ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम एक दुसरे  के पूरक 

26  फरवरी 2022 का ज्ञानप्रसाद-ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम एक दुसरे  के पूरक 

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित लघु पुस्तिका “इन्द्रिय संयम का महत्त्व” पर आधारित आदरणीय संध्या कुमार जी की लेख श्रृंखला का यह छठा एवं अंतिम  पार्ट है। आज के  लेख में ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार, सत्कार्य द्वारा प्राप्त किया गया आहार यानि हिंसा शून्य आहार  आदि की चर्चा की गयी है। “जैसा खाये अन्न वैसा होए मन” का   सूत्र character building, opposite sex attraction के परिपेक्ष्य में समझने का प्रयास किया गया है। अंत में परम पूज्य गुरुदेव के जीवन से शिक्षा लेने का प्रयास किया गया है। “इन्द्रिय संयम का महत्त्व” पुस्तक को अध्ययन करने का आग्रह किया गया है और ऑनलाइन पढ़ने के लिए लिंक भी दिया गया है। 

कल शनिवार को अवकाश रहेगा और आप प्रतीक्षा कीजिये सोमवार को एक और रोचक ज्ञानवर्धक ज्ञानप्रसाद की। 

आइये चलें संग -संग 

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ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम एक दूसरे के पूरक ही समझे जाते हैं। प्राचीनकाल से ही ब्रह्मचर्य पर अत्याधिक महत्त्व दिया गया है क्योंकि इसे शक्ति संचय के लिये बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरुदेव ने भी ब्रह्मचर्य पर बहुत  महत्त्व दिया है। वह  कहते हैं संसार में जितने भी व्यक्तियों ने महान एवं उपयोगी कार्य किये हैं, वह सभी किसी न किसी रूप में ब्रह्मचर्य के अनुयायी रहे हैं। ब्रह्मचर्य का मतलब यह कदापि नहीं है कि कामवृति का सर्वथा त्याग कर दिया जाए। उचित अवस्था प्राप्त होने पर शास्त्रों  की मर्यादा  के अनुसार कामवृति का उपयोग सर्वथा मान्य  है।

जीवन को शुद्ध बनाने के लिये जिन लोगों ने साधना  की है  उनका मानना है कि आहारशुद्धो  सत्वशुद्धिः -इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते हैं।  (1)अगर आहार शुद्ध है, स्वच्छ है, ताजा है, परिपक्व है, सुपाच्य है, प्रभाव युक्त है, उसके घटक परम्परागत हैं तो उनके सेवन से शरीर के रक्त, मज्जा, शुक्र आदि सब घटक शुद्ध होते हैं।  साथ ही वात, पित्त, कफ आदि की अवस्था भी balanced  रहती है और सप्तधातु परिपुष्ट होकर शरीर सुदृढ,कार्यक्षम तथा सब तरह के आघात सहन करने योग्य बनता है,और आरोग्य शरीर का मन पर भी सुप्रभाव पड़ता है। (2) आहार शुद्धि का दूसरा व्यापक अर्थ है यदि आहार प्रामाणिक  है एवं सत्कार्य द्वारा प्राप्त किया गया अर्थात्‌ हिंसा शून्य  है और यज्ञ, दान, तप का क़र्ज़  अदा करने से प्राप्त किया गया है तो उससे चारित्र्य शुद्धि  का मार्ग प्रशस्त होता है। अगर चारित्र्य शुद्धि  के लिये आहार शुद्धि महत्वपूर्ण है तो लैंगिक शुद्धि भी किसी न किसी रूप में आहार य भोजन के साथ जुड़ी हुई है। यहाँ लैंगिक शब्द opposite sex के सन्दर्भ में प्रयोग किया गया है।   

यह समझने की बात है कि जिसे हम कामविकार य लैंगिक आकर्षण कहते हैं उसके लिए  मानव के सारे पहलू उत्तेजित हो जाते हैं, जिसमें  मन, शरीर, हृदय की भावनायें और आत्मिक निष्ठा सब का सहयोग अनिवार्य होता है । ऐसी प्रवृत्ति का का विचार स्वार्थपरत के कारण एकांगी नहीं होना चाहिए। जीवन के सार्वभौम और सर्वोत्तम मूल्य से ही उसका विचार किया जाना चाहिये। जिस आचरण में शारीरिक प्रेरणा या लिप्सा के वश में होकर कार्य किया जाता है तथा बाकी सब तत्वों का अपमान किया जाता है, ऐसा आचरण  समाज द्रोह  तो करता ही है, उससे अधिक  मनुष्य के व्यक्तित्व के प्रति महान द्रोह करता है। 

