कब तक मृगतृष्णा में आत्मबल की आहुति चढ़ाते जायेंगें ?

8 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद- कब तक मृगतृष्णा में आत्मबल की आहुति चढ़ाते जायेंगें ?

आज का मानव जीवन की अंधी दौड़ में आगे निकलने के लिए कुछ भी करने तो तैयार है ,किसी को भी गिराकर,किसी भी मूल्य पर, सबसे आगे, शिखर पर बैठने के लिए प्रयासरत है। जब वह शिखर प्राप्त नहीं होता तो औंधे बल गिरता है। इस स्थिति में आत्मबल, आत्मविश्वास, मनोबल ,शारीरिक बल आदि किस बल की बात करें, सभी शिथिल हो जाते हैं और मिलती है केवल अशांति। यही है मृगतृष्णा, एक ऐसी तृष्णा (प्यास) जो शांत तो होती नहीं है लेकिन मनुष्य अपना नाश कर बैठता है। परमपिता परमात्मा द्वारा वरदानरूपी अनंत संभावनाओं से युक्त इस मनुष्य शरीर का सम्मान करते हुए चलते हैं आज के ज्ञानप्रसाद की ओर।

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योगबल के माध्यम से हम परमसत्ता से ,परमात्मा से जुड़ सकते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। योग का तो शाब्दिक अर्थ ही जोड़ होता है। गणित की प्राम्भिक श्रेणियों में पढ़ाया जाता है 2 और 2 का योग 4 होता है। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है।

आगे चलने से पूर्व आइये कुछ टेक्निकल शब्दावली को जान लें। 

परमाणु को इंग्लिश में Atom कहते हैं। 

अणु को इंग्लिश में Molecule कहते हैं 

तत्व को इंग्लिश में Element कहते हैं 

उत्तक को इंग्लिश में Tissue कहते हैं 

जीवद्रव्य को इंग्लिश में Protoplasm/Cytoplasm कहते हैं 

कोशिका को इंग्लिश में Cells कहते हैं।

 हमारा शरीर अति सूक्ष्म परमाणुओं (atoms) और अणुओं (molecules) से मिलकर बना है। अणु मिलकर तत्व (element) बनाते हैं और तत्वों के मेल से (cells) बनते हैं। हमारे शरीर में लगभग 370 से 500 ख़रब (37-50 trillion ) से भी अधिक cells होते हैं। बायोलॉजी हमें बताती है कि एक cell के अंदर 70 millivolts इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है, तो हम समझ सकते हैं कि हमारे शरीर में कितनी एनर्जी और चार्ज की सम्भावना है। हम तो अनंत ही कहेंगें। परमपिता परमात्मा ने हमें मनुष्य शरीर एक वरदान के रूप में दिया है। Cells मिलकर उत्तक (tissue) बनाते हैं और इन tissues से ही अंगों का निर्माण होता है।

आत्मा भृकुटि के मध्य में स्थित रहकर सारे शरीर को चेतन-ऊर्जा प्रदान करती है। “हमारे शरीर में आत्मा कहाँ रहती है?” इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ने और समझने के लिए हमने इंटरनेट पर खोज और स्वाध्याय करते हुए पाया कि हमारा अल्पज्ञान इस विषय पर उपलब्ध मटेरियल को समझने में असमर्थ है और कुछ कहने के बजाय और confuse हो जायेगा। इसलिए इस टॉपिक को थोड़ा और अध्यन करने तक स्थगित करना ही उचित समझा।

जीवन और ऊर्जा :

अब बात आती है जीवन और ऊर्जा की। हर cell में लाइफ है, जीवन है क्योंकि जिनसे वह बना हुआ है ( अणु और परमाणु ) उनमें लाइफ है। तो अगर लाइफ है तो एनर्जी/ऊर्जा भी होगी ही। शरीर के पालन पोषण के लिए, दिन भर की एक्टिविटी के लिए हम भोजन करते हैं। सड़क पर काम करने वाले श्रमिक और एयर कंडिशन्ड ऑफिस में कार्य करने वाले मनुष्य के भोजन में ज़मीन आसमान का अंतर है। लेकिन दोनों को ऊर्जा की आवश्यकता है। जिस ऊर्जा की हम इस समय बात कर रहे हैं वह है स्थूल ऊर्जा। स्थूल ऊर्जा की प्राप्ति के लिए हम भोजन लेते हैं जिससे रक्त बनता है, जो शिरा और धमनियों ( veins and arteries ) के द्वारा पूरे शरीर में प्रवाहित होता रहता है। इससे एक तरल पदार्थ बनता है जिसे जीवद्रव्य (protoplasm) कहते हैं। यह शरीर के लिए अनिवार्य तथा अतिशक्तिशाली होता है। इससे cells को शक्ति मिलती है और शरीर की पूरी मशीनरी शक्तिशाली होती हुई सभी कार्य सम्पन्न करती है। स्थूल ऊर्जा, आत्मिक ऊर्जा से अलग है। यह दोनों इसी तरह अलग हैं जिस तरह शारीरिक सुख और आत्मिक सुख। कई बार इन दोनों की इतनी अधिक overlapping होती है कि अलग होते हुए भी अलग करना कठिन होता है। उदाहरण के तौर पर हम कई बार अच्छे से अच्छा भोजन करने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते और अक्सर कहते हैं – पेट तो भर गया है लेकिन आत्मा तृप्त नहीं हुई है। 

