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आंतरिक सुख ही स्थाई सुख है। 

9 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद – आंतरिक सुख ही स्थाई सुख है। 

आत्मबल,मनोबल, आत्मविश्वास,शरीरबल, योगबल जैसे शब्द पिछले दो दिनों में हम कई बार प्रयोग कर चुके हैं। अपनी अल्प बुद्धि के आधार पर हमने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक बैकग्राउंड का सहारा लेते हुए कई बातों को समझने का प्रयास किया क्योंकि यह लेख हमारे व्यक्तिगत स्वाध्याय पर ही आधारित हैं। हम समझने का प्रयास कर रहे हैं कि साधना का मार्ग अपनाकर, आत्मविश्वास प्राप्त करके कौन-कौन सी अविश्वसनीय उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं। आने वाले लेखों में हम जापान की जेन साधना के परिणाम तो देखेगें ही लेकिन यह भी देखेंगें कि स्त्री पुरष द्वारा सेक्स किये बिना संतान उत्पन की जा सकती है। हमारे पुरातन ग्रन्थ तो ऐसे कई उदाहरणों से भरे हैं लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक सन्दर्भ में बीबीसी की 2014 की Virgin births पर चर्चा भी की जाएगी जिसमें stem cell science के द्वारा एक ही parent से संतान उत्पति हो सकती है। 

तो चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद को ओर 

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हमारे सहकर्मियों ने कल वाले लेख में देखा था कि कैसे एक यात्री विदेश में जाकर सुन्दर दिखने वाली लाल मिर्चों को खाता रहा और आंसू बहाता रहा। कहीं हमारा भी उस यात्री जैसा हाल तो नहीं है कि हम दुर्लभ हीरे जैसी अनमोल जीवन-यात्रा में बनावटी सुंदरता की मृगतृष्णा में फंस कर आंसू बहा रहे हैं -कदापि नहीं -यह ऑनलाइन ज्ञानरथ का परिवार है – एक ऐसा परिवार जहाँ स्थाई सुख है,कोई बनावट नहीं है। हमारा कोई भी सदस्य ऐसा नहीं है जो बार-बार उन्हीं चीज़ों में सुख ढूँढ रहा है जिनमें सुख है ही नहीं । कोई भी ऐसा नहीं है जो सुख की खोज में एक वस्तु से, दूसरी और फिर तीसरी पर जा रहा है। ज्ञानप्रसाद उसे इतना शिक्षित तो कर ही रहा है कि यह केवल मन का भ्रम ही है कि हम बाहरी वस्तुओं से सु्ख पा सकते हैं। सत्य यही है कि बाहरी किसी वस्तु में सुख है ही नहीं। जिस सुख की सभी को खोज है वह हम सबके अंदर ही है। ईश्वर ने हमें शरीर, मन व बुद्धि दी है ताकि हम अविवेकपूर्ण इन्द्रिय भोग से दूर ही रहें। शरीर व इन्द्रियों का उपयोग हम दो प्रकार से कर सकते हैं। पहला यदि हम ईश्वर को जानने का प्रयत्न करें तो हम अनंत सुख पा सकते हैं। परंतु यदि इन्द्रिय सुखों के पीछे ही भागते रहें, तो तीखे सुन्दर दिखने वाले फल में मिठास ढूँढने वाले मूर्ख यात्री के समान दुःख ही पाते रहेंगे।

इन्द्रिय सुखों की मूल प्रकृति ही दु:ख देने की है

यह समझे बिना उनके पीछे दौड़ने से दुःख ही हासिल होगा। अगर हम बाहरी वस्तुओं की मूल प्रकृति समझ लें, तो उनसे उत्पन्न दुःख, हमें कमजोर नहीं बना सकेगा।

सागर में लहरें उठती हैं, परंतु अगले ही क्षण तट पर गिर कर चूर हो जाती हैं। वे ऊपर रुक नहीं सकती, गिरना उनकी नियति है। जो व्यक्ति सुख पाने की आशा में बाहरी वस्तुओं की ओर लपकता है, वह भी इसी तरह गिरकर दुःखी होता है। इससे हमें यह समझ लेना चाहिये कि सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं है। लोगों की आंतरिक अशांति व दु:ख का कारण यही भ्रम है। इससे केवल व्यक्ति नहीं, पूरा समाज प्रभावित हो रहा है। बाहरी वस्तुओं में सुख की खोज के कारण ही “सच्चा प्रेम” लुप्त हो गया है। पारिवारिक जीवन की खुशी व शांति नष्ट हो गई है। लोगों ने खुले दिल से प्रेम व सेवा करने की क्षमता खो दी है। पति पराई स्त्रियों की कामना करते हैं और स्त्रियाँ पराये मर्दों की। भोग की लालसा इस हद तक बढ़ चुकी है कि कुछ ऐसे पिता भी हैं, जो भूल जाते कि वह उनकी अपनी बेटी है। भार्ई बहन के रिश्तों में भी दरार पड़ रही है। अनगिनत बच्चों की हत्या की जा रही है। इस सारी दुष्टता का कारण यह भ्रमित करने वाली अवधारणा है कि सुख बाहर पाया जा सकता है। जो लोग केवल अपने लिये सुख खोजते फिर रहे हैं तथा असंयमित जीवन जी रहे हैं, उनका अंत दु:खदायी ही होगा ? यह स्वाभाविक है कि कामनाएँ और भावनाएँ मन में पैदा हों, लेकिन कुछ संयम बरतना आवश्यक है। भूख लगना स्वाभाविक है, यह शरीर की एक अतिआवश्यक ज़रूरत है परंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि कहीं भी, कभी भी, कुछ भी, खाने योग्य दिेखे तो हम उस पर टूट पड़ें। ऐसा करेंगे, तो बीमार पड़ जायँगे। 