यह भी समझ लेने की बात है कि हृदय की एकता, स्नेह, निष्ठा, अत्याधिक आवश्यक है। संयम और निष्ठा वैवाहिक जीवन की प्रथम आवश्यकता तो है ही इसके साथ ही सामाजिकता की बुनियाद भी है। संयम से जो शक्ति पैदा होती है वही चरित्र का आधार है, इसके साथ ही निष्ठा भी अवश्यभावी है। 

जब मनुष्य संयम और निष्ठा जैसी उदार एवं उत्तम भावनाओं को साथ रखता है, तब वह विपरित परिस्थितियों में भी  पुण्य एवं पवित्रता उत्पन्न करता है। महात्मा इमरसन ने कहा था कि यदि तुमने मुझे नर्क  में भेज दिया तो मैं वहां भी अपने लिये स्वर्ग बना लूँगा। अतः यह स्पष्ट है कि अपने लिये वातावरण हम स्वयं बनाते हैं।  यह हमारे सोच, विचार, संयम, निष्ठा आदि सात्विक गुणों पर निर्भर करता है ।

यह सत्य है कि संयम और धैर्य चरित्र की सबसे बड़ी शक्ति है। सारी इंद्रियों का मालिक मन है।  मनुष्य को उसे ही काबू में रखना चाहिए, मन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए  जिससे वह बे-लगाम  घोड़े की भाँति न दौड़ सके। मन मनुष्य का सेवक बनकर इंद्रियों का सदुपयोग करने दे जिससे मनुष्य जीवात्मा को परिष्कृत करते हुए उन्नत जीवन प्राप्त कर सके। 

यह एक दिव्य संजोग ही हो सकता है कि हमने केवल दो माह पूर्व ही मनोनिग्रह पर आधारित लेखों का विस्तृत अमृतपान किया और अब गुरुदेव की प्रेरणा से इन्द्रिय-संयम पर अध्ययन एवं चर्चा का सौभाग्य प्राप्त  हुआ। मनोनिग्रह लेख श्रृंखला में  भगवान श्रीकृष्ण, महात्मा बुद्ध, श्री रामकृष्ण परमहँस, स्वामी विवेकानंद , श्रीमां आदि दिव्य आत्माओं के विचारों एवं कथनों के माध्यम से  मन को बांधने और  वश में रखने के लिए  भक्तिमार्ग को सर्वोत्तम बताया है। भक्ति मार्ग पर चलते हुए स्वाध्याय,सत्संग,जप, ध्यान, चिंतन, मनन  आदि के माध्यम से  ईश्वर के समीप पहुंचने का मार्ग सरल हो सकता  है। जब मनुष्य मनोनिग्रह  में सफल हो जाता है तब वह मन का स्वामी बन जाता है, मन सेवक बनकर  सहयोग देता है। मनोनिग्रह की  सफलता से मनुष्य इंद्रिय-संयम  में भी सफल होकर जीवात्मा को परिष्कृत करते हुए जीवन को उन्नत एवं आनंदित बना सकता है। मन ही कुंजी है, मन ही धुरी है इसलिए  उसे विवेक से नियंत्रण में रखना चाहिए, तभी मनोनिग्रह सफल हो पाता  है एवं इसी सफ़लता से इंद्रिय-संयम में  सफ़लता निश्चित ही  सम्भव है।

परमपूज्य गुरुदेव का जीवन -एक उदाहरण 

हम सब के समक्ष परम पूज्य गुरुदेव का जीवन चरित्र एक ज्वलन्त उदाहरण के रूप में है। महाकाल गुरुदेव  इंद्रिय-संयम की पराकाष्ठा पर रहे। उन्होंने  गुरुसत्ता के निर्देशों का पालन करते हुए किशोरावस्था में ही अपनी जिव्हा को सेवक बना लिया, जौ  की रोटी और छाछ को अपना भोजन बना लिया। मन-मस्तिष्क जो सारी इंद्रियों की कुंजी  है उसे  माँ गायत्री को समर्पित कर दिया और  किशोर श्रीराम से आचार्य  श्रीराम  बन कर दिखा दिया।