जीवद्रव्य की मुख्य दो अवस्थायें होती हैं-1.अधोगामी (downward ), 2. उर्ध्वगामी (upward )। अधोगामी अवस्था में जीवद्रव्य व्यर्थ चला जाता है जिससे शरीर कमज़ोर, शिथिल एवं बीमार हो जाता है। आत्मा पतित हो जाती है। उर्ध्वगामी अवस्था के लिए उसकी दिशा बदलनी पड़ती है, जो कि कठिन कार्य है। यह बिल्कुल उसी तरह है जैसे हम अपने घर में छत पर रखी टंकी में पानी भरने के लिए पंप का प्रयोग करते हैं, लेकिन जब टंकी में पानी चला जाता है,टंकी भर जाती है तो केवल नल खोलने से ही पानी आना आरम्भ हो जाता है, तब किसी पंप की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि – Water flows from higher to lower level, heat flows from higher temperature to lower temperature. 

उर्ध्वगामी अवस्था के लिए हमें ध्यान की शक्ति,साधना की शक्ति, स्वाध्याय की शक्ति का सहयोग लेना पड़ता है। यह सारी क्रियाएं उसी पंप की तरह हैं जो हमें उच्च स्तर पर ,higher level तक पहुँचने में सहायक होती हैं। वास्तव में यही योगबल है, यही राजयोग है, इसी शक्ति से हम अपने मन की दिशा जो कि नकारात्मकता में बदल गई है, उसे सकारात्मकता में परिवर्तित कर सकते हैं। जब हमारी उर्ध्वगामी अवस्था होती है तो शरीर की कोशिकाओं को शक्ति मिलने के साथ-साथ उनकी दिशा बदल जाती है। जैसे, खेत में सिंचाई करते समय जल की धारा, फसल की दिशा में हो जाती है तो फसल लहराने लगती है। उसी प्रकार, कोशिकाओं के साथ शरीर की सारी तंत्र प्रणाली उर्ध्वगामी होकर शक्तिशाली बनती है जिससे “आत्मा की ऊर्जा” में वृद्धि होती है और परमात्मा की शक्तिशाली किरणों को ग्रहण करने की शक्ति उसे प्राप्त होती है। दिशा ऊपर की तरफ होने से, दिशा उर्ध्वगामी होने से मनुष्य को “ईश्वर पिता” जो कि ऊर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत है, से सुख, शान्ति, आनन्द, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति की शक्तिशाली किरणें मिलती हैं जिससे एक अलौकिक सुख और आनन्द की अनुभूति होती है। इसे ही “अतीन्द्रिय सुख (sensual pleasure)” या आत्मिक सुख कहते हैं। आत्मा का वास इसी अतीन्द्रिय सुख में होता है। आत्मा अविनाशी है तो आत्मिक सुख भी अविनाशी होगा। इन्द्रियाँ खुद ही विनाशी हैं तो सुख भी विनाशी होगा। कोई भी विनाशी यानी थोड़े समय का सुख, temporary सुख नहीं चाहता । अगर किसी को भी कहो कि 2 घण्टे का सुख ले लो और 22 घण्टे का दु:ख ले लो तो कौन मानेगा। यही सोचेगा कि मुझे सदा सुख हो, दु:ख का नाम-निशान न हो। तो कौन सा सुख अच्छा होता है ? इन्द्रियों का सुख य आत्मा का सुख ,तो हम सब एक ही स्वर में कहेंगें आत्मा का सुख क्योंकि आत्मा का सुख स्थाई है और इन्द्रिय सुख ( sense pleasure ) अस्थाई, temporary 

