है जिसे लार टपकना कहते हैं और जब कोई दुःखद घटना सुनाई देती है तो स्वतः ही आंखों से आंसू टपकते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जैसा संकल्प उठता है, उससे सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (glands) सक्रिय होकर वैसा रस-स्राव करती हैं। 

इसी योग-बल की शक्ति से दृष्टि के द्वारा, बिना स्त्री-पुरुष के सैक्स करने से सन्तान उत्पन्न की जा सकती है । जब हम योग-बल की ऊर्जा से परिपूर्ण होते हैं तो सन्तान उत्पत्ति के संकल्प मात्र से एवं दृष्टि के प्रभाव से नारी में ग्रन्थियां सक्रिय हो जाती हैं और उनमें मौजूद X, X क्रोमोसोम्स, कुछ Y में बदल कर आपस में संयुक्त होकर गर्भधारण करते हैं। ये क्रोमोसोम्स आपस में संयुक्त एवं परिवर्तित तभी होंगे जब हमारी सोच शक्तिशाली होगी, जब हमारी सोच व्यर्थ नहीं होकर समर्थ होगी, जब हमारी सोच नकारात्मक न रह कर सकारात्मक बन जायेगी। मानव शरीर के प्रत्येक cell में 23 जोड़े क्रोमोसोम्स होते हैं जो टोटल 46 बनते हैं। इन 23 में से केवल एक ही जोड़ा ऐसा होता है जिसे sex chromosome कहते हैं। महिलाओं में इस एक जोड़े में दोनों X जबकि पुरषों में एक X और एक Y होता है।

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आंतरिक शक्ति ,आत्मिक शक्ति जिसे हमने अपने पूर्व प्रकाशित लेखों में ब्रह्माण्ड शक्ति से compare करते हुए समझने का प्रयास किया था, यह परमपिता परमात्मा का दिया हुआ वरदान है। इस असीम शक्ति को पहचानना हमारा कर्तव्य है, जिसने इस शक्ति को पहचान लिया वह मानव से महामानव और देवमानव बनता जायेगा और कभी भीअपनेआप को under-estimate नहीं करेगा। 

“आइये ज़रा देखें इस असीम शक्ति का एक उदाहरण।”

अखंड ज्योति के मई 1996 के अंक में परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं :

मनुष्य के अन्दर इतना कुछ असाधारण छिपा-दबा पड़ा है कि उसे ढूँढ़ने-उभारने में संलग्न होने वाला मनुष्य ऐसी असाधारण विभूतियाँ करतलगत कर लेता है जिन्हे बाहरी उपार्जन से किसी भी प्रकार संभव नहीं किया जा सकता। सिद्धियों की चर्चा जहाँ-तहाँ होती रहती है और ऐसे विवरण सामने आते रहते हैं, जिनसे प्रकट होता है कि बाहरी दौड़-धूप तक सीमित रहने की अपेक्षा अधिक सुखी समुन्नत बनने के लिए अपने अंतरंग में छिपी शक्तियों को ढूँढ़ना और जगाना कम लाभदायक नहीं है।

बौद्ध धर्म की योग-साधनाओं में एक साधना है जो “जेन साधना” के नाम से प्रसिद्ध है। जिसके प्रमाण जापान आदि देशों में भी पिछले दिनों तक पाए जाते रहे हैं। क्या है यह साधना, इसका विस्तृत विवरण तो हम अगले लेख में ही पढ़ पायेंगें, आज देखेंगें कि इस साधना से ‘मास’ नामक पहलवान ने कुश्ती के क्षेत्र में क्या विश्व्यापी कीर्तिमान स्थापित किए। 

तो प्रस्तुत है कोरियाई पहलवान की शक्ति : 