कामवृति सदुपयोग पर भी गुरुदेव  एक सशक्त उदाहरण हैं । गुरुदेव विवाहित रहे, सपत्नीक रहे, संतानोत्पत्ति भी किये किंतु समय, संयम और सीमा का पूर्ण रूप से पालन किया। अपनी धर्मपत्नी वंदनीय माताजी  को वह माताजी कहकर ही संबोधित करते रहे और उन्हें अपनी सहयोगी, साथी के रूप में मान सम्मान देते रहे । जब गुरुदेव ने शरीर त्यागने का निर्णय लिया तो अपनी समस्त जिम्मेदारियाँ माताजी को सौंप दी। वंदनीय माता जी ने भी पूर्ण  निष्ठा और  समर्पण से समस्त  जिम्मेदारियों पर कोई आँच नहीं आने दी। परम पूज्य गुरुदेव का ‘मनो निग्रह’ एवं ‘इंद्रिय निग्रह’ अद्वितीय है। ऑनलाइन ज्ञानरथ के संचालक आदरणीय डॉक्टर अरुण त्रिखा  जी ने गुरुदेव  की मथुरा से विदाई का अद्भुत प्रस्तुतिकरण किया था, जिसमें हमने देखा कि स्नेह, प्यार, अपनत्व से जोड़े गये विशाल जनसमुदाय से अलग होते समय करुणा, वेदना से गुरुदेव के मन मस्तिष्क में क्या  उथल पुथल मची हुई थी, किंतु अपनी गुरुसत्ता से बाँध कर, गुरुसत्ता की आज्ञा का पालन करते हुए, समस्त  इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए गुरुदेव घोर तपस्या के लिए  चल पड़े थे। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा मनोनिग्रह एवं इंद्रिय संयम के परिणाम हम सबके समक्ष हैं। 

हम सब को गुरुदेव  के बताए  निर्देशों का पालन करते हुए  मनोनिग्रह  का संकल्प लेकर इंद्रिय-संयम की ओर कदम बढ़ाते हुए स्वयं का परिष्कार करते हुए, जन जन को जगाने का लक्ष्य बनाकर नवयुग का निर्माण करना होगा।इस महान कार्य में  स्वयं का  सुधार अति आवश्यक है। अखंड ज्योति के  जनवरी 1962 के अंक में  गुरुदेव लिखते हैं कि दूसरों को सुधारना  कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने, यह कैसे हो सकता है। हम अपनेआप को तो सुधार ही सकते हैं। अपनेआप  को तो सन्मार्ग पर  चला ही सकते हैं । अतः गुरुदेव का गोल्डन उद्घोष  “हम सुधरेंगे,युग सुधरेगा-‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’ स्वयं अपनाते हुए औरों को भी अपनाने का संकल्प लेना चाहिए नहीं तो यह हर आयोजन में एक उद्घोष बन कर ही रह जायेगा।  नया सवेरा  लाने के लिये स्वयं से ही शुरूआत करनी होगी, यही हम सब की गुरुभक्ति होगी, गुरुदक्षिणा होगी। ऐसे गुरु को हम नतमस्तक हैं जिन्होंने अपने बच्चों के कार्य को इतना सरल बना दिया  जय गुरुदेव

इंद्रिय-संयम का महत्व  गुरुदेव द्वारा लिखित केवल 25 पन्नों की  एक लघु पुस्तक है जिसमें विशाल ज्ञान का भंडार समाया हुआ है। आपसे निवेदन है कि  इस पुस्तक का  अध्ययन, चिंतन, मनन एवं अनुपालन करें।  http://beta.literature.awgp.in/book/Indriya_Sanyam_Ka_Mahatva/v3.4

इतिश्री 

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24  आहुति संकल्प 

25  फ़रवरी 2022 वाले लेख के स्वाध्याय के उपरांत 5  सहकर्मियों ने संकल्प पूर्ण किया है 

यह सहकर्मी निम्नलिखित हैं :(1 )प्रेरणा कुमारी-25,(2 )अरुण वर्मा-33,(3 )सरविन्द पाल-32,(4 )संध्या कुमार -24,(5 )रेनू श्रीवास्तव -24  अरुण वर्मा जी 33  अंक प्राप्त करते हुए गोल्ड मैडल विजेता घोषित किये जाते हैं। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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