क्या अतीन्द्रिय सुख में रहने वालों को कभी भी दु:ख नहीं हो सकता, अवश्य हो सकता है? कई लोग कहते सुने गए हैं – मुझे अपना तो कोई दु:ख नहीं है लेकिन जब कोई दूसरा दु:ख देता है तो क्या करें? दूसरा देता है तो आप लेते क्यों हो भाई ? यह तो आपके ऊपर निर्भर करता है कि आपने क्या लेना है। अगर आपको कोई ऐसी चीज़ दे जो आपको पसंद न हो और आप इंकार कर दो तो वह किसके पास रहेगी? उसके पास ही रहेगी जो दे रहा है। जिसके पास जो कुछ है, वह वही देगा। उसके पास दुःख है तो वह दु:ख ही देगा। लेकिन आप न लो। आपका स्लोगन है – सुख दो, सुख लो; न दु:ख दो, न दु:ख लो। अगर कभी कभार थोड़ी दु:ख की लहर आ भी जाती है, तो उसे भी परिवर्तन कर उसको सुख दे दो, उसको भी सुखी बना दो। 

“सुखदाता के बच्चे हो, सुख देना और सुखी रहना – यही आपका काम है।”

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सभी सहकर्मी इसी स्लोगन पर कार्य कर रहे हैं।

इन्द्रिय भोग कोई आपत्ति नहीं : 

अभी कुछ समय पहले वाले लेखों में हमने ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी इन्द्रिय-सुख की बात की। हमने चर्चा की थी कि र्ईश्वर की बनाई वस्तुओं के उपभोग से आनंद लेने में क्या आपत्ति है? ईश्वर ने हमें 11 इन्द्रियाँ इसीलिये दी हैं कि हम वस्तुओं का आनंद ले सकें। लेकिन आनंद लेने की प्रक्रिया में एक rider लगाते हुए सावधान भी किया था कि हर वस्तु के उपभोग के लिए कुछ नियम और सीमाएँ भी होती है और हमें उन नियमों के दायरे में रह कर ही इन्द्रिय भोग का आनंद उठाना चाहिए। हर वस्तु की एक अंतर्निहित प्रकृति होती है। ईश्वर ने हमें केवल इन्द्रियाँ ही नहीं दी हैं वरन्‌ विवेक-बुद्धि भी दी है। जो व्यक्ति उसका उपयोग न कर, इन्द्रिय सुखों के पीछे भागते रहते हैं, उन्हें कभी सुख शान्ति नहीं मिल सकती। उनका अंत हमेशा दुःखद ही होगा।

आइये ज़रा एक कहानी पढ़कर इस चर्चा का आनंद लें :

एक यात्री विदेश गया। उस देश में वह पहली बार गया था। वहाँ के लोग उसके लिये अजनबी थे। उसे वहाँ की भाषा नहीं आती थी, न उनके रीति रिवाज मालूम थे, न खानपान की आदतें ज्ञात थी। वह घूमते घामते, बाज़ार में पहुँच गया, जहाँ खरीददारों की बहुत भीड़ थी। बाजार में तरह तरह के फल थे, जो उसने पहले नहीं देखे थे। उसने देखा कि बहुत से लोग एक विशिष्ट सुन्दर फल खरीद रहे थे। उसने सोचा कि ये फल ज़रुर स्वादिष्ट होगा और एक थैला भर खरीद लिया। घर आकर उसने एक फल चखा। फल जरा भी मीठा नहीं था उसका मुँह जलने लगा,उसने फल का मध्यभाग चखा,वह भी तीखा था। फल का दूसरा सिरा भी बहुत तीखा निकला। उसने दूसरा फल चखा, वह भी तीखा निकला। उसने सोचा कोई फल तो मीठा होगा, उसने एक एक करके सभी फल चखे। तीखे स्वाद के फलों से उसका मुँह जलता रहा,आँसू बहने लगे, पर वह ज़िद्दपूर्वक एक के बाद एक फल खाता ही गया। बेचारा बहुत पीड़ा में था। मीठे स्वादिष्ट फल की तलाश में उसे मिले केवल मुँह जलाने वाले, तीखे स्वाद के फल। परंतु इस झूठी आशा में कि कोई फल तो मीठा होगा वह अंतिम फल तक खाता ही चला गया लेकिन एकमात्र सुख जो उसे मिला, वह था उस फल की “सुंदरता का सुख।” सुंदरता के सुख ने उसे आंसू बहाने पर विवश कर दिया। 

क्रमशः जारी -To be continued 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं

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24 आहुति संकल्प 

 7 मार्च 2022 वाले लेख के स्वाध्याय के उपरांत निम्नलिखित 5 सहकर्मियों ने संकल्प पूर्ण किया है। 

(1)अरुण वर्मा-30, (2)सरविन्द पाल-36, (3) संध्या कुमार -25, (4)पूनम कुमारी-28, (5) रेणु श्रीवास्तव-29 

सरविन्द पाल जी ने 36 अंक प्राप्त करके गोल्ड मैडल हासिल किया है।हमारी व्यक्तिगत एवं परिवार की सामूहिक शुभकामना। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्

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