अधिक भोग से दु:ख ही पैदा होगा लेकिन क्या हम इस पर विचार करते हैं। 

जो लोग पागलों की तरह आत्मिक सुख की चिंता किए बिना बाहरी सुखों की ओर भागते रहते हैं, तब तक पीछा करते रहते हैं जब तक कि वे हारकर, निराश होकर गिर न पड़ें, हमेशा दुःखी ही रहेंगें, अशांत ही रहेंगें, stressed ही रहेंगें। ऐसे लोगों को अपने अंदर झांकना चाहिए। अपनी अंतरात्मा के साथ connection बनाना चाहिए और सीखना चाहिए कि हमारा अन्तःकरण अनंत संभावनाओं का स्रोत है, वहीँ सच्चा सुख मिलने की सम्भावना है। जब तक हमारा मन बाहरी कूद-फाँद बंद करके, शांत नहीं हो जाता, तब तक सच्चा सुख अनुभव करना असंभव ही होता है । सागर की गहराई में बेचैनी की कोई लहरें नहीं हैं।

मन की गहराइयों में उतरते ही, मन स्वतः शांत हो जाता है. वहाँ केवल आनंद ही आनंद है। 

वह परमात्मा जिसे लोग मंदिरों में तलाशते हैं, “मन के मंदिर” में ही मिल सकता है। भक्त को वह अपने हृदय में प्रतीत होता है। वह भक्त को निर्देश देता है, प्रेम देता है, आनंद और ज्ञान देता है, उच्च मनोभूमि पर स्थापित करता है, द्वन्दों से परे ले जाता है, आकाश की तरह मुक्त वह परमात्मा स्वयं सच्चिदानंद है। उसकी अनुभूति होने के बाद संसार का हर सुख मृगतृष्णा की भांति प्रतीत होता है। भीतर का सुख शाश्वत है, असीम है, अपरिवर्तनीय है। जहाँ कोई रुकावट नहीं, कोई उहापोह नहीं, कोई चाह नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। वह शहंशाहों का शाह जब दिल में बसता हो तो और कुछ चाहने योग्य बचता भी कहाँ है। वह जिसका मीत ( मन का मीत ) बना हो उसका शोक सदा के लिये समाप्त हो जाता है। जीवन उत्सव बन जाता है। भक्ति, प्रेम और ज्ञान ही जीवन को तृप्त कर सकते हैं, इसका पता चलने पर अपनी कमियों को दूर करने की समझ भी बढ़ती है और संकल्प का बल भी मिलता है। एक छोटी सी किरण भी यदि उस परम की भीतर मिल जाये तो राह मिल जाती है। बाहर के मौसम के मिजाज़ तो बदलते रहते हैं, हमें अपने अंदर वह धुरी खोज निकालनी है जो अचल है, अडिग है जिसका आश्रय लेकर हम दुनिया में किसी भी ऊंचाई तक पहुँच सकते हैं, जो मुक्त है, शुद्ध प्रेम स्वरूप है, उसी को पाने के लिये भीतर की यात्रा योगी करते हैं। स्थिर मन ही हमें उस स्थिति तक ले जा सकता है और “मन की स्थिरता” ध्यान से आती है। वहाँ एक बार जाकर लौटना नहीं होता, हम जीते जी पूर्णता का अनुभव करते हैं। प्रकृति के सान्निध्य में अथवा पूजा के क्षणों में अभी भी हम कभी-कभी ईश्वर की झलक पाते हैं पर यह अस्थायी होती है क्योंकि संसार पुनः हमें अपनी ओर खींचने का प्रयास करता ही रहता है और कई बार खींच भी लेता है। होना तो यह चाहिए कि जब हम साधना से उठें ,पूजास्थली से बाहिर आएं तो प्रसन्नता के साथ, आत्मिक शांति के साथ बाहिर आएं, हमें ऐसा प्रतीत हो कि हमें पता नहीं कौन सा कुबेर का खज़ाना मिल गया। अगर ऐसा नहीं होता है तो इसका अर्थ यही निकला जा सकता है कि हमारा मन संसार में डूबा हुआ है। इस स्थिति के लिए हम तो संसार को दोषी ठहरा रहे हैं लेकिन असल में हमारा मोह, हमारा लालच, हमारी तृष्णा हमें दलदल रुपी संसार से निकलने ही नहीं देती। 