एक बार ‘मास’ नामक एक कोरियाई नाटा (ठिगना) पहलवान अमेरिका गया और उसने वहाँ के नामी-गिरामी पहलवानों को चुनौतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः एक दंगल का आयोजन किया गया जिसमें अमेरिका के तत्कालीन चैम्पियन पहलवान डिकरियल से भिड़न्त की व्यवस्था की गई। दोनों जब विशाल जन-समूह के बीच अखाड़े में उतरे, तो जनता खिलखिला कर हँस पड़ी। हँसी का मुख्य कारण ‘मास’ का कद था। अपने छोटे कद और साधारण शरीर गठन से उसने डिकरियल को जिस प्रकार की चुनौती दी थी, उससे बरबस ही दर्शकों की हँसी फूट पड़ी। ‘मास’ देखने में डिकरियल से दो फुट छोटा ही न था वरन् आकार में भी उसके आगे वह बच्चे जैसा लगता था। कहाँ 6 फुट 7 इंच का डिकरियल और कहाँ 4 फुट 1 इंच का बौना ‘मास’। दर्शकों का उत्साह ठंडा हो गया और वे इस बेजोड़-बेतुकी कुश्ती का सहज परिणाम समझ कर समय से पहले ही उठ कर जाने लगे किन्तु तब चमत्कार ही हो गया, जब कुछ ही दाँव-पेंचों के बाद ‘मास’ ने डिकरियल को चित्त कर दिया और एक हजार डालर का इनाम जीत लिया। 

अमेरिकी जनता इस पराजय को अपना राष्ट्रीय अपमान समझने लगी और ‘मास’ पर धोखाधड़ी की लड़ाई-लड़ने का आरोप लगाया गया। अखबारों में इस संबंध में कटु आलोचनाएँ छपी। खिन्न ‘मास’ ने इन आरोपों का उत्तर एक नई चुनौती के रूप में दिया। उसने विज्ञापन छपवाया कि कोई भी अमेरिकी यदि उसे हरा दे, तो वह मिली हुई उपहार की रकम एक हजार डालर उसी को खुशी-खुशी वापिस लौटा देगा। एक बार फिर दंगल का आयोजन हुआ। इसमें एक पुलिस अफसर से कुश्ती निर्धारित की गई। यह अफसर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पहलवान था। वह बहुत ही आवेश में लड़ने आया था, किन्तु हुआ इस बार भी अचरज कि ‘मास’ ने उसे ऐसी पटक दी कि बेचारे की दो हड्डियाँ ही टूट गईं। इस पर अमेरिकी और भी खीजे और मारने पर उतारू हो गये। किसी प्रकार भाग कर वह अपने होटल पहुँचा और जान बचायी।

यह तो हुई अमेरिका की बात, इससे पूर्व ‘मास’ ने जापान में भी अपने पराक्रम की धूम मचा दी थी। यों तो वह जन्म से कोरियाई था, पर वहाँ से बचपन में ही अपने बाप के साथ जापान आ गया था और वहाँ का नागरिक बन गया था। उसने एक विशेष प्रकार की योग-साधना “जेन साधना” सीखी और उसी के बल पर वह चमत्कारी योद्धा बन गया।

अक्सर चुनौती भरे प्रदर्शनों में उसके सामने अत्यन्त मजबूत पत्थर जैसी कठोर पकी हुई दो ईटें दी जातीं। ईंटों की मजबूती को विशेषज्ञ परखते। इसके बाद दोनों हथेलियों के बीच वह इन ईंटों को रखता और उंगलियों के खाँचे भिड़ाकर इस तरह दबाता कि ईंटों का चूरा हो जाता दर्शक अवाक् रह जाते।

एक बार जापान में उसे विचित्र प्रकार की कुश्ती का सामना करना पड़ा:

हारे हुए पहलवानों ने मिल-जुलकर उसे चुनौती दी कि वह साँड़ से कुश्ती लड़ने को तैयार हो। पहले तो वह आनाकानी करता रहा, पर पीछे जब चिढ़ाया जाने लगा, तो वह तैयार हो गया। इसके लिए एक अत्यन्त क्रोधी और 13 मन भारी साँड़ विशेष रूप से तैयार किया गया और नशा पिलाकर प्राणघातक आक्रमण करने में प्रवीण बनाया गया। इस दंगल को देखने के लिए जापान के कोने-कोने से लोग आये। डॉक्टरों और पुलिस वालों का एक विशेष कैम्प लगाया गया कि यदि ‘मास’ साँड़ की चपेट में आ जाय तो कम से कम उसकी मरणासन्न स्थिति में लाश को यथास्थान पहुँचाया जा सके, तब कुद्ध साँड़ को काबू करने का भी सवाल था। यह काम पुलिस ही सँभाल सकती थी सो सभी आवश्यक प्रबन्ध पहले से ही नियोजित कर लिये गये। ‘मास’ पूरी तरह निहत्था था। मुट्ठियाँ ही उसकी एक मात्र ढाल तलवार थीं। लड़ाई आरंभ हुई, आक्रमण करने के लिए पहला अवसर साँड़ को दिया गया। ‘मास’ अपनी जगह चट्टान की तरह खड़ा रहा। टक्कर खाकर वह उखड़ा नहीं, वरन् घूसे से प्रत्याक्रमण किया। घूसा ऐसा करारा बैठा कि वह एक में ही चक्कर खाकर गिर पड़ा और वहीं ढेर हो गया। 13 मन भारी उस महादैत्य साँड़ को एक ठिगना सा दो मन से भी कम वजन का मनुष्य इस तरह गिर सकता है, यह दृश्य लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था। कई तो इसे “भूत-प्रेत की सिद्धि एवं जादू मंत्र” का चमत्कार तक कहने लगे।