लेकिन एक बात सत्य और अटल है कि किसी भी साधना के परिणाम एकदम नहीं देखे जा सकते। परिणाम देखने के लिए अनवरत अनुशासन के साथ, संयम को बरतते हुए ही प्रयास करना पड़ता है। इतनी पुरातन कहावत – Rome was not built in a day- आज भी कितने विश्वास के साथ प्रयोग की जाती है और कितनी प्रेरणा देती है। इस कहावत का अर्थ यह है कि बड़ी तथा महान् चीजें थोड़े समय में प्राप्त नहीं की जा सकती। व्यक्ति की मेहनत तथा लगन का बहुत मूल्य होता है। सफलता के लिए कोई भी Expressway मौजूद नहीं होता। जो लोग शार्ट-कट को अपनाते हैं उन्हें अन्त में दुःख तथा हार का सामना करना पड़ता है। उन्हें यह ज्ञान होना चाहिए कि जीवन में कोई जादू की छड़ी नहीं होती। रोम दुनिया का एक बहुत खूबसूरत शहर है। शुरूआत में वह एक छोटा-सा गाँव था। वहाँ रहने वाले लोगों ने कड़ी मेहनत करके उसे एक खूबसूरत शहर में तबदील किया। आज इसकी खूबसूरती कुछ दिनों की मेहनत नहीं, न ही किसी चमत्कार से है बल्कि यह तो वहां रहने वाले लोगों की कड़ी मेहनत का नतीजा है। दुनिया के बड़े-बड़े देश कड़ी मेहनत तथा प्रयासों से ही महान् बने हैं। केवल कुछ किताबें पढ़ने से व्यक्ति बुद्धिमान नहीं बनता। हमें कभी भी हौसला नहीं खोना चाहिए। यदि हमारे प्रयास कभी विफल भी हो जाएं तो लगातार परिश्रम करके ही सफलता की ऊँचाइयों को छुआ जा सकता। इसलिए व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति सहनशील तथा परिश्रमी होना चाहिए। 

जब हम आंतरिक सुख प्राप्त कर लेते हैं तो हम सभी को भाग-भाग कर बताते हैं, चाहे कोई सुने य न सुने। ऐसा इसलिये होता है कि यह Human Nature है कि जब हम खुश होते हैं तो वह ख़ुशी दूसरों के साथ बांटते हैं ताकि दूसरे भी खुश हों। फिर देखिये आप कैसे सभी को अपना बनाते चले जायेंगें,अपना परिवार ,social circle विस्तृत ही होता जायेगा, ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार की भांति। इसके विपरीत अगर हम दुःखी हैं तो आप देख सकते हैं कि लोग हमसे कैसे दूर भागेंगें क्योंकि उन्हें मालूम है कि इसने तो अपना ही रोना रोना है। 

आंतरिक सुख की स्थिति प्राप्त होते ही हम सबको उपदेश देने के समर्थ भी हो जाते हैं जैसे कि यह सुख अविनाशी होता है और मनुष्य को तृप्त करता है, यह अविस्मरणीय, अवर्णनीय होता है, इसके आगे संसार के सारे सुख तुच्छ एवं झूठे लगते हैं आदि आदि। आत्मिक सुख प्राप्त होते ही शरीर और आत्मा दोनों शक्तिशाली एवं पावन बन जाते हैं, शरीर स्वस्थ एवं गुलाबी हो जाता है, चेहरे पर रूहानी चमक, आंखों में गहराई एवं स्थिरता पैदा हो जाती है। इसे प्राकृतिक सौन्दर्य ( Natural Beauty ) कहा जाता है। इस प्राप्त ऊर्जा से हमारी स्थूल कर्मेन्द्रियाँ भी शान्त और शीतल हो जाती हैं, शरीर पर भी चुम्बकीय आभामंडल छा जाता है।

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं

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24 आहुति संकल्प 

 8 मार्च 2022 वाले लेख के स्वाध्याय के उपरांत निम्नलिखित 4 सहकर्मियों ने संकल्प पूर्ण किया है। 

(1)अरुण वर्मा-24 , (2)सरविन्द पाल-24 , (3) संध्या कुमार -25, (4) रेणु श्रीवास्तव-27 

रेनू श्रीवास्तव जी ने 27 अंक प्राप्त करके गोल्ड मैडल हासिल किया है।हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक शुभकामना। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्

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