साँड़-‘मास’ युद्ध की प्रसिद्धि सम्पूर्ण जापान में फैल गई। यत्र-तत्र उसकी ही चर्चा होती सुनी जाती। ढेर सारे प्रशंसा पत्र उसके पास आने लगे। कितने ही लोग व्यक्तिगत रूप से भी उससे मिलने भी आते। घर पर प्रशंसकों को ताँता लगा रहता। इन सबसे चिढ़कर पराजित पहलवानों ने उसके विरुद्ध कुचक्र रचना आरम्भ किया। वे सभी कोई ऐसा उपाय सोचने ले, जिससे ‘मास’ को नीचा दिखाया जाए और उसके गर्व को चूरचूर किया जा सके।

‘मास’ को नीचा दिखाने की युक्ति : 

अचानक उन्हें एक युक्ति सूझी। कुछ ही दिन पूर्व कुंग फू क्षेत्र से एक नरभक्षी शेर पकड़ा गया था। शेर बड़ा ही खूंखार और आकार प्रकार में बहुत बड़ा था। उन्होंने ‘मास’ के समक्ष शेर से भिड़ने का प्रस्ताव रखा। ‘मास’ पहले तो हिचका, पर बाद में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। तिथि निक्षित कर दी गई। मुकाबले की तैयारी होने लगी। आयोजनकर्ताओं ने इसके लिए एक विशाल पिंजरा बनवाया। नियत तिथि को एक मैदान में शेर को लाया गया और इस पिंजरे में बन्द कर दिया गया। भीड़ बुरी तरह इस अद्भुत भिड़न्त को देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। सभी के मन में कौतूहल और उत्सुकता थी। ‘मास’ भी वहाँ पहुँच चुका था। शर्त के अनुसार ‘मास’ को शेर के गले में एक जंजीर बाँधनी थी। जब सम्पूर्ण तैयारी हो गई, तो ‘मास’ दरवाजा खोल कर पिंजरे के अन्दर गया और पुनः उसे बन्द कर लिया। मनुष्य को अपने समीप देखते ही शेर गुर्राया और आक्रमण कर दिया। ‘मास’ इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नहीं था। शेर उसके बायें कंधे का दो इंच मांस नोंच ले गया। अब ‘मास’ सतर्क हो चुका था। नरभक्षी दोबारा उसकी और झपटा। इस बार उसने अपने को फुर्ती से एक तरफ हटा लिया और शेर के वार को निष्फल कर दिया। दूसरे ही पल उसने चीते की सी फुर्ती दिखायी और जब तक शेर सम्भल पाता, इसके पूर्व ही एक भरपूर घूंसा उसके नथुनों में जड़ दिया और एक तरफ हट गया। शेर के नथुनों से खून की धारा फूट पड़ी। पीड़ा से वह बिलबिला उठा।ज़ोर की दहाड़ लगायी और ‘मास’ के ऊपर टूट पड़ा। इस बार पुनः उसने अपने को चतुराई पूर्वक बचा लिया और अगले आक्रमण से पूर्व ही ताबड़तोड़ घूंसे बरसाने लगा। इस बार प्रहार करारा था और सिर के ऊपर पड़ा। शेर वहीं निढाल सा पड़ गया। अब उसने जंजीर उठायी। और आसानी से शेर के गले में बाँध कर बाहर आ गया। सभी ने उसकी हिम्मत और बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की और करतल ध्वनि से उसका स्वागत किया। इस बार षड्यंत्रकारी पहलवानों को भी उसकी शक्ति स्वीकारनी पड़ी।

क्रमशः जारी -To be continued 


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